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भक्ति भावना पर हाल ही में प्रकाशित लेख और धार्मिक सामग्री

श्रीमद्भागवत महापुराण षष्ठ स्कन्ध भाग 2 — अध्याय 4, दक्ष की हंसगुह्य स्तुति

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ श्रीमद्भागवत महापुराण षष्ठ स्कन्ध • भाग 2 अध्याय 4 • प्रचेताओं की कथा, दक्ष की हंसगुह्य स्तुति और भगवान का प्राकट्य 54 मूल श्लोक • प्रत्येक का अलग सरल हिंदी भावार्थ ← षष्ठ स्कन्ध भाग 1 पढ़ें · भागवत के सभी प्रकाशित भाग अजामिल-प्रसंग और यमराज के उपदेश के बाद परीक्षित सृष्टि-विस्तार के विषय में पूछते हैं। शुकदेवजी उत्तर में प्रचेताओं और दक्ष प्रजापति की कथा सुनाते हैं। अध्याय का आरम्भ वृक्षों को नष्ट करने वाले क्रोध को शांत करने के उपदेश से होता है और उसका मध्य भगवान की हंसगुह्य स्तुति से प्रकाशित है। अन्त में भगवान दक्ष को प्रजा-विस्तार का निर्देश देते हैं। पाठ-सूचना: यह षष्ठ स्कन्ध का पूरा चौथा अध्याय है। मूल संस्कृत और स्वतंत्र सरल हिंदी भावार्थ अलग रखे गए हैं। कथा के विवाह, प्रजापति और सृष्टि-विस्तार सम्बन्धी कथन उसके पुराण-प्रसंग में पढ़ें। स्तुति में आने वाले दार्शनिक विचारों का भाव सरल किया गया है; हिंदी भावार्थ मूल श्लोक का विकल्प नहीं है। अध्ययन का क्रम श्लोक 1–22: सृष्टि का प्रश्न, प्रचेता और दक्ष की तपस्या श्लोक 23–34: दक्ष की ...

श्रीमद्भागवत महापुराण षष्ठ स्कन्ध भाग 1 — अध्याय 1–3, अजामिल उपाख्यान और नाम-महिमा

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ श्रीमद्भागवत महापुराण षष्ठ स्कन्ध • भाग 1 अध्याय 1–3 • अजामिल उपाख्यान, नाम-महिमा और यमराज का उपदेश 152 मूल श्लोक • प्रत्येक का अलग सरल हिंदी भावार्थ ← पंचम स्कन्ध का अंतिम भाग · भागवत के सभी प्रकाशित भाग पंचम स्कन्ध के अंत में कर्मफल और भगवान के विराट स्वरूप का वर्णन आया। षष्ठ स्कन्ध का आरम्भ परीक्षित के अत्यन्त व्यावहारिक प्रश्न से होता है—मनुष्य अधर्म के दुःखद फल से कैसे बचे? यदि प्रायश्चित्त करने के बाद फिर वही भूल होती रहे, तो भीतर का परिवर्तन किससे होगा? शुकदेवजी इसका उत्तर विवेक, संयम, सत्संग और भगवान की भक्ति से जोड़ते हुए अजामिल का उपाख्यान सुनाते हैं। कथा में पहले अजामिल का पतन, अन्तकाल में पुत्र को नारायण नाम से पुकारना और विष्णुदूतों द्वारा रक्षा आती है। इसके बाद उसे अपने कर्मों का पश्चात्ताप होता है; वह हरिद्वार जाकर साधना करता है और अन्ततः भगवान के पार्षदों का सान्निध्य पाता है। तीसरे अध्याय में यमराज स्वयं अपने सेवकों को भगवान की सर्वोच्चता, बारह महाजनों और नाम-संकीर्तन की महिमा समझाते हैं। पाठ को उसके पूरे क्रम में पढ़ें:...

श्रीमद्भागवत महापुराण पंचम स्कन्ध भाग 6 — अध्याय 24–26, पाताल लोक, अनन्त भगवान और कर्मफल

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥ श्रीमद्भागवत महापुराण पंचम स्कन्ध • भाग 6 अध्याय 24–26 • पाताल लोक, अनन्त भगवान और कर्मफल 86 क्रमांकित मूल पाठ • प्रत्येक का अलग सरल हिंदी भावार्थ ← पिछला भाग: अध्याय 20–23 · भागवत के सभी प्रकाशित भाग पिछले भाग में द्वीपों, सूर्यरथ और भगवान के शिशुमार रूप का वर्णन पढ़ा। अब पंचम स्कन्ध की अंतिम तीन अध्याय-कड़ियों में राहु की स्थिति, सात भूविवर, राजा बलि की निष्काम भक्ति, अनन्त शेष की महिमा और कर्म के अनुसार मिलने वाली गतियों का विवेचन आता है। इस भाग के अंत में पंचम स्कन्ध पूर्ण होता है। यह पाठ केवल लोकों का विवरण नहीं देता। बलि और प्रह्लाद का प्रसंग बताता है कि भगवान की सेवा भोग-ऐश्वर्य से श्रेष्ठ है। अनन्त भगवान के ध्यान और नाम की महिमा के बाद कर्मफल का वर्णन मनुष्य को अपने आचरण, दया, सत्य और उत्तरदायित्व पर विचार करने की प्रेरणा देता है। पाठ का संदर्भ: लोकों, योजन-परिमाणों और ग्रहण का यह वर्णन पुराण की पारम्परिक विश्वकल्पना तथा देवकथा के संदर्भ में है। नरक-वर्णन में कठोर दण्ड और तत्कालीन सामाजिक विधान आते हैं; इन्हें किसी व्यक्ति की वर...

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ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है | राम भजन लिरिक्स | Bhakti Bhavna

श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ | सरल अर्थ सहित

जय जय गिरिवरराज किशोरी | सीता जी की गौरी स्तुति | रामचरितमानस अर्थ सहित

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