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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 35 — प्रतापभानु का धर्मराज्य, वन में आखेट और कपटी मुनि का षड्यंत्र

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 35 प्रतापभानु का धर्मराज्य • वन में आखेट • कपटी मुनि • षड्यंत्र भाग 34 में “भूप प्रतापभानु बल पाई…” से “धरमसील सुंदर नर नारी…” तक आ चुका है। यह संशोधित लंबा भाग उसके ठीक बाद “सचिव धरमरुचि…” से शुरू होकर दोहा 168 तक जाता है। इस संस्करण में हर चौपाई, दोहा और सोरठा का अलग कार्ड और अलग सरल अर्थ रखा गया है। चौपाई सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥ गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥ सरल अर्थ: प्रतापभानु का मंत्री धर्मरुचि भगवान के चरणों में प्रेम रखने वाला था। राजा वेद-विहित धर्म का पालन, दान, शास्त्र-श्रवण और लोकहित के अनेक कार्य करता था। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है। चौपाई भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥ दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना॥ सरल अर्थ: प्रतापभानु का मंत्री धर्मरुचि भगवान के चरणों में प्रेम रखने वाला था। राजा वेद-विहित धर्म का पालन, दान, शास्त्र-श्रवण और लोकहित के अनेक कार्य करता था। इस चौपाई में कथा उसी...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 34 — प्रभु का अवतार-वचन, मनु-शतरूपा प्रसंग पूर्ण और प्रतापभानु कथा

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 34 अवतार-वचन • मनु–शतरूपा प्रसंग पूर्ण • प्रतापभानु कथा का आरंभ भाग 33 सोरठा 151 पर समाप्त हुआ था। अब प्रभु अपने भावी मनुष्यावतार की लीला का विस्तार बताते हैं, मनु-शतरूपा का प्रसंग पूर्ण होता है और याज्ञवल्क्यजी श्रीराम-जन्म के अगले हेतु के रूप में राजा प्रतापभानु की कथा आरंभ करते हैं। चौपाई इच्छामय नरबेष सँवारें। होइहउँ प्रगट निकेत तुम्हारें॥ अंसन्ह सहित देह धरि ताता। करिहउँ चरित भगत सुखदाता॥ सरल अर्थ: प्रभु कहते हैं कि वे अपनी इच्छा से सुंदर मनुष्यरूप धारण करके मनुजी के घर प्रकट होंगे और अपने अंशों सहित भक्तों को सुख देने वाली लीलाएँ करेंगे। चौपाई जे सुनि सादर नर बड़भागी। भव तरिहहिं ममता मद त्यागी॥ आदिसक्ति जेहिं जग उपजाया। सोउ अवतरिहि मोरि यह माया॥ सरल अर्थ: जो भाग्यवान इन लीलाओं को श्रद्धा से सुनेंगे वे ममता और अहंकार छोड़कर भवसागर पार करेंगे; प्रभु की आदिशक्ति भी अवतार लेंगी। चौपाई पुरउब मैं अभिलाष तुम्हारा। सत्य सत्य पन सत्य हमारा॥ पुनि पुनि अस कहि कृपानिधाना। अंतरधान भए भगवाना॥ सरल अर्थ: प्रभु मनु-शतरूपा की अभिलाषा पूर्ण करने का सत्य संकल्प दो...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 33 — मनु-शतरूपा को प्रभु दर्शन, पुत्ररूप वरदान और अवध अवतार का वचन

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 33 मनु–शतरूपा की प्रार्थना • प्रभु दर्शन • पुत्ररूप वरदान • अवध अवतार का वचन भाग 32 दोहा 145 पर समाप्त हुआ था। अब मनु और शतरूपा प्रभु से उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं। भगवान प्रकट होकर उन्हें दर्शन देते हैं और अंततः स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवध में अवतार लेने का वचन देते हैं। चौपाई सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥ सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥ सरल अर्थ: मनुजी प्रभु की स्तुति करते हैं—आप सेवकों के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु के समान हैं; आपके चरणों की रज ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी वंदित करते हैं। चौपाई जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू॥ जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं॥ सरल अर्थ: मनुजी कहते हैं—यदि हम पर आपकी कृपा है तो वही दिव्य स्वरूप दिखाइए जिसका शिवजी ध्यान करते और मुनि साधना करते हैं। चौपाई जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥ देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥ सरल अर्थ: वे उस सगुण-निर्गुण परम स्वरूप के प्रत्यक्ष दर्शन की प्...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 32 — मनु-शतरूपा का वैराग्य, नैमिषारण्य गमन और कठोर तप

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 32 मनु–शतरूपा • वैराग्य • नैमिषारण्य • द्वादशाक्षर मंत्र • कठोर तप भाग 31 दोहा 141 पर पूर्ण हुआ था। अब श्रीरामावतार के दूसरे कारण की कथा स्वायम्भुव मनु और शतरूपा से आरंभ होती है। धर्मपूर्वक राज्य करने के बाद वैराग्य, वनगमन, भक्ति और अत्यंत कठोर तप के द्वारा दंपति प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन की अभिलाषा करते हैं। चौपाई स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥ दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥ सरल अर्थ: स्वायम्भुव मनु और शतरूपा से मानव-सृष्टि का विस्तार हुआ। उनका धर्ममय आचरण इतना श्रेष्ठ था कि वेद भी उनकी मर्यादा का गान करते हैं। चौपाई नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू॥ लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहिं जाही॥ सरल अर्थ: मनुजी के पुत्र उत्तानपाद के पुत्र महान हरिभक्त ध्रुव हुए। उनके दूसरे पुत्र प्रियव्रत की भी वेद-पुराण प्रशंसा करते हैं। चौपाई देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥ आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥ सरल अर्थ: उनकी पुत्री देवहूति कर्दम मुनि की पत्नी...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 31 — नारद मोहभंग, शिवगणों का शापफल और रामावतार का दूसरा कारण

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 31 नारद मोहभंग • शिवगणों का शापफल • हरि माया • रामावतार का दूसरा कारण भाग 30 के बाद कथा नारदजी के पूर्ण मोहभंग से आगे बढ़ती है। शिवगणों के शाप का फल, प्रभु के मनुष्यावतार का एक हेतु और हरि-माया का रहस्य बताते हुए शिवजी अब श्रीरामावतार के दूसरे कारण की कथा आरंभ करते हैं। दोहा 138 बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान। सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥१३८॥ सरल अर्थ: भगवान ने नारदजी को अनेक प्रकार से समझाकर शांत किया और अंतर्धान हो गए। नारदजी श्रीराम के गुणों का गान करते हुए सत्यलोक को चले। चौपाई हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी॥ अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए॥ सरल अर्थ: शिवजी के गण नारदजी के पास आए और चरण पकड़कर विनती करने लगे। चौपाई हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया॥ श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला॥ सरल अर्थ: शिवगणों ने अपराध स्वीकार कर शाप को कृपा में बदलने की प्रार्थना की। चौपाई निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥ भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥ सर...

श्री रुद्राष्टकम् — संपूर्ण पाठ, सरल हिंदी अर्थ, महत्व और पाठ विधि

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श्री रुद्राष्टकम् — संपूर्ण पाठ, सरल अर्थ, महत्व और पाठ विधि | Bhakti Bhavna ॥ ॐ नमः शिवाय ॥ श्री रुद्राष्टकम् संपूर्ण पाठ • सरल अर्थ • महत्व • पाठ विधि श्री रुद्राष्टकम् भगवान शिव की प्रसिद्ध स्तुति है, जिसकी रचना गोस्वामी तुलसीदास जी ने की है। यह श्रीरामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में आता है। “अष्टकम्” का अर्थ आठ पदों वाली स्तुति है। इसमें भगवान शिव के निर्गुण, निराकार, करुणामय और कल्याणकारी स्वरूप की वंदना की गई है। रुद्राष्टकम् का भाव: यह स्तुति भक्त को भगवान शिव के विराट स्वरूप का स्मरण कराते हुए विनय, समर्पण और भक्ति की ओर ले जाती है। श्री रुद्राष्टकम् — संपूर्ण पाठ अर्थ सहित श्लोक 1 नमामीशमीशान निर्वाणरूपं विभुं व्यापकं ब्रह्मवेदस्वरूपम्। निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहम्॥ १॥ सरल अर्थ: मैं उन भगवान शिव को प्रणाम करता हूँ जो ईशानों के ईश, मोक्षस्वरूप, सर्वव्यापक और ब्रह्म-वेदस्वरूप हैं। वे निर्गुण, निर्विकल्प, इच्छारहित और चेतन आकाश के समान व्यापक हैं। श्लोक 2 निराकारमोङ्कारमूलं तुरीयं गिरा ज्ञान गोतीतमीशं गिरीशम्। करालं महाकाल...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 30 — विश्वमोहिनी स्वयंवर, नारद का श्राप और मोहभंग

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 30 विश्वमोहिनी स्वयंवर • नारद का क्रोध • श्राप • मोहभंग भाग 29 दोहा 133 पर समाप्त हुआ था। अब स्वयंवर-सभा में शिवगणों का उपहास, विश्वमोहिनी द्वारा भगवान का वरण, नारदजी को अपने रूप का बोध, शिवगणों और भगवान को दिया गया श्राप तथा अंत में भगवान द्वारा माया हटाकर नारदजी का मोह दूर करने का प्रसंग आता है। चौपाई जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥ तहँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥ सरल अर्थ: नारदजी रूप के अभिमान में जिस सभा में बैठे थे, वहीं शिवजी के दोनों गण भी ब्राह्मण-वेश में बैठ गए। चौपाई करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥ रीझिहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥ सरल अर्थ: शिवगण व्यंग्य करते हुए नारदजी की सुंदरता की प्रशंसा करने लगे। मोह के कारण नारदजी उस व्यंग्य को समझ नहीं पाए। चौपाई मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥ जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥ सरल अर्थ: नारदजी का मन माया के वश में था। शिवगण उनकी दशा देखकर मुस्करा रहे थे, पर भ्रमित बुद्धि के कारण...

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