सुंदरकांड भाग 20: श्रीराम की सेना का वर्णन, लक्ष्मण का पत्र और रावण को अंतिम चेतावनी | दोहा 54–57

॥ ✦ श्रीराम ✦ ॥
श्रीगोस्वामी तुलसीदास कृत
श्रीरामचरितमानस — सुन्दरकाण्ड
भाग 20 • श्रीराम की सेना, लक्ष्मण का पत्र एवं रावण को अंतिम चेतावनी
रावण अपने दूत शुक से श्रीराम की सेना का समाचार पूछता है। अब दूत लंका में जो कुछ देखकर आया है, उसे बिना छिपाए रावण के सामने बताता है।

वह विभीषण के राजतिलक से लेकर वानर-भालुओं की विशाल सेना और उनके अद्भुत पराक्रम तक का वर्णन करता है।

इसके बाद लक्ष्मण जी का पत्र रावण के सामने रखा जाता है। दूत स्वयं भी रावण को अभिमान छोड़कर श्रीराम से वैर समाप्त करने की सलाह देता है, परंतु रावण का अहंकार उसे सत्य स्वीकार नहीं करने देता।

उधर समुद्र तट पर तीन दिन की विनय के बाद भी मार्ग न मिलने पर श्रीराम गंभीर निर्णय लेते हैं।

॥ दूत द्वारा श्रीराम की सेना का वर्णन ॥

सुन्दरकाण्ड • दोहा 54 से दोहा 57 तक
चौपाई

नाथ कृपा करि पूँछेहु जैसें। मानहु कहा क्रोध तजि तैसें।।
मिला जाइ जब अनुज तुम्हारा। जातहिं राम तिलक तेहि सारा।।

सरल भावार्थ
दूत रावण से कहता है— हे नाथ! आपने कृपा करके पूछा है, इसलिए क्रोध छोड़कर मेरी बात को सत्य मानकर सुनिए।

आपके छोटे भाई विभीषण जैसे ही श्रीराम के पास पहुँचे, प्रभु ने उनका सम्मान करके उन्हें लंका का भावी राजा घोषित कर दिया।
चौपाई

रावन दूत हमहि सुनि काना। कपिन्ह बाँधि दीन्हे दुख नाना।।
श्रवन नासिका काटै लागे। राम सपथ दीन्हे हम त्यागे।।

सरल भावार्थ
दूत बताता है कि जब वानरों को पता चला कि हम रावण के गुप्तचर हैं, तो उन्होंने हमें पकड़ लिया और दंड देने लगे।

लेकिन श्रीराम की मर्यादा का स्मरण कराए जाने पर अंततः हमें छोड़ दिया गया।
चौपाई

पूँछिहु नाथ राम कटकाई। बदन कोटि सत बरनि न जाई।।
नाना बरन भालु कपि धारी। बिकटानन बिसाल भयकारी।।

सरल भावार्थ
दूत कहता है— हे नाथ! यदि आप श्रीराम की सेना के विषय में पूछते हैं, तो करोड़ों मुखों से भी उसका पूरा वर्णन नहीं किया जा सकता।

अनेक रंग-रूप वाले विशाल और पराक्रमी वानर तथा भालू उस सेना में उपस्थित हैं।
चौपाई

जेहिं पुर दहेउ हतेउ सुत तोरा। सकल कपिन्ह महँ तेहि बलु थोरा।।
अमित नाम भट कठिन कराला। अमित नाग बल बिपुल बिसाला।।

सरल भावार्थ
दूत कहता है— जिस हनुमान ने लंका जलाई और आपके पुत्र को परास्त किया, उसके समान अथवा उससे भी महान पराक्रमी योद्धा सेना में अनेक हैं।

उन वीरों की संख्या और शक्ति का पूरा वर्णन कर पाना कठिन है।
॥ दोहा 54 ॥

द्विबिद मयंद नील नल अंगद गद बिकटासि।
दधिमुख केहरि निसठ सठ जामवंत बलरासि।।54।।

दोहा का सरल भावार्थ
दूत श्रीराम की सेना के प्रमुख वीरों के नाम बताता है— द्विविद, मयंद, नील, नल, अंगद, गद, विकटास्य, दधिमुख, केहरि, निष्ठ, शठ और बल के भंडार जामवंत जैसे असंख्य महान योद्धा उस सेना में हैं।

॥ वानर-सेना का अतुलनीय बल ॥

चौपाई

ए कपि सब सुग्रीव समाना। इन्ह सम कोटिन्ह गनइ को नाना।।
राम कृपाँ अतुलित बल तिन्हहीं। तृन समान त्रैलोकहि गनहीं।।

सरल भावार्थ
दूत कहता है— ये सभी वानर बल में सुग्रीव के समान हैं और इनके जैसे करोड़ों अन्य योद्धाओं की गिनती भी संभव नहीं।

श्रीराम की कृपा से उनमें इतना अद्भुत बल है कि वे तीनों लोकों को भी तिनके के समान समझते हैं।
चौपाई

अस मैं सुना श्रवन दसकंधर। पदुम अठारह जूथप बंदर।।
नाथ कटक महँ सो कपि नाहीं। जो न तुम्हहि जीतै रन माहीं।।

सरल भावार्थ
दूत कहता है— हे दशानन! मैंने सुना है कि सेना में अठारह पद्म वानर-दलों के सेनापति हैं।

उनकी सेना में ऐसा कोई वानर नहीं जो युद्ध में स्वयं को आपके सामने निर्बल समझता हो।
चौपाई

परम क्रोध मीजहिं सब हाथा। आयसु पै न देहिं रघुनाथा।।
सोषहिं सिंधु सहित झष ब्याला। पूरहीं न त भरि कुधर बिसाला।।

सरल भावार्थ
सभी वानर क्रोध और उत्साह से अपने हाथ मल रहे हैं। वे केवल श्रीराम की आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

उनका कहना है कि वे समुद्र को उसके जीवों सहित सुखा सकते हैं या बड़े-बड़े पर्वत डालकर उसे भर सकते हैं।
चौपाई

मर्दि गर्द मिलवहिं दससीसा। ऐसेइ बचन कहहिं सब कीसा।।
गर्जहिं तर्जहिं सहज असंका। मानहु ग्रसन चहत हहिं लंका।।

सरल भावार्थ
वानरवीर निर्भय होकर रावण को परास्त करने की बातें कर रहे हैं।

उनकी गर्जना और उत्साह देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो वे पूरी लंका को अपने अधिकार में लेने के लिए तत्पर हों।
॥ दोहा 55 ॥

सहज सूर कपि भालु सब पुनि सिर पर प्रभु राम।
रावन काल कोटि कहु जीति सकहिं संग्राम।।55।।

दोहा का सरल भावार्थ
दूत कहता है— वानर और भालू स्वयं ही स्वभाव से वीर हैं, और उनके ऊपर स्वयं श्रीराम का संरक्षण है।

ऐसी सेना के सामने करोड़ों रावण भी युद्ध में विजय प्राप्त नहीं कर सकते।

॥ लक्ष्मण जी का पत्र ॥

चौपाई

राम तेज बल बुधि बिपुलाई। सेष सहस सत सकहिं न गाई।।
सक सर एक सोषि सत सागर। तब भ्रातहि पूँछेउ नय नागर।।

सरल भावार्थ
दूत रावण को समझाता है कि श्रीराम के तेज, बल और बुद्धि की विशालता का वर्णन हजार मुख वाले शेषनाग भी पूर्ण रूप से नहीं कर सकते।

प्रभु अपने एक ही बाण से सैकड़ों समुद्र सुखा सकते हैं, फिर भी नीति का सम्मान करते हुए उन्होंने विभीषण से उपाय पूछा।
चौपाई

तासु बचन सुनि सागर पाहीं। मागत पंथ कृपा मन माहीं।।
सुनत बचन बिहसा दससीसा। जौं असि मति सहाय कृत कीसा।।

सरल भावार्थ
विभीषण की सलाह मानकर श्रीराम समुद्र से मार्ग माँग रहे हैं।

यह सुनकर रावण हँसा। अपने अहंकार के कारण उसने प्रभु की विनम्रता को कमजोरी समझ लिया।
चौपाई

सहज भीरु कर बचन दृढ़ाई। सागर सन ठानी मचलाई।।
मूढ़ मृषा का करसि बड़ाई। रिपु बल बुद्धि थाह मैं पाई।।

सरल भावार्थ
रावण विभीषण का उपहास करता है और श्रीराम की समुद्र से विनय को भी भय का संकेत मानता है।

वह दूत की बात को झूठी प्रशंसा कहकर शत्रु के वास्तविक बल को समझ लेने का दावा करता है।
चौपाई

सचिव सभीत बिभीषन जाकें। बिजय बिभूति कहाँ जग ताकें।।
सुनि खल बचन दूत रिस बाढ़ी। समय बिचारि पत्रिका काढ़ी।।

सरल भावार्थ
रावण विभीषण का भी उपहास करता है और उनकी सावधानी को भय समझता है।

रावण के ऐसे वचन सुनकर दूत के मन में क्रोध आया, लेकिन उचित समय का विचार करके उसने लक्ष्मण जी का पत्र निकाल लिया।
चौपाई

रामानुज दीन्हीं यह पाती। नाथ बचाइ जुड़ावहु छाती।।
बिहसि बाम कर लीन्हीं रावन। सचिव बोलि सठ लाग बचावन।।

सरल भावार्थ
दूत ने कहा— हे नाथ! यह पत्र श्रीराम के छोटे भाई लक्ष्मण जी ने दिया है। इसे पढ़कर अपने हृदय को समझाइए।

रावण ने हँसकर पत्र को अपने बाएँ हाथ में लिया और अपने मंत्री से उसे पढ़वाने लगा।
॥ दोहा 56(क) ॥

बातन्ह मनहि रिझाइ सठ जनि घालसि कुल खीस।
राम बिरोध न उबरसि सरन बिष्नु अज ईस।।56(क)।।

दोहा का सरल भावार्थ
लक्ष्मण जी का संदेश है— हे मूर्ख! केवल बातों से अपने मन को प्रसन्न करके अपने कुल का नाश मत कर।

श्रीराम से विरोध करके कोई बच नहीं सकता, चाहे वह ब्रह्मा, विष्णु या शिव की शरण लेने का प्रयास ही क्यों न करे।
॥ दोहा 56(ख) ॥

की तजि मान अनुज इव प्रभु पद पंकज भृंग।
होहि कि राम सरानल खल कुल सहित पतंग।।56(ख)।।

दोहा का सरल भावार्थ
अभिमान छोड़कर अपने छोटे भाई विभीषण की तरह श्रीराम के चरण-कमलों का भक्त बन जा।

अन्यथा श्रीराम के बाणरूपी अग्नि में अपने कुल सहित पतंगे के समान नष्ट होना पड़ेगा।

॥ शुक की अंतिम हितकारी सलाह ॥

चौपाई

सुनत सभय मन मुख मुसुकाई। कहत दसानन सबहि सुनाई।।
भूमि परा कर गहत अकासा। लघु तापस कर बाग बिलासा।।

सरल भावार्थ
पत्र सुनकर रावण के मन में भीतर से भय उत्पन्न हुआ, पर बाहर से वह मुस्कराता रहा।

वह सभा के सामने श्रीराम की शक्ति का उपहास करने लगा और अपने अभिमान को बनाए रखा।
चौपाई

कह सुक नाथ सत्य सब बानी। समुझहु छाड़ि प्रकृति अभिमानी।।
सुनहु बचन मम परिहरि क्रोधा। नाथ राम सन तजहु बिरोधा।।

सरल भावार्थ
शुक ने कहा— हे नाथ! पत्र में कही गई प्रत्येक बात सत्य है। अपने अभिमानी स्वभाव को छोड़कर इसे समझिए।

मेरी बात क्रोध छोड़कर सुनिए और श्रीराम से विरोध समाप्त कर दीजिए।
चौपाई

अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। जद्यपि अखिल लोक कर राऊ।।
मिलत कृपा तुम्ह पर प्रभु करिही। उर अपराध न एकउ धरिही।।

सरल भावार्थ
शुक कहता है— श्रीरघुवीर का स्वभाव अत्यंत कोमल और करुणामय है, यद्यपि वे समस्त लोकों के स्वामी हैं।

यदि आप उनकी शरण में जाएँगे, तो वे आप पर कृपा करेंगे और आपके पिछले अपराधों को हृदय में नहीं रखेंगे।
चौपाई

जनकसुता रघुनाथहि दीजे। एतना कहा मोर प्रभु कीजे।।
जब तेहिं कहा देन बैदेही। चरन प्रहार कीन्ह सठ तेही।।

सरल भावार्थ
शुक ने रावण से अंतिम निवेदन किया— माता जानकी को श्रीरघुनाथ को लौटा दीजिए; मेरी केवल इतनी बात मान लीजिए।

लेकिन जैसे ही उसने माता सीता को लौटाने की बात कही, अभिमानी रावण ने उसका अपमान किया।
चौपाई

नाइ चरन सिरु चला सो तहाँ। कृपासिंधु रघुनायक जहाँ।।
करि प्रनामु निज कथा सुनाई। राम कृपाँ आपनि गति पाई।।

सरल भावार्थ
शुक रावण को प्रणाम करके वहाँ से चला और कृपा के सागर श्रीराम के पास पहुँचा।

उसने प्रभु को प्रणाम करके अपनी कथा सुनाई और श्रीराम की कृपा से अपना कल्याण प्राप्त किया।
चौपाई

रिषि अगस्ति कीं साप भवानी। राछस भयउ रहा मुनि ग्यानी।।
बंदि राम पद बारहिं बारा। मुनि निज आश्रम कहुँ पगु धारा।।

सरल भावार्थ
भगवान शिव माता पार्वती से बताते हैं कि शुक वास्तव में एक ज्ञानी मुनि था जो अगस्त्य ऋषि के शाप के कारण राक्षस बना हुआ था।

श्रीराम की कृपा से उसका शाप समाप्त हुआ। उसने बार-बार प्रभु के चरणों में प्रणाम किया और अपने आश्रम की ओर चला गया।
॥ दोहा 57 ॥

बिनय न मानत जलधि जड़ गए तीन दिन बीति।
बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति।।57।।

दोहा का सरल भावार्थ
इधर समुद्र के तट पर श्रीराम को विनय करते हुए तीन दिन बीत गए, लेकिन समुद्र ने कोई मार्ग प्रस्तुत नहीं किया।

तब श्रीराम ने गंभीर होकर कहा— जहाँ विनय का प्रभाव न हो, वहाँ कभी-कभी अनुशासन और दृढ़ता आवश्यक होती है।

🌺 इस प्रसंग का भाव

इस भाग में बार-बार रावण को सुधारने का अवसर मिलता है।

पहले उसका अपना दूत श्रीराम की शक्ति का सत्य वर्णन करता है, फिर लक्ष्मण जी का स्पष्ट संदेश आता है, और अंत में शुक स्वयं उसे अभिमान छोड़कर माता सीता को लौटाने की सलाह देता है।

लेकिन अहंकार सत्य को स्वीकार नहीं करने देता।

दूसरी ओर श्रीराम का व्यवहार हमें यह भी सिखाता है कि सामर्थ्य होने के बाद भी पहले विनय, नीति और धैर्य का मार्ग अपनाना चाहिए।

जब विनम्रता को बार-बार कमजोरी समझ लिया जाए, तब धर्म की रक्षा के लिए दृढ़ता भी आवश्यक हो जाती है।

मूल पाठ: श्रीरामचरितमानस — पञ्चम सोपान, सुन्दरकाण्ड। इस भाग में दोहा 54, 55, 56(क), 56(ख) और 57 तथा इनके अंतर्गत आने वाली सभी चौपाइयाँ क्रमवार मिलान करके प्रस्तुत की गई हैं।
अगला प्रसंग — श्रीराम का समुद्र पर क्रोध, समुद्रदेव का प्रकट होना, नल-नील का उपाय और सुन्दरकाण्ड का समापन
॥ जय श्रीराम • जय हनुमान ॥

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