धर्मरथ का अभेद्य कवच: विप्र और गुरु का सम्मान | रामचरितमानस प्रसंग
धर्मरथ श्रृंखला • भाग 7 धर्मरथ का अभेद्य कवच: विप्र और गुरु का सम्मान श्रीरामचरितमानस के धर्मरथ प्रसंग की सरल और प्रेरक व्याख्या जय श्री राम 🙏 श्रीरामचरितमानस के लंकाकाण्ड में भगवान श्रीराम विभीषण को धर्ममय रथ का ऐसा रहस्य बताते हैं, जिसमें जीवन की विजय के लिए आवश्यक प्रत्येक गुण को रथ के किसी न किसी अंग से जोड़ा गया है। पिछले भाग में हमने जाना कि निर्मल और अचल मन धर्मरथ का तरकस तथा शम, यम और नियम उसके अनेक बाण हैं। अब भगवान श्रीराम इस धर्मरथ के अभेद्य कवच का वर्णन करते हैं। कवच अभेद बिप्र गुर पूजा। एहि सम बिजय उपाय न दूजा॥ चौपाई का सरल अर्थ भगवान श्रीराम कहते हैं कि विप्र और गुरु का आदर-पूजन धर्मरथ का अभेद्य कवच है। और इसके समान विजय का दूसरा उपाय नहीं है। इसका गहरा भाव यह है कि जीवन में ज्ञान देने वालों, धर्ममार्ग दिखाने वालों और सद्गुरु के प्रति श्रद्धा, विनय और सम्मान मनुष्य को अहंकार से बचाते हैं और उ...