श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 50 — शिवधनुष और राजाओं की असफलता

भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 50

शिवधनुष और राजाओं की असफलता

इस भाग का प्रसंग: शिवधनुष और राजाओं की असफलता।

पाठ-सीमा: दोहा 248 के बाद से 253 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 249 से पहले
राम रूपु अरु सिय छबि देखें । नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें ॥
सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं । बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं ॥
हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई । मति हमारि असि देहि सुहाई ॥
बिनु बिचार पनु तजि नरनाहु । सीय राम कर करै बिबाहू ॥
जग भल कहहि भाव सब काहू । हठ कीन्हे अंतहुँ उर दाहू ॥
एहिं लालसाँ मगन सब लोगू । बरु साँवरो जानकी जोगू ॥
तब बंदीजन जनक बौलाए । बिरिदावली कहत चलि आए ॥
कह नृप जाइ कहहु पन मोरा । चले भाट हियँ हरषु न थोरा ॥

सरल भावार्थ: श्रीराम और सीताजी की छवि देखकर लोग पलक झपकाना भूल जाते हैं। वे मन में विधाता से प्रार्थना करते हैं कि जनकजी हठ छोड़कर दोनों का विवाह कर दें। सबको लगता है कि साँवले श्रीराम ही जानकीजी के योग्य वर हैं। जनकजी बंदीजन बुलाकर अपनी प्रतिज्ञा घोषित करने को कहते हैं; वे हर्षपूर्वक आगे आते हैं।

दोहा 249
बोले बंदी बचन बर सुनहु सकल महिपाल।
पन बिदेह कर कहहिं हम भुजा उठाइ बिसाल ॥२४९॥

सरल अर्थ: बंदीजन भुजाएँ उठाकर कहते हैं—हे राजाओ, सुनिए! हम राजा जनक की प्रतिज्ञा का वर्णन करते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 250 से पहले
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू । गरुअ कठोर बिदित सब काहू ॥
रावनु बानु महाभट भारे । देखि सरासन गवँहिं सिधारे ॥
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा । राज समाज आजु जोइ तोरा ॥
त्रिभुवन जय समेत बैदेही ॥बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही ॥
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे । भटमानी अतिसय मन माखे ॥
परिकर बाँधि उठे अकुलाई । चले इष्टदेवन्ह सिर नाई ॥
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं । उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं ॥
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं । चाप समीप महीप न जाहीं ॥

सरल भावार्थ: बंदीजन शिवधनुष की भारी और कठोर प्रकृति बताते हैं, जिसे देखकर रावण और बाण जैसे वीर भी लौट गए थे। आज जो राजा इसे तोड़ेगा, वही त्रिभुवन-विजय के यश सहित सीताजी का वर होगा। प्रतिज्ञा सुनकर अभिमानी वीर अपने इष्टदेव को प्रणाम कर कमर कसकर धनुष उठाने आते हैं। अनेक प्रकार से बल लगाने पर भी धनुष नहीं उठता; विवेकी राजा उसके पास ही नहीं जाते।

दोहा 250
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ।
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ ॥२५०॥

सरल अर्थ: मूढ़ राजा क्रोध और उत्साह से धनुष पकड़ते हैं, पर उठा नहीं पाते और लज्जित लौटते हैं। मानो उनके बल को पाकर धनुष और भारी होता जाता है।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 251 से पहले
भूप सहस दस एकहि बारा । लगे उठावन टरइ न टारा ॥
डगइ न संभु सरासन कैसें । कामी बचन सती मनु जैसें ॥
सब नृप भए जोगु उपहासी । जैसें बिनु बिराग संन्यासी ॥
कीरति बिजय बीरता भारी । चले चाप कर बरबस हारी ॥
श्रीहत भए हारि हियँ राजा । बैठे निज निज जाइ समाजा ॥
नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने । बोले बचन रोष जनु साने ॥
दीप दीप के भूपति नाना । आए सुनि हम जो पनु ठाना ॥
देव दनुज धरि मनुज सरीरा । बिपुल बीर आए रनधीरा ॥

सरल भावार्थ: दस हजार राजा एक साथ धनुष उठाने लगते हैं, पर वह तनिक भी नहीं हिलता। जैसे कामुक की बातें सती का मन नहीं डिगातीं, वैसे ही धनुष अचल रहता है। राजा अपना यश, विजय और वीरता खोकर निराश बैठे हैं। यह देखकर जनकजी व्याकुल होकर कहते हैं कि अनेक देशों के राजा तथा देव-दानव भी मनुष्य रूप धरकर उनकी प्रतिज्ञा सुनकर आए हैं।

दोहा 251
कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि कीरति अति कमनीय।
पावनिहार बिरंचि जनु रचेउ न धनु दमनीय ॥२५१॥

सरल अर्थ: जनकजी कहते हैं—सुंदर कन्या, बड़ी विजय और मनोहर कीर्ति पाने तथा धनुष को वश में करने योग्य पुरुष मानो ब्रह्माजी ने बनाया ही नहीं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 252 से पहले
कहहु काहि यहु लाभु न भावा । काहुँ न संकर चाप चढ़ावा ॥
रहउ चढ़ाउब तोरब भाई । तिलु भरि भूमि न सके छड़ाई ॥
अब जनि कोउ माखै भट मानी । बीर बिहीन मही मैं जानी ॥
तजहु आस निज निज गृह जाहू । लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहू ॥
सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ । कुअँरि कुआरि रहउ का करऊँ ॥
जो जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई । तौ पनु करि होतेउँ न हँसाई ॥
जनक बचन सुनि सब नर नारी । देखि जानकिहि भए दुखारी ॥
माखे लखनु कुटिल भइँ भौंहें । रदपट फरकत नयन रिसौंहें ॥

सरल भावार्थ: जनकजी कहते हैं कि धनुष चढ़ाना या तोड़ना तो दूर, कोई उसे भूमि से तनिक भी उठा नहीं सका। उन्हें पृथ्वी वीरों से रहित प्रतीत होती है। वे राजाओं को आशा छोड़कर लौटने को कहते हैं और सोचते हैं कि प्रतिज्ञा छोड़ने से पुण्य नष्ट होगा, पर सीता अविवाहित रह जाएँ तो क्या करें। सभा दुखी होती है। लक्ष्मणजी की भौंहें तन जाती हैं और नेत्र क्रोध से भर उठते हैं।

दोहा 252
कहि न सकत रघुबीर डर लगे बचन जनु बान।
नाइ राम पद कमल सिरु बोले गिरा प्रमान ॥२५२॥

सरल अर्थ: जनकजी के वचन लक्ष्मणजी को बाण जैसे लगते हैं। पहले श्रीराम की मर्यादा से चुप रहते हैं, फिर उनके चरणों में सिर झुकाकर उचित वचन कहते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 253 से पहले
रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई । तेहिं समाज अस कहइ न कोई ॥
कही जनक जसि अनुचित बानी । बिद्यमान रघुकुल मनि जानी ॥
सुनहु भानुकुल पंकज भानू । कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू ॥
जौ तुम्हारि अनुसासन पावौं । कंदुक इव ब्रह्मांड उठावौं ॥
काचे घट जिमि डारौं फोरी । सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी ॥
तव प्रताप महिमा भगवाना । को बापुरो पिनाक पुराना ॥
नाथ जानि अस आयसु होऊ । कौतुकु करौं बिलोकिअ सोऊ ॥
कमल नाल जिमि चाफ चढ़ावौं । जोजन सत प्रमान लै धावौं ॥

सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी कहते हैं कि जहाँ रघुवंश का कोई पुरुष हो, वहाँ पृथ्वी को वीरहीन कहना अनुचित है। वे श्रीराम से निवेदन करते हैं कि यह अभिमान नहीं, उनका स्वभाव है—आपकी आज्ञा हो तो ब्रह्माण्ड गेंद की तरह उठा लें, घड़े की तरह फोड़ दें और मेरु पर्वत मूली की तरह तोड़ दें। प्रभु के प्रताप से पुराना शिवधनुष क्या कठिन है! वे उसे कमलनाल की तरह चढ़ाकर दूर तक दौड़ाने का उत्साह प्रकट करते हैं।

दोहा 253
तोरौं छत्रक दंड जिमि तव प्रताप बल नाथ।
जौं न करौं प्रभु पद सपथ कर न धरौं धनु भाथ ॥२५३॥

सरल अर्थ: लक्ष्मणजी कहते हैं—आपके प्रताप से धनुष को छाते की डंडी की तरह तोड़ दूँगा। यदि ऐसा न करूँ तो आपके चरणों की शपथ, फिर धनुष और तरकस नहीं धारण करूँगा।

॥ श्री सीताराम ॥
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