श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 49 — सीताजी का रंगभूमि में आगमन
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 49
सीताजी का रंगभूमि में आगमन
इस भाग का प्रसंग: सीताजी का रंगभूमि में आगमन।
पाठ-सीमा: दोहा 243 के बाद से 248 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।
पीत जग्य उपबीत सुहाए । नख सिख मंजु महाछबि छाए ॥
देखि लोग सब भए सुखारे । एकटक लोचन चलत न तारे ॥
हरषे जनकु देखि दोउ भाई । मुनि पद कमल गहे तब जाई ॥
करि बिनती निज कथा सुनाई । रंग अवनि सब मुनिहि देखाई ॥
जहँ जहँ जाहि कुअँर बर दोऊ । तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ ॥
निज निज रुख रामहि सबु देखा । कोउ न जान कछु मरमु बिसेषा ॥
भलि रचना मुनि नृप सन कहेऊ । राजाँ मुदित महासुख लहेऊ ॥
सरल भावार्थ: कमर में तरकस और पीले वस्त्र, हाथ में बाण, बाएँ कंधे पर धनुष और शरीर पर यज्ञोपवीत शोभित हैं। उनकी छवि देखकर सब अपलक निहारते हैं। जनकजी दोनों भाइयों को देखकर आनंदित होते हैं, मुनि के चरण पकड़ते हैं और विनयपूर्वक रंगभूमि की व्यवस्था दिखाते हैं। सब अपनी भावना के अनुसार प्रभु को देखते हैं, पर लीला का रहस्य नहीं जानते। मुनि व्यवस्था की प्रशंसा करते हैं।
मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल ॥२४४॥
सरल अर्थ: राजा जनक ने सबसे सुंदर, स्वच्छ और विशाल मंच पर मुनि विश्वामित्रजी सहित दोनों भाइयों को बैठाया।
असि प्रतीति सब के मन माहीं । राम चाप तोरब सक नाहीं ॥
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला । मेलिहि सीय राम उर माला ॥
अस बिचारि गवनहु घर भाई । जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई ॥
बिहसे अपर भूप सुनि बानी । जे अबिबेक अंध अभिमानी ॥
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा । बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा ॥
एक बार कालउ किन होऊ । सिय हित समर जितब हम सोऊ ॥
यह सुनि अवर महिप मुसकाने । धरमसील हरिभगत सयाने ॥
सरल भावार्थ: श्रीराम को देखकर राजाओं का तेज वैसे फीका पड़ता है जैसे चंद्रमा के उदय पर तारों का। कुछ कहते हैं कि धनुष टूटे या न टूटे, सीता श्रीराम को ही माला पहनाएँगी, इसलिए घर लौटना चाहिए। अभिमानी राजा कहते हैं कि विवाह सरल नहीं; वे युद्ध में काल को भी जीत लेंगे। विवेकी और धर्मशील भक्त राजा इस घमंड पर मुस्कुराते हैं।
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे ॥२४५॥
सरल अर्थ: विवेकी राजा कहते हैं कि श्रीराम राजाओं का अभिमान दूर करके सीताजी से विवाह करेंगे। दशरथजी के रणबाँकुरे पुत्रों को युद्ध में कौन जीत सकता है?
सिख हमारि सुनि परम पुनीता । जगदंबा जानहु जियँ सीता ॥
जगत पिता रघुपतिहि बिचारी । भरि लोचन छबि लेहु निहारी ॥
सुंदर सुखद सकल गुन रासी । ए दोउ बंधु संभु उर बासी ॥
सुधा समुद्र समीप बिहाई । मृगजलु निरखि मरहु कत धाई ॥
करहु जाइ जा कहुँ जोई भावा । हम तौ आजु जनम फलु पावा ॥
अस कहि भले भूप अनुरागे । रूप अनूप बिलोकन लागे ॥
देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना । बरषहिं सुमन करहिं कल गाना ॥
सरल भावार्थ: भक्त राजा समझाते हैं—व्यर्थ डींग मत हाँको; कल्पना के लड्डुओं से भूख नहीं मिटती। सीताजी को जगज्जननी और श्रीराम को जगत्पिता जानकर उनकी छवि निहारो। शिवजी के हृदय में बसने वाले इन गुणवान भाइयों को छोड़कर मृगतृष्णा के पीछे क्यों दौड़ते हो? हमने तो आज जन्म सफल कर लिया। वे दर्शन में तन्मय हो जाते हैं। आकाश में देवता फूल बरसाते और गीत गाते हैं।
चतुर सखीं सुंदर सकल सादर चलीं लवाईं ॥२४६॥
सरल अर्थ: उचित समय जानकर जनकजी ने सीताजी को बुलवाया। सुंदर, चतुर सखियाँ उन्हें आदरपूर्वक रंगभूमि की ओर लेकर चलीं।
उपमा सकल मोहि लघु लागीं । प्राकृत नारि अंग अनुरागीं ॥
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई । कुकबि कहाइ अजसु को लेई ॥
जौ पटतरिअ तीय सम सीया । जग असि जुबति कहाँ कमनीया ॥
गिरा मुखर तन अरध भवानी । रति अति दुखित अतनु पति जानी ॥
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही । कहिअ रमासम किमि बैदेही ॥
जौ छबि सुधा पयोनिधि होई । परम रूपमय कच्छप सोई ॥
सोभा रजु मंदरु सिंगारू । मथै पानि पंकज निज मारू ॥
सरल भावार्थ: कवि कहते हैं कि जगज्जननी सीताजी के रूप और गुण का वर्णन संभव नहीं। साधारण स्त्रियों के अंगों पर आधारित उपमाएँ उनके सामने छोटी हैं। सरस्वती, पार्वती, रति और लक्ष्मी की उपमाएँ भी पूर्ण नहीं बैठतीं। कवि एक कल्पना करते हैं कि यदि सौंदर्य अमृत का समुद्र हो, रूपमय कच्छप आधार हो, श्रृंगार मंदराचल हो और कामदेव अपने कमल-हाथों से उसे मथे, तब कैसी लक्ष्मी प्रकट हो।
तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल ॥२४७॥
सरल अर्थ: यदि ऐसी कल्पना से सौंदर्य और सुख की मूल लक्ष्मी उत्पन्न हो, तब भी कवि संकोच सहित ही उसे सीताजी के समान कह सकते हैं।
सोह नवल तनु सुंदर सारी । जगत जननि अतुलित छबि भारी ॥
भूषन सकल सुदेस सुहाए । अंग अंग रचि सखिन्ह बनाए ॥
रंगभूमि जब सिय पगु धारी । देखि रूप मोहे नर नारी ॥
हरषि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई । बरषि प्रसून अपछरा गाई ॥
पानि सरोज सोह जयमाला । अवचट चितए सकल भुआला ॥
सीय चकित चित रामहि चाहा । भए मोहबस सब नरनाहा ॥
मुनि समीप देखे दोउ भाई । लगे ललकि लोचन निधि पाई ॥
सरल भावार्थ: सीताजी सखियों के साथ मधुर गीतों के बीच आती हैं। सुंदर साड़ी और अंग-अंग पर सुशोभित आभूषण उनकी अनुपम छवि बढ़ाते हैं। रंगभूमि में उनके प्रवेश से सभी स्त्री-पुरुष मुग्ध होते हैं; देवता दुंदुभियाँ बजाते, फूल बरसाते और अप्सराएँ गाती हैं। हाथ में जयमाला लिए सीताजी श्रीराम को खोजती हैं। गुरु के पास दोनों भाइयों को देखकर उनकी आँखें प्रिय निधि पाने की खुशी से खिल जाती हैं।
लागि बिलोकन सखिन्ह तन रघुबीरहि उर आनि ॥२४८॥
सरल अर्थ: गुरुजनों की मर्यादा और बड़ी सभा देखकर सीताजी संकोच करती हैं। श्रीराम को हृदय में धारण कर सखियों की ओर देखने लगती हैं।

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