संदेश

तुलसीदास लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्री विनय पत्रिका भाग 3 — रामनाम जप, दास्य भक्ति और करुणा | पद 65–100 हिंदी अर्थ सहित

✦ भक्ति भावना प्रस्तुत ✦ संत साहित्य संग्रह • तुलसीदास ग्रंथावली • भाग ३ श्री विनय पत्रिका — भाग ३ : रामनाम, दास्य-विनय और करुणा की पुकार गोस्वामी तुलसीदास कृत • पद ६५ से १०० • मूल पाठ, शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ ३६ संपूर्ण पद ४ बड़े विषय बिना फोटो • तेज़ खुलने वाला लेख श्री विनय पत्रिका के प्रारंभिक ६४ पदों की मंगल वंदना के बाद, इस तीसरे भाग में गोस्वामी तुलसीदास जी रामनाम की महिमा गाते हैं, श्रीराम को अपना प्रिय स्वामी मानकर विनय करते हैं और मन की भटकन को पहचानते हुए प्रभु की करुणा की पुकार लगाते हैं। यहाँ पद ६५ से पद १०० तक सभी ३६ पद पूरे मूल पाठ सहित दिए गए हैं—प्रत्येक के नीचे शब्दार्थ, सरल अर्थ और उसका भावपूर्ण विवेचन है। ← भाग २ : पद १–६४ पढ़ें भाग १ : परिचय पढ़ें इस लेख की विषय-सूची ↓ पढ़ने का क्रम: पद ६५–७० में रामनाम का महत्व, पद ७१–८२ में दास्य और करुणा, पद ८३–९० में मन को उपदेश तथा पद ९१–१०० में आत्मनिवेदन और श्रीराम के शील का वर्णन है। पाठ-संबंधी सूचना: पुराने अवधी/ब्रज पदों की वर्तनी अलग-अलग संस्करणों में बदल सकती है। मूल पाठ को उपलब्ध डिजिटल ...

श्री विनय पत्रिका भाग 2 — संपूर्ण मंगल वंदना एवं देवस्तुति संग्रह | पद 1–64 हिंदी अर्थ सहित

चित्र
✦ भक्ति भावना प्रस्तुत ✦ संत साहित्य संग्रह • तुलसीदास ग्रंथावली • भाग २ श्री विनय पत्रिका — संपूर्ण मंगल वंदना एवं देवस्तुति संग्रह गोस्वामी तुलसीदास कृत • पद १ से ६४ • मूल पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ सहित ६४ पूर्ण मूल पद १० देवस्तुति विषय मूल पाठ + शब्दार्थ + भावार्थ श्री विनय पत्रिका भाग 2 : मंगल वंदना और देवस्तुति संग्रह श्री विनय पत्रिका के प्रारंभिक चौंसठ पद भक्ति का एक अनुपम द्वार खोलते हैं। श्रीगणेश से आरंभ होकर सूर्यदेव, भगवान शिव, माँ भगवती, गंगा-यमुना, काशी-चित्रकूट, हनुमानजी, श्रीराम के प्रिय अनुजों, माता सीता और भगवान श्रीराम की वंदना तक, यह पूरा संग्रह हर पद के मूल पाठ, शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और भावार्थ के साथ यहाँ प्रस्तुत है। ← भाग १ : विनय पत्रिका का परिचय विषय-सूची देखें ↓ पाठक के लिए: यह एक ही संपूर्ण लंबे लेख में पद १–६४ का क्रमबद्ध संग्रह है; इसमें किसी पद को केवल शीर्षक या सार के रूप में नहीं छोड़ा गया है। मूल भाषा की अवधी/ब्रज और संस्कृतनिष्ठ पदावली को यथासंभव पाठानुसार रखा गया है। अलग-अलग प्रकाशनों में वर्तनी और विरामचिह्न में थोड़ा अंतर मिल सकता है। नी...