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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 68 | मिथिला से बारात की विदाई और अयोध्या की ओर प्रस्थान | दोहा 339–343 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥   •   भक्ति भावना प्रस्तुत श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग ६८ मिथिला से बारात का प्रस्थान और अयोध्या के निकट आगमन दोहा ३३९–३४३  •  मूल पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ गोस्वामी तुलसीदासजी की श्रीरामचरितमानस के इस भाग में मिथिला से श्रीसीताराम विवाह-बारात का प्रस्थान, जनकजी और दशरथजी के बीच स्नेहपूर्ण विदाई, राजा जनक की श्रीराम के प्रति भक्ति और अयोध्या की ओर मंगलमय यात्रा का प्रसंग पढ़िए। नीचे मूल चौपाइयाँ तथा दोहे क्रमवार और प्रत्येक का सरल हिंदी अर्थ दिया गया है। 📜 पाठ-सीमा: दोहा ३३८ के बाद से दोहा ३४३ तक — कुल २० चौपाई-इकाइयाँ और ५ दोहे। कोई छंद या सोरठा इस पाठ-खंड में अलग से नहीं है। दोहा 339 दोहा 340 दोहा 341 दोहा 342 दोहा 343 मिथिला से मंगलमय प्रस्थान और देवताओं की पुष्पवर्षा ✦ चौपाई 1 ✦ बहुबिधि भूप सुता समुझाई। नारिधरमु कुलरीति सिखाई॥ दासीं दास दिए बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे॥ सरल अर्थ — राजा जनक ने पुत्री को प्रेमपूर्वक समझाया और उस समय की कुल-परंपराओं की सीख दी। सीताजी के प्रिय सेवकों सहित बहुत-से दास-दासियाँ भी ...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 67 | माता सीता की भावपूर्ण विदाई और राजा जनक का वात्सल्य | दोहा 334–338 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥   •   भक्ति भावना प्रस्तुत श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग ६७ माता सीता की भावपूर्ण विदाई और राजा जनक का वात्सल्य दोहा ३३४–३३८   •   मूल पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ गोस्वामी तुलसीदासजी कृत श्रीरामचरितमानस के इस भाग में जनकपुर से माता सीता की विदाई का अत्यंत भावपूर्ण प्रसंग है। माताओं और सखियों का स्नेह, चारों राजकुमारों की विदाई, माता सुनयना का निवेदन तथा राजा जनक का पिता के रूप में वात्सल्य यहाँ मूल पाठ और सरल अर्थ सहित प्रस्तुत है। 📜 पाठ-सीमा: दोहा ३३३ के बाद से ३३८ तक — २० चौपाई-इकाइयाँ, ४ दोहे, १ सोरठा (३३६) और १ छंद। किसी भी मूल पंक्ति को संक्षेप में नहीं बदला गया है। पद 334 पद 335 पद 336 पद 337 पद 338 माता सीता को आशीर्वाद और विदाई की सीख ✦ चौपाई 1 ✦ सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई॥ चलिहि बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानीं॥ सरल अर्थ — जनकजी ने विदाई की सारी सामग्री सजाकर अयोध्या भेजी। बारात के लौटने का समाचार सुनकर महल की रानियाँ ऐसे व्याकुल हो गईं जैसे कम जल में मछलियाँ। ✦ चौपाई 2 ✦ पुनि पुनि स...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 66 | दशरथजी का गोदान और जनकपुर से विदाई की तैयारी | दोहा 329–333 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥   •   भक्ति भावना प्रस्तुत श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग ६६ विवाह-भोज, दशरथजी का गोदान और जनकपुर से विदाई की तैयारी दोहा ३२९–३३३   •   मूल पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ श्रीगोस्वामी तुलसीदासजी कृत रामचरितमानस का यह क्रमिक भाग पिछले भाग ६५ के दोहा ३२८ के ठीक बाद आरंभ होता है। इसमें जनकपुर के विवाह-भोज का समापन, राजा दशरथ का गोदान, मुनियों का सम्मान, जनकजी का प्रेम और बारात की विदाई की तैयारियों का मूल पाठ तथा सरल अर्थ दिया गया है। 📜 पाठ-सीमा: २० चौपाई-इकाइयाँ और ५ दोहे (३२९–३३३)। मूल चौपाई के नीचे उसका अलग सरल अर्थ। दोहा 329 दोहा 330 दोहा 331 दोहा 332 दोहा 333 जनकपुर की जेवनार और प्रेमपूर्ण अतिथि-सत्कार ✦ चौपाई 1 ✦ पंच कवल करि जेवन लअगे। गारि गान सुनि अति अनुरागे॥ भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने॥ सरल अर्थ — अतिथि पाँच ग्रास लेकर भोजन प्रारंभ करते हैं। प्रेम से गाए जा रहे पारंपरिक हास्यपूर्ण विवाहगीतों के बीच अमृत जैसे अनेक पकवान परोसे जाते हैं। ✦ चौपाई 2 ✦ परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना॥ चारि भ...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 65 | श्रीसीताराम विवाह और चारों भाइयों का विवाह | दोहा 324–328 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥   •   भक्ति भावना प्रस्तुत श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग ६५ श्रीसीताराम विवाह, चारों भाइयों का विवाह एवं जनकपुर की जेवनार मूल पाठ • दोहा ३२४–३२८ • सरल हिंदी अर्थ 📖 गोस्वामी तुलसीदासजी के श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड का यह भाग पिछले लेख के दोहा ३२३ के ठीक बाद प्रारंभ होता है। इसमें पाणिग्रहण, कन्यादान, भाँवरें, माँग में सिंदूर, अन्य तीन राजकुमारों के विवाह, मंगल रस्में और राजा जनक का आदरपूर्ण आतिथ्य वर्णित है। 📜 पाठ-सीमा: २२ चौपाई-इकाइयाँ • १६ छंद • ५ दोहे (३२४–३२८)। मूल पाठ और उसके नीचे अलग सरल अर्थ। दोहा 324 दोहा 325 दोहा 326 दोहा 327 दोहा 328 प्रसंग 324 — श्रीसीताराम का पाणिग्रहण और कन्यादान ✦ चौपाई 1 ✦ जनक पाटमहिषी जग जानी। सीय मातु किमि जाइ बखानी॥ सुजसु सुकृत सुख सुंदरताई। सब समेटि बिधि रची बनाई॥ सरल अर्थ — महाराज जनक की पटरानी सुनयना, जो सीताजी की माता हैं, अनुपम गुणों से संपन्न हैं। मानो विधाता ने उत्तम यश, पुण्य, सुख और सौंदर्य एकत्र कर उनका निर्माण किया हो। ✦ चौपाई 2 ✦ समउ जानि मुनिबरन्ह बोलाईं। सुनत सुआसिनि सादर ल्याईं॥ जनक...

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