सुंदरकांड भाग 20: श्रीराम की सेना का वर्णन, लक्ष्मण का पत्र और रावण को अंतिम चेतावनी | दोहा 54–57
वह विभीषण के राजतिलक से लेकर वानर-भालुओं की विशाल सेना और उनके अद्भुत पराक्रम तक का वर्णन करता है।
इसके बाद लक्ष्मण जी का पत्र रावण के सामने रखा जाता है। दूत स्वयं भी रावण को अभिमान छोड़कर श्रीराम से वैर समाप्त करने की सलाह देता है, परंतु रावण का अहंकार उसे सत्य स्वीकार नहीं करने देता।
उधर समुद्र तट पर तीन दिन की विनय के बाद भी मार्ग न मिलने पर श्रीराम गंभीर निर्णय लेते हैं।
॥ दूत द्वारा श्रीराम की सेना का वर्णन ॥
नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।
आपके छोटे भाई विभीषण जैसे ही श्रीराम के पास पहुँचे, प्रभु ने उनका सम्मान करके उन्हें लंका का भावी राजा घोषित कर दिया।
रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।
लेकिन श्रीराम की मर्यादा का स्मरण कराए जाने पर अंततः हमें छोड़ दिया गया।
पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।
अनेक रंग-रूप वाले विशाल और पराक्रमी वानर तथा भालू उस सेना में उपस्थित हैं।
जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।
उन वीरों की संख्या और शक्ति का पूरा वर्णन कर पाना कठिन है।
द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।
॥ वानर-सेना का अतुलनीय बल ॥
ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं।।
श्रीराम की कृपा से उनमें इतना अद्भुत बल है कि वे तीनों लोकों को भी तिनके के समान समझते हैं।
अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।
उनकी सेना में ऐसा कोई वानर नहीं जो युद्ध में स्वयं को आपके सामने निर्बल समझता हो।
परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।
उनका कहना है कि वे समुद्र को उसके जीवों सहित सुखा सकते हैं या बड़े-बड़े पर्वत डालकर उसे भर सकते हैं।
मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।
उनकी गर्जना और उत्साह देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पूरी लंका को अपने अधिकार में लेने के लिए तत्पर हों।
सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।
ऐसी सेना के सामने करोड़ों रावण भी युद्ध में विजय प्राप्त नहीं कर सकते।
॥ लक्ष्मण जी का पत्र ॥
राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।
प्रभु अपने एक ही बाण से सैकड़ों समुद्र सुखा सकते हैं, फिर भी नीति का सम्मान करते हुए उन्होंने विभीषण से उपाय पूछा।
तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।
यह सुनकर रावण हँसा। अपने अहंकार के कारण उसने प्रभु की विनम्रता को कमजोरी समझ लिया।
सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।
वह दूत की बात को झूठी प्रशंसा कहकर शत्रु के वास्तविक बल को समझ लेने का दावा करता है।
सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।
रावण के ऐसे वचन सुनकर दूत के मन में क्रोध आया, लेकिन उचित समय का विचार करके उसने लक्ष्मण जी का पत्र निकाल लिया।
रामानुज दीन्हीं यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्हीं रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।
रावण ने हँसकर पत्र को अपने बाएँ हाथ में लिया और अपने मंत्री से उसे पढ़वाने लगा।
बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।
श्रीराम से विरोध करके कोई बच नहीं सकता, चाहे वह ब्रह्मा, विष्णु या शिव की शरण लेने का प्रयास ही क्यों न करे।
की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।
अन्यथा श्रीराम के बाणरूपी अग्नि में अपने कुल सहित पतंगे के समान नष्ट होना पड़ेगा।
॥ शुक की अंतिम हितकारी सलाह ॥
सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।
वह सभा के सामने श्रीराम की शक्ति का उपहास करने लगा और अपने अभिमान को बनाए रखा।
कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।
मेरी बात क्रोध छोड़कर सुनिए और श्रीराम से विरोध समाप्त कर दीजिए।
अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।
यदि आप उनकी शरण में जाएँगे, तो वे आप पर कृपा करेंगे और आपके पिछले अपराधों को हृदय में नहीं रखेंगे।
जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।
लेकिन जैसे ही उसने माता सीता को लौटाने की बात कही, अभिमानी रावण ने उसका अपमान किया।
नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।
उसने प्रभु को प्रणाम करके अपनी कथा सुनाई और श्रीराम की कृपा से अपना कल्याण प्राप्त किया।
रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।
श्रीराम की कृपा से उसका शाप समाप्त हुआ। उसने बार-बार प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और अपने आश्रम की ओर चला गया।
बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।
तब श्रीराम ने गंभीर होकर कहा— जहाँ विनय का प्रभाव न हो, वहाँ कभी-कभी अनुशासन और दृढ़ता आवश्यक होती है।
🌺 इस प्रसंग का भाव
इस भाग में बार-बार रावण को सुधारने का अवसर मिलता है।
पहले उसका अपना दूत श्रीराम की शक्ति का सत्य वर्णन करता है,
फिर लक्ष्मण जी का स्पष्ट संदेश आता है,
और अंत में शुक स्वयं उसे अभिमान छोड़कर माता सीता को लौटाने की सलाह देता है।
लेकिन अहंकार सत्य को स्वीकार नहीं करने देता।
दूसरी ओर श्रीराम का व्यवहार हमें यह भी सिखाता है कि
सामर्थ्य होने के बाद भी पहले विनय, नीति और धैर्य का मार्ग अपनाना चाहिए।
जब विनम्रता को बार-बार कमजोरी समझ लिया जाए,
तब धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ता भी आवश्यक हो जाती है।
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