श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ | सरल अर्थ सहित
🚩 श्रीरामचरितमानस
श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ
प्रेम, भक्ति, सत्संग, कर्म, सद्बुद्धि, परोपकार और प्रभु श्रीराम की कृपा का मार्ग दिखाने वाली श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाइयाँ सरल हिंदी अर्थ सहित।
श्रीरामचरितमानस गोस्वामी तुलसीदासजी की अमर रचना है।
इसमें प्रभु श्रीराम की कथा के साथ जीवन, भक्ति, धर्म, प्रेम, कर्म, सदाचार,
सत्संग और लोककल्याण की अनेक शिक्षाएँ मिलती हैं। यहाँ 24 प्रसिद्ध
चौपाइयों को सरल भावार्थ के साथ प्रस्तुत किया गया है, ताकि उनके संदेश को
सहज रूप से समझा और जीवन में अपनाया जा सके।
📜 इस संग्रह में
❤️ प्रेम और भक्ति
प्रभु-प्रेम, समर्पण और निर्मल हृदय का संदेश
01
प्रभु को केवल प्रेम प्रिय है
रामहि केवल प्रेमु पिआरा।
जानि लेउ जो जाननिहारा॥
जानि लेउ जो जाननिहारा॥
सरल अर्थ:
प्रभु श्रीराम को सबसे अधिक सच्चा और निष्कपट प्रेम प्रिय है।
जो ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को समझना चाहता है, वह यह जान ले कि
भक्ति का मूल प्रेम है।
02
सीताराम के चरणों में प्रेम
सीता राम चरन रति मोरें।
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥
सरल अर्थ:
प्रभु की कृपा से माता सीता और श्रीराम के चरणों में मेरा प्रेम
प्रतिदिन बढ़ता रहे। यह चौपाई भक्त के निरंतर बढ़ते समर्पण की
भावना व्यक्त करती है।
03
निर्मल मन से प्रभु की प्राप्ति
निर्मल मन जन सो मोहि पावा।
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
मोहि कपट छल छिद्र न भावा॥
सरल अर्थ:
प्रभु को निर्मल और निष्कपट हृदय वाला भक्त प्राप्त करता है।
छल, कपट और दिखावा ईश्वर को प्रिय नहीं हैं।
04
समस्त जगत में सीताराम
सीय राममय सब जग जानी।
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी॥
सरल अर्थ:
पूरे संसार को माता सीता और प्रभु श्रीराम से व्याप्त समझकर
सबके प्रति सम्मान और नम्रता का भाव रखना चाहिए।
05
भावना के अनुसार प्रभु का अनुभव
जिन्ह कें रही भावना जैसी।
प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥
प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी॥
सरल अर्थ:
मनुष्य के हृदय में जैसी भावना होती है,
वह प्रभु को भी उसी भावना और दृष्टि से अनुभव करता है।
06
भगवान और उनकी कथा अनंत हैं
हरि अनंत हरिकथा अनंता।
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता॥
सरल अर्थ:
भगवान अनंत हैं और उनकी कथाएँ भी अनंत हैं।
संतजन प्रभु की महिमा को अनेक भावों और रूपों में कहते और सुनते हैं।
🌿 जीवन, कर्म और नीति
सद्बुद्धि, कर्म और परोपकार की प्रेरणा
07
कर्म के अनुसार फल
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥
जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥
सरल अर्थ:
संसार में कर्म का विशेष महत्व है।
मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसे उसी के अनुरूप फल मिलता है।
08
सद्बुद्धि से उन्नति
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
सरल अर्थ:
जहाँ अच्छी बुद्धि और उचित विचार होते हैं वहाँ उन्नति और
कल्याण के अवसर बढ़ते हैं, जबकि गलत सोच विपत्ति का कारण बनती है।
09
सत्संग से विवेक
बिनु सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सरल अर्थ:
सत्संग से मनुष्य में सही और गलत का विवेक जागता है।
ऐसा श्रेष्ठ सत्संग भी प्रभु की कृपा से सहज प्राप्त होता है।
10
परोपकार सबसे बड़ा धर्म
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई।
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
पर पीड़ा सम नहिं अधमाई॥
सरल अर्थ:
दूसरों का भला करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं और
किसी दूसरे जीव को पीड़ा देने से बड़ी अधमता नहीं है।
11
मनुष्य जन्म का महत्व
बड़ें भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा॥
सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा॥
सरल अर्थ:
मनुष्य शरीर बड़े सौभाग्य से प्राप्त होता है।
इसलिए इस जीवन का उपयोग भक्ति, ज्ञान, सेवा और सत्कर्म में करना चाहिए।
12
उपदेश से अधिक आचरण
पर उपदेस कुसल बहुतेरे।
जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥
जे आचरहिं ते नर न घनेरे॥
सरल अर्थ:
दूसरों को अच्छी बातें बताना आसान है,
लेकिन उन्हीं बातों को स्वयं अपने जीवन में अपनाने वाले लोग कम होते हैं।
🙏 संकट, समर्पण और विश्वास
कठिन समय में प्रभु-स्मरण और धैर्य का संदेश
13
प्रभु मेरा वास्तविक हित करें
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा।
करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
सरल अर्थ:
हे प्रभु! जिस प्रकार मेरा वास्तविक कल्याण हो,
आप वही कीजिए। मैं आपका सेवक हूँ और आपकी इच्छा में समर्पित हूँ।
14
हे दीनदयाल, संकट दूर करें
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
हरहु नाथ मम संकट भारी॥
हरहु नाथ मम संकट भारी॥
सरल अर्थ:
हे दीनों पर दया करने वाले प्रभु!
अपने करुणामय स्वभाव को स्मरण कर मेरे बड़े संकटों को दूर कीजिए।
15
प्रभु की व्यवस्था पर विश्वास
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
सरल अर्थ:
अंततः वही होता है जो प्रभु की व्यवस्था में है।
व्यर्थ चिंता और तर्क से मन को उलझाने के बजाय विश्वास और धैर्य रखना चाहिए।
16
कार्य से पहले श्रीराम का स्मरण
प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदयँ राखि कौसलपुर राजा॥
हृदयँ राखि कौसलपुर राजा॥
सरल अर्थ:
किसी महत्वपूर्ण कार्य में प्रवेश करते समय हृदय में
अयोध्यापति श्रीराम का स्मरण और विश्वास बनाए रखना चाहिए।
17
रामकृपा से असंभव भी सरल
गरल सुधा रिपु करहिं मिताई।
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
गोपद सिंधु अनल सितलाई॥
सरल अर्थ:
प्रभु की कृपा से कठिन परिस्थितियाँ भी अनुकूल हो सकती हैं।
विष अमृत-सा, शत्रु मित्र-सा और विशाल समुद्र भी छोटा प्रतीत हो सकता है।
18
मंगल करने वाले प्रभु से प्रार्थना
मंगल भवन अमंगल हारी।
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥
द्रवउ सो दसरथ अजिर बिहारी॥
सरल अर्थ:
प्रभु श्रीराम मंगल के धाम और अमंगल को दूर करने वाले हैं।
भक्त उनसे करुणा और कृपा की प्रार्थना करता है।
🚩 मर्यादा, रामराज्य और आदर्श जीवन
वचन, संबंध, समाज और श्रीराम भक्ति का संदेश
19
कठिन समय में वास्तविक पहचान
धीरज धर्म मित्र अरु नारी।
आपद काल परिखिअहिं चारी॥
आपद काल परिखिअहिं चारी॥
सरल अर्थ:
धैर्य, धर्म, मित्रता और संबंधों की वास्तविक दृढ़ता
कठिन और विपरीत परिस्थितियों में पहचानी जाती है।
20
वचन-पालन की मर्यादा
रघुकुल रीति सदा चलि आई।
प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥
प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई॥
सरल अर्थ:
रघुकुल की परंपरा सत्य और दिए हुए वचन की रक्षा करना है।
यह चौपाई सत्यनिष्ठा और जिम्मेदारी की महत्ता बताती है।
21
पराधीनता की पीड़ा
कत बिधि सृजीं नारि जग माहीं।
पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥
पराधीन सपनेहुँ सुखु नाहीं॥
सरल अर्थ:
यह पंक्ति अपने प्रसंग में पराधीनता की गहरी पीड़ा व्यक्त करती है।
दूसरे के पूर्ण नियंत्रण में रहने पर स्वतंत्र और सहज सुख कठिन हो जाता है।
22
रामराज्य में दुःख से मुक्ति
दैहिक दैविक भौतिक तापा।
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥
सरल अर्थ:
रामराज्य के आदर्श वर्णन में कहा गया है कि लोगों को
शारीरिक, प्राकृतिक और सांसारिक कष्ट नहीं सताते थे।
23
समाज में प्रेम और कर्तव्य
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥
सरल अर्थ:
आदर्श समाज में लोग एक-दूसरे से प्रेम करते हैं और
अपने कर्तव्यों तथा धर्मसम्मत आचरण का पालन करते हैं।
24
श्रीराम भक्ति से परम कल्याण
राम भगति रत नर अरु नारी।
सकल परम गति के अधिकारी॥
सकल परम गति के अधिकारी॥
सरल अर्थ:
जो स्त्री-पुरुष श्रद्धा और प्रेम से श्रीराम की भक्ति में लगे रहते हैं,
वे आध्यात्मिक कल्याण और परम गति के अधिकारी बनते हैं।
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📅 पंचांग 2026
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