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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 5 | श्रीराम नाम की महिमा और नाम-रूप रहस्य अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ ◆ ◆ ◆ श्रीरामचरितमानस — बालकाण्ड भाग 5 — श्रीराम नाम की महिमा और नाम-रूप का रहस्य मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • विस्तृत भावार्थ गोस्वामी तुलसीदास कृत भाग 5 का प्रसंग पिछले भाग में गोस्वामी तुलसीदासजी ने माता सीता और भगवान श्रीराम को वाणी और अर्थ के समान अभिन्न बताते हुए उनकी वंदना की थी। अब बालकाण्ड का अत्यंत प्रसिद्ध श्रीराम नाम की महिमा वाला प्रसंग आरंभ होता है। इस प्रसंग में तुलसीदासजी बताते हैं कि रामनाम वेदों का प्राण, शिवजी का महामंत्र, भक्तों का आधार और कलियुग में जीवों के कल्याण का सरल साधन है। आगे नाम और रूप के संबंध, निर्गुण-सगुण ब्रह्म तथा विभिन्न युगों में नाम के प्रभाव का गहरा वर्णन किया गया है। ◆ श्रीराम नाम की वंदना चौपाई बंदउँ नाम राम रघुबर को। हेतु कृसानु भानु हिमकर को॥ बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो। अगुन अनूपम गुन निधान सो॥ सरल अर्थ: तुलसीदासजी श्रीरघुनाथजी के “राम” नाम की वंदना करते हैं। रामनाम के अक्षरों को अग्नि, सूर्य और चंद्रमा के मूल कारण के रूप में चित्रित किया गया है। यह नाम ब्रह...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 4 | सरस्वती-गंगा, अयोध्या, हनुमान और सीताराम वंदना अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ ◆ ◆ ◆ श्रीरामचरितमानस — बालकाण्ड भाग 4 — सरस्वती-गंगा, अयोध्या, हनुमान और सीताराम वंदना मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • विस्तृत भावार्थ गोस्वामी तुलसीदास कृत भाग 4 का प्रसंग पिछले भाग में गोस्वामी तुलसीदासजी ने महर्षि वाल्मीकि, चारों वेद, ब्रह्माजी, देवताओं और विद्वानों की वंदना की थी। अब वे माता सरस्वती और गंगाजी, भगवान शिव और माता पार्वती, श्रीअयोध्यापुरी, सरयूजी, महाराज दशरथ, माता कौसल्या, राजा जनक, भरतजी, लक्ष्मणजी, शत्रुघ्नजी, श्रीहनुमानजी तथा श्रीराम के सभी भक्तों को प्रणाम करते हैं। अंत में जगज्जननी सीताजी और श्रीरघुनाथजी के चरणों की वंदना करके वे रामनाम की महिमा के अगले महान प्रसंग की भूमिका तैयार करते हैं। ◆ सरस्वती और गंगा वंदना चौपाई पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता। जुगल पुनीत मनोहर चरिता॥ मज्जन पान पाप हर एका। कहत सुनत एक हर अबिबेका॥ सरल अर्थ: अब तुलसीदासजी माता सरस्वती और गंगाजी की वंदना करते हैं। दोनों का चरित्र अत्यंत पवित्र और मनोहर है। गंगाजी में स्नान और उनका जल ग्रहण करना पापों को दूर करता है,...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 3 | तुलसीदासजी की विनम्रता, कवि वंदना और वाल्मीकि-वेद वंदना अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ ◆ ◆ ◆ श्रीरामचरितमानस — बालकाण्ड भाग 3 — तुलसीदासजी की विनम्रता, कवि वंदना और वाल्मीकि-वेद वंदना मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • विस्तृत भावार्थ गोस्वामी तुलसीदास कृत भाग 3 का प्रसंग पिछले भाग में गोस्वामी तुलसीदासजी ने सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत को श्रीराममय मानकर प्रणाम किया। अब वे अपनी अल्प बुद्धि का वर्णन करते हुए अत्यंत विनम्र भाव से श्रीरघुनाथजी के अथाह चरित्र का गान करने की अनुमति और कृपा माँगते हैं। इसी क्रम में वे रामनाम से युक्त कविता की महिमा बताते हैं, अपने दोषों और सीमाओं को स्वीकार करते हैं तथा प्राचीन और वर्तमान कवियों, महर्षि वाल्मीकि, चारों वेदों, ब्रह्माजी, देवताओं, ब्राह्मणों और विद्वानों की वंदना करते हैं। ◆ तुलसीदासजी की विनम्र प्रार्थना चौपाई आकर चारि लाख चौरासी। जाति जीव जल थल नभ बासी॥ सीय राममय सब जग जानी। करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥ सरल अर्थ: चौरासी लाख योनियों में जितने भी जीव जल, पृथ्वी और आकाश में रहते हैं, तुलसीदासजी पूरे संसार को सीता-राममय जानकर दोनों हाथ...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 2 | खल वंदना, संत-असंत स्वभाव और जीवमात्र वंदना अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ ◆ ◆ ◆ श्रीरामचरितमानस — बालकाण्ड भाग 2 — खल वंदना, संत-असंत स्वभाव और जीवमात्र वंदना मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • विस्तृत भावार्थ गोस्वामी तुलसीदास कृत भाग 2 का प्रसंग बालकाण्ड के प्रथम भाग में गुरु, संत और सत्संग की महिमा का वर्णन हुआ। अब गोस्वामी तुलसीदासजी अत्यंत विनम्र और व्यंग्यपूर्ण शैली में दुष्ट स्वभाव वाले लोगों की भी वंदना करते हैं। इसके बाद संत और असंत के स्वभाव, गुण-दोष के विवेक, सत्संग और कुसंग के प्रभाव तथा अंत में सम्पूर्ण जड़-चेतन जगत को श्रीराममय मानकर सभी जीवों की वंदना की गई है। ◆ खल वंदना चौपाई बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥ पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥ सरल अर्थ: तुलसीदासजी अब दुष्टजनों की भी सच्चे भाव से वंदना करते हैं। उनका स्वभाव ऐसा होता है कि वे बिना किसी कारण भी दूसरों के विपरीत चलते हैं। दूसरों की हानि को अपना लाभ समझते हैं और...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 1 | मंगलाचरण, गुरु वंदना और संत वंदना अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥ ◆ ◆ ◆ श्रीरामचरितमानस — बालकाण्ड भाग 1 — मंगलाचरण, गुरु वंदना और संत वंदना मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • विस्तृत भावार्थ गोस्वामी तुलसीदास कृत बालकाण्ड का शुभारंभ श्रीरामचरितमानस के प्रथम सोपान बालकाण्ड का आरंभ अत्यंत पवित्र मंगलाचरण से होता है। गोस्वामी तुलसीदासजी सबसे पहले वाणी, बुद्धि, श्रद्धा, विश्वास, गुरु, माता सीता, भगवान श्रीराम, महर्षि वाल्मीकि और श्रीहनुमानजी सहित पूज्य शक्तियों का स्मरण करते हैं। इसके बाद गुरुचरणों की महिमा, संतों के पवित्र स्वभाव तथा सत्संग के प्रभाव का वर्णन करते हुए श्रीरामचरित की कथा के लिए आध्यात्मिक भूमिका तैयार की जाती है। ◆ मंगलाचरण — संस्कृत श्लोक श्लोक 1 वर्णानामर्थसङ्घानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥१॥ सरल अर्थ: मैं माता सरस्वती और श्रीगणेशजी की वंदना करता हूँ, जो अक्षरों, उनके अर्थों, रसों, छंदों तथा समस्त मंगल के कर्ता हैं। ...

हनुमान जी अपनी शक्ति क्यों भूल गए? ऋषियों के शाप से जाम्बवान के स्मरण तक पूरी कथा

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भक्ति भावना • श्री हनुमान भक्ति ॥ जय श्री सीताराम ॥ हनुमान जी अपनी शक्ति क्यों भूल गए? बाल्यकाल के शाप से जाम्बवान के स्मरण और समुद्र लाँघने तक पूरी कथा जिन हनुमान जी का नाम साहस, बुद्धि और अतुलित बल का स्मरण कराता है, उन्हें अपने सामर्थ्य का स्मरण क्यों कराना पड़ा? क्या उनका बल समाप्त हो गया था? किसने शाप दिया और जाम्बवान के वचन सुनकर क्या हुआ? इस कथा को समझने के लिए पहले बाल हनुमान के प्रसंग में चलना होगा, फिर उस समुद्रतट पर जहाँ माता सीता की खोज में पहुँची वानर-सेना के सामने विशाल समुद्र की चुनौती खड़ी थी। कथा का आधार: बाल्यकाल के शाप का वृत्तांत वाल्मीकि रामायण के उत्तरकाण्ड में मिलता है। आगे का जाम्बवान–हनुमान संवाद यहाँ श्रीरामचरितमानस की चौपाइयों और उनके सरल भावार्थ के साथ समझाया गया है। 1. बाल हनुमान का सामर्थ्य और चंचलता उत्तरकाण्ड के वृत्तांत में देवताओं के वरदानों से संपन्न बाल हनुमान अत्यंत सामर्थ्यवान थे। बालसुलभ चंचलता में वे मुनियों के आश्रमों में पात्र, यज्ञ-सामग्री और वल्कल आदि बिखेर...

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