श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 56 — श्रीराम की विनम्रता और परशुरामजी का संशय

भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 56

श्रीराम की विनम्रता और परशुरामजी का संशय

इस भाग का प्रसंग: श्रीराम की विनम्रता और परशुरामजी का संशय।

पाठ-सीमा: दोहा 278 के बाद से 283 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 279 से पहले
अति बिनीत मृदु सीतल बानी । बोले रामु जोरि जुग पानी ॥
सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना । बालक बचनु करिअ नहिं काना ॥
बररै बालक एकु सुभाऊ । इन्हहि न संत बिदूषहिं काऊ ॥
तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा । अपराधी में नाथ तुम्हारा ॥
कृपा कोपु बधु बँधब गोसाईं । मो पर करिअ दास की नाई ॥
कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई । मुनिनायक सोइ करौं उपाई ॥
कह मुनि राम जाइ रिस कैसें । अजहुँ अनुज तव चितव अनैसें ॥
एहि के कंठ कुठारु न दीन्हा । तौ मैं काह कोपु करि कीन्हा ॥

सरल भावार्थ: श्रीराम हाथ जोड़कर कहते हैं कि संत बालक की चंचलता का दोष नहीं मानते। अपराधी वे स्वयं हैं; कृपा, क्रोध, दंड या बंधन उन्हीं पर किया जाए। मुनि जैसा उपाय कहें, वे करने को तैयार हैं। परशुरामजी कहते हैं कि छोटे भाई की दृष्टि अब भी उद्दंड है और उसे दंड दिए बिना उनका क्रोध कैसे मिटे?

दोहा 279
गर्भ स्त्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर।
परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर ॥२७९॥

सरल अर्थ: परशुरामजी कहते हैं कि उनके फरसे के भय से राजाओं की पत्नियों के गर्भ गिर जाते थे, पर आज फरसा होते हुए भी सामने राजपुत्र शत्रु जीवित है।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 280 से पहले
बहइ न हाथु दहइ रिस छाती । भा कुठारु कुंठित नृपघाती ॥
भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ । मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ ॥
आजु दया दुखु दुसह सहावा । सुनि सौमित्र बिहसि सिरु नावा ॥
बाउ कृपा मूरति अनुकूला । बोलत बचन झरत जनु फूला ॥
जौं पै कृपाँ जरिहिं मुनि गाता । क्रोध भएँ तनु राख बिधाता ॥
देखु जनक हठि बालक एहू । कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू ॥
बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा । देखत छोट खोट नृप ढोटा ॥
बिहसे लखनु कहा मन माहीं । मूदें आँखि कतहुँ कोउ नाहीं ॥

सरल भावार्थ: परशुरामजी को आश्चर्य है कि हाथ नहीं चल रहा, छाती क्रोध से जल रही और राजाओं का संहारक फरसा कुंठित हो गया। वे इसे विपरीत भाग्य और दया का दुख कहते हैं। लक्ष्मणजी उनके दया-वचनों पर व्यंग्य करते हैं। मुनि जनकजी से उन्हें आँखों से दूर करने को कहते हैं; लक्ष्मणजी मन में सोचते हैं कि आँखें बंद कर लेने से कोई दिखता ही नहीं।

दोहा 280
परसुरामु तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु।
संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमार प्रबोधु ॥२८०॥

सरल अर्थ: परशुरामजी क्रोधित होकर श्रीराम से कहते हैं कि शिवधनुष तोड़कर अब उन्हें समझाने का प्रयत्न क्यों कर रहे हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 281 से पहले
बंधु कहइ कटु संमत तोरें । तू छल बिनय करसि कर जोरें ॥
करु परितोषु मोर संग्रामा । नाहिं त छाड़ कहाउब रामा ॥
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही । बंधु सहित न त मारउँ तोही ॥
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ । मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ ॥
गुनह लखन कर हम पर रोषू । कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू ॥
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू । बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू ॥
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा । कर कुठारु आगें यह सीसा ॥
जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी । मोहि जानि आपन अनुगामी ॥

सरल भावार्थ: मुनि श्रीराम की विनय को छल बताते और युद्ध की चुनौती देते हैं। श्रीराम मन में मुस्कुराते हैं कि दोष लक्ष्मण का है, पर क्रोध उन पर है। वे फरसे के सामने सिर प्रस्तुत करके कहते हैं कि सेवक जानकर जो उचित हो करें। प्रभु और सेवक में युद्ध कैसा? बालक ने वीर का वेश देखकर उत्तर दिया था।

दोहा 281
प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु।
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु ॥२८१॥

सरल अर्थ: श्रीराम ब्राह्मणश्रेष्ठ से क्रोध छोड़ने की विनती करते हैं। वे कहते हैं कि आपके शस्त्रधारी वेश को देखकर बालक बोला, इसलिए उसका दोष नहीं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 282 से पहले
देखि कुठार बान धनु धारी । भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी ॥
नामु जान पै तुम्हहि न चीन्हा । बंस सुभायँ उतरु तेंहिं दीन्हा ॥
जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं । पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं ॥
छमहु चूक अनजानत केरी । चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी ॥
हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा ॥कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा ॥
राम मात्र लघु नाम हमारा । परसु सहित बड़ नाम तोहारा ॥
देव एकु गुनु धनुष हमारें । नव गुन परम पुनीत तुम्हारें ॥
सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे । छमहु बिप्र अपराध हमारे ॥

सरल भावार्थ: श्रीराम समझाते हैं कि लक्ष्मण ने मुनि को नाम से जाना, स्वरूप से नहीं पहचाना और रघुवंश के स्वभाव से वीरतापूर्ण उत्तर दिया। यदि मुनिवेश में आते तो वह चरणरज सिर पर रखता। श्रीराम अज्ञान की भूल क्षमा करने को कहते हैं। वे अपने छोटे नाम, एक धनुष और मुनि के बड़े नाम तथा नौ ब्राह्मण गुणों का उल्लेख कर आदर जताते हैं।

दोहा 282
बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम।
बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम ॥२८२॥

सरल अर्थ: श्रीराम बार-बार ब्राह्मणश्रेष्ठ कहकर सम्मान देते हैं। परशुरामजी क्रोधभरी हँसी से कहते हैं कि तुम भी अपने भाई जैसे टेढ़े हो।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 283 से पहले
निपटहिं द्विज करि जानहि मोही । मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही ॥
चाप स्त्रुवा सर आहुति जानू । कोप मोर अति घोर कृसानु ॥
समिधि सेन चतुरंग सुहाई । महा महीप भए पसु आई ॥
मै एहि परसु काटि बलि दीन्हे । समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे ॥
मोर प्रभाउ बिदित नहिं तोरें । बोलसि निदरि बिप्र के भोरें ॥
भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा । अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा ॥
राम कहा मुनि कहहु बिचारी । रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी ॥
छुअतहिं टूट पिनाक पुराना । मैं कहि हेतु करौं अभिमाना ॥

सरल भावार्थ: परशुरामजी युद्ध को यज्ञ की उपमा देकर अपने धनुष, बाण, क्रोध, सेना और पराजित राजाओं का वर्णन करते हैं। वे श्रीराम पर ब्राह्मण समझकर अपमान करने और धनुषभंग का गर्व रखने का आरोप लगाते हैं। श्रीराम कहते हैं कि उनका अपराध छोटा है; पुराना धनुष छूते ही टूट गया, इसमें अभिमान का क्या कारण?

दोहा 283
जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ।
तौ अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ ॥२८३॥

सरल अर्थ: श्रीराम कहते हैं—यदि हम ब्राह्मण का अनादर करते, तो संसार में कौन ऐसा वीर है जिसके भय से सिर झुकाते? उनका प्रणाम श्रद्धा का है।

॥ श्री सीताराम ॥
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