श्री विनय पत्रिका भाग 2 — संपूर्ण मंगल वंदना एवं देवस्तुति संग्रह | पद 1–64 हिंदी अर्थ सहित

✦ भक्ति भावना प्रस्तुत ✦
संत साहित्य संग्रह • तुलसीदास ग्रंथावली • भाग २

श्री विनय पत्रिका — संपूर्ण मंगल वंदना एवं देवस्तुति संग्रह

गोस्वामी तुलसीदास कृत • पद १ से ६४ • मूल पाठ एवं सरल हिंदी अर्थ सहित
६४ पूर्ण मूल पद१० देवस्तुति विषयमूल पाठ + शब्दार्थ + भावार्थ
श्री विनय पत्रिका भाग 2 मंगल वंदना — गोस्वामी तुलसीदास भगवान राम और ग्रंथ
श्री विनय पत्रिका भाग 2 : मंगल वंदना और देवस्तुति संग्रह

श्री विनय पत्रिका के प्रारंभिक चौंसठ पद भक्ति का एक अनुपम द्वार खोलते हैं। श्रीगणेश से आरंभ होकर सूर्यदेव, भगवान शिव, माँ भगवती, गंगा-यमुना, काशी-चित्रकूट, हनुमानजी, श्रीराम के प्रिय अनुजों, माता सीता और भगवान श्रीराम की वंदना तक, यह पूरा संग्रह हर पद के मूल पाठ, शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और भावार्थ के साथ यहाँ प्रस्तुत है।

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पाठक के लिए: यह एक ही संपूर्ण लंबे लेख में पद १–६४ का क्रमबद्ध संग्रह है; इसमें किसी पद को केवल शीर्षक या सार के रूप में नहीं छोड़ा गया है।

मूल भाषा की अवधी/ब्रज और संस्कृतनिष्ठ पदावली को यथासंभव पाठानुसार रखा गया है। अलग-अलग प्रकाशनों में वर्तनी और विरामचिह्न में थोड़ा अंतर मिल सकता है। नीचे दिए हिंदी अर्थ स्वतंत्र, सरल भावानुवाद हैं—शब्दशः टीका नहीं।

विनय पत्रिका की मंगल वंदना का भाव

भक्ति की परंपरा में मंगलाचरण केवल कार्य की शुरुआत नहीं, बल्कि मन और वाणी को सही उद्देश्य के लिए समर्पित करना है। गोस्वामी तुलसीदास जी प्रत्येक देवता का सम्मान करते हुए अंत में प्रायः श्रीराम के चरणों में प्रेम, निर्मल बुद्धि या कृपा का ही वर माँगते हैं। इसीलिए आरंभिक ६४ पदों में विविध देवस्तुतियाँ होते हुए भी उनका अंतःसूत्र विनय, सेवा और श्रीरामभक्ति है।

01. श्रीगणेश एवं सूर्य स्तुति पद 1 से 2

गणेश और सूर्य देव की मंगलप्रार्थना। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

विनय पत्रिका में गणेश सूर्यदेव और भगवान शिव की मंगल स्तुति
श्रीगणेश एवं सूर्य स्तुति

पद 01 — गाइये गनपति जगबंदन।

गाइये गनपति जगबंदन। संकर-सुवन भवानी नंदन ॥१॥ सिद्धि-सदन, गज बदन, बिनायक। कृपा-सिंधु, सुंदर सब-लायक ॥२॥ मोदक-प्रिय, मुद-मंगल-दाता। बिद्या-बारिधि, बुद्धि बिधाता ॥३॥ माँगत तुलसिदास कर जोरे। बसहिं रामसिय मानस मोरे ॥४॥

शब्दार्थ

जगबंदन = संसार के वंदनीय; मुद = आनंद; मानस = हृदय।

सरल हिंदी अर्थ

कवि गणेशजी को शिव-पार्वती के पुत्र, बुद्धि और मंगल के दाता कहकर नमस्कार करते हैं। अंत में वे सांसारिक वस्तुओं के बदले अपने हृदय में सीताराम का स्थायी निवास माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

मंगलाचरण का वास्तविक उद्देश्य यही है कि साधना की दिशा स्पष्ट हो। तुलसीदास के लिए विवेक, शिक्षा और सिद्धि का सर्वोच्च फल राम-सीता के प्रति प्रेम है। गणेश की स्तुति भी रामभक्ति को पुष्ट करती है; इसमें अलग-अलग आराध्य विरोधी नहीं, भक्ति-पथ के सहायक दिखाई देते हैं।

पद 02 — दीन-दयालु दिवाकर देवा।

दीन-दयालु दिवाकर देवा। कर मुनि, मनुज, सुरासुर सेवा ॥१॥ हिम-तम-करि केहरि करमाली। दहन दोष-दुख-दुरित-रुजाली ॥२॥ कोक-कोकनद-लोक-प्रकासी। तेज-प्रताप-रूप-रस-रासी ॥३॥ सारथि-पंगु, दिब्य रथ-गामी। हरि-संकर-बिधि-मूरति स्वामी ॥४॥ बेद पुरान प्रगट जस जागै। तुलसी राम-भगति बर माँगै ॥५॥

शब्दार्थ

दिवाकर = सूर्य; करमाली = किरणों की माला; दुरित = पाप या बुरा कर्म।

सरल हिंदी अर्थ

सूर्यदेव जगत को प्रकाश और ऊर्जा देने वाले हैं; उनका तेज अंधकार, शीत और व्याधियों का प्रतीकात्मक नाश करता है। तुलसीदास सूर्य की महिमा गाकर अंत में उनसे श्रीराम की भक्ति का वरदान माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

सूर्य की उज्ज्वलता को कवि बाहरी प्रकाश से अधिक अंतरात्मा के जागरण से जोड़ते हैं। मन की जड़ता, अज्ञान और आलस्य दूर करके जीवन को कर्तव्य तथा भगवान की स्मृति की ओर लगाना ही इस स्तुति का प्रेरक संदेश है।

02. भगवान शिव एवं भैरवरूप स्तुति पद 3 से 14

शिव की उदारता, ज्ञान, वैराग्य और रामभक्ति की याचना। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

पद 03 — को जाँचिये संभु तजि आन।

को जाँचिये संभु तजि आन। दीनदयालु भगत-आरति-हर, सब प्रकार समरथ भगवान ॥१॥ कालकूट-जुर जरत सुरासुर, निज पन लागि किये बिष पान। दारुन दनुज, जगत-दुखदायक, मारेउ त्रिपुर एक ही बान ॥२॥ जो गति अगम महामुनि दुर्लभ, कहत संत, श्रुति, सकल पुरान। सो गति मरन-काल अपने पुर, देत सदासिव सबहिं समान ॥३॥ सेवत सुलभ, उदार कलपतरु, पारबती-पति परम सुजान। देहु काम-रिपु राम-चरन-रति, तुलसिदास कहँ कृपानिधान ॥४॥

शब्दार्थ

कालकूट = समुद्र-मंथन का विष; पुर = नगरी; चरन-रति = चरणों से प्रेम।

सरल हिंदी अर्थ

भक्त पूछता है कि भगवान शंकर जैसा उदार और किससे याचना की जाए। विषपान, त्रिपुर-विजय और काशी में कृपा देने वाले शिव सर्वसमर्थ हैं। कवि उनसे अंततः श्रीराम के चरणों में प्रेम माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

शिव की महिमा में बल और करुणा दोनों समान रूप से हैं। यहाँ संकट से बचने की प्रार्थना केवल सांसारिक सुरक्षा नहीं, आत्मिक कल्याण का आग्रह है। शरणागति का भाव है कि जो प्रभु दूसरों के दुःख हरते हैं, वे मेरे हृदय को भी रामभक्ति के योग्य बना दें।

पद 04 — दानी कहुँ संकर-सम नाहीं।

दानी कहुँ संकर-सम नाहीं। दीन-दयालु दिबोई भावै, जाचक सदा सोहाहीं ॥१॥ मारिकै मार थप्यौ जगमें, जाकी प्रथम रेख भट माहीं। ता ठाकुरकौ रीझि निवाजिबौ, कह्यौ क्यों परत मो पाहीं ॥२॥ जोग कोटि करि जो गति हरिसों, मुनि माँगत सकुचाहीं। बेद-बिदित तेहि पद पुरारि-पुर, कीट पंतग समाहीं ॥३॥ ईस उदार उमापति परिहरि, अनत जे जाचन जाहीं। तुलसिदास ते मूढ़ माँगने, कबहुँ न पेट अघाहीं ॥४॥

शब्दार्थ

दानी = देने वाले; जाचक = याचक; पुरारि = त्रिपुरासुर के शत्रु शिव।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास शिव को अतुलनीय दानी बताते हैं। उनके यहाँ छोटा-बड़ा, योग्य-अयोग्य का भेद किए बिना शरणागत को अनुग्रह मिल सकता है। भगवान की महिमा देखकर कवि अन्यत्र भटकने की निरर्थकता कहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पद में दान का अर्थ वस्तु-वितरण मात्र नहीं है, बल्कि उत्तम गति और आत्मिक आश्रय देना है। भक्त को अपना अभिमान छोड़कर भगवान के दयालु स्वभाव पर विश्वास रखना चाहिए। यह विनम्र याचना भक्त और ईश्वर के संबंध की सहजता को प्रकट करती है।

पद 05 — बावरो रावरो नाह भवानी।

बावरो रावरो नाह भवानी। दानि बड़ो दिन देत दये बिनु, बेद-बडाई भानी ॥१॥ निज घरकी बरबात बिलोकहु, हौ तुम परम सयानी। सिवकी दई संपदा देखत, श्री-सारदा सिहानी ॥२॥ जिनके भाल लिखी लिपि मेरी, सुखकी नहीं निसानी। तिन रंकनकौ नाक सँवारत, हौं आयो नकबानी ॥३॥ दुख-दीनता दुखी इनके दुख, जाचकता अकुलानी। यह अधिकार सौपिये औरहिं, भीख भली मैं जानी ॥४॥ प्रेम-प्रसंसा-बिनय-ब्यंगजुत, सुनि बिधिकी बर बानी। तुलसी मुदित महेस मनहिं मन, जगत-मातु मुसुकानी ॥५॥

शब्दार्थ

नाह = स्वामी या पति; रंक = निर्धन; नकबानी = प्रशंसा करने वाला।

सरल हिंदी अर्थ

पद में देवी पार्वती से संवाद का अनोखा, प्रेमपूर्ण और विनोदी ढंग है। कवि शिव की दानशीलता का ऐसा वर्णन करते हैं कि स्वयं उनका गृहस्थ जीवन भी सरलता और त्याग का प्रतीक दिखाई देता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

तुलसीदास के व्यंग्य में अपमान नहीं, निकटता और अपनापन है। भक्त अपने आराध्य के घर का सदस्य बनकर उनसे बोलने का साहस करता है। यहाँ शिव का वैराग्य और उनकी असीम उदारता साथ-साथ उभरते हैं। पद पढ़ते समय इसकी विनोदपूर्ण भक्ति-भाषा को समझना महत्त्वपूर्ण है।

पद 06 — जाँचिये गिरिजापति कासी। जासु भवन अनिमादिक दासी ॥१॥

जाँचिये गिरिजापति कासी। जासु भवन अनिमादिक दासी ॥१॥ औढर-दानि द्रवत पुनि थोरें। सकत न देखि दीन करजोरे ॥२॥ सुख-संपति, मति-सुगति सुहाई। सकल सुलभ संकर-सेवकाई ॥३॥ गये सरन आरतिकै लीन्हे। निरखि निहाल निमिषमहँ कीन्हे ॥४॥ तुलसिदास जाचक जस गावै। बिमल भगति रघुपतिकी पावै ॥५॥

शब्दार्थ

गिरिजापति = पार्वती के स्वामी; औढरदानी = उदारता से देने वाले; सुगति = उत्तम गति।

सरल हिंदी अर्थ

काशी के ईश्वर शिव थोड़ी भक्ति से भी प्रसन्न होकर दीन की ओर देखते हैं। तुलसीदास उनकी कृपा का यश गाते हुए श्रीरघुनाथ की निर्मल भक्ति पाने की कामना करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कवि के लिए शिव-सेवा का सर्वोत्तम प्रसाद आत्मा का कल्याण है। विनम्र हाथ जोड़ना बाहरी संकेत है; असली शरणागति भीतर की ईमानदार पुकार है। इस पद में भगवान की कृपा को सहज, दयालु और भक्त के निकट बताया गया है।

पद 07 — कस न दीनपर द्रवहु उमाबर। दारुन बिपति हरन करुनाकर ॥१॥

कस न दीनपर द्रवहु उमाबर। दारुन बिपति हरन करुनाकर ॥१॥ बेद-पुरान कहत उदार हर। हमरि बेर कस भयेहु कृपिनतर ॥२॥ कवनि भगति कीन्ही गुननिधि द्विज। होइ प्रसन्न दीन्हेहु सिव पद निज ॥३॥ जो गति अगम महामुनि गावहिं। तव पुर कीट पतंगहु पावहिं ॥४॥ देहु काम-रिपु राम-चरन-रति। तुलसिदास प्रभु हरहु भेद-मति ॥५॥

शब्दार्थ

उमाबर = पार्वती के पति; कृपिन = कृपण; भेद-मति = भिन्नता में उलझी बुद्धि।

सरल हिंदी अर्थ

भक्त शिव से प्रश्न करता है कि आप सब पर दया करते हैं, तो मुझ दीन पर भी कृपा क्यों न हो। अंतिम प्रार्थना यह है कि मेरे मन का भेदभाव मिटे और श्रीराम के चरणों में प्रीति हो।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह सवाल श्रद्धाहीन विरोध नहीं, प्रेमपूर्ण विनय है। भक्त मानता है कि उसकी पात्रता छोटी है, पर भगवान की दया बड़ी है। ऐसी प्रार्थना अहंकार घटाती है तथा मन को व्यापक करुणा, समानता और रामनाम की ओर उन्मुख करती है।

पद 08 — देव बड़े, दाता बड़े, संकर बड़े भोरे।

देव बड़े, दाता बड़े, संकर बड़े भोरे। किये दूर दुख सबनिके, जिन्ह-जिन्ह कर जोरे ॥१॥ सेवा, सुमिरन, पूजिबौ, पात आखत थोरे। दिये जगत जहँ लगि सबै, सुख, गज, रथ, घोरे ॥२॥ गावँ बसत बामदेव, मैं कबहूँ न निहोरे। अधिभौतिक बाधा भई, ते किंकर तोरे ॥३॥ बेगि बोलि बलि बरजिये, करतूति कठोरे। तुलसी दलि, रूँध्यो चहैं सठ साखि सिहोरे ॥४॥

शब्दार्थ

भोरे = सरल या भोले; आखत = अक्षत चावल; बामदेव = शिव का एक नाम।

सरल हिंदी अर्थ

शिव अल्प पूजा, स्मरण और अर्पण से भी भक्त की बात सुनते हैं। तुलसीदास अपने सामने उपस्थित कठिनाइयाँ बताकर शंकर से रक्षा की याचना करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इस पद में बाहरी समृद्धि के चित्र आते हैं, पर अंतर्निहित संदेश भगवान की सहज उपलब्धता है। भक्ति के लिए दिखावा आवश्यक नहीं; प्रेम और सच्ची पुकार अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। कवि अपने जीवन के संघर्षों को छिपाते नहीं और उन्हें भगवान के सामने रख देते हैं।

पद 09 — सिव! सिव! होइ प्रसन्न करु दाया।

सिव! सिव! होइ प्रसन्न करु दाया। करुनामय उदार कीरति, बलि जाउँ हरहु निज माया ॥१॥ जलज-नयन, गुन-अयन, मयन-रिपु, महिमा जान न कोई। बिनु तव कृपा राम-पद-पंकज, सपनेहुँ भगति न होई ॥२॥ रिषय, सिद्ध, मुनि, मनुज, दनुज, सुर, अपर जीव जग माहीं। तव पद बिमुख न पार पाव कोउ, कलप कोटि चलि जाहीं ॥३॥ अहिभूषन, दूषन-रिपु-सेवक, देव-देव, त्रिपुरारी। मोह-निहार-दिवाकर संकर, सरन सोक-भयहारी ॥४॥ गिरिजा-मन-मानस-मराल, कासीस, मसान-निवासी। तुलसिदास हरि-चरन-कमल-बर, देहु भगति अबिनासी ॥५॥

शब्दार्थ

मयन-रिपु = कामदेव के शत्रु; मराल = हंस; अबिनासी = कभी न मिटने वाली।

सरल हिंदी अर्थ

भगवान शिव से दया माँगते हुए कवि कहते हैं कि आपकी कृपा बिना श्रीराम के चरणों में भक्ति मिलना भी कठिन है। वे शिव को मोह और भय का निवारक मानकर अविनाशी प्रेम का वरदान चाहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पद का केंद्र ईश्वर-कृपा से मन के भीतर परिवर्तन होना है। केवल संसार से मुक्ति का विचार नहीं, रामचरण में स्थिर प्रेम उसकी परिणति है। शिव और श्रीराम के प्रति तुलसीदास की समन्वयकारी श्रद्धा यहाँ बहुत स्पष्ट रूप से झलकती है।

पद 10 — मोह-तम-तरणि, हर, रुद्र, संकर, शरण, हरण, मम शोक लोकाभिरामं।

मोह-तम-तरणि, हर, रुद्र, संकर, शरण, हरण, मम शोक लोकाभिरामं। बाल-शशि-भाल, सुविशाल लोचन-कमल, काम-सतकोटि-लावण्य-धामं ॥१॥ कंबु-कुंदेंदु-कर्पूर-विग्रह रुचिर, तरुण-रवि-कोटि तनु तेज भ्राजै। भस्म सर्वांग अर्धांग शैलात्मजा, व्याल-नृकपाल-माला विराजै ॥२॥ मौलिसंकुल जटा-मुकुट विद्युच्छटा, तटिनि-वर-वारि हरि-चरण-पूतं। श्रवण कुंडल, गरल कंठ, करुणाकंद, सच्चिदानंद वंदेऽवधूतं ॥३॥ शूल-शायक पिनाकासि-कर, शत्रु-वन-दहन इव धूमध्वज, वृषभ-यानं। व्याघ्र-गज-चर्म-परिधान, विज्ञान-घन, सिद्ध-सुर-मुनि-मनुज-सेव्यमानं ॥४॥ तांडवित-नृत्यपर, डमरु डिंडिम प्रवर, अशुभ इव भाति कल्याणाराशी। महाकल्पांत ब्रह्मांड-मंडल-दवन, भवन कैलास, आसीन काशी ॥५॥ तज्ञ, सर्वज्ञ, यज्ञेश, अच्युत, विभो, विश्व भवदंशसंभव पुरारी। ब्रह्मेंद्र, चंद्रार्क, वरुणाग्नि, वसु, मरुत, यम, अर्चि भवदंघ्नि सर्वाधिकारी ॥६॥ अकल, निरुपाधि, निर्गुण, निरंजन, ब्रह्म, कर्म-पथमेकमज निर्विकारं। अखिलविग्रह, उग्ररूप, शिव, भूपसुर, सर्वगत, शर्व सर्वोपकारं ॥७॥ ज्ञान-वैराग्य, धन-धर्म, कैवल्य-सुख, सुभग सौभाग्य शिव सानुकूलं। तदपि नर मूढ आरूढ संसार-पथ, भ्रमत भव, विमुख तव पादमूलं ॥८॥ नष्टमति, दुष्ट अति, कष्ट-रत, खेद-गत, दास तुलसी शंभु-शरण आया। देहि कामारि श्रीराम-पद-पंकज भक्ति अनवरत गत-भेद-माया ॥९॥

शब्दार्थ

मोह-तम = अज्ञान का अंधकार; तांडव = शिव का दिव्य नृत्य; कैवल्य = परम मुक्ति।

सरल हिंदी अर्थ

शिव के विविध नाम, रूप, आभूषण, नृत्य और विश्वव्यापक स्वरूप का महिमामय वर्णन है। कवि उनकी शरण में अपने कष्टों और भ्रम से छुटकारा पाकर श्रीराम के चरणों में निरंतर भक्ति माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

शिव का बाहरी रूप भले विरक्त और उग्र दिखे, भीतर वे कल्याण एवं करुणा की निधि हैं। पद में ज्ञान, वैराग्य, धर्म और मोक्ष की चर्चा होते हुए भी अंतिम आग्रह प्रेममयी भक्ति है। विश्व-वैभव के बीच अपनी आध्यात्मिक दुर्बलता स्वीकार करना ही विनय का सौंदर्य है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 10/64

पद 11 — देव, भीषणाकार, भैरव, भयंकर, भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति, विपति-हर्ता।

देव, भीषणाकार, भैरव, भयंकर, भूत-प्रेत-प्रमथाधिपति, विपति-हर्ता। मोह-मूषक-मार्जार, संसार-भय-हरण, तारण-तरण, अभय कर्ता ॥१॥ अतुल बल, विपुलविस्तार, विग्रहगौर, अमल अति धवल धरणीधराभं। शिरसि संकुलित-कल-जूट पिंगलजटा, पटल शत-कोटि-विद्युच्छटाभं ॥२॥ भ्राज विबुधापगा आप पावन परम, मौलि-मालेव शोभा विचित्रं। ललित लल्लाटपर राज रजनीशकल, कलाधर, नौमि हर धनद-मित्रं ॥३॥ इंदु-पावक-भानु-नयन, मर्दन-मयन, गुण-अयन, ज्ञान-विज्ञान-रूपं। रमण-गिरिजा, भवन भूधराधिप सदा, श्रवण कुंडल, वदनछवि अनूपं ॥४॥ चर्म-असि-शूल-धर, डमरु-शर-चाप-कर, यान वृषभेश, करुणा-निधानं। जरत सुर-असुर, नरलोक शोकाकुलं, मृदुलचित, अजित, कृत गरलपानं ॥५॥ भस्म तनु-भूषणं, व्याघ्र-चर्माम्बरं, उरग-नर-मौलि उर मालधारी। डाकिनी, शाकिनी, खेचरं, भूचरं, यंत्र-मंत्र-भंजन, प्रबल कल्मषारी ॥६॥ काल-अतिकाल, कलिकाल, व्यालादि-खग, त्रिपुर-मर्दन, भीम-कर्म भारी। सकल लोकान्त-कल्पान्त शूलाग्र कृत दिगजाव्यक्त-गुण नृत्यकारी ॥७॥ पाप-संताप-घनघोर संसृति दीन, भ्रमत जग योनि नहिं कोपि त्राता। पाहि भैरव-रूप राम-रूपी रुद्र, बंधु, गुरु, जनक, जननी, विधाता ॥८॥ यस्य गुण-गण गणति विमल मति शारधा, निगम नारद-प्रमुख ब्रह्मचारी। शेष, सर्वेश, आसीन आनंदवन, दास तुलसी प्रणत-त्रासहारी ॥९॥

शब्दार्थ

भैरव = शिव का उग्र स्वरूप; कल्मष = पाप-मैल; अवधूत = सांसारिक बंधनों से विरक्त।

सरल हिंदी अर्थ

भैरव रूप में शिव को संकट दूर करने वाला, भय हरने वाला तथा समय और मृत्यु की सीमाओं से परे बताया गया है। तुलसीदास उनके संरक्षण में अपनी असहायता प्रकट करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह उग्र स्वरूप भक्त को डराने के लिए नहीं, बल्कि मन के भय और अधर्म पर विजय का प्रतीक है। कवि अपने रक्षक को गुरु, माता, पिता और बंधु की तरह पुकारते हैं। इस अपनत्व में ही भैरव-स्तुति की करुणा दिखाई देती है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 11/64

पद 12 — सदा-शंकरं, शंप्रदं, सज्जनानंददं, शैल-कन्या-वरं, परमरम्यं।

सदा-शंकरं, शंप्रदं, सज्जनानंददं, शैल-कन्या-वरं, परमरम्यं। काम-मदमोचनं, तामरस-लोचनं, वामदेवं भजे भावगम्यं ॥१॥ कंबु-कुंदेंदु-कर्पूर-गौरं शिवं, सुंदरं, सच्चिदानंदकंदं। सिद्ध-सनकादि-योगींद्र-वृंदारका, विष्णु-विधि-वन्द्य चरणारविंदं ॥२॥ ब्रह्म-कुल-वल्लभं, सुलभ मति दुर्लभं, विकट-वेषं, विभुं, वेदपारं। नौमि करुणाकरं, गरल-गंगाधरं, निर्मलं, निर्गुणं, निर्विकारं ॥३॥ लोकनाथं, शोक-शूल-निर्मूलिनं, शूलिनं मोह-तम-भूरि-भानुं। कालकालं, कलातीतमजरं हरं, कठिन-कलिकाल-कानन-कृशानुं ॥४॥ तज्ञमज्ञान-पाथोधि-घटसंभवं, सर्वगं, सर्वसौभाग्यमूलं। प्रचुर-भव-भंजनं, प्रणत-जन-रंजनं, दास तुलसी शरण सानुकूलं ॥५॥

शब्दार्थ

शंप्रद = मंगल देने वाले; गरल = विष; निर्विकार = विकार से रहित।

सरल हिंदी अर्थ

शिव को कल्याणकारी, कमलनयन, ज्ञानस्वरूप, गंगाधर, काल के भी काल और शरणागतों का सहारा कहकर वंदन किया गया है। तुलसीदास स्वयं को उनका दास बताते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद याद दिलाता है कि भगवान का अनंत रूप केवल रूप-शोभा से नहीं जाना जाता। करुणा, सत्य, शांति और ज्ञान उनके स्वरूप के अभिन्न अंग हैं। भक्त उनके चरणों का आश्रय लेकर अपने भीतर भी इन्हीं गुणों को विकसित करने की प्रेरणा ग्रहण करता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 12/64

पद 13 — सेवहु सिव-चरन-सरोज-रेनु। कल्यान-अखिल-प्रद कामधेनू ॥१॥

सेवहु सिव-चरन-सरोज-रेनु। कल्यान-अखिल-प्रद कामधेनू ॥१॥ कर्पूर-गौर, करुना-उदार। संसार-सार, भुजगेन्द्र-हार ॥२॥ सुख-जन्मभूमि, महिमा अपार। निर्गुन, गुननायक, निराकार ॥३॥ त्रयनयन, मयन-मर्दन महेस। अहँकार निहार-उदित दिनेस ॥४॥ बर बाल निसाकर मौलि भ्राज। त्रैलोक-सोकहर प्रमथराज ॥५॥ जिन्ह कहँ बिधि सुगति न लिखी भाल। तिन्ह की गति कासीपति कृपाल ॥६॥ उपकारी कोऽपर हर-समान। सुर-असुर जरत कृत गरल पान ॥७॥ बहु कल्प उपायन करि अनेक। बिनु संभु-कृपा नहिं भव-बिबेक ॥८॥ बिग्यान-भवन, गिरिसुता-रमन। कह तुलसिदास मम त्राससमन ॥९॥

शब्दार्थ

चरन-सरोज = कमल जैसे चरण; कामधेनु = मनोवांछित मंगल देने वाली; भव-विवेक = संसार का सत्य समझने की बुद्धि।

सरल हिंदी अर्थ

भगवान शिव के चरणों की रज को कल्याण का साधन बताया गया है। उनका गौर शरीर, चंद्रमा, त्रिनेत्र, दया और वैराग्य वर्णित हैं; उनकी कृपा से विवेक और मंगल मिलने का भाव है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पद का गहरा संदेश है कि विवेक के बिना साधनाएँ अधूरी पड़ सकती हैं। बाहरी उपलब्धि से आगे बढ़कर भक्त अपने व्यवहार, इच्छा और अहंकार को परखता है। शिव की कृपा से आत्मचिंतन और रामभक्ति का मार्ग प्रशस्त होने की कामना प्रकट की गई है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 13/64

पद 14 — देखो देखो, बन बन्यो आजु उमाकंत। मानों देखन तुमहिं आई रितु बसंत ॥१॥

देखो देखो, बन बन्यो आजु उमाकंत। मानों देखन तुमहिं आई रितु बसंत ॥१॥ जनु तनुदुति चंपक-कुसुम-माल। बर बसन नील नूतन तमाल ॥२॥ कलकदलि जंघ, पद कमल लाल। सूचत कटि केहरि, गति मराल ॥३॥ भूषन प्रसून बहु बिबिध रंग। नूपूर किंकिनि कलरव बिहंग ॥४॥ कर नवल बकुल-पल्लव रसाल। श्रीफल कुच, कंचुकिलता-जाल ॥५॥ आनन सरोज, कच मधुप गुंज। लोचन बिसाल नव नील कंज ॥६॥ पिक बचन चरित बर बर्हि कीर। सित सुमन हास, लीला समीर ॥७॥ कह तुलसिदास सुनु सिव सुजान। उर बसि प्रपंच रचे पंचबान ॥८॥ करि कृपा हरिय भ्रम-फंद काम। जेहि हृदय बसहिं सुखरासि राम ॥९॥

शब्दार्थ

उमाकंत = पार्वतीपति शिव; पंचबान = कामदेव; मलय बात = सुगंधित मंद समीर।

सरल हिंदी अर्थ

यह अत्यंत कल्पनाशील पद है, जिसमें शिव-पार्वती की शोभा को वसंत ऋतु और वन के रूपकों से चित्रित किया गया है। अंत में कवि कामजनित भ्रम मिटाकर अपने हृदय में श्रीराम को बसाने की प्रार्थना करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

काव्य की अलंकारपूर्ण भाषा यहाँ भक्ति के आंतरिक उद्देश्य को नहीं छिपाती। सुंदर प्रकृति के दृश्य मन को आकर्षित करते हैं, लेकिन तुलसीदास उसी मन को शुद्ध प्रेम की ओर मोड़ना चाहते हैं। रूपक और आत्मनिवेदन का यह सुंदर मेल विनय पत्रिका का खास साहित्यिक गुण है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 14/64

03. माँ भगवती की स्तुति पद 15 से 16

आदिशक्ति की करुणा और रामप्रेम की कामना। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

माँ भगवती और माँ गंगा की विनय पत्रिका में दिव्य वंदना
माँ भगवती की स्तुति

पद 15 — दुसह दोष-दुख, दलनि, करु देवि दाया।

दुसह दोष-दुख, दलनि, करु देवि दाया। विश्व-मूलाऽसि, जन-सानुकूलाऽसि, कर शूलधारिणि महामूलमाया ॥१॥ तडित गर्भाङ्ग सर्वाङ्ग सुन्दर लसत, दिव्य पट भव्य भूषण विराजैं। बालमृग-मंजु खंजन-विलोचनि, चन्द्रवदनि लखि कोटि रतिमार लाजैं ॥२॥ रूप-सुख-शील-सीमाऽसि, भीमाऽसि, रामाऽसि, वामाऽसि वर बुद्धि बानी। छमुख हेरंब-अंबासि, जगदंबिके, शंभु-जायासि जय जय भवानी ॥३॥ चंड-भुजदंड-खंडनि, बिहंडनि महिष मुंड-मद-भंग कर अंग तोरे। शुंभ-निःशुंभ कुम्भीश रण-केशरिणि, क्रोध-वारीश अरि-वृन्द बोरे ॥४॥ निगम-आगम-अगम गुर्वि तव गुन-कथन, उर्विधर करत जेहि सहसजीहा। देहि मा, मोहि पन प्रेम यह नेम निज, राम घनश्याम तुलसी पपीहा ॥५॥

शब्दार्थ

मूलमाया = जगत की आदि शक्ति; शूलधारिणी = त्रिशूल धारण करने वाली; पपीहा = वर्षा-बूँद की प्रतीक्षा करने वाला पक्षी।

सरल हिंदी अर्थ

माँ भवानी से दोष और दुःख हरने की विनती है। उन्हें शक्ति, सौंदर्य, करुणा और दुष्टता के विनाश की अधिष्ठात्री कहा गया है। तुलसीदास उनसे श्रीराम के लिए पपीहे जैसी एकनिष्ठ प्यास माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

देवी-स्तुति में शक्ति और ममता का अद्वितीय समन्वय है। माता का आशीर्वाद भक्त को बाहरी विजय से अधिक अपने चित्त की दिशा सुधारने के लिए चाहिए। रामप्रेम के लिए पपीहे का रूपक इस एकाग्र साधना का मार्मिक प्रतीक बन जाता है।

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पद 16 — जय जय जगजननि देवि सुर-नर-मुनि-असुर-सेवि,

जय जय जगजननि देवि सुर-नर-मुनि-असुर-सेवि, भुक्ति-मुक्ति-दायनी, भय-हरणि कालिका। मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्वशर्वरीश-वदनि, ताप-तिमिर-तरुणि-तरणि-किरणमालिका ॥१॥ वर्म, चर्म कर कृपाण, शूल-शेल-धनुषबाण, धरणि, दलनि दानव-दल, रण-करालिका। पूतना-पिंशाच-प्रेत-डाकिनी-शाकिनी-समेत, भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका ॥२॥ जय महेश-भामिनी, अनेक-रूप-नामिनी, समस्त-लोक-स्वामिनी, हिमशैल-बालिका। रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम, देहु ह्वै प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका ॥३॥

शब्दार्थ

भुक्ति = सांसारिक सुख; मुक्ति = बंधन से छुटकारा; प्रणत-पालिका = शरणागत की रक्षक।

सरल हिंदी अर्थ

जगज्जननी के अनेक स्वरूप और नाम गाए गए हैं। वे शुभ फल देने वाली, भय हरने वाली और दुष्टता को रोकने वाली हैं। कवि उनसे रघुनाथ के चरणों में अचल प्रेम की याचना करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

देवी की वीरता का अर्थ भक्त के लिए अपने भीतर के क्रोध, भय और अविवेक का सामना करने की शक्ति भी है। विभिन्न नामों से कही गई एक ही मातृशक्ति का लक्ष्य कल्याण है। अंतिम प्रार्थना फिर उसी साधना पर लौटती है—रामचरण में प्रेम और निष्ठा।

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04. माँ गंगा की स्तुति पद 17 से 20

पतित-पावनी गंगा, पवित्रता और निर्मल वाणी। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

पद 17 — जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दिनि,

जय जय भगीरथनन्दिनि, मुनि-चय चकोर-चन्दिनि, नर-नाग-बिबुध-बन्दिनि जय जह्नु बालिका। बिस्नु-पद-सरोजजासि, ईस-सीसपर बिभासि, त्रिपथगासि, पुन्यरासि, पाप-छालिका ॥१॥ बिमल बिपुल बहसि बारि, सीतल त्रयताप-हारि, भँवर बर बिभंगतर तरंग-मालिका। पुरजन पूजोपहार, सोभित ससि धवलधार, भंजन भव-भार, भक्ति-कल्पथालिका ॥२॥ निज तटबासी बिहंग, जल-थल-चर पसु-पतंग, कीट, जटिल तापस सब सरिस पालिका। तुलसी तव तीर तीर सुमिरत रघुबंस-बीर, बिचरत मति देहि मोह-महिष-कालिका ॥३॥

शब्दार्थ

भागीरथनंदिनी = भगीरथ के प्रयास से प्रकट गंगा; त्रिपथगा = तीन लोकों में बहने वाली; त्रयताप = तीन प्रकार के ताप।

सरल हिंदी अर्थ

गंगा माता को पवित्र, शीतल, सबकी समान रूप से पालन करने वाली और दया की धारा कहा गया है। कवि गंगातट पर रघुवीर का स्मरण करते रहने की बुद्धि माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कवि के चित्रण में गंगा भेदभाव नहीं करतीं—पक्षी, पशु, तपस्वी और सामान्य मनुष्य सबको जल मिलता है। यह प्रकृति के प्रति आदर और करुणा की शिक्षा भी है। तट पर विचरते हुए रामनाम स्मरण की इच्छा बाहरी तीर्थ और आंतरिक साधना को जोड़ देती है।

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पद 18 — जयति जय सुरसरी जगदखिल-पावनी।

जयति जय सुरसरी जगदखिल-पावनी। विष्णु-पदकंज-मकरंद इव अम्बुवर वहसि, दुख दहसि, अघवृन्द-विद्राविनी ॥१॥ मिलितजलपात्र-अजयुक्त-हरिचरणरज, विरज-वर-वारि त्रिपुरारि शिर-धामिनी। जह्नु-कन्या धन्य, पुण्यकृत सगर-सुत, भूधरद्रोणि-विद्दरणि, बहुनामिनी ॥२॥ यक्ष, गंधर्व, मुनि, किन्नरोरग, दनुज, मनुज मज्जहिं सुकृत-पुंज युत-कामिनी। स्वर्ग-सोपान, विज्ञान-ज्ञानप्रदे, मोह-मद-मदन-पाथोज-हिमयामिनी ॥३॥ हरित गंभीर वानीर दुहुँ तीरवर, मध्य धारा विशद, विश्व अभिरामिनी। नील-पर्यक-कृत-शयन सर्पेश जनु, सहस सीसावली स्त्रोत सुर-स्वामिनी ॥४॥ अमित-महिमा, अमितरूप, भूपावली-मुकुट-मनिवंद्य त्रेलोक पथगामिनी। देहि रघुबीर-पद-प्रीति निर्भर मातु, दासतुलसी त्रासहरणि भवभामिनी ॥५॥

शब्दार्थ

सुरसरी = गंगा; अम्बु = जल; अघवृन्द = पापों का समूह; बहुनामिनी = अनेक नामों वाली।

सरल हिंदी अर्थ

गंगा को विष्णुचरण से संबद्ध, शिवमस्तक पर प्रतिष्ठित और पुण्य की धारा कहा गया है। उनकी निर्मल जलराशि और मनोहर तरंगों का वर्णन कर तुलसीदास उनसे श्रीराम-चरणों में गहरा प्रेम माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

जल के सौंदर्य का आध्यात्मिक रूपक अत्यंत प्रभावशाली है। जैसे प्रवाह मलिनता को बहा ले जाता है, वैसे ही स्मरण और सत्संग मन को स्वच्छ करने की प्रेरणा देते हैं। गंगाजी की महिमा का अंत भक्त के हृदय में रघुवीर-प्रेम से होता है।

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पद 19 — हरनि पाप त्रिबिध ताप सुमिरत सुरसरित।

हरनि पाप त्रिबिध ताप सुमिरत सुरसरित। बिलसति महि कल्प-बेलि मुद-मनोरथ-फरित ॥१॥ सोहत ससि धवल धार सुधा-सलिल-भरित। बिमलतर तरंग लसत रघुबरके-से चरित ॥२॥ तो बिनु जगदंब गंग कलिजुग का करित? घोर भव अपारसिंधु तुलसी किमि तरित ॥३॥

शब्दार्थ

त्रिबिध ताप = तीन प्रकार के कष्ट; सुधा-सलिल = अमृत जैसा जल; भव-सिंधु = संसार-सागर।

सरल हिंदी अर्थ

गंगा का स्मरण, उज्ज्वल धारा और निर्मल तरंगें पाप तथा कष्टों से मुक्ति का भाव जगाती हैं। तुलसीदास कठिन संसार में गंगा की करुणा को आश्रय मानते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पद की भाषा छोटी होते हुए भी उसका प्रतीक बहुत व्यापक है। गंगा का जल पवित्रता, शीतलता और नई शुरुआत की याद दिलाता है। श्रद्धालु के लिए यह संदेश मन को करुणामय बनाने और जीवन की कठिनाइयों में भी आशा बनाए रखने का है।

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पद 20 — ईस-सीस बससि, त्रिपथ लससि, नभ-पताल-धरनि।

ईस-सीस बससि, त्रिपथ लससि, नभ-पताल-धरनि। सुर-नर-मुनि-नाग-सिद्ध-सुजन मंगल-करनि ॥१॥ देखत दुख-दोष-दुरित-दाह-दारिद-दरनि। सगर-सुवन साँसति-समनि, जलनिधि जल भरनि ॥२॥ महिमाकी अवधि करसि बहु बिधि हरि-हरनि। तुलसी करु बानि बिमल, बिमल बारि बरनि ॥३॥

शब्दार्थ

ईस-सीस = शिव के सिर पर; त्रिपथ = तीन लोकों में प्रवाह; बानि बिमल = शुद्ध वाणी।

सरल हिंदी अर्थ

गंगाजी को समस्त प्राणियों का मंगल करने वाली और दुःख-दोष-दारिद्र्य का निवारण करने वाली कहा गया है। अंत में कवि अपने शब्दों को इतना निर्मल करने की याचना करते हैं कि वे गंगा की महिमा गा सकें।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यहाँ भक्त केवल बाहरी पवित्रता नहीं चाहता; वह वाणी और विचार की शुद्धता की भी कामना करता है। शुद्ध जल और शुद्ध भाषा के बीच बनाया गया संबंध अत्यंत सुंदर है। भक्ति के प्रभाव से बोलचाल, व्यवहार और दृष्टि तक निर्मल बनें—यही प्रेरणा है।

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05. यमुना, काशी एवं चित्रकूट वंदना पद 21 से 24

पावन तीर्थों और श्रीराम की वनवास-स्मृतियों का दर्शन। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

यमुना काशी विश्वनाथ गंगा घाट चित्रकूट के तीर्थों का चित्रण
यमुना, काशी एवं चित्रकूट वंदना

पद 21 — जमुना यों ज्यों ज्यों लागी बाढ़न।

जमुना यों ज्यों ज्यों लागी बाढ़न। त्यों त्यों सुकृत-सुभट कलि भूपहिं, निदरि लगे बहु काढ़न ॥१॥ ज्यों ज्यों जल मलीन त्यों त्यों जमगन मुख मलीन लहै आढ़ न। तुलसिदास जगदघ जवास ज्यों अनघमेघ लगे डाढ़न ॥२॥

शब्दार्थ

जमुना = यमुना नदी; सुकृत = शुभ कर्म; कलि-भूप = कलियुग का प्रभाव।

सरल हिंदी अर्थ

यमुना के बढ़ते जल और उसके धार्मिक प्रभाव को कवि रूपक में जोड़ते हैं। उनका आशय है कि पवित्र नदी की महिमा से पापपूर्ण प्रवृत्तियाँ पराजित हों और सत्कर्म की शक्ति बढ़े।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पद में जल का वर्णन बाहरी स्वरूप से आगे बढ़कर धार्मिक चेतना का प्रतीक बनता है। यमुना से जुड़े काव्यात्मक रूपकों को नदी की वैज्ञानिक स्थिति का कथन न समझें। मूल संदेश पवित्र स्मरण, सदाचार और जीवन में शुभ संकल्पों को बढ़ावा देना है।

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पद 22 — सेइअ सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी।

सेइअ सहित सनेह देह भरि, कामधेनु कलि कासी। समनि सोक-संताप-पाप-रुज, सकल-सुमंगल-रासी ॥१॥ मरजादा चहुँओर चरनबर, सेवत सुरपुर-बासी। तीरथ सब सुभ अंग रोम सिवलिंग अमित अबिनासी ॥२॥ अंतराइन ऐन भल, थन फल, बच्छ बेद-बिस्वासी। गलकंबल बरुना बिभाति जनु, लूम लसति, सरिताऽसी ॥३॥ दंडपानि भैरव बिषान, मलरुचि-खलगन-भयदा-सी। लोलदिनेस त्रिलोचन लोचन, करनघंट घंटा-सी ॥४॥ मनिकर्निका बदन-ससि सुंदर, सुरसरि-सुख सुखमा-सी। स्वारथ परमारथ परिपूरन, पंचकोसि महिमा-सी ॥५॥ बिस्वनाथ पालक कृपालुचित, लालति नित गिरिजा-सी। सिद्धि सची, सारद पूजहिं मन जोगवति रहति रमा-सी ॥६॥ पंचाच्छरी प्रान, मुद माधव, गब्य सुपंचनदा-सी। ब्रह्म-जीव-सम रामनाम जुग, आखर बिस्व बिकासी ॥७॥ चारितु चरति करम कुकरम करि, मरत जीवगन घासी। लहत परमपद पय पावन, जेहि चहत प्रपंच-उदासी ॥८॥ कहत पुरान रची केसव निज कर-करतूति कला-सी। तुलसी बसि हरपुरी राम जपु, जो भयो चहै सुपासी ॥९॥

शब्दार्थ

काशी = वाराणसी; मणिकर्णिका = काशी का प्रसिद्ध तीर्थ; पंचकोसी = काशी की पारंपरिक परिक्रमा।

सरल हिंदी अर्थ

काशी का स्तवन कामधेनु के रूपक में है। यहाँ विश्वनाथ, गंगा, मणिकर्णिका, भैरव और पंचकोसी की महिमा जोड़कर कवि तीर्थ के बाहरी स्थान और भीतर जागने वाली भक्ति का सुंदर संबंध बताते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इस पद में काशी का अलंकारिक मानवीकरण विशेष साहित्यिक आकर्षण है। विभिन्न तीर्थ-चिह्नों को शरीर-अंगों जैसा बताया गया है। अंत में तुलसीदास काशीवास को रामनाम स्मरण से जोड़ते हैं—यात्रा का सच्चा लाभ शुद्ध आचरण और निरंतर भगवद्-स्मरण है।

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पद 23 — सब सोच-बिमोचन चित्रकूट। कलिहरन, करन कल्यान बूट ॥१॥

सब सोच-बिमोचन चित्रकूट। कलिहरन, करन कल्यान बूट ॥१॥ सुचि अवनि सुहावनि आलबाल। कानन बिचित्र, बारी बिसाल ॥२॥ मंदाकिनि-मालिनि सदा सींच। बर बारि, बिषम नर-नारि नीच ॥३॥ साखा सुसृंग, भूरुह-सुपात। निरझर मधुबर, मृदु मलय बात ॥४॥ सुक, पिक, मधुकर, मुनिबर बिहारु। साधन प्रसून फल चारि चारु ॥५॥ भव-घोरघाम-हर सुखद छाँह। थप्यो थिर प्रभाव जानकी-नाह ॥६॥ साधक-सुपथिक बडे भाग पाइ। पावत अनेक अभिमत अघाइ ॥७॥ रस एक, रहित-गुन-करम-काल। सिय राम लखन पालक कृपाल ॥८॥ तुलसी जो राम पद चहिय प्रेम। सेइय गिरि करि निरुपाधि नेम ॥९॥

शब्दार्थ

सोच-बिमोचन = चिंता मिटाने वाला; मंदाकिनी = चित्रकूट की पवित्र नदी; निरुपाधि = निष्कपट।

सरल हिंदी अर्थ

चित्रकूट को हरियाली, पर्वत, जलधाराओं और श्रीराम के वनवास-संबंध से पावन बताया गया है। तुलसीदास कहते हैं कि रामचरणों में प्रेम चाहने वाला व्यक्ति श्रद्धा और निष्कपट भाव से इस तीर्थ का स्मरण करे।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कवि की दृष्टि में प्रकृति स्वयं मानो भक्ति का एक आश्रम है। वृक्षों की छाया, मधुर ध्वनि और पावन नदी के साथ रामकथा की स्मृतियाँ मन को शांत करती हैं। यह पद प्रकृति-सौंदर्य के बीच आत्मिक एकाग्रता का मार्ग दिखाता है।

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पद 24 — अब चित चेति चित्रकूटहि चलु।

अब चित चेति चित्रकूटहि चलु। कोपित कलि, लोपित मंगल मगु, बिलसत बढ़त मोह-माया-मलु ॥१॥ भूमि बिलोकु राम-पद-अंकित, बन बिलोकु रघुबर-बिहारथलु। सैल-सृंग भवभंग-हेतु लखु, दलन कपट-पाखंड-दंभ-डलु ॥२॥ जहँ जनमे जग-जनक जगपति, बिधि-हरि परिहरि प्रपंच छलु। सकृत प्रबेस करत जेहि आस्रम, बिगत-बिषाद भये पारथ नलु ॥३॥ न करु बिलंब बिचारु चारुमति, बरष पाछिले सम अगिले पलु। मंत्र सो जाइ जपहि, जो जपि भे, अजर अमर हर अचइ हलाहलु ॥४॥ रामनाम-जप जाग करत नित, मज्जत पय पावन पीवत जलु। करिहैं राम भावतौ मनकौ, सुख-साधन, अनयास महाफलु ॥५॥ कामदमनि कामता, कलपतरु सो जुग-जुग जागत जगतीतलु। तुलसी तोहि बिसेषि बूझिये, एक प्रतीति प्रीति एकै बलु ॥६॥

शब्दार्थ

चित चेति = हे मन, सावधान हो; विहारथल = निवास या विहार का स्थान; प्रतीति = दृढ़ भरोसा।

सरल हिंदी अर्थ

कवि अपने मन को चित्रकूट जाने, श्रीराम के चरणचिह्नों से जुड़ी भूमि को देखने और रामनाम जपने का निर्देश देते हैं। निष्कपट प्रेम तथा विश्वास को इस तीर्थस्मरण की असली शक्ति कहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद आत्मसंवाद के रूप में लिखा गया है। मन को विलंब, मोह और छल से बाहर निकालकर साधना में लगाना इसकी शिक्षा है। तीर्थयात्रा यदि संभव न भी हो तो उसका मूल संदेश घर में रामनाम, सदाचरण और एकाग्र स्मरण के अभ्यास से जुड़ सकता है।

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06. श्रीहनुमान जी की स्तुति पद 25 से 36

पराक्रम, सेवाभाव, विवेक और अटूट श्रीरामभक्ति। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

श्रीहनुमान जी प्रभु श्रीराम के समक्ष सेवाभाव और अटूट भक्ति
श्रीहनुमान जी की स्तुति

पद 25 — जयत्यंजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत विधु विबुध-कुल-कैरवानंदकारी।

जयत्यंजनी-गर्भ-अंभोधि-संभूत विधु विबुध-कुल-कैरवानंदकारी। केसरी-चारु-लोचन चकोरक-सुखद, लोकगन-शोक-संतापहारी ॥१॥ जयति जय बालकपि केलि-कौतुक उदित-चंडकर-मंडल-ग्रासकर्त्ता। राहु-रवि-शक्र-पवि-गर्व-खर्वीकरण शरण-भयहरण जय भुवन-भर्ता ॥२॥ जयति रणधीर, रघुवीरहित, देवमणि, रुद्र-अवतार, संसार-पाता। विप्र-सुर-सिद्ध-मुनि-आशिषाकारवपुष, विमलगुण, बुद्धि-वारिधि-विधाता ॥३॥ जयति सुग्रीव-ऋक्षादि-रक्षण-निपुण, बालि-बलशालि-बध-मुख्यहेतू। जलधि-लंघन सिंह सिंहिंका-मद-मथन, रजनिचर-नगर-उत्पात-केतू ॥४॥ जयति भूनन्दिनी-शोच-मोचन विपिन-दलन घननादवश विगतशंका। लूमलीलाऽनल-ज्वालमालाकुलित होलिकाकरण लंकेश-लंका ॥५॥ जयति सौमित्र रघुनंदनानंदकर, ऋक्ष-कपि-कटक-संघट-विधायी। बद्ध-वारिधि-सेतु अमर-मंगल-हेतु, भानुकुलकेतु-रण-विजयदायी ॥६॥ जयति जय वज्रतनु दशन नख मुख विकट, चंड-भुजदंड तरु-शैल-पानी। समर-तैलिक-यंत्र तिल-तमीचर-निकर, पेरि डारे सुभट घालि घानी ॥७॥ जयति दशकंठ-घटकर्ण-वारिद-नाद-कदन-कारन, कालनेमि-हंता। अघट घटना-सुघट सुघट-विघटन विकट, भूमि-पाताल-जल-गगन-गंता ॥८॥ जयति विश्व-विख्यात बानैत-विरुदावली, विदुष बरनत वेद विमल बानी। दास तुलसी त्रास शमन सीतारमण संग शोभित राम-राजधानी ॥९॥

शब्दार्थ

अंजनी = हनुमानजी की माता; जलधि-लंघन = समुद्र पार करना; सीतारमण = श्रीराम।

सरल हिंदी अर्थ

अंजनीपुत्र हनुमान के बाल्यचरित, तेज, समुद्र लाँघने, लंका में कार्य करने और रामकाज में विजय दिलाने वाले पराक्रम का स्तवन किया गया है। तुलसीदास उन्हें संकट और भय हरने वाला मानते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इस लंबे पद में वीरता का आधार अहंकार नहीं, श्रीराम का कार्य है। हनुमान की शक्ति उनकी बुद्धि, निष्ठा और सेवा के साथ चलती है। सीताजी का दुःख दूर करना और रामसेना को सहायता देना दिखाता है कि श्रेष्ठ सामर्थ्य दूसरों के हित में उपयोग होता है।

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पद 26 — जयति मर्कटाधीश, मृगराज-विक्रम, महादेव, मुद-मंगलालय, कपाली।

जयति मर्कटाधीश, मृगराज-विक्रम, महादेव, मुद-मंगलालय, कपाली। मोह-मद-क्रोध-कामादि-खल-संकुला, घोर संसार-निशि किरणमाली ॥१॥ जयति लसदंजनाऽदितिज, कपि-केसरी-कश्यप-प्रभव, जगदार्त्तिहर्त्ता। लोक-लोकप-कोक-कोकनद-शोकहर, हंस हनुमान कल्यानकर्ता ॥२॥ जयति सुविशाल-विकराल-विग्रह, वज्रसार सर्वांग भुजदण्ड भारी। कुलिशनख, दशनवर लसत, बालधि बृहद, वैरि-शस्त्रास्त्रधर कुधरधारी ॥३॥ जयति जानकी-शोच-संताप-मोचन, रामलक्ष्मणानंद-वारिज-विकासी। कीस-कौतुक-केलि-लूम-लंका-दहन, दलन कानन तरुण तेजरासी ॥४॥ जयति पाथोधि-पाषाण-जलयानकर, यातुधान-प्रचुर-हर्ष-हाता। दुष्टरावण-कुंभकर्ण-पाकारिजित-मर्मभित्, कर्म-परिपाक-दाता ॥५॥ जयति भुवननैकभूषण, विभीषणवरद, विहित कृत राम-संग्राम साका। पुष्पकारूढ़ सौमित्रि-सीता-सहित, भानु-कुलभानु-कीरति-पताका ॥६॥ जयति पर-यत्रंमंत्राभिचार-ग्रसन, कारमन-कूट-कृत्यादि-हंता। शाकिनी-डाकिनी-पूतना-प्रेत-वेताल-भूत-प्रमथ-यूथ-यंता ॥७॥ जयति वेदान्तविद विविध-विद्या-विशद, वेद-वेदांगविद ब्रह्मवादी। ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य-भाजन विभो, विमल गुण गनति शुकनारदादी ॥८॥ जयति काल-गुण-कर्म-माया-मथन, निश्चलज्ञान, व्रत-सत्यरत, धर्मचारी। सिद्ध-सुरवृंद-योगींद्र-सेवति सदा, दास तुलसी प्रणत भय-तमारी ॥९॥

शब्दार्थ

मर्कटाधीश = वानरों के अधिपति; पाथोधि = समुद्र; वेदान्तविद = वेदांत के ज्ञाता।

सरल हिंदी अर्थ

हनुमानजी के तेजस्वी रूप, विशाल बल, युद्धकौशल, ज्ञान, वैराग्य, धर्मनिष्ठा और संकट दूर करने की शक्ति का गुणगान है। कवि उन्हें रामसंग्राम के महान सेवक और शरणागत के रक्षक के रूप में देखते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

वीर हनुमान केवल बल के प्रतीक नहीं, वे सत्य, संयम और विद्या से संपन्न आदर्श भक्त हैं। बाहरी भय पर विजय पाने के साथ अपने मन की अशांति, मोह और दुराचार पर नियंत्रण भी इस पद के भाव से प्रेरित होता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 26/64

पद 27 — जयति मंगलागार, संसारभारापहर, वानराकारविग्रह पुरारी।

जयति मंगलागार, संसारभारापहर, वानराकारविग्रह पुरारी। राम-रोषानल-ज्वालमाला-मिष ध्वांतर-सलभ-संहारकारी ॥१॥ जयति मरुदंजनामोद-मंदिर, नतग्रीव सुग्रीव-दुःखैकबंधो। यातुधानोद्धत-क्रुद्ध-कालाग्निहर, सिद्ध-सुर-सज्जनानंद-सिंधो ॥२॥ जयति रुद्राग्रणी, विश्व-वंद्याग्रणी, विश्वविख्यात-भट-चक्रवर्ती। सामगाताग्रणी, कामजेताग्रणी, रामहित, रामभक्तानुवर्ती ॥३॥ जयति संग्रामजय, रामसंदेसहर, कौशला-कुशल-कल्याणभाषी। राम-विरहार्क-संतप्त-भरतादि-नरनारि-शीतलकरण कल्पशाषी ॥४॥ जयति सिंहासनासीन सीतारमण, निरखि निर्भरहरण नृत्यकारी। राम संभ्राज शोभा-सहित सर्वदा तुलसिमानस-रामपुर-विहारी ॥५॥

शब्दार्थ

मंगलागार = मंगल का भंडार; मरुदंजन = पवन और अंजना से संबंधित; रामसंदेसहर = रामसंदेश पहुँचाने वाले।

सरल हिंदी अर्थ

हनुमानजी को भक्तहितकारी, रामसंदेश के वाहक और सुग्रीव के सहायक के रूप में प्रणाम है। पद में उनके रामप्रेम, दया और सेवा के कारण उत्पन्न आनंद को विशेष रूप से उभारा गया है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

प्रभु श्रीराम का संदेश पहुँचाना हनुमान के लिए केवल कर्तव्य नहीं, प्रेम की अभिव्यक्ति है। उनका व्यक्तित्व संकटग्रस्त को सांत्वना और निराश को आशा देता है। तुलसीदास इसी सेवाभाव को अपने अंतर्मन में बसाना चाहते हैं।

↑ विषय-सूची  ·  पद 27/64

पद 28 — जयति वात-संजात, विख्यात विक्रम, बृहद्बाहु, बलबिपुल, बालधिबिसाला।

जयति वात-संजात, विख्यात विक्रम, बृहद्बाहु, बलबिपुल, बालधिबिसाला। जातरूपाचलाकारविग्रह, लसल्लोम विद्युल्लता ज्वालमाला ॥१॥ जयति बालार्क वर-वदन, पिंगल-नयन, कपिश-कर्कश-जटाजूटधारी। विकट भृकुटी, वज्र दशन नख, वैरि-मदमत्त-कुंजर-पुंज-कुंजरारी ॥२॥ जयति भीमार्जुन-व्यालसूदन-गर्वहर, धनंजय-रथ-त्राण-केतू। भीष्म-द्रोण-कर्णादि-पालित, कालदृक सुयोधन-चमू-निधन-हेतू ॥३॥ जयति गतराजदातार, हंतार संसार-संकट, दनुज-दर्पहारी। ईति-अति-भीति-ग्रह-प्रेत-चौरानल-व्याधिबाधा-शमन घोर मारी ॥४॥ जयति निगमागम व्याकरण करणलिपि, काव्यकौतुक-कला-कोटि-सिंधो। सामगायक, भक्त-कामदायक, वामदेव, श्रीराम-प्रिय-प्रेम बंधो ॥५॥ जयति घर्माशु-संदग्ध-संपाति-नवपक्ष-लोचन-दिव्य-देहदाता। कालकलि-पापसंताप-संकुल सदा, प्रणत तुलसीदास तात-माता ॥६॥

शब्दार्थ

वात-संजात = पवनपुत्र; केतू = ध्वज; कपिश = वानर; कल्याणकर्ता = मंगल करने वाले।

सरल हिंदी अर्थ

हनुमान के बल, अपार वेग, तेज, धर्मरक्षा, विद्या और भक्तवत्सलता की प्रशंसा है। पद में महाभारत-संबंधी प्रसंगों का संकेत भी आता है। भक्त अंत में उन्हें माता-पिता जैसा सहारा मानता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कवि बताना चाहते हैं कि सामर्थ्य ज्ञान और करुणा से संयुक्त होकर ही पवित्र बनता है। हनुमान को विविध युगों की भक्ति-परंपरा में स्मरण करने का कारण उनकी निष्काम निष्ठा है। इस पद का केंद्रीय भाव रक्षा की प्रार्थना और मर्यादित शक्ति का सम्मान है।

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पद 29 — जयति निर्भरानंद-संदोह कपिकेसरी, केसरी-सुवन भुवनैकभर्ता।

जयति निर्भरानंद-संदोह कपिकेसरी, केसरी-सुवन भुवनैकभर्ता। दिव्यभूम्यंजना-मंजुलाकर-मणे, भक्त-संताप-चिंतापहर्ता ॥१॥ जयति धमार्थ-कामापवर्गद, विभो ब्रह्मलोकादि-वैभव-विरागी। वचन-मानस-कर्म सत्य-धर्मव्रती, जानकीनाथ-चरणानुरागी ॥२॥ जयति बिहगेश-बलबुद्धि-बेगाति-मद-मथन, मनमथ-मथन, ऊर्ध्वरेता। महानाटक-निपुन, कोटि-कविकुल-तिलक, गानगुण-गर्व-गंधर्व-जेता ॥३॥ जयति मंदोदरी-केश-कर्षण, विद्यमान दशकंठ भट-मुकुट मानी। भूमिजा-दुःख-संजात रोषांतकृत-जातनाजंतु कृत जातुधानी ॥४॥ जयति रामायण-श्रवण-संजात-रोमांच, लोचन सजल, शिथिल वाणी। रामपदपद्म-मकरंद-मधुकर पाहि, दास तुलसी शरण, शूलपाणी ॥५॥

शब्दार्थ

निष्काम = फल की अपेक्षा से रहित; विरागी = आसक्ति से दूर; रोमांच = भक्ति से पुलकित अवस्था।

सरल हिंदी अर्थ

केसरीनंदन हनुमानजी को धर्म, सत्य, वैराग्य और रामचरणों के अनुराग से युक्त बताया गया है। श्रीरामकथा सुनकर उनके नेत्र नम होने और हृदय में प्रेम उमड़ने का मनोहारी वर्णन है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यहाँ बलशाली हनुमान का सबसे कोमल पक्ष सामने आता है। सच्ची महानता में संवेदनशीलता और विनम्रता भी रहती है। रामकथा सुनते समय उत्पन्न भाव-विभोरता उनके भीतर बसे सच्चे भक्त को प्रकट करती है।

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पद 30 — जाके गति है हनुमानकी।

जाके गति है हनुमानकी। ताकी पैज पूजि आई, यह रेखा कुलिस पषानकी ॥१॥ अघटित-घटन, सुघट-बिघटन, ऐसी बिरुदावलि नहिं आनकी। सुमिरत संकट-सोच-बिमोचन, मूरति मोद-निधानकी ॥२॥ तापर सानुकूल गिरिजा, हर, लषन, राम अरु जानकी। तुलसी कपिकी कृपा-बिलोकनि, खानि सकल कल्यानकी ॥३॥

शब्दार्थ

पैज = प्रतिज्ञा या मान; अघटित = असंभव; कल्यान = मंगल।

सरल हिंदी अर्थ

जिस व्यक्ति को हनुमान का आश्रय प्राप्त है, उसे उनकी कृपा से साहस और मंगल मिलने की आशा रहती है। पद में हनुमान की अद्भुत सहायता और सीता-राम सहित देव-परिवार की अनुकूलता का विश्वास है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

भक्ति यहाँ निराशा से निकलने का मानसिक आधार बनती है। तुलसीदास संकट में हनुमान के नाम का स्मरण करते हुए अपना भरोसा प्रकट करते हैं। संदेश है कि आस्था के साथ धर्मसम्मत प्रयास और सेवा-भाव जीवन में बने रहें।

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पद 31 — ताकिहै तमकि ताकी ओर को।

ताकिहै तमकि ताकी ओर को। जाको है सब भाँति भरोसो कपि केसरी-किसोरको ॥१॥ जन-रंजन अरिगिन-गंजन मुख-भंजन खल बरजोरको। बेद-पुरान-प्रगट पुरुषारथ सकल-सुभट-सिरमोर को ॥२॥ उथपे-थपन, थपे उथपन पन, बिबुधबृंद बँदिछोर को। जलधि लाँघि दहि लंक प्रबल बल दलन निसाचर घोर को ॥३॥ जाको बालबिनोद समुझि जिय डरत दिवाकर भोरको। जाकी चिबुक-चोट चूरन किय रद-मद कुलिस कठोरको ॥४॥ लोकपाल अनुकूल बिलोकिवो चहत बिलोचन-कोरको। सदा अभय, जय, मुद-मंगलमय जो सेवक रनरोरको ॥५॥ भगत-कामतरु नाम राम परिपूरन चंद चकोरको। तुलसी फल चारो करतल जस गावत गईबहोर को ॥६॥

शब्दार्थ

केसरी-किसोर = केसरी के पुत्र; बँदिछोर = बंधन से छुड़ाने वाला; पुरुषारथ = मानवीय प्रयत्न।

सरल हिंदी अर्थ

हनुमानजी का स्मरण करने वाले को भय से मुक्ति और साहस मिलता है—ऐसा कवि का भक्तिपूर्ण विश्वास है। समुद्र-लाँघन और लंका-दहन उनके कार्यों की प्रसिद्ध मिसाल के रूप में वर्णित हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पद में रामनाम और हनुमानभक्ति का अभिन्न संबंध दिखता है। संकट की घड़ी में निडरता के साथ सही निर्णय और सत्कर्म की जरूरत होती है। तुलसीदास हनुमान को ऐसे आदर्श के रूप में देखते हैं जो साधक को कर्तव्यपथ से विचलित नहीं होने देता।

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पद 32 — ऐसी तोही न बूझिये हनुमान हठीले।

ऐसी तोही न बूझिये हनुमान हठीले। साहेब कहूँ न रामसे, तोसे न उसीले ॥१॥ तेरे देखत सिंहके सिसु मेंढक लीले। जानत हौं कलि तेरेऊ मन गुनगन कीले ॥२॥ हाँक सुनत दसकंधके भये बंधन ढीले। सो बल गयो किधौं भये अब गरबगहीले ॥३॥ सेवकको परदा फटे तू समरथ सीले। अधिक आपुते आपुनो सुनि मान सही ले ॥४॥ साँसति तुलसीदासकी सुनि सुजस तुही ले। तिहुँकाल तिनको भलौं जे राम-रँगीले ॥५॥

शब्दार्थ

हठीले = दृढ़ स्वभाव वाले; उसीले = अपार तेजस्वी; गरबगहीले = अभिमान से ग्रस्त।

सरल हिंदी अर्थ

कवि हनुमानजी से अत्यंत अपनत्व के साथ शिकायत करता है कि आपके जैसा समर्थ सेवक और श्रीराम जैसा स्वामी होते हुए मेरी पीड़ा क्यों बनी हुई है। पद का स्वर भावनात्मक और विनोदपूर्ण विनय का है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

प्रेममय शिकायत भी भक्ति का एक रूप है। तुलसीदास भगवान के सेवक को अपना निकट संबंधी मानकर व्यथा कह देते हैं। इस संवाद में अहंकार नहीं, गहरे विश्वास से जन्मी निर्भीक विनम्रता है।

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पद 33 — समरथ सुअन समीरके, रघुबीर-पियारे।

समरथ सुअन समीरके, रघुबीर-पियारे। मोपर कीबी तोहि जो करि लेहि भिया रे ॥१॥ तेरी महिमा ते चलै चिंचिनी-चिया रे। अँधियारो मेरी बार क्यो, त्रिभुवन-उजियारे ॥२॥ केहि करनी जन जानिकै सनमान किया रे। केहि अघ औगुन आपने कर डारि दिया रे ॥३॥ खाई खोंची माँगि मैं तेरो नाम लिया रे। तेरे बल, बलि, आजु लौं जग जागि जिया रे ॥४॥ जो तोसों होतौ फिरौं मेरो हेतु हिया रे। तौ कयों बदन देखावतो कहि बचन इयारे ॥५॥ तोसो ग्यान-निधान को सरबग्य बिया रे। हौं समुझत साई-द्रोहकी गति छार छिया रे ॥६॥ तेरे स्वामी राम से, स्वामिनी सिया रे। तहँ तुलसीके कौनको काको तकिया रे ॥७॥

शब्दार्थ

सुअन समीरके = पवनदेव के पुत्र; रघुबीर-पियारे = श्रीराम के प्रिय; सरबग्य = सर्वज्ञ।

सरल हिंदी अर्थ

भक्त हनुमानजी के सामने अपनी स्थिति रखता है। वह उनके सामर्थ्य, विवेक और सीता-राम से निकट संबंध का स्मरण कराकर कृपा चाहता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद भक्त की मनोभूमि को बहुत सजीव बनाता है। व्यक्ति कभी स्वयं को छोटा, त्रुटिपूर्ण और उपेक्षित समझता है; पर वह अपने इष्ट के आगे बिना आडंबर के सब कह सकता है। प्रभु-सेवक संबंध में यही आत्मीयता आत्मनिवेदन की आधारशिला है।

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पद 34 — अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन-दुखारी।

अति आरत, अति स्वारथी, अति दीन-दुखारी। इनको बिलगु न मानिये, बोलहिं न बिचारी ॥१॥ लोक-रीति देखी सुनी, व्याकुल नर-नारी। अति बरषे अनबरषेहूँ, देहिं दैवहिं गारी ॥२॥ नाकहि आये नाथसों, साँसति भय भारी। कहि आयो, कीबी छमा, निज ओर निहारी ॥३॥ समै साँकरे सुमिरिये, समरथ हितकारी। सो सब बिधि ऊबर करै, अपराध बिसारी ॥४॥ बिगरी सेवककी सदा, साहेबहिं सुधारी। तुलसीपर तेरी कृपा, निरुपाधि निरारी ॥५॥

शब्दार्थ

आरत = पीड़ित; साँसति = कष्ट; निरुपाधि = बिना स्वार्थ या शर्त के।

सरल हिंदी अर्थ

कवि स्वीकार करता है कि वह व्याकुल है और कभी उसकी वाणी अनुचित भी हो सकती है। फिर भी वह संकट में हनुमान के संरक्षण तथा क्षमा की याचना करता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

अपनी कमजोरी को स्वीकारना विनय का एक आवश्यक चरण है। तुलसीदास दिखाते हैं कि सच्ची भक्ति निर्दोष होने का दावा नहीं करती। भक्त अपनी चूक पहचानकर सुधार की ओर बढ़ता है और ईश्वर-कृपा की आशा रखता है।

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पद 35 — कटु कहिये गाढे परे, सुनि समुझि सुसाईं।

कटु कहिये गाढे परे, सुनि समुझि सुसाईं। करहिं अनभलेउ को भलो, आपनी भलाई ॥१॥ समरथ सुभ जो पाइये, बीर पीर पराई। ताहि तकैं सब ज्यों नदी बारिधि न बुलाई ॥२॥ अपने अपनेको भलो, चहैं लोग लुगाई। भावै जो जेहि तेहि भजै, सुभ असुभ सगाई ॥३॥ बाँह बोलि दै थापिये, जो निज बरिआई। बिन सेवा सों पालिये, सेवककी नाईं ॥४॥ चूक-चपलता मेरियै, तू बड़ो बड़ाई। होत आदरे ढीठ है, अति नीच निचाई ॥५॥ बंदिछोर बिरुदावली, निगमागम गाई। नीको तुलसीदासको, तेरियै निकाई ॥६॥

शब्दार्थ

गाढ़े परे = भारी संकट में; समरथ = समर्थ; बंदिछोर = बंधन से छुड़ाने वाले।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास कहते हैं कि कठिन परिस्थिति में कड़वे शब्द भी निकल पड़ते हैं; उदार प्रभु सेवक की बात का मर्म समझते हैं। हनुमान से वे विनय करते हैं कि सेवक की भूलें क्षमा कर उसका भला करें।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कवि की याचना हमें नम्र संवाद की शिक्षा देती है। भक्त अपने दोष का उत्तरदायित्व स्वयं स्वीकार कर क्षमा माँगता है। दया के साथ आत्म-सुधार की इच्छा होने पर ही शरणागति सार्थक बनती है।

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पद 36 — मंगल-मूरति मारुत-नंदन। सकल-अमंगल-मूल-निकंदन ॥१॥

मंगल-मूरति मारुत-नंदन। सकल-अमंगल-मूल-निकंदन ॥१॥ पवनतनय संतन हितकारी। ह्रदय बिराजत अवध-बिहारी ॥२॥ मातु-पिता, गुरु, गनपति, सारद। सिवा समेत संभु, सुक, नारद ॥३॥ चरन बंदि बिनवौं सब काहू। देहु रामपद-नेह-निबाहू ॥४॥ बंदौं राम-लखन-बैदेही। जे तुलसीके परम सनेही ॥५॥

शब्दार्थ

मंगल-मूरति = कल्याण का स्वरूप; अमंगल-मूल-निकंदन = अनिष्ट के मूल का नाश करने वाले; नेह-निबाहू = प्रेम का निर्वाह।

सरल हिंदी अर्थ

यह प्रसिद्ध पद हनुमानजी को मंगलमय, संतों के हितकारी और हृदय में श्रीराम को धारण करने वाला बताता है। तुलसीदास अंत में सभी आराध्यों को प्रणाम करके रामचरणों में अखंड प्रेम माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

संक्षिप्त पद में पूरी विनय पत्रिका का लक्ष्य मानो समा गया है। हनुमानभक्ति की पूर्णता रामप्रेम में है। संकट दूर होने की आशा के साथ सेवाभाव, सत्यनिष्ठा और प्रेम का निरंतर पालन करने की प्रेरणा भी इस रचना में निहित है।

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07. लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न वंदना पद 37 से 40

श्रीराम के प्रिय अनुजों की मर्यादा, त्याग और सेवा। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न का श्रीराम के प्रति प्रेम
लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न वंदना

पद 37 — लाल लाडिले लखन, हित हौ जनके।

लाल लाडिले लखन, हित हौ जनके। सुमिरे संकटहारी, सकल सुमंगलकारी, पालक कृपालु अपने पनके ॥१॥ धरनी-धरनहार भंजन-भुवनभार, अवतार साहसी सहसफनके। सत्यसंध, सत्यब्रत, परम धरमरत, निरमल करम बचन अरु मन के ॥२॥ रूपके निधान, धनु-बान पानि, तून कटि, महाबीर बिदित, जितैया बड़े रनके। सेवक-सुख-दायक, सबल, सब लायक, गायक जानकीनाथ गुनगनके ॥३॥ भावते भरत के, सुमित्रा-सीताके दुलारे, चातक चतुर राम स्याम घनके। बल्लभ उरमिलाके, सुलभ सनेहबस, धनी धन तुलसीसे निरधनके ॥४॥

शब्दार्थ

लखन = लक्ष्मण; सहसफन = सहस्र फन वाले शेष; तून = तरकश।

सरल हिंदी अर्थ

लक्ष्मणजी को सुमित्रानंदन, शेषावतार, वीर, सत्यवादी और प्रभु श्रीराम की सेवा में निरंतर समर्पित बताया गया है। पद में माता सीता, भरत और उर्मिला से उनके आत्मीय संबंधों का भी स्मरण है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

भक्त के लिए लक्ष्मण सतर्क सेवा का आदर्श हैं। उनके रूप और शौर्य से भी अधिक महत्त्व वचन, धर्म और कर्तव्य के प्रति निष्ठा का है। तुलसीदास इस आदर्श से अपने जीवन को भी निष्काम समर्पण की दिशा में ले जाना चाहते हैं।

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पद 38 — जयति लक्ष्मणानंत भगवंत भूधर, भुजग-

जयति लक्ष्मणानंत भगवंत भूधर, भुजग- राज, भुवनेश, भूभारहारी। प्रलय-पावक-महाज्वालमाला-वमन, शमन-संताप लीलावतारी ॥१॥ जयति दाशरथि, समर-समरथ, सुमित्रा- सुवन, शत्रुसूदन, राम-भरत-बंधो। चारु-चंपक-वरन, वसन-भूषन-धरन, दिव्यतर, भव्य, लावण्य-सिधों ॥२॥ जयति गाधेय-गौतम-जनक-सुख-जनक, विश्व-कंटक-कुटिल-कोटि-हंता। वचन-चय-चातुरी-परशुधर-गरबहर, सर्वदा रामभद्रानुगंता ॥३॥ जयति सीतेश-सेवासरस, बिषयरस- निरस, निरुपाधि धुरधर्मधारी। विपुलबलमूल शार्दूलविक्रम जलद- नाद-मर्दन, महावीर भारी ॥४॥ जयति संग्राम-सागर-भयंकर-तरन, रामहित-करण वरबाहु-सेतु। उर्मिला-रवन, कल्याण-मंगल-भवन, दासतुलसी-दोष-दवन-हेतू ॥५॥

शब्दार्थ

सौमित्रि = सुमित्रा के पुत्र लक्ष्मण; रामभद्रानुगंता = श्रीराम के पीछे चलने वाले; दवन = नाश।

सरल हिंदी अर्थ

इस स्तुति में लक्ष्मणजी के पराक्रम, सत्य, विनम्र सेवाभाव और श्रीराम के प्रति अनन्य अनुराग की जयकार है। उन्हें दुष्टों का निवारक और भक्तों के कल्याण में सहायक कहा गया है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

लक्ष्मणजी का व्यक्तित्व त्याग और जागरूकता से बना है। वे अपनी प्रतिभा को बड़े उद्देश्य में अर्पित करते हैं। पद मनुष्य को परिवार, समाज और धर्म के प्रति सजग, विश्वसनीय और मर्यादित रहने की प्रेरणा देता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 38/64

पद 39 — जयति भूमिजा-रमण-पदकंज-मकरंद-रस-

जयति भूमिजा-रमण-पदकंज-मकरंद-रस- रसिक-मधुकर भरत भूरिभागी। भुवन-भूषण, भानुवंश-भूषण, भूमिपाल- मनि रामचंद्रानुरागी ॥१॥ जयति विबुधेश-धनदादि-दुर्लभ-महा- राज-संम्राज-सुख-पद-विरागी। खड्ग-धाराव्रती-प्रथमरेखा प्रकट शुद्धमति-युवति पति-प्रेमपागी ॥२॥ जयति निरुपाधि-भक्तिभाव-यंत्रित-ह्रदय, बंधु-हित चित्रकुटाद्रि-चारी। पादुका-नृप-सचिव, पुहुमि-पालक परम धरम-धुर-धीर, वरवीर भारी ॥३॥ जयति संजीवनी-समय-संकट हनूमान धनुबान-महिमा बखानी। बाहुबल बिपुल परमिति पराक्रम अतुल, गूढ गति जानकी-जानि जानी ॥४॥ जयति रण-अजिर गन्धर्व-गण-गर्वहर, फिर किये रामगुणगाथ-गाता। माण्डवी-चित्त-चातक-नवांबुद-बरन, सरन तुलसीदास अभय दाता ॥५॥

शब्दार्थ

भूमिजा-रमण = सीतापति श्रीराम; पादुका = चरण-पादुका; विरागी = वैराग्य से युक्त।

सरल हिंदी अर्थ

भरतजी का वर्णन श्रीराम के चरणकमलों के अनुरागी और राज्यसुख से विरक्त भक्त के रूप में है। चित्रकूट-यात्रा और चरणपादुका के प्रति उनकी निष्ठा का स्मरण किया गया है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

भरत की सबसे बड़ी पहचान त्याग और भ्रातृप्रेम है। अधिकार होते हुए भी वे उसे व्यक्तिगत लाभ के रूप में नहीं देखते। तुलसीदास की दृष्टि में धर्म वह है जहाँ पद और प्रतिष्ठा से ऊपर सत्य, मर्यादा तथा अपने प्रियजन के प्रति निष्ठा रखी जाए।

↑ विषय-सूची  ·  पद 39/64

पद 40 — जयति जय शत्रु-करि-केसरी शत्रुहन,

जयति जय शत्रु-करि-केसरी शत्रुहन, शत्रुतम-तुहिनहर किरणकेतू। देव-महिदेव-महि-धेनु-सेवक सुजन- सिद्धि-मुनि-सकल-कल्याण-हेतू ॥१॥ जयति सर्वांगसुदंर सुमित्रा-सुवन, भुवन-विख्यात-भरतानुगामी। वर्मचर्मासी-धनु-बाण-तूणीर-धर शत्रु-संकट-समय यत्प्रणामी ॥२॥ जयति लवणाम्बुनिधि-कुंभसंभव महा- दनुज-दुर्जनदवन, दुरितहारि। लक्ष्मणानुज, भरत-राम-सीता-चरण- रेणु-भूषित-भाल-तिलकधारी ॥३॥ जयति श्रुतिकीर्ति-वल्लभ सुदुर्लभ सुलभ नमत नर्मद भुक्तिमुक्तिदाता। दासतुलसी चरण-शरण सीदत विभो, पाहि दीनार्त्त-संताप-हाता ॥४॥

शब्दार्थ

शत्रुहन = शत्रुघ्न; रेणु = धूल; दुरित = बुरा कर्म; श्रुतिकीर्ति = शत्रुघ्नजी की पत्नी।

सरल हिंदी अर्थ

शत्रुघ्नजी को वीर, धर्मपालक, भरत के सहायक, श्रीराम-सीता-लक्ष्मण के प्रति विनम्र और शरणागत की रक्षा करने वाला बताया गया है। कवि उनकी कृपा चाहता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह स्तुति उन गुणों को महत्त्व देती है जो अक्सर शांत और बिना प्रदर्शन के दिखाई देते हैं। शत्रुघ्न के व्यक्तित्व में सेवा, पराक्रम और अनुशासन साथ हैं। समर्पित मनुष्य स्वयं को बड़ा सिद्ध किए बिना भी बड़े कार्य का आधार बन सकता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 40/64

08. माता जानकी की करुणा पद 41 से 42

माँ सीता की मध्यस्थ कृपा और भक्त की विनय। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

माता सीता की करुणा और श्रीराम भक्ति का दिव्य रूप
माता जानकी की करुणा

पद 41 — कबहुँक अंब, अवसर पाइ।

कबहुँक अंब, अवसर पाइ। मेरिऔ सुधि द्याइबी, कछु करुन-कथा चलाइ ॥१॥ दीन, सब अँगहीन, छीन, मलीन, अघी अघाइ। नाम लै भरै उदर एक प्रभु-दासी-दास कहाइ ॥२॥ बूझिहैं 'सो है कोन', कहिबी नाम दसा जनाइ। सुनत राम कृपालुके मेरी बिगरीऔ बनि जाइ ॥३॥ जानकी जगजननि जनकी किये बचन सहाइ। तरै तुलसीदास भव तव नाथ-गुन-गन गाइ ॥४॥

शब्दार्थ

अंब = माँ; सुधि = स्मरण या खबर; जनकी = भक्त की; भव = संसार।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास माँ सीता से प्रार्थना करते हैं कि उचित अवसर पर प्रभु श्रीराम से उनकी दशा कह दें। वे स्वयं को दीन और दोषयुक्त बताकर माता की मध्यस्थ करुणा में भरोसा रखते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद विनय पत्रिका का अत्यंत मार्मिक आत्मनिवेदन है। भक्त को लगता है कि माँ अपने बच्चे की व्यथा को सबसे कोमल शब्दों में व्यक्त कर सकती हैं। उसके लिए जनकनंदिनी केवल पूजनीय नहीं, निकटतम दयालु आश्रय हैं।

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पद 42 — कबहुँ समय सुधि द्ययाबी, मेरी मातु जानकी।

कबहुँ समय सुधि द्ययाबी, मेरी मातु जानकी। जन कहाइ नाम लेत हौं, किये पन चातक ज्यों, प्यास-प्रेम-पानकी ॥१॥ सरल कहाई प्रकृति आपु जानिए करुना-निधानकी। निजगुन, अरिकृत अनहितौ, दास-दोष सुरति चित रहत न दिये दानकी ॥२॥ बानि बिसारनसील है मानद अमानकी। तुलसीदास न बिसारिये, मन करम बचन जाके, सपनेहुँ गति न आनकी ॥३॥

शब्दार्थ

चातक = वर्षा की विशेष बूँद चाहने वाला पक्षी; करुना-निधान = दया का भंडार; गति = आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

भक्त माता जानकी से विनती करता है कि वे उसे न भूलें। वह स्वयं को पूर्ण न मानते हुए भी श्रीराम की कृपा के अतिरिक्त किसी दूसरे आधार की कल्पना नहीं करता।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

साधक की सबसे बड़ी संपत्ति यहाँ उसका विश्वास है। अपनी भूलें जानते हुए भी वह परम करुणा से आशा छोड़ता नहीं। यह पद पढ़कर समझ आता है कि शरणागति आत्मविश्वास के विरोध में नहीं; वह सत्य स्वीकार कर सही दिशा में आगे बढ़ने की शक्ति भी देती है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 42/64

09. श्रीराम स्तुति, रामनाम और आरती पद 43 से 56

श्रीराम का स्वरूप, लीला, नाम, दिव्य आरती एवं हरिशंकरी पद। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

पद 43 — जयति सच्चिदव्यापकानंद परब्रह्म-पद विग्रह-व्यक्त लीलावतारी।

जयति सच्चिदव्यापकानंद परब्रह्म-पद विग्रह-व्यक्त लीलावतारी। विकल ब्रह्मादि, सुर, सिद्ध, संकोचवश, विमल गुण-गेह नर-देह-धारी ॥१॥ जयति कोशलाधीश कल्याण कोशलसुता, कुशल कैवल्य-फल चारु चारी। वेद-बोधित करम-धरम-धरनीधेनु, विप्र-सेवक साधु-मोदकारी ॥२॥ जयति ऋषि-मखपाल, शमन-सज्जन-साल, शापवश मुनिवधू-पापहारी। भंजि भवचाप, दलि दाप भूपावली, सहित भृगुनाथ नतमाथ भारी ॥३॥ जयति धारमिक-धुर, धीर रघुवीर गुर-मातु-पितु-बंधु-वचनानुसारी। चित्रकूटाद्रि विन्ध्याद्रि दंडकविपिन, धन्यकृत पुन्यकानन-विहारी ॥४॥ जयति पाकारिसुत-काक-करतूति-फलदानि खनि गर्त गोपित विराधा। दिव्य देवी वेश देखि लखि निशिचरी जनु विडंबित करी विश्वबाधा ॥५॥ जयति खर-त्रिशिर-दूषण चतुर्दश-सहस-सुभट-मारीच-संहारकर्ता। गृध्र-शबरी-भक्ति-विवश करुणासिंधु, चरित निरुपाधि, त्रिविधार्तिहर्ता ॥६॥ जयति मद-अंध कुकबंध बधि, बालि बलशालि बधि, करन सुग्रीव राजा। सुभट मर्कट-भालु-कटक-संघट सजत, नमत पद रावणानुज निवाजा ॥७॥ जयति पाथोधि-कृत-सेतु कौतुक हेतु, काल-मन अगम लई ललकि लंका। सकुल, सानुज, सदल दलित दशकंठ रण, लोक-लोकप किये रहित-शंका ॥८॥ जयति सौमित्रि-सीता-सचिव-सहित चले पुष्पकारुढ निज राजधानी। दासतुलसी मुदित अवधवासी सकल, राम भे भूप वैदेहि रानी ॥९॥

शब्दार्थ

सच्चिद् = सत्-चित्-आनंद स्वरूप; मख = यज्ञ; दशकंठ = रावण।

सरल हिंदी अर्थ

इस विस्तृत स्तुति में भगवान श्रीराम के अवतार, ऋषियों की रक्षा, मिथिला से वनवास, शबरी और जटायु पर कृपा, सुग्रीव-विभीषण का हित, लंका-विजय और अयोध्या-आगमन की कथा-स्मृतियाँ हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

तुलसीदास भगवान के चरित्र को धर्म और करुणा के संयुक्त रूप में देखते हैं। श्रीराम की महानता केवल पराक्रम में नहीं, उनकी वचनपालन, दीनों के प्रति प्रेम और मित्रधर्म निभाने की क्षमता में भी है। पद रामकथा के प्रमुख प्रसंगों को एक भक्ति-सूत्र में पिरो देता है।

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पद 44 — जयति राज-राजेंद्र राजीवलोचन, राम नाम कलि-कामतरु, साम-शाली।

जयति राज-राजेंद्र राजीवलोचन, राम नाम कलि-कामतरु, साम-शाली। अनय-अंभोधि-कुंभज, निशाचर-निकर-तिमिर-घनघोर-खरकिरणमाली ॥१॥ जयति मुनि-देव-नरदेव दसरत्थके, देव-मुनि-वंद्य किय अवध-वासी। लोक नायक-कोक-शोक-संकट-शमन, भानुकुल-कमल कानन-विकासी ॥२॥ जयति शृंगार-सर तामरस-दामदुति-देह, गुणगेह, विश्वोपकारी। सकल सौभाग्य-सौंदर्य-सुषमारुप, मनोभव कोटि गर्वापहारी ॥३॥ जयति सुभग सारंग सुनिखंग सायक शक्ति, चारु चर्मासि वर वर्मधारी। धर्मधुरधीर, रघुवीर, भुजबल अतुल, हेलया दलित भूभार भारी ॥४॥ जयति कलधौत मणि-मुकुट, कुंडल, तिलक-झलक भलि भाल, विधु-वदन-शोभा। दिव्य भूषन, बसन पीत, उपवीत, किय ध्यान कल्यान-भाजन न को भा ॥५॥ जयति भरत-सौमित्रि-शत्रुघ्न-सेवित, सुमुख, सचिव-सेवक-सुखद, सर्वदाता। अधम, आरत, दीन, पतित, पातक-पीन सकृत नतमात्र कहि 'पाहि' पाता ॥६॥ जयति जय भुवन दसचारि जस जगमगत, पुन्यमय, धन्य जय रामराजा। चरित-सुरसरित कवि-मुख्य गिरि निःसरित, पिबत, मज्जत मुदित सँत-समाजा ॥७॥ जयति वर्णाश्रमाचारपर नारि-नर, सत्य-शम-दम-दया-दानशीला। विगत दुख-दोष, संतोस सुख सर्वदा, सुनत, गावत राम राजलीला ॥८॥ जयति वैराग्य-विज्ञान-वारांनिधे, नमत नर्मद, पाप-ताप-हर्ता। दास तुलसी चरण शरण संशय-हरण, देहि अवलंब वैदेहि-भर्ता ॥९॥

शब्दार्थ

राजीवलोचन = कमल के समान नेत्र; रामराजा = आदर्श राजा; वैदेहि-भर्ता = सीता के पति।

सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम का रूप, शील, धर्मरक्षा, भ्रातृप्रेम और रामराज्य की मर्यादा गाई गई है। कवि अंत में सीतापति से अपनी शरण को स्वीकार करने का निवेदन करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

रामराज्य का चित्र यहाँ न्याय, दया, संयम और संतोष की भावना से जुड़ता है। राज्य की महिमा मनुष्य के चरित्र से बनती है। तुलसीदास के लिए आदर्श शासन वही है जिसमें सामान्य जन को सम्मान और जीवन में नैतिक स्थिरता मिलती है।

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पद 45 — श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं।

श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन हरण भवभय दारुणं। नवकंज-लोचन, कंज-मुख, कर-कंज, पद कंजारुणं ॥१॥ कंदर्प अगणित अमित छवि, नवनिल नीरद सुंदरं। पट पीत मानहु तड़ित रुचि शुचि नौमि जनक सुतावरं ॥२॥ भजु दीनबंधु दिनेश दानव-दैत्य-वंश निकंदनं। रघुनंद आनँदकंद कोशलचंद दशरथ-नंदनं ॥३॥ सिर मुकुट कुंडल तिलक चारु उदारु अंग विभूषणं। आजानुभुज शर-चाप-धर, संग्राम-जित-खरदूषणं ॥४॥ इति वदति तुलसीदास शंकर-शेष-मुनि-मन-रंजनं। मम ह्रदय कंज निवास करु कामादि खल-दल-गंजनं ॥५॥

शब्दार्थ

नवकंज = नया कमल; भवभय = संसार-संबंधी भय; दीनबंधु = दीनों के सहायक।

सरल हिंदी अर्थ

यह प्रसिद्ध 'श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन' स्तुति भगवान श्रीराम के सुंदर स्वरूप, करुणा, शौर्य और दशरथनंदन के रूप का स्मरण कराती है। तुलसीदास प्रभु से अपने हृदय-कमल में निवास का वर माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पद का सौंदर्य इसके मधुर चित्रों और भावपूर्ण पुकार में है। कमल, मेघ और विद्युत जैसे रूपक भक्त के मन में श्रीराम का कोमल रूप रचते हैं। अंततः सौंदर्य-दर्शन आत्मिक परिवर्तन का साधन बनता है, जिससे अहंकार और अवांछित इच्छाएँ कम हों।

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भगवान श्रीराम की आरती और तुलसी माला से रामनाम स्मरण
श्रीराम नाम की महिमा और आरती

पद 46 — सदा राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, मूढंअन बार बारं।

सदा राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, राम जपु, मूढंअन बार बारं। सकल सौभाग्य-सुख-खानि जिय जानि शठ, मानि विश्वास वद वेदसारं ॥१॥ कोशलेन्द्र नव-नीलकंजाभतनु, मदन-रिपु-कंजह्रदि-चंचरीकं। जानकीरवन सुखभवन भुवनैकप्रभु, समर-भंजन, परम कारुनीकं ॥२॥ दनुज-वन धूमधुज, पीन आजानुभुज, दंड-कोदंडवर चंड बानं। अरुनकर चरण मुख नयन राजीव, गुन-अयन, बहु मयन-शोभा-निधानं ॥३॥ वासनावृंद-कैरव-दिवाकर, काम-क्रोध-मद कंज-कानन-तुषारं। लोभ अति मत्त नागेंद्र पंचानन भक्तहित हरण संसार-भारं ॥४॥ केशवं, क्लेशहं, केश-वंदित पद-द्वंद्व मंदाकिनी-मूलभूतं। सर्वदानंद-संदोह, मोहापहं, घोर-संसार-पाथोधि-पोतं ॥५॥ शोक-संदेह-पाथोदपटलानिलं, पाप-पर्वत-कठिन-कुलिशरूपं। संतजन-कामधुक-धेनु, विश्रामप्रद, नाम कलि-कलुष-भंजन अनूपं ॥६॥ धर्म-कल्पद्रुमाराम, हरिधाम-पथि संबलं, मूलमिदमेव एकं। भक्ति-वैराग्यं विज्ञान-शम-दान-दम, नाम आधीन साधन अनेकं ॥७॥ तेन तप्तं, हुतं, दत्तमेवाखिलं, तेन सर्व कृतं कर्मजालं। येन श्रीरामनामामृतं पानकृतमनिशमनवद्यमवलोक्य कालं ॥८॥ श्वपच, खल, भिल्ल, यवनादि हरिलोकगत, नामबल विपुल मति मल न परसी। त्यागि सब आस, संत्रास, भवपास असि निसित हरिनाम जपु दासतुलसी ॥९॥

शब्दार्थ

कोशलेन्द्र = अयोध्या के स्वामी; कैरव = रात में खिलने वाला कमल; संबल = सहारा।

सरल हिंदी अर्थ

कवि अपने मन और जीभ को बार-बार श्रीराम नाम जपने का उपदेश देते हैं। पद में नाम को सुख, विवेक, वैराग्य, शांति और भक्ति की जड़ बताया गया है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

नाम-स्मरण एक ऐसी साधना है जिसे व्यक्ति दैनिक जीवन में सरलता से अपना सकता है। तुलसीदास नाम को केवल उच्चारण तक सीमित नहीं रखते; उसके साथ विश्वास, अनुशासन और सदाचार जुड़ा है। बार-बार का स्मरण मन को उद्देश्यमय और करुणामय बनाने की प्रेरणा देता है।

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पद 47 — ऐसी आरती राम रघुबीरकी करहि मन।

ऐसी आरती राम रघुबीरकी करहि मन। हरन दुखदुंद गोबिंद आनन्दघन ॥१॥ अचरचर रूप हरि, सरबगत, सरबदा बसत, इति बासना धूप दीजै। दीप निजबोधगत-कोह-मद-मोह-तम, प्रौढऽभिमान चितबृति छीजै ॥२॥ भाव अतिशय विशद प्रवर नैवेद्य शुभ श्रीरमण परम संतोषकारी। प्रेम-तांबूल गत शूल संशय सकल, विपुल भव-बासना-बीजहारी ॥३॥ अशुभ-शुभकर्म-घृतपूर्ण दश वर्तिका, त्याग पावक, सतोगुण प्रकासं। भक्ति-वैराग्य-विज्ञान दीपावली, अर्पि नीराजनं जगनिवासं ॥४॥ बिमल ह्रदि-भवन कृत शांति-पर्यक शुभ, शयन विश्राम श्रीरामराया। क्षमा-करुणा प्रमुख तत्र परिचारिका, यत्र हरि तत्र नहिं भेद-माया ॥५॥ एहि आरती-निरत सनकादि, श्रुति, शेष, शिव, देवरिषि, अखिलमुनि तत्व-दरसी। करै सोइ तरै, परिहरै कामादि मल, वदति इति अमलमति-दास तुलसी ॥६॥

शब्दार्थ

नीराजन = आरती उतारना; नैवेद्य = अर्पित भोग; निजबोध = आत्मज्ञान।

सरल हिंदी अर्थ

यह बाहरी दीपक से आगे बढ़कर मन की आध्यात्मिक आरती है। अज्ञान के अंधकार को ज्ञान का दीप, शुद्ध भाव को नैवेद्य, प्रेम को तांबूल और क्षमा-करुणा को सेवा के रूप में अर्पित किया गया है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

तुलसीदास बताते हैं कि पूजा का गहरा अर्थ चरित्र का परिवर्तन है। भक्ति, वैराग्य और ज्ञान जब साथ आते हैं तो मन स्वयं मंदिर बन जाता है। ऐसी प्रतीकात्मक आरती दैनिक व्यवहार को भी भक्तिमय और नैतिक बनाने का संदेश देती है।

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पद 48 — हरति सब आरती आरती रामकी।

हरति सब आरती आरती रामकी। दहन दुख-दोष, निरमूलिनी कामकी ॥१॥ सुरभ सौरभ धूप दीपबर मालिका। उड़त अघ-बिहँग सुनि ताल करतालिका ॥२॥ भक्त-ह्रदि-भवन, अज्ञान-तम-हारिनी। बिमल बिग्यानमय तेज-बिस्तारिनी ॥३॥ मोह-मद-कोह-कलि-कंज-हिमजामिनी। मुक्तिकी दूतिका, देह-दुति दामिनी ॥४॥ प्रनत-जन-कुमुद-बन-इंदु-कर-जालिका। तुलसि अभिमान-महिषेस बहु कालिका ॥५॥

शब्दार्थ

आरती = पूजा तथा पीड़ा की व्यंजना; अज्ञान-तम = अविद्या का अंधकार; बिमल = शुद्ध।

सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम की आरती को दुःख, दोष और अज्ञान दूर करने वाली ज्योति के रूप में गाया गया है। पुष्प, दीप, सुगंध और करताल की छवियाँ भक्त के हृदय में उजाला फैलाती हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इस पद में प्रकाश मन के विवेक का प्रतीक है। आरती की रस्म तभी सार्थक है जब उसके साथ अहंकार, क्रोध और मोह घटें। बाहरी भक्ति से भीतर की करुणा और मन की शुद्धता तक पहुँचने की प्रेरणा इसमें मिलती है।

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पद 49 — देव-दनुज-बन-दहन, गुन-गहन, गोविंद नंदादि-आनंद-दाताऽविनाशी।

देव-दनुज-बन-दहन, गुन-गहन, गोविंद नंदादि-आनंद-दाताऽविनाशी। शंभु, शिव, रुद्र, शंकर, भयंकर, भीम, घोर, तेजायतन, क्रोध-राशी ॥१॥ अनँत, भगवंत-जगदंत-अंतक-त्रास-शमन, श्रीरमन, भुवनाभिरामं। भूधराधीश जगदीश ईशान, विज्ञानघन, ज्ञान-कल्यान-धामं ॥२॥ वामनाव्यक्त, पावन, परावर, विभो, प्रकट परमातमा, प्रकृति-स्वामी। चंद्रशेखर, शूलपाणि, हर, अनघ, अज, अमित, अविछिन्न, वृशभेश-गामी ॥३॥ नीलजलदाभ तनु श्याम, बहु काम छवि राम राजीवलोचन कृपाला। कबुं-कर्पूर-वपु धवल, निर्मल मौलि जटा, सुर-तटिनि, सित सुमन माला ॥४॥ वसन किंजल्कधर, चक्र-सारंग-दर-कंज-कौमोदकी अति विशाला। मार-करि-मत्त-मृगराज, त्रैनैन, हर, नौमि अपहरण संसार-जाला ॥५॥ कृष्ण, करुणाभवन, दवन कालीय खल, विपुल कंसादि निर्वशकारी। त्रिपुर-मद-भंगकर, मत्तगज-चर्मधर, अन्धकोरग-ग्रसन पन्नगारी ॥६॥ ब्रह्म, व्यापक, अकल, सकल, पर, परमहित, ग्यान, गोतीत, गुण-वृत्ति-हर्त्ता। सिंधुसुत-गर्व-गिरि-वज्र, गौरीश, भव दक्ष-मख अखिल विध्वंसकर्त्ता ॥७॥ भक्तिप्रिय, भक्तजन-कामधुक धेनु, हरि हरण दुर्घट विकट विपति भारी। सुखद, नर्मद, वरद, विरज, अनवघ्यऽखिल, विपिन-आनंद-वीथिन-विहारी। रुचिर हरिशंकरी नाम-मंत्रावली द्वंद्वदुख हरनि, आनंदखानी। विष्णु-शिव-लोक-सोपान-सम सर्वदा वदति तुलसीदास विशद बानी ॥८॥

शब्दार्थ

हरिशंकरी = हरि और शंकर को साथ स्मरण करने वाली; शूलपाणि = त्रिशूलधारी; कल्यान-धाम = मंगल का निवास।

सरल हिंदी अर्थ

इस पद में भगवान विष्णु और शिव के नाम, रूप, लीलाएँ तथा दिव्य गुण एक साथ गाए गए हैं। तुलसीदास दोनों को संसार के संकट हरने वाले और ज्ञान तथा आनंद का स्रोत मानते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह भारतीय भक्ति परंपरा के समन्वय का सुंदर उदाहरण है। आराधना के भिन्न रूपों के भीतर करुणा, सत्य और कल्याण का साझा तत्त्व निहित है। भक्त के लिए इससे संकीर्णता दूर करने और सभी के प्रति आदर रखने की प्रेरणा निकलती है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 49/64

पद 50 — भानुकुल-कमल-रवि, कोटि कंदर्प-छवि, काल-कलि-व्यालमिव वैनतेयं।

भानुकुल-कमल-रवि, कोटि कंदर्प-छवि, काल-कलि-व्यालमिव वैनतेयं। प्रबल भुजदंड परचंड-कोदंड-धर तूणवर विशिख बलमप्रमेयं ॥१॥ अरुण राजीवदल-नयन, सुषमा-अयन, श्याम तन-कांति वर वारिदाभं। तत्प कांचन-वस्त्र, शस्त्र-विद्या-निपुण, सिद्ध-सुर-सेव्य, पाथोजनाभं ॥२॥ अखिल लावण्य-गृह, विश्व-विग्रह, परम प्रौढ, गुणगूढ़, महिमा उदारं। दुर्धर्ष, दुस्तर, दुर्ग, स्वर्ग-अपवर्ग-पति, भग्न संसार-पादप कुठारं ॥३॥ शापवश मुनिवधू-मुक्तकृत, विप्रहित, यज्ञ-रक्षण-दक्ष, पक्षकर्ता। जनक-नृप-सदसि शिवचाप-भंजन, उग्र भार्गवागर्व-गरिमापहर्ता ॥४॥ गुरु-गिरा-गौरवामर-सुदुस्त्यज राज्य त्यक्त, श्रीसहित सौमित्रि-भ्राता। संग जनकात्मजा, मनुजमनुसृत्य अज, दुष्ट-वध-निरत, त्रैलोक्यत्राता ॥५॥ दंडकारण्य कृतपुण्य पावन चरण, हरण मारीच-मायाकुरंगं। बालि बलमत्त गजराज इव केसरी, सुह्रद-सुग्रीव-दुख-राशि-भंगं ॥६॥ ऋक्ष, मर्कट विकट सुभट उभ्दट समर, शैल-संकाश रिपु त्रासकारी। बद्धपाथोधि, सुर-निकर-मोचन, सकुल दलन दससीस-भुजबीस भारी ॥७॥ दुष्ट विबुधारि-संघात, अपहरण महि-भार, अवतार कारण अनूपं। अमल, अनवद्य, अद्वैत, निर्गुण, सर्गुण, ब्रह्म सुमिरामि नरभूप-रूपं ॥८॥ शेष-श्रुति-शारदा-शंभु-नारद-सनक गनत गुन अंत नहीं तव चरित्रं। सोइ राम कामारि-प्रिय अवधपति सर्वदा दासतुलसी-त्रास-निधि वहित्रं ॥९॥

शब्दार्थ

भानुकुल = सूर्यवंश; वैनतेय = गरुड़; कोदंड = श्रीराम का धनुष।

सरल हिंदी अर्थ

राम के कमलनयन, मेघश्याम रूप, धनुष-बाण, अहिल्या-उद्धार, वनवास, सुग्रीव-मित्रता, सेतु-बंधन और रावण-विजय जैसे प्रसंगों द्वारा उनकी महिमा गाई गई है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कवि भगवान को साकार राजा के रूप में देखते हुए उनके निर्गुण ब्रह्मत्व का भी स्मरण करते हैं। उनकी करुणा धर्मपालन और पराक्रम के साथ जुड़ती है। यह पद रामकथा का संक्षिप्त किन्तु भावसमृद्ध पुनर्स्मरण है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 50/64

पद 51 — जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-तम-तरणि, तारुण्यतनु, तेजधामं।

जानकीनाथ, रघुनाथ, रागादि-तम-तरणि, तारुण्यतनु, तेजधामं। सच्चिदानंद, आनंदकंदाकरं, विश्व-विश्राम, रामाभिरामं ॥१॥ नीलनव-वारिधर-सुभग-शुभकांति, कटि पीत कौशेय वर वसनधारी। रत्न-हाटक-जटित-मुकुट-मंडित-मौलि, भानु-शत-सदृश उद्योतकारी ॥२॥ श्रवण कुंडल, भाल तिलक, भूरुचिर अति, अरुण अंभोज लोचन विशालं। वक्र-अवलोक, त्रैलोक-शोकापहं, मार-रिपु-ह्रदय-मानस-मरालं ॥३॥ नासिका चारु सुकपोल, द्विज वज्रदुति, अधर बिंबोपमा, मधुरहासं। कंठ दर, चिबुक वर, वचन गंभीरतर, सत्य-संकल्प, सुरत्रास-नासं ॥४॥ सुमन सुविचित्र नव तुलसिकादल-युतं मृदुल वनमाल उर भ्राजमानं। भ्रमत आमोदवश मत्त मधुकर-निकर, मधुरतर मुखर कुर्वन्ति गानं ॥५॥ सुभग श्रीवत्स, केयूर, कंकण, हार, किंकणी-रटनि कटि-तट रसालं। वाम दिसि जनकजासीन-सिंहासनं कनक-मृदुवल्लित तरु तमालं ॥६॥ आजानु भुजदंड कोदंड-मंडित वाम बाहु, दक्षिण पाणि बाणमेकं। अखिल मुनि-निकर, सुर, सिद्ध, गंधर्व वर नमत नर नाग अवनिप अनेकं ॥७॥ अनघ अविछिन्न, सर्वज्ञ, सर्वेश, खलु सर्वतोभद्र-दाताऽसमाकं। प्रणतजन-खेद-विच्छेद-विद्या-निपुण नौमि श्रीराम सौमित्रिसाकं ॥८॥ युगल पदपद्म, सुखसद्म पद्मालयं, चिन्ह कुलिशादि शोभाति भारी। हनुमंत-ह्रदि विमल कृत परममंदिर, सदातुलसी-शरण शोकहारी ॥९॥

शब्दार्थ

जानकीनाथ = सीतापति; आजानुभुज = घुटनों तक लंबी भुजाओं वाले; शोकहारी = दुःख दूर करने वाले।

सरल हिंदी अर्थ

श्रीराम के मुख, नेत्र, केश, मुकुट, वस्त्र, माला, धनुष और चरणों की अलंकारपूर्ण स्तुति है। माता सीता की उपस्थिति तथा हनुमान के हृदय में प्रभु के निवास का भी उल्लेख आता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यहाँ रूप-वर्णन केवल बाहरी सौंदर्य नहीं, कृपा और मर्यादा का अनुभव कराता है। भक्त ध्यान के माध्यम से प्रभु के गुणों को अपने जीवन में उतारना चाहता है। राम, सीता और हनुमान का पवित्र संबंध भक्ति में प्रेम और सेवा की एकता दिखाता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 51/64

पद 52 — कोशलाधीश, जगदीश, जगदेकहित, अमितगुण, विपुल विस्तार लीला।

कोशलाधीश, जगदीश, जगदेकहित, अमितगुण, विपुल विस्तार लीला। गायंति तव चरित सुपवित्र श्रुति-शेष-शुक-शंभु-सनकादि मुनि मननशीला ॥१॥ वारिचर-वपुष धरि भक्त-निस्तारपर, धरणिकृत नाव महिमातिगुर्वी। सकल यज्ञांशमय उग्र विग्रह क्रोड़, मर्दि दनुजेश उद्धरण उर्वी ॥२॥ कमठ अति विकट तनु कठिन पृष्ठोपरी, भ्रमत मंदर कंडु-सुख मुरारी। प्रकटकृत अमृत, गो, इंदिरा, इंदु, वृंदारकावृंद-आनंदकारी ॥३॥ मनुज-मुनि-सिद्ध-सुर-नाग-त्रासक, दुष्ट दनुज द्विज-धर्म-मरजाद-हर्त्ता। अतुल मृगराज-वपुधरित, विद्दरित अरि, भक्त प्रहलाद-अहलाद-कर्त्ता ॥४॥ छलन बलि कपट-वटुरूप वामन ब्रह्म, भुवन पर्यंत पद तीन करणं। चरण-नख-नीर-त्रेलोक-पावन परम, विबुध-जननी-दुसह-शोक-हरणं ॥५॥ क्षत्रियाधीश-करिनिकर-नव-केसरी, परशुधर विप्र-सस-जलदरूपं। बीस भुजदंड दससीस खंडन चंड वेग सायक नौमि राम भूपं ॥६॥ भूमिभर-भार-हर, प्रकट परमातमा, ब्रह्म नररूपधर भक्तहेतू। वृष्णि-कुल-कुमुद-राकेश राधारमण, कंस-बंसाटवी-धूमकेतू ॥७॥ प्रबल पाखंड महि-मंडलाकुल देखि, निंद्यकृत अखिल मख कर्म-जालं। शुद्ध बोधैकघन, ज्ञान-गुणधाम, अज बौद्ध-अवतार वंदे कृपालं ॥८॥ कालकलिजनित-मल-मलिनमन सर्व नर मोह निशि-निबिड़यवनांधकारं। विष्णुयश पुत्र कलकी दिवाकर उदित दासतुलसी हरण विपतिभारं ॥९॥

शब्दार्थ

लीलावतार = भगवान का विभिन्न रूपों में प्रकट होना; कमठ = कच्छप; वामन = विष्णु का बटुक रूप।

सरल हिंदी अर्थ

इस पद में भगवान के मत्स्य, कूर्म, वराह, नरसिंह, वामन, परशुराम, राम, कृष्ण आदि पारंपरिक अवतारों की लीलाओं का स्मरण है। उनका उद्देश्य अधर्म से रक्षा और धर्म का समर्थन बताया गया है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

अवतार-कथाओं का काव्यात्मक सार बताता है कि भिन्न-भिन्न युग और परिस्थितियों में धर्मरक्षा का आदर्श कैसे व्यक्त किया गया है। तुलसीदास इन्हें श्रीराम-भक्ति की व्यापक वैष्णव परंपरा से जोड़ते हैं। इस पद का पाठ करते समय कथा-संदर्भों और सांकेतिक भाषा का ध्यान रखना उपयोगी है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 52/64

पद 53 — सकल सौभाग्यप्रद सर्वतोभद्र-निधि, सर्व, सर्वेश, सर्वाभिरामं।

सकल सौभाग्यप्रद सर्वतोभद्र-निधि, सर्व, सर्वेश, सर्वाभिरामं। शर्व-ह्रदि-कंज-मकरंद-मधुकर रुचिर-रूप, भूपालमणि नौमि रामं ॥१॥ सर्वसुख-धाम गुणग्राम, विश्रामपद, नाम सर्वसंपदमति पुनीतं। निर्मलं शांत, सुविशुद्ध, बोधायतन, क्रोध-मद-हरण, करुणा-निकेतं ॥२॥ अजित, निरुपाधि, गोतीतमव्यक्त, विभुमेकमनवद्यमजमद्वितीयं। प्राकृतं, प्रकट परमातमा, परमहित, प्रेरकानंत वंदे तुरीयं ॥३॥ भूधरं सुन्दरं, श्रीवरं, मदन-मद-मथन सौन्दर्य-सीमातिरम्यं। दुष्प्राप्य, दुष्पेक्ष्य, दुस्तर्क्य, दुष्पार, संसारहर, सुलभ, मृदुभाव-गम्यं ॥४॥ सत्यकृत, सत्यरत, सत्यव्रत, सर्वदा, पुष्ट, संतुष्ट, संकष्टहारी। धर्मवर्मनि ब्रह्मकर्मबोधैक, विप्रपूज्य, ब्रह्मण्यजनप्रिय, मुरारी ॥५॥ नित्य, निर्मम, नित्यमुक्त, निर्मान, हरि, ज्ञानघन, सच्चिदानंद मूलं। सर्वरक्षक सर्वभक्षकाध्यक्ष, कूटस्थ, गूढार्चि, भक्तानुकूलं ॥६॥ सिद्ध-साधक-साध्य, वाच्य-वाचकरूप, मंत्र-जापक-जाप्य, सृष्टि-स्त्रष्टा। परम कारण, कञ्ञनाभ, जलदाभतनु, सगुण, निर्गुण, सकल दृश्य-द्रष्टा ॥७॥ व्योम-व्यापक, विरज, ब्रह्म, वरदेश, वैकुंठ, वामन विमल ब्रह्मचारी। सिद्ध-वृंदारकावृंदवंदित सदा, खंडि पाखंड-निर्मूलकारी ॥८॥ पूरनानंदसंदोह, अपहरन संमोह-अज्ञान, गुण-सन्निपातं। बचन-मन-कर्म-गत शरण तुलसीदास त्रास-पाथोधि इव कुंभजातं ॥९॥

शब्दार्थ

सर्वतोभद्र = सभी प्रकार से मंगलमय; निरुपाधि = उपाधियों से रहित; तुरीय = चेतना की पारलौकिक अवस्था।

सरल हिंदी अर्थ

भगवान को सर्वव्यापी, करुणामय, निर्लिप्त और साधकों के लिए सहज आश्रय कहा गया है। नाम, जापक और जप्य के गहरे दार्शनिक संबंध सहित प्रभु के सगुण-निर्गुण स्वरूपों की वंदना है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद भक्ति तथा दर्शन को एक सूत्र में जोड़ता है। जो परम सत्य शब्दों और विचारों से भी परे है, वही प्रेम और नम्रता से हृदय के निकट अनुभव होता है। तुलसीदास का आत्मनिवेदन अंततः ज्ञान और भक्तिभाव के मेल पर टिकता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 53/64

पद 54 — विश्व-विख्यात, विश्वेश, विश्वायतन, विश्वमरजाद, व्यालारिगामी।

विश्व-विख्यात, विश्वेश, विश्वायतन, विश्वमरजाद, व्यालारिगामी। ब्रह्म, वरदेश, वागीश, व्यापक, विमल विपुल, बलवान, निर्वानस्वामी ॥१॥ प्रकृति, महतत्व, शब्दादि गुण, देवता व्योम, मरुदग्नि, अमलांबु, उर्वी। बुद्धि, मन, इंद्रिय, प्राण, चित्तातमा, काल, परमाणु, चिच्छक्ति गुर्वी ॥२॥ सर्वमेवात्र त्वद्रूप भूपालमणि! व्यक्तमव्यक्त, गतभेद, विष्णो। भुवन भवदंग, कामारि-वंदित, पदद्वंद्व मंदाकिनी-जनक, जिष्णो ॥३॥ आदिमध्यांत, भगवंत! त्वं सर्वगतमीश, पश्यन्ति ये ब्रह्मवादी। यथा पट-तंतु, घट-मृतिका, सर्प-स्त्रग, दारुकरि, कनक-कटकांगदादी ॥४॥ गूढ़, गंभीर, गर्वघ्न, गूढार्थवित, गुप्त, गोतीत, गुरु, ग्यान-ग्याता। ग्येय, ग्यानप्रिय, प्रचुर गरिमागार, घोर-संसार-पर, पार दाता ॥५॥ सत्यसंकल्प, अतिकल्प, कल्पांतकृत, कल्पनातीत, अहि-तल्पवासी। वनज-लोचन, वनज-नाभ, वनदाभ-वपु, वनचरध्वज-कोटि-लावण्यरासी ॥६॥ सुकर, दुःकर, दुराराध्य, दुर्व्यसनहर, दुर्ग, दुर्द्धर्ष, दुर्गार्त्तिहर्त्ता। वेदगर्भार्भकादर्भ-गुनगर्व, अर्वांगपर-गर्व-निर्वाप-कर्त्ता ॥७॥ भक्त-अनुकूल, भवशूल-निर्मूलकर, तूल-अघ-नाम पावक-समानं। तरलतृष्णा-तमी-तरणि, धरणीधरण, शरण-भयहरण, करुणानिधानं ॥८॥ बहुल वृंदारकावृंद-वंदारु-पद-द्वंद्व मंदार-मालोर-धारी। पाहि मामीश संताप-संकुल सदा दास तुलसी प्रणत रावणारी ॥९॥

शब्दार्थ

विश्वायतन = संपूर्ण विश्व का आधार; अहि-तल्पवासी = शेषनाग की शय्या पर विराजने वाले; जिष्णु = विजयी।

सरल हिंदी अर्थ

प्रकृति, मन, इंद्रियाँ, समय और समस्त जगत को भगवान के व्यापक अस्तित्व से संबद्ध बताया गया है। कवि विष्णु/राम की करुणा तथा नाम की पावन शक्ति का स्मरण करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यहाँ जगत को ईश्वर से पृथक न मानने वाला दार्शनिक दृष्टिकोण सामने आता है। जीवन के प्रत्येक घटक में दिव्यता की स्मृति व्यक्ति को जिम्मेदार और विनीत बना सकती है। तुलसीदास का स्वर ज्ञानमय होकर भी याचना और प्रेम से भरपूर रहता है।

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पद 55 — संत-संतापहर, विश्व-विश्रामकर, रामकामारि, अभिरामकारी।

संत-संतापहर, विश्व-विश्रामकर, रामकामारि, अभिरामकारी। शुद्ध बोधायतन, सच्चिदानंदघन, सज्जनानंद-वर्धन, खरारी ॥१॥ शील-समता-भवन, विषमता-मति-शमन, राम, रमारमन, रावनारी। खड्ग, कर चर्मवर, वर्मधर, रुचिरल कटि तूण, शर-शक्ति-सारंगधारी ॥२॥ सत्यसंधान, निर्वानप्रद, सर्वहित, सर्वगुण-ज्ञान-विज्ञानशाली। सघन-तम-घोर-संसार-भर-शर्वरी नाम दिवसेष खर-किरणमाली ॥३॥ तपन तीच्छन तरुन तीव्र तापघ्न, तपरूप, तनभूप, तमपर, तपस्वी। मान-मद-मदन-मत्सर-मनोरथ-मथन, मोह-अंभोधि-मंदर, मनस्वी ॥४॥ वेद विख्यात, वरदेश, वामन, विरज, विमल, वागीश, वैकुंठस्वामी। काम-क्रोधादिमर्दन, विवर्धन, छमा-शांति-विग्रह, विहगराज-गामी ॥५॥ परम पावन, पाप-पुंज-मुंजावटी-अनल इव निमिष निर्मूलकर्त्ता। भुवन-भूषण, दूषणारि-भुवनेश, भूनाथ, श्रुतिमाथ जय भुवनभर्ता ॥६॥ अमल, अविचल, अकल, सकल, संतप्त-कलि-विकलता-भंजनानंदरासी। उरगनायक-शयन, तरुणपंकज-नयन, छीरसागर-अयन, सर्ववासी ॥७॥ सिद्ध-कवि-कोविकानंद-दायक पदद्वंद्व मंदात्ममनुजैर्दुरापं। यत्र संभूत अतिपूत जल सुरसरी दर्शनादेव अपहरति पापं ॥८॥ नित्य निर्मुक्त, संयुक्तगुण, निर्गुणानंद, भगवंत, न्यामक, नियंता। विश्व-पोषण-भरण, विश्व-कारण-करण, शरण तुलसीदास त्रास-हंता ॥९॥

शब्दार्थ

खरारी = खर नामक दैत्य के शत्रु श्रीराम; शील = सद्गुण; क्षमा-शांति = सहिष्णुता और मानसिक स्थिरता।

सरल हिंदी अर्थ

भगवान को सत्पुरुषों का आनंद बढ़ाने वाला, शांति तथा समता का स्वरूप और संसार का पालनकर्ता कहा गया है। स्तुति में राम के विविध गुणों के साथ भक्त का उनकी शरण जाने का भाव है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

शक्ति की सच्ची पहचान शील और संयम के साथ होती है। क्रोध, लोभ तथा अहंकार पर नियंत्रण का भाव इस पद में बार-बार आता है। साधक को याद दिलाया जाता है कि रामभक्ति व्यक्तिगत व्यवहार में शांति, दया और न्याय के रूप में प्रकट हो।

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पद 56 — दनुजसूदन दयासिंधु, दंभापहन दहन दुर्दोष, दर्पापहर्त्ता।

दनुजसूदन दयासिंधु, दंभापहन दहन दुर्दोष, दर्पापहर्त्ता। दुष्टतादमन, दमभवन, दुःखौघहर दुर्ग दुर्वासना नाश कर्त्ता ॥१॥ भूरिभूषण, भानुमंत, भगवंत, भवभंजनाभयद, भुवनेश भारी। भावनातीत, भववंद्य, भवभक्तहित, भूमिउद्धरण, भूधरण-धारी ॥२॥ वरद, वनदाभ, वागीश, विश्वात्मा, विरज, वैकुण्ठ-मन्दिर-विहारी। व्यापक व्योम, वंदारु, वामन, विभो, ब्रह्मविद, ब्रह्म, चिंतापहारी ॥३॥ सहज सुन्दर, सुमुख, सुमन, शुभ सर्वदा, शुद्धसर्वज्ञ, स्वछन्दचारी। सर्वकृत, सर्वभृत, सर्वजित, सर्वहित, सत्य-संकल्प, कल्पांतकारी ॥४॥ नित्य, निर्मोह, निर्गुण, निरंजन, निजानंद, निर्वाण, निर्वाणदाता। निर्भरानंद, निःकंप, निःसीम, निर्मुक्त, निरुपाधि, निर्मम, विधाता ॥५॥ महामंगलमूल, मोद-महिमायतन, मुग्ध-मधु-मथन, मानद, अमानी। मदनमर्दन, मदातीत, मायारहित, मंजु मानाथ, पाथोजपानी ॥६॥ कमल-लोचन, कलाकोश, कोदंडधर, कोशलाधीश, कल्याणराशी। यातुधान प्रचुर मत्तकरि-केसरी, भक्तमन-पुण्य-आरण्यवासी ॥७॥ अनघ, अद्वैत, अनवद्य, अव्यक्त, अज, अमित अविकार, आनंदसिंधो। अचल, अनिकेत, अविरल, अनामय, अनारंभ, अंभोदनादहन-बंधो ॥८॥ दासतुलसी खेदखिन्न, आपन्न इह, शोकसंपन्न अतिशय सभीतं। प्रणतपालक राम, परम करुणाधाम, पाहि मामुर्विपति, दुर्विनीतं ॥९॥

शब्दार्थ

दयासिंधु = दया का महासागर; दुर्वासना = अशुभ प्रवृत्ति; प्रणतपालक = शरणागत की रक्षा करने वाले।

सरल हिंदी अर्थ

इस विस्तृत स्तुति में भगवान के उदार, निर्भयकारी, ज्ञानस्वरूप और विश्वकल्याणकारी रूप का वर्णन है। अंतिम चरण में तुलसीदास अपनी व्यथा कहकर भगवान श्रीराम से तत्काल करुणा की विनती करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

शास्त्रीय शब्दावली के बीच कवि का सरल मानवीय हृदय बोल उठता है। आत्मसमर्पण में अपनी कठिनाई छिपाना आवश्यक नहीं। प्रभु को करुणाधाम कहकर पुकारना उस भरोसे को व्यक्त करता है जो भक्त को निराशा में भी सद्मार्ग पर बने रहने की प्रेरणा देता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 56/64

10. श्रीरंग, नर-नारायण, विन्दुमाधव और समापन पद 57 से 64

सत्संग, दिव्य दर्शन और रघुनाथ चरणों में विश्राम। नीचे प्रत्येक पद क्रमवार पढ़ें।

श्रीराम श्रीरंग नर नारायण और विन्दुमाधव के दिव्य स्वरूप
श्रीरंग, नर-नारायण, विन्दुमाधव और समापन

पद 57 — देहि सतसंग निज-अंग श्रीरंग! भवभंग-कारण शरण-शोकहारी।

देहि सतसंग निज-अंग श्रीरंग! भवभंग-कारण शरण-शोकहारी। ये तु भवदघ्रिपल्लव-समाश्रित सदा, भक्तिरत, विगतसंशय, मुरारी ॥१॥ असुर, सुर, नाग, नर, यक्ष, गंधर्व, खग, रजनिचर, सिद्ध, ये चापि अन्ने। संत-संसर्ग त्रेवर्गपर, परमपद, प्राप्य निप्राप्यगति त्वयि प्रसन्ने ॥२॥ वृत्र, बलि, बाण, प्रहलाद, मय, व्याध, गज, गृध्र, द्विजबन्धु निजधर्मत्यागी। साधुपद-सलिल-निर्धूत-कल्मष सकल, श्वपच-यवनादि कैवल्य-भागी ॥३॥ शांत, निरपेक्ष, निर्मम, निरामय, अगुण, शब्दब्रह्मैकपर, ब्रह्मज्ञानी। दक्ष, समदृक, स्वदृक, विगत अति स्वपरमति, परमरतिविरति तव चक्रपानी ॥४॥ विश्व-उपकारहित व्यग्रचित सर्वदा, त्यक्तमदमन्यु, कृत पुण्यरासी। यत्र तिष्ठन्ति, तत्रेव अज शर्व हरि सहित गच्छन्ति क्षीराब्धिवासी ॥५॥ वेद-पयसिंधु, सुविचार मंदरमहा, अखिल-मुनिवृंद निमर्थनकर्ता। सार सतसंगमुद् धृत्य इति निश्चिंतं वदति श्रीकृष्ण वैदर्भिभर्ता ॥६॥ शोक-संदेह, भय-हर्ष, तम-तर्षगण, साधु-सद्युक्ति विच्छेदकारी। यथा रघुनाथ-सायक निशाचर-चमू-निचय-निर्दलन-पटु-वेग-भारी ॥७॥ यत्र कुत्रापि मम जन्म निजकर्मवश भ्रमत जगजोनि संकट अनेकं। तत्र त्वद्भक्ति, सज्जन-समागम, सदा भवतु मे राम विश्राममेकं ॥८॥ प्रबल भव-जनित त्रैव्याधि-भैषज भगति, भक्त भैषज्यमद्वैतदरसी। संत-भगवंत अंतर निरंतर नहीं, किमपि मति मलिन कह दासतुलसी ॥९॥

शब्दार्थ

सतसंग = संतों का साथ; श्रीरंग = भगवान विष्णु का श्रीरंगनाथ स्वरूप; कैवल्य = मुक्ति।

सरल हिंदी अर्थ

श्रीरंगनाथ से सच्चे संतों का साथ देने की प्रार्थना है। पद बताता है कि सत्संग से मोह, संशय और नकारात्मक प्रवृत्तियों का क्षय होता है तथा भगवान के प्रति प्रेम बढ़ता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इस रचना में संगति का महत्त्व प्रमुख है। जैसे अच्छा वातावरण विचारों को उन्नत करता है, वैसे ही संतों की वाणी आत्मचिंतन और सेवा के लिए प्रेरित करती है। तुलसीदास का आग्रह किसी दिखावे का नहीं, सत्पुरुषों के गुण ग्रहण करने का है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 57/64

पद 58 — देहि अवलंब कर कमल, कमलारमन, दमन-दुख, शमन-संताप भारी।

देहि अवलंब कर कमल, कमलारमन, दमन-दुख, शमन-संताप भारी। अज्ञान-राकेश-ग्रासन विंधुतुद, गर्व-काम-करिमत्त-हरि, दूषणारी ॥१॥ वपुष ब्रह्माण्ड सुप्रवृत्ति लंका-दुर्ग, रचित मन दनुज मय-रूपधारी। विविध कोशौघ, अति रुचिर-मंदिर-निकर, सत्वगुण प्रमुख त्रेकटककारी ॥२॥ कुणप-अभिमान सागर भंयकर घोर, विपुल अवगाह, दुस्तर अपारं। नक्र रागादि-संकुल मनोरथ सकल, संग-संकल्प वीची-विकारं ॥३॥ मोह दशमौलि, तद्भ्रात अहँकार, पाकारिजित काम विश्रामहारी। लोभ अतिकाय, मत्सर महोदर दुष्ट, क्रोध पापिष्ठ-विबुधांतकारी ॥४॥ द्वेष दुर्मुख, दंभ खर अकंपन कपट, दर्प मनुजाद मद शूलपानी। अमितबल परम दुर्जय निशाचर-निकर सहित षडवर्ग गो-यातुधानी ॥५॥ जीव भवदंघ्रि-सेवक विभीषण बसत मध्य दुष्टाटवी ग्रसितचिंता। नियम-यम-सकल सुरलोक-लोकेश लंकेश-वश नाथ! अत्यंत भीता ॥६॥ ज्ञान-अवधेश-गृह गेहिनी भक्ति शुभ, तत्र अवतार भूभार-हर्ता। भक्त-संकष्ट अवलोकि पितु-वाक्य कृत गमन किय गहन वैदेहि-भर्ता ॥७॥ कैवल्य-साधन अखिल भालु मर्कट विपुल ज्ञान-सुग्रीवकृत जलधिसेतू। प्रबल वैराग्य दारुण प्रभंजन-तनय, विषय वन भवनमिव धूमकेतू ॥८॥ दुष्ट दनुजेश निर्वशकृत दासहित, विश्वदुख-हरण बोधैकरासी। अनुज निज जानकी सहित हरि सर्वदा दासतुलसी ह्रदय कमलवासी ॥९॥

शब्दार्थ

कमलारमन = लक्ष्मीपति विष्णु; मोह = अज्ञानजनित आसक्ति; षड्वर्ग = काम, क्रोध आदि छह आंतरिक शत्रु।

सरल हिंदी अर्थ

यह पद जीवन को लंका रूपक में प्रस्तुत करता है। मोह रावण, अहंकार अन्य दुष्ट पात्र और ज्ञान-भक्ति रामकथा के सहयोगी बनते हैं। कवि भगवान से इन आंतरिक बाधाओं पर विजय और हृदय में निवास की प्रार्थना करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

तुलसीदास की रूपक-योजना अत्यंत सूक्ष्म है: बाहरी युद्ध दरअसल मन के दोषों से संघर्ष को समझाता है। विवेक, वैराग्य, संयम और विश्वास मिलकर जीवन को व्यवस्थित करते हैं। इस दृष्टि से रामकथा आत्मशुद्धि की एक यात्रा भी बन जाती है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 58/64

पद 59 — दीन-उद्धरण रघुवर्य करुणाभवन शमन-संताप पापौघहारी।

दीन-उद्धरण रघुवर्य करुणाभवन शमन-संताप पापौघहारी। विमल विज्ञान-विग्रह, अनुग्रहरूप, भूपवर, विबुध, नर्मद, खरारी ॥१॥ संसार-कांतार अति घोर, गंभीर, घन, गहन तरुकर्मसंकुल, मुरारी। वासना वल्लि खर-कंटकाकुल विपुल, निबिड़ विटपाटवी कठिन भारी ॥२॥ विविध चितवृति-खग निकर श्येनोलूक, काक वक गृध्र आमिष-अहारी। अखिल खल, निपुण छल, छिद्र निरखत सदा, जीवजनपथिकमन-खेदकारी ॥३॥ क्रोध करिमत्त, मृगराज, कंदर्प, मद-दर्प वृक-भालु अति उग्रकर्मा। महिष मत्सर क्रूर, लोभ शूकररूप, फेरु छल, दंभ मार्जारधर्मा ॥४॥ कपट मर्कट विकट, व्याघ्र पाखण्डमुख, दुखद मृगव्रात, उत्पातकर्ता। ह्रदय अवलोकि यह शोक शरणागतं, पाहि मां पाहि भो विश्वभर्ता ॥५॥ प्रबल अहँकार दुरघट महीधर, महामोह गिरि-गुहा निबिड़ांधकारं। चित्त वेताल, मनुजाद मन, प्रेतगनरोग, भोगौघ वृश्चिक-विकारं ॥६॥ विषय-सुख-लालसा दंश-मशकादि, खल झिल्लि रूपादि सब सर्प, स्वामी। तत्र आक्षिप्त तव विषम माया नाथ, अंध मैं मंद, व्यालादगामी ॥७॥ घोर अवगाह भव आपगा पापजलपूर, दुष्प्रेक्ष्य, दुस्तर, अपारा। मकर षड्वर्ग, गो नक्र चक्राकुला, कूल शुभ-अशुभ, दुख तीव्र धारा ॥८॥ सकल संघट पोच शोचवश सर्वदा दासतुलसी विषम गहनग्रस्तं। त्राहि रघुवंशभूषण कृपा कर, कठिन काल विकराल-कलित्रास-त्रस्तं ॥९॥

शब्दार्थ

कांतार = घना जंगल; वृक = भेड़िया; पाखंड = दिखावटी धर्माचरण; त्राहि = रक्षा कीजिए।

सरल हिंदी अर्थ

संसार को एक कठिन वन बताया गया है, जिसमें काम, क्रोध, लोभ, अहंकार और छल अलग-अलग हिंसक जीवों के रूपक बनते हैं। भक्त इस वन से पार लगाने के लिए रघुनाथ को पुकारता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कवि का उद्देश्य संसार से घृणा पैदा करना नहीं, मन की छिपी कमजोरियों के प्रति सजग बनाना है। जब जीवन के रास्ते अस्पष्ट लगें, तब आत्मचिंतन और उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता होती है। इस पद की प्रार्थना विवेकशील, संयमित जीवन की ओर प्रेरित करती है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 59/64

पद 60 — नौमि नारायणं नरं करुणायनं, ध्यान-पारायणं, ज्ञान-मूलं।

नौमि नारायणं नरं करुणायनं, ध्यान-पारायणं, ज्ञान-मूलं। अखिल संसार-उपकार-कारण, सदयह्रदय, तपनिरत, प्रणतानुकूलं ॥१॥ श्याम नव तामरस-दामद्युति वपुष, छवि कोटि मदनार्क अगणित प्रकाशं। तरुण रमणीय राजीव-लोचन ललित, वदन राकेश, कर-निकस-हासं ॥२॥ सकल सौंदर्य-निधि, विपुल गुणधाम, विधि-वेद-बुध-शंभु-सेवित, अमानं। अरुण पदकंज-मकरंद मंदाकिनी मधुप-मुनिवृंद कुर्वन्ति पानं ॥३॥ शक्र-प्रेरित घोर मदन मद-भृगंकृत, क्रोधगत, बोधरत, ब्रह्मचारी। मार्केण्डय मुनिवर्यहित कौतुकी बिनहि कल्पांत प्रभु प्रलयकारी ॥४॥ पुण्य वन शैलसरि बद्रिकाश्रम सदासीन पद्मासनं, एक रूपं। सिद्ध-योगीन्द्र-वृंदारकानंदप्रद, भद्रदायक दरस अति अनूपं ॥५॥ मान मनभंग, चितभंग, मद, क्रोधा लोभादि पर्वतदुर्ग, भुवन-भर्त्ता। द्वेष-मत्सर-राग प्रबल प्रत्यूह प्रति, भूरि निर्दय, क्रूर कर्म कर्त्ता ॥६॥ विकटतर वक्र क्षुरधार प्रमदा, तीव्र दर्प कंदर्प खर खड्गधारा। धीर-गंभीर-मन-पीर-कारक, तत्र के वराका वयं विगतसारा ॥७॥ परम दुर्घट पथं खल-असंगत साथ, नाथ! नहिं हाथ वर विरति-यष्टी। दर्शनारत दास, त्रसित माया-पाश, त्राहि हरि, त्राहि हरि, दास कष्टी ॥८॥ दासतुलसी दीन धर्म-संबलहीन, श्रमित अति, खेद, मति मोह नाशी। देहि अवलंब न विलंब अंभोज-कर, चक्रधर-तेजबल शर्मराशी ॥९॥

शब्दार्थ

नर-नारायण = बदरिकाश्रम से जुड़े दिव्य तपस्वी स्वरूप; तपनिरत = तप में स्थित; विरति = वैराग्य।

सरल हिंदी अर्थ

नर-नारायण की महिमा, बदरिकाश्रम की तपोभूमि, उनका ध्यान तथा शरणागत के लिए करुणा वर्णित है। तुलसीदास मन के दोषों से रक्षा के लिए भगवान का सहारा चाहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

तप और ज्ञान यहाँ केवल कठिन अभ्यास नहीं हैं; उनका फल मन की स्थिरता तथा सदाचार है। जीवन में लोभ, क्रोध और आसक्ति जैसे अवरोधों से संघर्ष करते समय अनुशासन, विवेक और सत्संग आवश्यक हैं। पद इस साधना को प्रार्थना से जोड़ता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 60/64

पद 61 — सकल सुखकंद, आनंदवन-पुण्यकृत, बिंदुमाधव द्वंद्व-विपतिहारी।

सकल सुखकंद, आनंदवन-पुण्यकृत, बिंदुमाधव द्वंद्व-विपतिहारी। यस्यांघ्रिपाथोज अज-शंभु-सनकादि-शुक-शेष-मुनिवृंद-अलि-निलयकारी ॥१॥ अमल मरकत श्याम, काम शतकोटि छवि, पीतपट तड़ित इव जलदनीलं। अरुण शतपत्र लोचन, विलोकनि चारू, प्रणतजन-सुखद, करुणार्द्रशीलं ॥२॥ काल-गजराज-मृगराज, दनुजेश-वन-दहन पावक, मोह-निशि-दिनेशं। चारिभुज चक्र-कौमोदकी-जलज-दर, सरसिजोपरि यथा राजहंस ॥३॥ मुकुट, कुंडल, तिलक, अलक अलिव्रातइव, भृकुटि, द्विज, अधरवर, चारुनासा। रुचिर सुकपोल, दर ग्रीव सुखसीव, हरि, इंदुकर-कुंदमिव मधुरहासा ॥४॥ उरसि वनमाल सुविशाल नवमंजरी, भ्राज श्रीवत्स-लांछन उदारं। परम ब्रह्मन्य, अतिधन्य, गतमन्यु, अज, अमितबल, विपुल महिमा अपारं ॥५॥ हार-केयूर, कर कनक कंकन रतन-जटित मणि-मेखला कटिप्रदेशं। युगल पद नूपुरामुखर कलहंसवत, सुभग सर्वांग सौन्दर्य वेशं ॥६॥ सकल सौभाग्य-संयुक्त त्रेलोक्य-श्री दक्षि दिशि रुचिर वारीश-कन्या। बसत विबुधापगा निकट तट सदनवर, नयन निरखंति नर तेऽति धन्या ॥७॥ अखिल मंगल-भवन, निबिड़ संशय-शमन दमन-वृजिनाटवी, कष्टहर्त्ता। विश्वधृत, विश्वहित, अजित, गोतीत, शिव, विश्वपालन, हरण, विश्वकर्त्ता ॥८॥ ज्ञान-विज्ञान-वैराग्य-ऐश्वर्य-निधि, सिद्धि अणिमादि दे भूरिदानं। ग्रसित-भव-व्याल अतित्रास तुलसीदास, त्राहि श्रीराम उरगारि-यानं ॥९॥

शब्दार्थ

बिंदुमाधव = काशी में पूजित विष्णु स्वरूप; कौमोदकी = विष्णु की गदा; पीतपट = पीले वस्त्र।

सरल हिंदी अर्थ

भगवान बिन्दुमाधव के मेघश्याम रूप, कमलनयन, चार भुजाओं, शंख-चक्र-गदा-पद्म और करुणामय स्वभाव की स्तुति है। कवि उन्हें संकट हरने वाला और भक्ति का आधार मानते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

काशी के इस वैष्णव स्वरूप की वंदना पूरे संग्रह के व्यापक धार्मिक समन्वय का परिचय देती है। भगवान की रूप-माधुरी अंततः गुण-स्मरण और ज्ञान की प्रेरणा बनती है। तुलसीदास अपने लिए रक्षा और आध्यात्मिक आश्रय की कामना करते हैं।

↑ विषय-सूची  ·  पद 61/64

पद 62 — इहै परम फलु, परम बड़ाई।

इहै परम फलु, परम बड़ाई। नखसिख रुचिर बिंदुमाधव छबि निरखहिं नयन अघाई ॥१॥ बिसद किसोर पीन सुंदर बपु, श्याम सुरुचि अधिकाई। नीलकंज, बारिद, तमाल, मनि, इन्ह तनुते दुति पाई ॥२॥ मृदुल चरन शुभ चिन्ह, पदज, नख अति अभूत उपमाई। अरुन नील पाथोज प्रसव जनु, मनिजुत दल-समुदाई ॥३॥ जातरूप मनि-जटित-मनोहर, नूपुर जन-सुखदाई। जनु हर-उर हरि बिबिध रूप धरि, रहे बर भवन बनाई ॥४॥ कटितट रटति चारु किंकिनि-रव, अनुपम, बरनि न जाई। हेम जलज कल कलित मध्य जनु, मधुकर मुखर सुहाई ॥५॥ उर बिसाल भृगुचरन चारु अति, सूचत कोमलताई। कंकन चारु बिबिध भूषन बिधि, रचि निज कर मन लाई ॥६॥ गज-मनिमाल बीच भ्राजत कहि जाति न पदक निकाई। जनु उडुगन-मंडल बारिदपर, नवग्रह रची अथाई ॥७॥ भुजगभोग-भुजदंड कंज दर चक्र गदा बनि आई। सोभासीव ग्रीव, चिबुकाधर, बदन अमित छबि छाई ॥८॥ कुलिस, कुंद-कुडमल, दामिनि-दुति, दसनन देखि लजाई। नासा-नयन-कपोल, ललित श्रुति कुंडल भ्रू मोहि भाई ॥९॥ कुंचित कच सिर मुकुट, भाल पर, तिलक कहौं समुझाई। अलप तड़ित जुग रेख इंदु महँ, रहि तजि चंचलताई ॥१०॥ निरमल पीत दुकुल अनूपम, उपमा हिय न समाई। बहु मनिजुत गिरि नील सिखरपर कनक-बसन रुचिराई ॥११॥ दच्छ भाग अनुराग-सहित इंदिरा अधिक ललिताई। हेमलता जनु तरु तमाल ढिग, नील निचोल ओढ़ाई ॥१२॥ सत सारदा सेष श्रुति मिलिकै, सोभा कहि न सिराई। तुलसिदास मतिमंद द्वंदरत कहै कौन बिधि गाई ॥१३॥

शब्दार्थ

नखसिख = सिर से पाँव तक; दुकुल = रेशमी वस्त्र; इंदिरा = माता लक्ष्मी।

सरल हिंदी अर्थ

कवि बिन्दुमाधव का नख-शिख सौंदर्य-वर्णन करते हैं—चरण, नूपुर, कमर, आभूषण, चार भुजाएँ, मुख, मुकुट और पास विराजती लक्ष्मी की शोभा का चित्रण है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इस पद की कला अत्यंत दृश्यात्मक है। रंग, रत्न, कमल, मेघ और बिजली के अनेक उपमान मिलकर ध्यान का भाव जगाते हैं। भक्त की दृष्टि सौंदर्य पर ठहरकर धीरे-धीरे भगवान के गुण और दया के अनुभव की ओर बढ़ती है।

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पद 63 — मन इतनोई या तनुको परम फलु।

मन इतनोई या तनुको परम फलु। सब अँग सुभग बिंदुमाधव-छबि, तजि सुभाव, अवलोकु एक पलु ॥१॥ तरुन अरुन अंभोज चरन मृदु, नख-दुति ह्रदय-तिमिर-हारी। कुलिस-केतु-जव-जलज रेख बर, अंकुस मन-गज-बसकारी ॥२॥ कनक-जटित मनि नूपुर, मेखल, कटि-तट रटति मधुर बानी। त्रिबली उदर, गँभीर नाभि सर, जहँ उपजे बिरंचि ग्यानी ॥३॥ उर बनमाल, पदिक अति सोभित, बिप्र-चरन चित कहँ करषै। स्याम तामरस-दाम-बरन बपु पीत बसन सोभा बरषै ॥४॥ कर कंकन केयूर मनोहर, देति मोद मुद्रिक न्यारी। गदा कंज दर चारु चक्रधर, नाग-सुंड-सम भुज चारी ॥५॥ कंबुग्रीव, छबिसीव चिबुक द्विज, अधर अरुन, उन्नत नासा। नव राजीव नयन, ससि आनन, सेवक-सुखद बिसद हासा ॥६॥ रुचिर कपोल, श्रवन कुंडल, सिर मुकुट, सुतिलक भाल भ्राजै। ललित भृकुटि, सुंदर चितवनि, कच निरखि मधुप-अवली लाजे ॥७॥ रूप-सील-गुन-खानि दच्छ दिसि, सिंधु-सुता रत-पद-सेवा। जाकी कृपा-कटाच्छ चहत सिव, बिधि, मुनि, मनुज, दनुज, देवा ॥८॥ तुलसिदास भव-त्रास मिटै तब, जब मति येहि सरूप अटकै। नाहिंत दीन मलीन हीनसुख, कोटि जनम भ्रमि भ्रमि भटकै ॥९॥

शब्दार्थ

अवलोकु = देखो; चक्रधर = चक्र धारण करने वाले; सिंधुसुता = समुद्र से प्रकट लक्ष्मी।

सरल हिंदी अर्थ

मन को समझाया जाता है कि शरीर और इंद्रियों का श्रेष्ठ उपयोग भगवान बिन्दुमाधव का दर्शन और गुण-स्मरण है। उनके चरण से मुकुट तक की मनोहर छवि तथा लक्ष्मीजी की सेवा का वर्णन है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद मन के बिखराव को एक पवित्र केंद्र देने की साधना है। लगातार बाहरी आकर्षणों में उलझने के स्थान पर मन को दया, सौंदर्य और विवेक के आदर्श पर लगाना इसका भाव है। रूप-स्मरण आत्मिक स्थिरता तथा विनम्रता के लिए सहायक माना गया है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 63/64

पद 64 — बंदौ रघुपति करुना-निधान। जाते छूटै भव-भेद-ग्यान ॥१॥

बंदौ रघुपति करुना-निधान। जाते छूटै भव-भेद-ग्यान ॥१॥ रघुबंस-कुमुद-सुखप्रद निसेस। सेवत पद-पंकज अज महेस ॥२॥ निज भक्त-ह्रदय-पाथोज-भृंग। लावन्य बपुष अगनित अनंग ॥३॥ अति प्रबल मोह-तम-मारतंड। अग्यान-गहन-पावक प्रचंड ॥४॥ अभिमान-सिंधु-कुंभज उदार। सुररंजन, भंजन भूमिभार ॥५॥ रागादि-सर्पगन-पन्नगारि। कंदर्प-नाग-मृगपति, मुरारि ॥६॥ भव-जलधि-पोत चरनारबिंद। जानकी-रवन आनंद-कंद ॥७॥ हनुमंत-प्रेम-बापी-मराल। निष्काम कामधुक गो दयाल ॥८॥ त्रेलोक-तिलक, गुनगहन राम। कह तुलसिदास बिश्राम-धाम ॥९॥

शब्दार्थ

रघुपति = श्रीराम; करुना-निधान = करुणा के भंडार; भव-जलधि = संसार-सागर; विश्राम-धाम = शांति का आश्रय।

सरल हिंदी अर्थ

अंतिम पद में भगवान श्रीराम की करुणा, भक्तों के प्रति प्रेम, अज्ञान को मिटाने वाले प्रकाश और संसाररूपी सागर से पार लगाने वाले चरणों का वंदन है। तुलसीदास उन्हें अंततः विश्राम का धाम कहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

आरंभ की गणेश-स्तुति से चलकर यह संग्रह फिर श्रीराम में विश्रांति पाता है। विविध देवी-देवता, तीर्थ, संत, अनुज और अवतार की वंदना का सूत्र रामप्रेम है। इसी कारण पद 64 अगले खंड के रामनाम-जप और आगे की विनय के लिए सुंदर पुल का काम करता है।

↑ विषय-सूची  ·  पद 64/64
विनय पत्रिका 64 पद का संग्रह पढ़ने का आमंत्रण भक्ति भावना
विनय पत्रिका पद १–६४ : संपूर्ण पाठ और हिंदी भावार्थ — भक्ति भावना

🌺 जय श्री सीताराम 🌺

संपूर्ण मंगल वंदना और देवस्तुति संग्रह यहीं पूर्ण होता है। अगले भाग में पद ६५ से आगे रामनाम और आत्मनिवेदन की भक्ति-यात्रा पढ़ेंगे।

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