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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 41 — विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा, मारीच-सुबाहु और अहल्या प्रसंग

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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 41 विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा, मारीच-सुबाहु और अहल्या प्रसंग की भूमिका कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 40 दोहा 209 पर समाप्त हुआ था। उसके ठीक बाद प्रातःकाल श्रीराम विश्वामित्रजी को निर्भय होकर यज्ञ करने के लिए कहते हैं। आगे मारीच-सुबाहु से यज्ञ की रक्षा, धनुष-यज्ञ की ओर प्रस्थान और मार्ग में गौतम मुनि के आश्रम का प्रसंग आता है। चौपाई प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जग्य करहु तुम्ह जाई॥ होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख कीं रखवारी॥ सरल अर्थ: प्रातःकाल श्रीराम ने विश्वामित्रजी से कहा कि अब आप निर्भय होकर यज्ञ कीजिए। तब सभी मुनि हवन करने लगे और श्रीराम स्वयं यज्ञ की रक्षा के लिए उपस्थित रहे। चौपाई सुनि मारीच निसाचर क्रोही। लै सहाय धावा मुनिद्रोही॥ बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा॥ सरल अर्थ: यज्ञ आरंभ होने का समाचार पाकर मुनियों का शत्रु मारीच अपने सहायकों सहित आ पहुँचा। श्रीराम ने उसे बिना फल वाले बाण से मारा, जिससे वह बहुत दूर समुद्र के पार जा गिरा। चौपाई पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा॥ मारि असुर द्विज निर्मयकारी...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 40 — विश्वामित्र के साथ यात्रा, ताड़का-वध और दिव्य विद्याओं की प्राप्ति

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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 40 विश्वामित्र के साथ यात्रा, ताड़का-वध और दिव्य विद्याओं की प्राप्ति कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 39 सोरठा 208 (ख) पर समाप्त हुआ था। अब विश्वामित्रजी के साथ यात्रा, ताड़का-वध और विद्याएँ प्रदान करने का प्रसंग आता है। चौपाई अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला॥ कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा॥ सरल अर्थ: श्रीराम के नेत्र अरुण हैं, वक्षस्थल और भुजाएँ विशाल हैं तथा उनका श्याम शरीर नीलकमल और तमाल के समान सुंदर है। कमर में पीत वस्त्र और सुंदर तरकस बँधा है तथा हाथों में सुंदर धनुष-बाण शोभित हैं। चौपाई स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। बिस्बामित्र महानिधि पाई॥ प्रभु ब्रह्मन्यदेव मै जाना। मोहि निति पिता तजेहु भगवाना॥ सरल अर्थ: श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई अत्यंत सुंदर हैं। विश्वामित्रजी उन्हें साथ पाकर महान निधि पाने जैसा आनंद अनुभव करते हैं और प्रभु की ब्राह्मण-भक्तवत्सलता का मन में अनुभव करते हैं। चौपाई चले जात मुनि दीन्हि दिखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई॥ एकहिं बान प्रान हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा॥ सरल अर्थ: मार्ग मे...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 39 — विश्वामित्र का अयोध्या आगमन और श्रीराम-लक्ष्मण का प्रस्थान

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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 39 विश्वामित्र का अयोध्या आगमन और श्रीराम-लक्ष्मण का प्रस्थान विश्वामित्रजी के साथ यज्ञ-रक्षा के लिए अयोध्या से प्रस्थान करते श्रीराम और लक्ष्मण — बालकाण्ड भाग 39 कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 38 दोहा 205 पर समाप्त हुआ था। उसके ठीक बाद कथा विश्वामित्रजी के आश्रम से आगे बढ़ती है। मारीच-सुबाहु के यज्ञ-विघ्न से चिंतित विश्वामित्र अयोध्या पहुँचकर श्रीराम और लक्ष्मण को साथ ले जाने का अनुरोध करते हैं। चौपाई यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई॥ बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन सुभ आश्रम जानी॥ सरल अर्थ: बाललीला का वर्णन पूरा करके कथा विश्वामित्रजी के पवित्र वन-आश्रम की ओर बढ़ती है। चौपाई जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहि डरहीं॥ देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं॥ सरल अर्थ: आश्रम में जप, यज्ञ और योग होता था, पर मारीच और सुबाहु यज्ञ में विघ्न डालकर मुनियों को दुःख देते थे। चौपाई गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी॥ तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा॥ सरल अर्थ: विश्वामित्रजी ...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 38 — श्रीराम जन्मोत्सव, नामकरण और बाललीला

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 38 श्रीराम जन्मोत्सव • नामकरण • दिव्य बालस्वरूप • कौसल्या को विराट दर्शन • बाललीला भाग 37 दोहा 192 पर समाप्त हुआ था। यह भाग उसी के ठीक बाद “सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी…” से आरंभ होकर श्रीराम की मनोहर बाललीलाओं के दोहा 205 तक जाता है। प्रत्येक चौपाई और दोहे का अलग कार्ड तथा उसी का अलग सरल अर्थ रखा गया है। चौपाई सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥ हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥ सरल अर्थ: शिशु की मधुर रुदन-ध्वनि सुनकर रानियाँ और दासियाँ दौड़ीं। पूरे अयोध्या नगर में आनंद छा गया। चौपाई दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना॥ परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठत करत मति धीरा॥ सरल अर्थ: पुत्र-जन्म का समाचार सुनकर दशरथजी ब्रह्मानंद में डूब गए; प्रेम से उनका शरीर पुलकित हो उठा। चौपाई जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई॥ परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥ सरल अर्थ: राजा को लगा कि जिनका नाम सुनना ही मंगलकारी है, वही प्रभु उनके घर आए हैं; उन्होंने उत्सव के बाजे बजवाए। चौपाई गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँका...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 37 — रावण के अत्याचार, देवताओं की पुकार और श्रीराम जन्म

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 37 रावण के अत्याचार • पृथ्वी की पुकार • अवतार-वचन • पुत्रेष्टि यज्ञ • श्रीराम जन्म भाग 36 दोहा 180 पर समाप्त हुआ था। यह लंबा भाग उसी के ठीक बाद “कामरूप जानहिं सब माया…” से आरंभ होकर श्रीराम जन्म के पावन प्रसंग और दोहा 192 तक जाता है। प्रत्येक चौपाई, दोहा, सोरठा और छन्द का अलग कार्ड तथा अलग सरल अर्थ रखा गया है। चौपाई कामरूप जानहिं सब माया। सपनेहुँ जिन्ह कें धरम न दाया॥ दसमुख बैठ सभाँ एक बारा। देखि अमित आपन परिवारा॥ सरल अर्थ: राक्षस इच्छानुसार रूप बदलने और माया करने में समर्थ थे। एक बार रावण ने सभा में अपने विशाल परिवार और शक्ति को देखा। चौपाई सुत समूह जन परिजन नाती। गनै को पार निसाचर जाती॥ सेन बिलोकि सहज अभिमानी। बोला बचन क्रोध मद सानी॥ सरल अर्थ: अपनी असंख्य संतानों, संबंधियों और सेना को देखकर रावण का अभिमान और बढ़ गया। चौपाई सुनहु सकल रजनीचर जूथा। हमरे बैरी बिबुध बरूथा॥ ते सनमुख नहिं करहिं लराई। देखि सबल रिपु जाहिं पराई॥ सरल अर्थ: रावण ने राक्षसों को देवताओं के विरुद्ध उकसाया और उनकी शक्ति को चुनौती दी। चौपाई तेन्ह कर मरन एक बिधि होई। कहउँ बुझाइ सुनहु ...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 36 — प्रतापभानु का अंत, रावणादि जन्म, वरदान और लंका

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 36 प्रतापभानु का अंत • ब्राह्मण-शाप • रावणादि जन्म • वरदान • लंका भाग 35 दोहा 168 पर समाप्त हुआ था। यह भाग उसी के ठीक बाद “एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें…” से आरंभ होकर दोहा 180 तक जाता है। हर चौपाई, दोहा और सोरठा का अलग कार्ड तथा उसी के नीचे अलग सरल अर्थ रखा गया है। चौपाई एहि बिधि भूप कष्ट अति थोरें। होइहहिं सकल बिप्र बस तोरें॥ करिहहिं बिप्र होम मख सेवा। तेहिं प्रसंग सहजेहिं बस देवा॥ सरल अर्थ: कपटमुनि राजा को समझाता है कि इस उपाय से ब्राह्मण उसके वश में हो जाएँगे और उनके यज्ञ-हवन के प्रभाव से देवताओं पर भी उसका प्रभाव हो जाएगा। चौपाई और एक तोहि कहउँ लखाऊ। मैं एहिं बेष न आउब काऊ॥ तुम्हरे उपरोहित कहुँ राया। हरि आनब मैं करि निज माया॥ सरल अर्थ: वह अपनी योजना का अगला चरण बताता है—वह इसी वेश में नहीं आएगा, बल्कि राजा के पुरोहित को माया से हटाकर उसका रूप धारण करेगा। चौपाई तपबल तेहि करि आपु समाना। रखिहउँ इहाँ बरष परवाना॥ मैं धरि तासु बेषु सुनु राजा। सब बिधि तोर सँवारब काजा॥ सरल अर्थ: कपटमुनि कहता है कि असली पुरोहित को एक वर्ष छिपाकर वह स्वयं उसका रूप लेकर राजा...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 35 — प्रतापभानु का धर्मराज्य, वन में आखेट और कपटी मुनि का षड्यंत्र

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 35 प्रतापभानु का धर्मराज्य • वन में आखेट • कपटी मुनि • षड्यंत्र भाग 34 में “भूप प्रतापभानु बल पाई…” से “धरमसील सुंदर नर नारी…” तक आ चुका है। यह संशोधित लंबा भाग उसके ठीक बाद “सचिव धरमरुचि…” से शुरू होकर दोहा 168 तक जाता है। इस संस्करण में हर चौपाई, दोहा और सोरठा का अलग कार्ड और अलग सरल अर्थ रखा गया है। चौपाई सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती। नृप हित हेतु सिखव नित नीती॥ गुर सुर संत पितर महिदेवा। करइ सदा नृप सब कै सेवा॥ सरल अर्थ: प्रतापभानु का मंत्री धर्मरुचि भगवान के चरणों में प्रेम रखने वाला था। राजा वेद-विहित धर्म का पालन, दान, शास्त्र-श्रवण और लोकहित के अनेक कार्य करता था। इस चौपाई में कथा उसी प्रसंग को क्रमशः आगे बढ़ाती है और आगे होने वाली घटना की भूमिका स्पष्ट करती है। चौपाई भूप धरम जे बेद बखाने। सकल करइ सादर सुख माने॥ दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना। सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना॥ सरल अर्थ: प्रतापभानु का मंत्री धर्मरुचि भगवान के चरणों में प्रेम रखने वाला था। राजा वेद-विहित धर्म का पालन, दान, शास्त्र-श्रवण और लोकहित के अनेक कार्य करता था। इस चौपाई में कथा उसी...

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