श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 31 — नारद मोहभंग, शिवगणों का शापफल और रामावतार का दूसरा कारण

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 31

नारद मोहभंग • शिवगणों का शापफल • हरि माया • रामावतार का दूसरा कारण

भाग 30 के बाद कथा नारदजी के पूर्ण मोहभंग से आगे बढ़ती है। शिवगणों के शाप का फल, प्रभु के मनुष्यावतार का एक हेतु और हरि-माया का रहस्य बताते हुए शिवजी अब श्रीरामावतार के दूसरे कारण की कथा आरंभ करते हैं।
दोहा 138
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥१३८॥
सरल अर्थ: भगवान ने नारदजी को अनेक प्रकार से समझाकर शांत किया और अंतर्धान हो गए। नारदजी श्रीराम के गुणों का गान करते हुए सत्यलोक को चले।
चौपाई
हर गन मुनिहि जात पथ देखी। बिगतमोह मन हरष बिसेषी॥
अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए॥
सरल अर्थ: शिवजी के गण नारदजी के पास आए और चरण पकड़कर विनती करने लगे।
चौपाई
हर गन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया॥
श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला॥
सरल अर्थ: शिवगणों ने अपराध स्वीकार कर शाप को कृपा में बदलने की प्रार्थना की।
चौपाई
निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। बैभव बिपुल तेज बल होऊ॥
भुजबल बिस्व जितब तुम्ह जहिआ। धरिहहिं बिष्नु मनुज तनु तहिआ॥
सरल अर्थ: नारदजी ने कहा कि दोनों राक्षस रूप में अत्यंत बलवान होंगे और उसी समय विष्णु मनुष्य रूप धारण करेंगे।
चौपाई
समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा॥
चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई॥
सरल अर्थ: भगवान के हाथों मृत्यु पाकर दोनों संसार-बन्धन से मुक्त होंगे।
दोहा 139
एक कलप एहि हेतु प्रभु लीन्ह मनुज अवतार।
सुर रंजन सज्जन सुखद हरि भंजन भुबि भार॥१३९॥
सरल अर्थ: एक कल्प में इसी हेतु प्रभु ने मनुष्यावतार लिया—देवताओं को आनंद, सज्जनों को सुख और पृथ्वी का भार दूर करने के लिए।
चौपाई
एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे॥
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं। चारु चरित नानाबिधि करहीं॥
सरल अर्थ: भगवान के जन्म और कर्म अनेक, सुंदर और कल्याणकारी हैं; वे कल्प-कल्प में विविध लीलाएँ करते हैं।
चौपाई
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई॥
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरजु सयाने॥
सरल अर्थ: मुनियों ने विविध लीलाओं को पवित्र कथाओं में गाया है; ज्ञानी इनके भिन्न प्रसंगों पर संशय नहीं करते।
चौपाई
हरि अनंत हरि कथा अनंता। कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
रामचंद्र के चरित सुहाए। कलप कोटि लगि जाहिं न गाए॥
सरल अर्थ: श्रीहरि और उनकी कथा अनंत हैं; श्रीराम के चरित्र करोड़ों कल्पों में भी पूर्ण नहीं गाए जा सकते।
चौपाई
यह प्रसंग मैं कहा भवानी। हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी॥
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी। सेवत सुलभ सकल दुखहारी॥
सरल अर्थ: शिवजी कहते हैं कि हरि की माया ज्ञानी मुनियों को भी मोहित कर सकती है; प्रभु शरणागत के हितकारी हैं।
सोरठा 140
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल।
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि॥१४०॥
सरल अर्थ: प्रबल माया देव, मनुष्य और मुनि को भी मोहित कर सकती है; इसलिए माया के स्वामी भगवान का भजन करना चाहिए।
चौपाई
अपर हेतु सुनु सैलकुमारी। कहउँ बिचित्र कथा बिस्तारी॥
जेहि कारन अज अगुन अरूपा। ब्रह्म भयउ कोसलपुर भूपा॥
सरल अर्थ: अब शिवजी उस दूसरे कारण की कथा कहते हैं जिससे अजन्मा, निर्गुण और निराकार ब्रह्म अयोध्या में अवतरित हुआ।
चौपाई
जो प्रभु बिपिन फिरत तुम्ह देखा। बंधु समेत धरें मुनिबेषा॥
जासु चरित अवलोकि भवानी। सती सरीर रहिहु बौरानी॥
सरल अर्थ: शिवजी उमा को उसी श्रीराम की याद दिलाते हैं जिन्हें वन में लक्ष्मणजी सहित देखा गया था।
चौपाई
अजहुँ न छाया मिटति तुम्हारी। तासु चरित सुनु भ्रम रुज हारी॥
लीला कीन्हि जो तेहिं अवतारा। सो सब कहिहउँ मति अनुसारा॥
सरल अर्थ: शिवजी उसी अवतार की भ्रम-नाशक कथा और लीलाएँ सुनाने की बात कहते हैं।
चौपाई
भरद्वाज सुनि संकर बानी। सकुचि सप्रेम उमा मुसुकानी॥
लगे बहुरि बरनै बृषकेतू। सो अवतार भयउ जेहि हेतू॥
सरल अर्थ: उमा प्रेमपूर्वक मुस्कुराईं और शिवजी अवतार के दूसरे हेतु का वर्णन करने लगे।
दोहा 141
सो मैं तुम्ह सन कहउँ सबु सुनु मुनीस मन लाइ।
रामकथा कलि मल हरनि मंगल करनि सुहाइ॥१४१॥
सरल अर्थ: याज्ञवल्क्यजी भरद्वाज से कहते हैं—मन लगाकर सुनिए; रामकथा कलियुग के पाप हरने वाली और मंगलकारी है।

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