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श्री विनय पत्रिका भाग 6 — राम-प्रेम, करुणा और मन को उपदेश | पद 171–203 हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना प्रस्तुत • संत साहित्य एवं भक्ति ग्रंथ संग्रह गोस्वामी तुलसीदास कृत • संपूर्ण विनय पत्रिका श्रृंखला श्री विनय पत्रिका — भाग ६ : राम-प्रेम, करुणा और मन को उपदेश पद १७१ से २०३ — मूल अवधी पाठ, कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और विस्तृत भावार्थ प्रभु के चरणों में अपनी गलतियों को स्वीकारते तुलसीदास, संतों के समान जीवन की इच्छा, रामनाम का भरोसा, संसार की अनित्यता और परोपकार का मार्ग—इस विस्तृत भाग में मूल क्रम से तैंतीस पद प्रस्तुत हैं। अंतिम पद २०३ की पूर्ण तिथि-आधारित उपदेशावली भी शामिल है। पद १७१–२०३ संपूर्ण ३३ पद ५ विषय-खंड बिना फोटो • हल्की HTML भाग १ : परिचय भाग २ : पद १–६४ भाग ३ : पद ६५–१०० भाग ४ : पद १०१–१३४ भाग ५ : पद १३५–१७० विषय-सूची ↓ पाठकों के लिए: प्रत्येक पद में पहले मूल पाठ, फिर कठिन शब्दार्थ, आसान हिंदी अर्थ और अलग भावार्थ दिया गया है। मूल भाषा अवधी/ब्रज-प्रभावित है, इसलिए कुछ शब्द आधुनिक हिंदी से अलग हैं। अलग संस्करणों में पाठांतर संभव हैं। परंपरागत काव्य-उपमाओं को उसी धार्मिक-साहित्यिक संदर्भ में पढ़ें। 📖 संपूर्ण विषय-सूची — पद १७१ से २०३ पद १७१–१७७ ...

श्री विनय पत्रिका भाग 5 — सत्संग, दीनता, रामनाम और श्रीराम प्रेम | पद 135–170 हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना प्रस्तुत • संत साहित्य एवं भक्ति ग्रंथ संग्रह गोस्वामी तुलसीदास कृत • संपूर्ण विनय पत्रिका श्रृंखला श्री विनय पत्रिका — भाग ५ : सत्संग, दीनता, रामनाम और श्रीराम प्रेम पद १३५ से १७० — मूल अवधी पाठ, शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ एवं विस्तृत भावार्थ कभी मन को आत्मचिंतन की ओर बुलाती विनय, कभी प्रभु के चरण-कमलों की करुणा माँगता भक्त, तो कभी श्रीराम नाम का भरोसा—इस भाग में तुलसीदास जी के छत्तीस पद एक ही क्रमबद्ध पाठ में प्रस्तुत हैं। पद १३५–१७० संपूर्ण ३६ पद ५ विषय-खंड बिना चित्र • तेज़ लोडिंग भाग १ : परिचय भाग २ : पद १–६४ भाग ३ : पद ६५–१०० भाग ४ : पद १०१–१३४ विषय-सूची ↓ पढ़ने की विधि: हर पद के पहले पूरा मूल पाठ पढ़ें, फिर कठिन शब्द, सरल हिंदी अर्थ और भावार्थ समझें। मूल पद की अवधी वर्तनी आधुनिक हिंदी से अलग हो सकती है; व्याख्या हमारी अपनी सरल हिंदी में दी गई है। पद १३५ और १३६ लंबे हैं, उन्हें भी नहीं काटा गया है। 📖 संपूर्ण विषय-सूची — पद १३५ से १७० पद १३५–१४० : भक्त का आत्मबोध, सत्संग और लोकहित पद १४१–१४७ : दीनता, पश्चात्ताप और प्रभु-कृपा की पुकार पद १४८–१५४ : अनन्य शर...