रामचरितमानस की 10 प्रसिद्ध चौपाइयाँ | सरल अर्थ सहित
🚩 श्री रामचरितमानस
रामचरितमानस की 10 प्रसिद्ध चौपाइयाँ
प्रेम, भक्ति, सत्संग, कर्म, सद्बुद्धि और परोपकार का मार्ग दिखाने वाली श्रीरामचरितमानस की प्रसिद्ध चौपाइयाँ सरल हिंदी अर्थ सहित।
गोस्वामी तुलसीदासजी द्वारा रचित श्रीरामचरितमानस केवल प्रभु श्रीराम की कथा ही नहीं,
बल्कि जीवन को धर्म, भक्ति, प्रेम और सदाचार के मार्ग पर चलाने वाली अमूल्य शिक्षाओं
का भंडार है। यहाँ मानस की 10 प्रसिद्ध चौपाइयाँ उनके सरल भावार्थ सहित प्रस्तुत हैं।
1
प्रभु को केवल प्रेम प्रिय है
रामहि केवल प्रेमु पिआरा।
जानि लेउ जो जाननिहारा॥
जानि लेउ जो जाननिहारा॥
सरल अर्थ:
प्रभु श्रीराम को सबसे अधिक निष्कपट प्रेम प्रिय है।
जो प्रभु के वास्तविक स्वरूप को समझना चाहता है, वह इस सत्य को समझ ले।
2
सीताराम के चरणों में प्रेम
सीता राम चरन रति मोरें।
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥
अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें॥
सरल अर्थ:
आपकी कृपा से माता सीता और प्रभु श्रीराम के चरणों में मेरा प्रेम
प्रतिदिन और अधिक बढ़ता रहे।
3
प्रभु जो हितकारी हो वही करें
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा।
करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
करहु सो बेगि दास मैं तोरा॥
सरल अर्थ:
हे प्रभु! जिस प्रकार मेरा वास्तविक कल्याण हो, आप वही शीघ्र कीजिए।
मैं आपका सेवक हूँ और स्वयं को आपकी इच्छा पर समर्पित करता हूँ।
4
हे दीनदयाल, संकट दूर कीजिए
दीन दयाल बिरिदु संभारी।
हरहु नाथ मम संकट भारी॥
हरहु नाथ मम संकट भारी॥
सरल अर्थ:
हे प्रभु! दीन-दुःखियों पर दया करना आपका स्वभाव है।
अपने उसी करुणामय स्वभाव को स्मरण कर मेरे भारी संकट को दूर कीजिए।
5
होता वही है जो प्रभु ने रचा है
होइहि सोइ जो राम रचि राखा।
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
सरल अर्थ:
अंततः वही होता है जो प्रभु की व्यवस्था में निर्धारित है।
व्यर्थ तर्क-वितर्क करके मन को उलझाने से कोई लाभ नहीं।
6
कर्म के अनुसार फल
करम प्रधान बिस्व करि राखा।
जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥
जो जस करइ सो तस फलु चाखा॥
सरल अर्थ:
संसार में कर्म का बहुत महत्व है।
मनुष्य जैसे कर्म करता है, उसे उसी के अनुरूप फल प्राप्त होता है।
7
सुमति से संपत्ति, कुमति से विपत्ति
जहाँ सुमति तहँ संपति नाना।
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
जहाँ कुमति तहँ बिपति निदाना॥
सरल अर्थ:
जहाँ अच्छी बुद्धि और उचित विचार होते हैं, वहाँ अनेक प्रकार की उन्नति होती है।
गलत बुद्धि और अनुचित विचार विपत्ति का कारण बनते हैं।
8
सत्संग से विवेक
बिनु सतसंग बिबेक न होई।
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
राम कृपा बिनु सुलभ न सोई॥
सरल अर्थ:
सत्संग के बिना सच्चा विवेक उत्पन्न होना कठिन है,
और प्रभु श्रीराम की कृपा के बिना ऐसा सत्संग भी सहज प्राप्त नहीं होता।
9
परोपकार सबसे बड़ा धर्म
परहित सरिस धरम नहि भाई।
पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥
पर पीड़ा सम नहि अधमाई॥
सरल अर्थ:
दूसरों का हित करने के समान कोई दूसरा धर्म नहीं,
और किसी को दुःख पहुँचाने से बढ़कर कोई अधमता नहीं।
10
मनुष्य जन्म का महत्व
बड़ें भाग मानुष तनु पावा।
सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा॥
सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा॥
सरल अर्थ:
मनुष्य शरीर बड़े सौभाग्य से प्राप्त होता है।
धर्मग्रंथों में इसे देवताओं के लिए भी दुर्लभ बताया गया है,
इसलिए इस जीवन का सदुपयोग भक्ति और सत्कर्म में करना चाहिए।
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