श्री विनय पत्रिका भाग 6 — राम-प्रेम, करुणा और मन को उपदेश | पद 171–203 हिंदी अर्थ सहित

भक्ति भावना प्रस्तुत • संत साहित्य एवं भक्ति ग्रंथ संग्रह
गोस्वामी तुलसीदास कृत • संपूर्ण विनय पत्रिका श्रृंखला

श्री विनय पत्रिका — भाग ६ : राम-प्रेम, करुणा और मन को उपदेश

पद १७१ से २०३ — मूल अवधी पाठ, कठिन शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और विस्तृत भावार्थ

प्रभु के चरणों में अपनी गलतियों को स्वीकारते तुलसीदास, संतों के समान जीवन की इच्छा, रामनाम का भरोसा, संसार की अनित्यता और परोपकार का मार्ग—इस विस्तृत भाग में मूल क्रम से तैंतीस पद प्रस्तुत हैं। अंतिम पद २०३ की पूर्ण तिथि-आधारित उपदेशावली भी शामिल है।

पद १७१–२०३संपूर्ण ३३ पद५ विषय-खंडबिना फोटो • हल्की HTML
पाठकों के लिए: प्रत्येक पद में पहले मूल पाठ, फिर कठिन शब्दार्थ, आसान हिंदी अर्थ और अलग भावार्थ दिया गया है। मूल भाषा अवधी/ब्रज-प्रभावित है, इसलिए कुछ शब्द आधुनिक हिंदी से अलग हैं। अलग संस्करणों में पाठांतर संभव हैं। परंपरागत काव्य-उपमाओं को उसी धार्मिक-साहित्यिक संदर्भ में पढ़ें।

📖 संपूर्ण विषय-सूची — पद १७१ से २०३

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पद १७१ — कीजै मोको जमजातनामई पद १७२ — कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो पद १७३ — नाहिंन आवत आन भरोसो पद १७४ — जाके प्रिय न राम बैदेही पद १७५ — जो पै रहनि राम सों नाहीं पद १७६ — राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेह न नातो पद १७७ — जो तुम त्यागों राम हौं तौं नहीं त्यागो पद १७८ — भए हूँ उदास राम मेरे आस रावरी पद १७९ — कहाँ जाउँ? कासों कहौ? कौन सुनै दीन की? त्रिभुव पद १८० — बारक बिलोकि बलि कीजै मोहिं आपनो पद १८१ — केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिए पद १८२ — नाथ-गुननाथ सुनि होत चित चाउ सो पद १८३ — राम प्रीति की रीति आप नीके जनियत है पद १८४ — राम-नाम के जपे जाइ जिय की जरनि पद १८५ — लाज न लागत दास कहावत पद १८६ — कौन जतन बिनती करिए पद १८७ — ताहि तें आयो सरन सबेरे पद १८८ — मैं तोहिं अब जान्यो, संसार! बाँधि न सकहिं मोहि पद १८९ — राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु, भाई रे पद १९० — सहज सनेही राम सों तैं कियो न सहज सनेह पद १९१ — एक सनेही साँचिलो केवल कोसलपालु पद १९२ — जो पै जानकी नाथ सों नातो नेह न नीच पद १९३ — अजहुँ आपने राम के करतब समुझत हित होइ पद १९४ — जो अनुराग न राम सनेही सों पद १९५ — बलि जाउँ हौं राम गुसाईं पद १९६ — काहे को फिरत मन करत बहु जतन, मिटै न दुख बिमुख पद १९७ — नाहिन चरन-रति ताहि तें सहौं बिपति, कहत स्रुति पद १९८ — मन पछितैहै अवसर बीते पद १९९ — काहे को फिरत मूढ़ मन धायो पद २०० — ताँबे सो पीठि मनहुँ तन पायो पद २०१ — लाभ कहा मानुष तनु पाए पद २०२ — काज कहा नरतनु धरि सार्‍यो पद २०३ — श्रीहरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान

श्री विनय पत्रिका भाग ६ का परिचय

गोस्वामी तुलसीदास की विनय पत्रिका में भक्ति केवल गुणगान का विषय नहीं है। कई पदों में कवि अपने मन के सामने प्रश्न रखते हैं: प्रभु की कृपा याद रहते हुए भी आचरण क्यों नहीं सुधरता? मन बार-बार अस्थायी आकर्षणों की ओर क्यों जाता है? कठिन घड़ी में किसका सहारा लिया जाए? इन प्रश्नों से आरंभ होने वाला यह भाग धीरे-धीरे श्रीराम-प्रेम, सत्संग, जीवन की नश्वरता और परोपकार पर गहरा चिंतन प्रस्तुत करता है।

पद १७२ में मन-वचन-कर्म से परहित, संतोष और कटु वचन सहने की साधना अत्यंत स्पष्ट है। पद १८४ में रामनाम और मन की शांति का संबंध उभरता है। पद २०१–२०२ दुर्लभ मानव जीवन का मूल्य परोपकार और संयम में खोजते हैं। अंतिम पद २०३ में तिथियों की प्रतीकात्मक शृंखला द्वारा साधना को एक सुंदर आध्यात्मिक उत्सव में बदल दिया गया है।

इन पदों में जब संसार या मन को कठोर शब्द कहे जाते हैं, उन्हें आत्मचिंतन के काव्यात्मक संबोधन के रूप में समझें, किसी दूसरे व्यक्ति के अपमान या परिवार के प्रति उपेक्षा के निर्देश के रूप में नहीं। रामकथा के प्रसंग भक्ति-परंपरा के सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक उदाहरण हैं।

खंड • पद १७१ से १७७

आत्मस्वीकार, संत-आचरण और अनन्य रामनिष्ठा

प्रभु के उपकारों का स्मरण, संतोष, परोपकार और अपने जीवन के सही लक्ष्य की खोज।

पद १७१ — कीजै मोको जमजातनामई

कीजै मोको जमजातनामई। राम! तुमसे सुचि सुहृद साहिबहिं मैं सठ पीठि दई॥ गरभबास दस मास पालि पितु-मातु-रूप हित कीन्हों। जड़हिं बिबेक, सुसील खलहिं, अपराधिहिं आदर दीन्हों॥ कपट करौं अंतरजामिहुँ सों, अघ ब्यापकहिं दुरावौं। ऐसेहु कुमति कुसेवक पर रघुपति न कियो मन बावौं॥ उदर भरौं किंकर कहाइ, बेंच्यौं बिषयनि हाथ हियो है। मोसे बंचक को कृपालु छल छाँड़ि कै छोह कियो है॥ पल-पल के उपकार रावरे जानि बूझि सुनि नीके। भिद्यो न कुलिसहुँ ते कठोर चित कबहुँ प्रेम सिय-पी के॥ स्वामी की सेवक-हितता सब, कछु निज साँई-द्रोहाई। मैं मति-तुला तौलि देखी भइ मेरिहि दिसि गरूआई॥ एतेहु पर हित करत नाथ मेरो, करि आयो अरु करिहैं। तुलसी अपनी ओर जानियत प्रभुहि कनौड़ो भरिहैं॥
कठिन शब्दों का अर्थ

जमजातनामई = यम के दंड का भागी; सुहृद = हितैषी; अंतरजामी = मन की बात जानने वाले; किंकर = सेवक; कनौड़ो = ऋणी।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास स्वीकार करते हैं कि उन्होंने उन श्रीराम की ओर से पीठ फेर ली, जिन्होंने माता-पिता के माध्यम से पालन किया और गलतियों पर भी करुणा बनाए रखी। कवि स्वयं को कपटी सेवक कहते हैं क्योंकि वह प्रभु को सब जानने वाला मानकर भी उनसे बातें छिपाने का प्रयास करता रहा। हर क्षण मिले उपकारों के सामने उसका अपना व्यवहार तुच्छ लगता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद कठोर आत्मस्वीकार के साथ कृतज्ञता का गीत है। साधक को अपने जीवन के सहारे, अवसर और दूसरों की कृपा को याद करना चाहिए। केवल पूजा का नाम लेना काफी नहीं; अपने आचरण से भी उस विश्वास के योग्य बनने की कोशिश करनी चाहिए।

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पद १७२ — कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो

कबहुँक हौं यहि रहनि रहौंगो। श्री रघुनाथ-कृपालु-कृपा ते संत सुभाव गहौंगो॥ यथालाभ संतोष सदा काहू सों कछु न चहौंगो। पर-हित-निरत निरंतर मन क्रम बचन नेम निबहौंगो॥ परुष-बचन अति दुसह स्रवन सुनि तेहि पावक न दहौंगो। बिगत मान सम सीतल मन, पर-गुन, नहिं दोष कहौंगो॥ परहरि देह-जनित चिंता, दुख-सुख समबुद्धि सहौंगो। तुलसिदास प्रभु यहि पथ रहि अबिचल हरि-भगति लहौंगो॥
कठिन शब्दों का अर्थ

रहनि = जीवन-आचरण; यथालाभ = जितना सहज मिले; परुष-बचन = कटु वचन; बिगत मान = अहंकाररहित; समबुद्धि = सुख-दुःख में सम दृष्टि।

सरल हिंदी अर्थ

कवि पूछते हैं कि कब वह संतों जैसा जीवन जी पाएँगे। वे अपनी आवश्यकताओं में संतोष, मन-वचन-कर्म से परोपकार, कटु बात सुनकर भी संयम, दूसरों के गुण देखना और सुख-दुःख को संतुलन से सहना चाहते हैं। उनकी प्रार्थना है कि श्रीराम की कृपा से ऐसी स्थिर भक्ति मिले।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह विनय पत्रिका का अत्यंत व्यावहारिक पद है। संतत्व को बाहरी वेश नहीं, बल्कि संतोष, सेवा, विनय और मन की शांति के रूप में देखा गया है। किसी के दोषों पर टिके रहने के बजाय उसके गुण पहचानना रोज़ की साधना बन सकता है।

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पद १७३ — नाहिंन आवत आन भरोसो

नाहिंन आवत आन भरोसो। यहि कलिकाल सकल साधनतरु है स्रम-फलनि फरो सो॥ तप, तीरथ, उपवास, दान, मख जेहि जो रुचै करो सो। पाएहि पै जानिबो करम-फल, भरि-भरि बेद परोसो॥ आगम-बिधि, जप, जाग करत नर सरत न काज खरो सो। सुख सपनेहुँ न जोग-सिधि-साधन, रोग बियोग धरो सो॥ काम, क्रोध, मद, लोभ, मोह मिलि ज्ञान बिराग हरो सो। बिगरत मन संन्यास लेत जल नावत आम घरो सो॥ बहु मत मुनि बहु पंथ पुराननि जहाँ-तहाँ झगरो सो। गुरु कह्यो राम-भजन नीको मोंहि लगत राज-डगरो सो॥ तुलसी बिनु परतीती प्रीति फिरि-फिरि पचि मरै मरो सो। रामनाम-बोहित भव-सागर, चाहै तरन तरो सो॥
कठिन शब्दों का अर्थ

साधनतरु = साधना का वृक्ष; आगम = धार्मिक शास्त्र; बिराग = वैराग्य; राज-डगर = सीधा और खुला मार्ग; बोहित = नाव।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास कहते हैं कि विविध साधन और वाद-विवाद देखकर उनका भरोसा सरल रामभजन में टिक गया है। तप, तीर्थ, दान, योग तथा अनेक मतों का सम्मान करते हुए भी वह अपने लिए गुरु द्वारा दिखाए गए प्रेम और विश्वास से युक्त रामनाम के मार्ग को सहज समझते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पद की शिक्षा यह नहीं कि दूसरे साधकों की राह का अनादर किया जाए। कवि अपने अनुभव में भक्ति की सरलता को प्रधान बताते हैं: अभ्यास तब सार्थक है जब उसमें विश्वास, प्रेम, विनम्रता और जीवन की दिशा बदलने की इच्छा हो।

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पद १७४ — जाके प्रिय न राम बैदेही

जाके प्रिय न राम बैदेही। सो छाँड़िए कोटि बैरी सम जद्यपि परम सनेही॥ तज्यो पिता प्रहलाद, बिभीषन बंधु, भरत महतारी। बलि गुरु तज्यो, कंत ब्रज-बनितन्हि, भए मुद-मंगलकारी॥ नाते नेह राम के मनियत सुहृद सुसेब्य जहाँ लौं। अंजन कहा आँखि जेहि फूटै बहुतक कहौं कहाँ लौं॥ तुलसि सो सब भाँति परम हित पुँजी प्रानते प्यारो। जासों होय सनेह राम-पद, एतो मतो हमारो॥
कठिन शब्दों का अर्थ

बैदेही = माता सीता; परम सनेही = बहुत प्रिय; सुसेब्य = सेवा योग्य; अंजन = आँख में लगाया जाने वाला काजल।

सरल हिंदी अर्थ

कवि ऐसे संग से सावधान करते हैं जो श्रीराम और सीता के प्रति प्रेम को नष्ट कर दे। वे प्रह्लाद, विभीषण, भरत, बलि और गोपियों के उदाहरणों से बताते हैं कि आध्यात्मिक निष्ठा कभी-कभी कठिन निर्णय की माँग करती है। अंत में वही संबंध प्रिय बताया जाता है जो रामचरणों से प्रेम बढ़ाए।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इसे परिवार या समाज के प्रति द्वेष की आज्ञा न समझें। भक्ति-काव्य की कठोर उपमा का भाव है—अपने नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य न बेचें। जो संगति सत्य, करुणा और सदाचार बढ़ाती है, उसे अपनाना अधिक उचित है।

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पद १७५ — जो पै रहनि राम सों नाहीं

जो पै रहनि राम सों नाहीं। तौ नर खर कूकर सूकर सम बृथा जियत जग माहीं॥ काम, क्रोध, मद, लोभ, नींद, भय, भूख, प्यास सबही के। मनुज देह सुर-साधु सराहत सो सनेह सिय-पी के॥ सूर, सुजान, सुपूत सुलच्छन गनियत गुन गरुआई। बिनु हरिभजन इँनारुन के फल तजत नहीं करुआई॥ कीरति, कुल, करतूति, भूति भलि, सील, सरूप सलोने। तुलसी प्रभु-अनुराग-रहित जस सालन साग अलोने॥
कठिन शब्दों का अर्थ

रहनि = आचरण; बृथा = व्यर्थ; सुलच्छन = अच्छे लक्षणों वाला; गरुआई = महिमा; अलोने = नमकविहीन।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि मनुष्य की प्रशंसा केवल बल, विद्या, कुल और रूप से पूरी नहीं होती। उनका विश्वास है कि प्रेममय भक्ति के बिना जीवन की बहुत-सी उपलब्धियाँ स्वादहीन भोजन जैसी प्रतीत होती हैं। मनुष्य होने का विशेष अवसर उसे उच्च आदर्श चुनने के लिए मिला है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

काव्य की तीखी पशु-उपमाएँ आत्मजागरण के लिए हैं, किसी व्यक्ति की गरिमा कम करने के लिए नहीं। धन, प्रतिष्ठा और योग्यता मूल्यवान हो सकते हैं; भक्त का आग्रह है कि उनमें सद्भाव और प्रभु-स्मरण का रस भी जुड़ा रहे।

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पद १७६ — राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेह न नातो

राख्यो राम सुस्वामी सों नीच नेह न नातो। एते अनादर हूँ तोहि ते न हातो॥ जोरे नए नाते नेह फोकट फीके। देह के दाहक, गाहक जी के॥ अपने-अपने को सब चाहत नीको। मूल दुहुँ को दयालु दूलह सी को॥ जीव को जीवन, प्रान को प्यारो। सुखहू को सूख राम सो बिसारो॥ कियो, करैगो तोसे खल को भलो। ऐसे सुसाहब सों तू कुचाल क्यौं चलो॥ तुलसी तेरी भलाई अजहूँ बूझै। राढ़उ राउत होत फिरि कै जूझै॥
कठिन शब्दों का अर्थ

सुस्वामी = उत्तम स्वामी; फोकट = खोखले; गाहक = लेने वाले; दूलह सी को = सीताजी के पति; राउत = सेवक/योद्धा।

सरल हिंदी अर्थ

कवि अपने मन को डाँटते हैं कि उसने श्रीराम जैसे हितकारी प्रभु से स्नेह नहीं रखा और क्षणिक स्वार्थ के रिश्तों को बहुत बड़ा समझ लिया। श्रीराम को वे प्राणों के प्रिय तथा सुख के भी मूल सुख के रूप में याद करते हैं। वे कहते हैं कि अब भी मन को सही मार्ग चुनना चाहिए।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद संबंध-विरोध नहीं, आसक्ति की परीक्षा है। जीवन के रिश्तों का सम्मान करते हुए भी मनुष्य को अपना विवेक किसी स्वार्थी लालच के हवाले नहीं करना चाहिए। प्रेम और दायित्व के पीछे स्थित स्थायी मूल्यों को पहचानना ही इसका संकेत है।

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पद १७७ — जो तुम त्यागों राम हौं तौं नहीं त्यागो

जो तुम त्यागों राम हौं तौं नहीं त्यागो। परिहरि पाँय काहि अनुरागों॥ सुखद सुप्रभु तुम सों जग माहीं। स्रवन-नयन मन गोचर नाहीं॥ हौं जड़ जीव, ईस रघुराया। तुम मायापति, हौं बस माया॥ हौं तो कुजाचक, स्वामी सुदाता। हौं कुपूत, तुमहीं पितु माता॥ जौ पै कहुँ कोउ बूझत बातो। तौ तुलसी बिनु मोल बिकातो॥
कठिन शब्दों का अर्थ

परिहरि = छोड़कर; गोचर = अनुभव में आने वाला; मायापति = माया के स्वामी; कुजाचक = अयोग्य याचक; कुपूत = भटका हुआ पुत्र।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास भगवान से कहते हैं—यदि आप मुझे छोड़ दें तो भी मैं आपके चरण नहीं छोड़ूँगा। वे स्वयं को सीमित जीव और श्रीराम को अपना पिता-माता तथा उदार आश्रयदाता मानते हैं। यह सेवक की ओर से अनन्य निष्ठा की सीधी घोषणा है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

सच्ची शरणागति का अर्थ भय से चिपकना नहीं, बल्कि प्रेम और भरोसे पर टिकना है। यह पद प्रतिकूल समय में भी अपने चुने हुए श्रेष्ठ आदर्श से जुड़े रहने और मन में आशा बनाए रखने की प्रेरणा देता है।

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खंड • पद १७८ से १८४

करुणा की पुकार और रामनाम का विश्वास

जटायु, शबरी, केवट एवं रामचरित से लेकर नाम-स्मरण की आत्मिक शक्ति तक।

पद १७८ — भए हूँ उदास राम मेरे आस रावरी

भए हूँ उदास राम मेरे आस रावरी। आरत स्वारथी सब कहैं बात बावरी॥ जीवन को दानी घन कहा ताहि चाहिए। प्रेम नेम के निबाहे चातक सराहिए॥ मीन तें न लाभ-लेस पानी पुन्य-पीन को? जल बिनु थल कहा मीचु बिनु मीन को?॥ बड़े ही की ओट, बलि बाँचि आए छोटे हैं। चलत खरे के संग जहाँ तहाँ खोटे हैं॥ यहि दरबार भलो दाहिनेहु-बाम को। मोको सुभदायक भरोसो राम-नाम को॥ कहत नसानी ह्वैहै हिये नाथ नीकी है। जानत कृपानिधान तुलसी के जी की है॥
कठिन शब्दों का अर्थ

रावरी = आपकी; चातक = वर्षाजल की प्रतीक्षा करने वाला पक्षी; मीचु = मृत्यु; ओट = सहारा; कृपानिधान = दया के भंडार।

सरल हिंदी अर्थ

कवि स्वीकारते हैं कि संसार उन्हें स्वार्थी या विचित्र कहे तो भी उनका हृदय केवल श्रीराम पर आश्रित है। चातक के मेघ-प्रेम और मछली के जल-संबंध की उपमा देकर वे अपनी निर्भरता बताते हैं। उन्हें विश्वास है कि श्रीराम उनके मन की निष्ठा जानते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कवि की दृष्टि में प्रेम का मूल्य बाहरी लाभ से नहीं तय होता। कठिन परिस्थितियों में भी अपने श्रेष्ठ मूल्य और प्रभु का नाम न छोड़ना इस पद का भाव है। उपमाएँ ईश्वर-प्रेम की तीव्रता व्यक्त करती हैं।

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पद १७९ — कहाँ जाउँ? कासों कहौ? कौन सुनै दीन की? त्रिभुवन तुही गति सब अंगहीन की

कहाँ जाउँ? कासों कहौ? कौन सुनै दीन की? त्रिभुवन तुही गति सब अंगहीन की॥ जग जगदीस घर घरनि घनेरे हैं। निराधार के अधार गुनगन तेरे हैं॥ गजराज-काज खगराज तजि धायो को। मोसे दोस-कोस पोसे, तोसे माय जायो को॥ मोसे कूर कायर कुपूत कौड़ी आध के। किए बहुमोल तैं करैया गीध-स्राध के॥ तुलसी की तेरे ही बनाये, बलि, बनैगी। प्रभु की बिलंब-अंब दोष दुख जनैगी॥
कठिन शब्दों का अर्थ

अंगहीन = असहाय; खगराज = पक्षियों के राजा गरुड़; गीध = जटायु; स्राध = श्राद्धकर्म; बिलंब-अंब = विलंब रूपी माता।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास कहते हैं कि अपनी व्यथा कहने के लिए श्रीराम के अतिरिक्त दूसरा सच्चा आश्रय नहीं दिखाई देता। वे गजराज की रक्षा और जटायु के प्रति श्रीराम के सम्मान की स्मृति से कृपा की प्रार्थना करते हैं। अपने अवगुण स्वीकारने पर भी उन्हें प्रभु की दया पर भरोसा है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यहाँ करुणा का माप व्यक्ति की हैसियत नहीं है। श्रीराम के चरित्र के उदाहरण साधक को सिखाते हैं कि निर्बल तथा उपेक्षित जनों के प्रति सम्मान और मदद ही ऊँची भक्ति की पहचान हो सकती है।

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पद १८० — बारक बिलोकि बलि कीजै मोहिं आपनो

बारक बिलोकि बलि कीजै मोहिं आपनो। राय दशरथ के तू उथपन-थापनो॥ साहिब सरनपाल सबल न दूसरो। तेरो नाम लेत ही सुखेत होत ऊसरो॥ बचन करम तेरे मेरे मन गड़े हैं। देखे सुने जाने मैं जहान जेते बड़े हैं॥ कौन कियो समाधान सनमान सीला को? भृगुनाथ सो ऋषी जितैया कौन लीला को? मातु-पितु-बन्धु-हितु, लोक-बेदपाल को? बोल को अचल, नत करत निहाल को? संग्रही सनेहबस अधम असाधु को? गीध सबरी को, कहो, करिहै सराधु को? निराधार को अधार, दीन को दयालु को? मीत कपि केवट, रजनिचर भालु को॥ रंक निरगुनी नीच जितने निवाजे हैं। महाराज! सुजन-समाज ते बिराजे हैं॥ साँची बिरुदावली न बढ़ि कहि गई है। सीलसिंधु ढील तुलसी की बार भई है॥
कठिन शब्दों का अर्थ

बारक = बालक; ऊसरो = बंजर भूमि; सिला = अहल्या; भृगुनाथ = परशुराम; नत = प्रणत; निराधार = सहाराहीन।

सरल हिंदी अर्थ

कवि दशरथनंदन से स्वयं को बालक समझकर अपनाने की प्रार्थना करते हैं। वे अहल्या, परशुराम, जटायु, शबरी, केवट, वानर और विभीषण से जुड़े प्रसंगों का स्मरण करके दिखाते हैं कि श्रीराम की करुणा विविध परिस्थितियों तक पहुँचती है। उन्हें आश्चर्य है कि अभी उनकी अपनी पुकार का उत्तर क्यों देर से आता लगता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद रामचरित के उदाहरणों द्वारा सेवक-वात्सल्य का परिचय देता है। जीवन में दूसरों के साथ बिना भेदभाव विनम्रता से व्यवहार करना इन कथाओं से निकलने वाला सार्थक अभ्यास है।

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पद १८१ — केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिए

केहू भाँति कृपासिंधु मेरी ओर हेरिए। मोको और ठौर न, सुटेक एक तेरिए॥ सहस सिला तें अति जड़ मति भई है। कासों कहौं, कौन गति पाहनिहिं दई है?॥ पद-राग-जाग चहौं कौसिक ज्यों कियो हौं। कलि-मल खल देखि भारी भीति भियो हौं॥ करम-कपीस बालि बली त्रास-त्रस्यो हौं। चाहत अनाथ-नाथ तेरी बाँह बस्यो हौं॥ महामोह रावन बिभीषन ज्यों हयो हौं। त्राहि, तुलसीस! त्राहि तिहूँ ताप तयो हौं॥
कठिन शब्दों का अर्थ

कृपासिंधु = करुणा का समुद्र; पाहन = पत्थर; कौसिक = विश्वामित्र; कपीस = वानरराज; त्रास-त्रस्यो = भय से व्याकुल।

सरल हिंदी अर्थ

कवि स्वयं की जड़ता को अहल्या की शिला से, कर्मजन्य भय को बालि से तथा मोह की विपत्ति को लंका के प्रसंगों से जोड़ते हैं। वह भगवान से विनती करते हैं कि उनकी स्थिति कैसी भी हो, एक बार अपनी कृपादृष्टि करें और भीतर के भय को दूर करें।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

कठिनाइयों से घिरा मन कभी स्वयं ही समाधान नहीं देख पाता। यहाँ विनय का अर्थ अपनी स्थिति पहचानना और साहस के साथ परिवर्तन की दिशा माँगना है। पौराणिक रूपक आत्मिक संघर्ष का चित्र प्रस्तुत करते हैं।

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पद १८२ — नाथ-गुननाथ सुनि होत चित चाउ सो

नाथ-गुननाथ सुनि होत चित चाउ सो। राम रीझिबे को जानो भगति न भाउ सो॥ करम सुभाव काल ठाकुर न ठाउँ सो। सुधन न, सुतन न, सुमन, सुआउ सो॥ जाँचौं जल जाहि कहै अमिय पिआउ सो। कासों कहौं काहू सों न बढ़त हिआउ सो॥ बाप बलि जाउँ आप करिए उपाउ सो। तेरेहि निहारे परै हारेहू सुदाउ सो॥ तेरेहि सुझाए सूझे असुझ सुझाउ सो। तेरे ही बुझाये बूझै अबुझ बुझाउ सो॥ नाम अवलंबु-अंबु दीन मीन-राउ सो। प्रभु सों बनाइ कहौं जीह जरि जाउ सो॥ सब भाँति बिगरी है एक सुबनाउ सो। तुलसी सुसाहिबहिं दियो है जनाउ सो॥
कठिन शब्दों का अर्थ

सुआउ = शुभ उपाय; अमिय = अमृत; हिआउ = हिम्मत; अवलंबु = सहारा; सुबनाउ = सुधारने का अवसर।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास प्रभु के गुण सुनकर उत्साहित होते हैं, फिर विनम्रता से कहते हैं कि उन्हें भक्ति की विधि तक नहीं आती। वे भगवान से ही प्रेरणा, विवेक और अपने बिखरे जीवन को सँभालने का उपाय चाहते हैं। रामनाम को वे अपनी जीवनी-शक्ति की तरह मानते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद सिखाता है कि सहायता माँगना भी विनय का एक रूप है। केवल अपनी कमी गिनाने से आगे बढ़कर सीखना, समझना और अच्छे आचरण के लिए प्रयत्न करना भक्ति की स्वाभाविक अगली दिशा है।

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पद १८३ — राम प्रीति की रीति आप नीके जनियत है

राम प्रीति की रीति आप नीके जनियत है। बड़े की बड़ाई, छोटे की छोटाई दूरि करै, ऐसी बिरुदावली बलि बेद मनियत है॥ गीध को कियो सराध, भीलनी को खायो फल, सोऊ साधु-सभा भली भाँति भनियत है। रावरे आदरे लोक बेद हूँ आदरियत, जोग ज्ञान हू तें गरू गनियत है॥ प्रभु की कृपा कृपालु कठिन कलि हूँ काल, महिमा समुझि उर अनियत है। तुलसी पराये बस भये रस अनरस, दीनबंधु! द्वारे हठ ठनियत है॥
कठिन शब्दों का अर्थ

बिरुदावली = महिमा का वर्णन; गीध = जटायु; भीलनी = शबरी; अनियत = हृदय में धारण करना; हठ ठनियत = दृढ़ विनती करना।

सरल हिंदी अर्थ

कवि श्रीराम की प्रेम-रीति का गुणगान करते हैं। जटायु का सम्मान और शबरी के फल स्वीकारना उनके लिए इस बात का प्रमाण है कि राम छोटे-बड़े के भेद से परे स्नेह देते हैं। तुलसीदास स्वयं को दूसरे आकर्षणों में उलझा मानकर भी प्रभु के द्वार पर अडिग हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इस पद में सेवा और सम्मान किसी की सामाजिक हैसियत पर निर्भर नहीं। प्रेमपूर्ण व्यवहार से किसी को अपनाना केवल सुंदर कथा नहीं, बल्कि आचरण में उतारने योग्य भक्ति का संदेश है।

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पद १८४ — राम-नाम के जपे जाइ जिय की जरनि

राम-नाम के जपे जाइ जिय की जरनि। कलिकाल अपर उपाय ते अपाय भए, जैसे तम नासिबे को चित्र के तरनि॥ करम-कलाप परिताप पाप साने सब, ज्यों सुफूल फूले तरु फोकट फरनि। दंभ, लोभ, लालच उपासना बिनासि नीके, सुगति साधन भई उदर भरनि॥ जोग न समाधि निरुपाधि न बिराग ज्ञान, बचन बिसेष बेष, कहूँ न करनि। कपट कुपथ कोटि, कहनि रहनि खोटि, सकल सराहैं निज निज आचरनि॥ मरत महेस उपदेस हैं कहा करत, सुरसरि-तीर कासी धरम-धरनि। राम-नाम को प्रताप हर कहैं, जपैं आपु, जुग-जुग जानैं जग बेदहूँ बरनि॥ मति राम-नाम ही सों, रति राम-नाम ही सों, गति राम नाम ही की बिपति-हरनि। राम-नाम सों प्रतीति प्रीति राखे कबहुँक, तुलसी ढरैंगे राम आपनी ढरनि॥
कठिन शब्दों का अर्थ

जरनि = भीतर की जलन; तरनि = सूर्य; उपासना = साधना; सुरसरि = गंगा; प्रतीति = दृढ़ विश्वास।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास कहते हैं कि रामनाम हृदय की अशांति के लिए सहारा है। वे दिखावे, लालच और केवल बाहरी धार्मिक विधियों पर निर्भरता की आलोचना करते हैं। काशी में महादेव द्वारा रामनाम का उपदेश दिए जाने की परंपरा याद करके कवि अपना चित्त नाम-स्मरण में स्थिर करना चाहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यहाँ नाम का महत्व हृदय की सच्चाई के साथ जुड़ा है। निरंतर स्मरण से मन संयम, संतुलन और करुणा की ओर लौटे—यही इस पद को दैनिक जीवन में सार्थक बनाने वाली बात है।

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खंड • पद १८५ से १९०

दीन-विनय, सत्संग और संसार का विवेक

दिखावे की जगह आचरण, ईर्ष्या के स्थान पर सेवा, तथा मन के लिए श्रीराम की पुकार।

पद १८५ — लाज न लागत दास कहावत

लाज न लागत दास कहावत। सो आचरन बिसारि सोच तजि जो हरि तुम कहँ भावत॥ सकल संग तजि भजत जाहि मुनि जप तप जाग बनावत। मो सम मंद महा खल पाँवर कौन जतन तेहि पावत॥ हरि निर्मल, मल-ग्रसित हृदय, असमंजस मोहि जनावत। जेहि सर काक कंक बक सूकर क्यों मराल तहँ आवत॥ जाकी सरन जाइ कोबिद दारुन त्रयताप बुझावत। तहूँ गए मद मोह लोभ अति सरगहुँ मिटत न सावत॥ भव-सरिता कहँ नाउ संत यह कहि औरनि समुझावत। हौं तिन सों करि परम बैर हरि तुम सों भलो मनावत॥ नाहिंन और ठौर मो कहँ तातें हठि नातो लावत। राखु सरन उदार-चूड़ामनि तुलसिदास गुन गावत॥
कठिन शब्दों का अर्थ

मल-ग्रसित = दोषों में उलझा; मराल = हंस; त्रयताप = तीन प्रकार के ताप; भव-सरिता = संसार-रूपी नदी; उदार-चूड़ामनि = उदारता में श्रेष्ठ।

सरल हिंदी अर्थ

कवि को लज्जा है कि वह स्वयं को रामदास कहते हैं, किंतु व्यवहार में संतों की संगति और सदाचार का अनुसरण नहीं कर पाते। वह अपने हृदय की अशुद्धि को देखकर पूछते हैं कि निर्मल प्रभु उसमें कैसे निवास करेंगे, फिर भी अंततः उनकी शरण माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

भक्ति का नाम और उसके अनुरूप कर्म, दोनों में सामंजस्य होना आवश्यक है। यह पद पाखंड से बचने, संतों का सम्मान करने और बुरे अभ्यासों को पहचानकर धीरे-धीरे बदलने की प्रेरणा देता है।

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पद १८६ — कौन जतन बिनती करिए

कौन जतन बिनती करिए। निज आचरन बिचारि हारि हिय मानि जानि डरिए॥ जेहि साधन हरि द्रवहु जानि जन सो हठि परिहरिए। जाते बिपति-जाल निसि दिन दुख तेहि पथ अनसरिए॥ जानत हूँ मन बचन कर्म पर-हित कीन्हें तरिए। सो बिपरीत देखि पर-सुख बिनु कारन ही जरिए॥ स्रुति पुरान सब को मत यह सतसंग सुदृढ़ धरिए। निज अभिमान मोह ईर्षा बस तिनहिं न आदरिए॥ संतत सोइ प्रिय मोहिं सदा जातें भव-निधि परिए। कहौं अब नाथ! कौन बल तें संसार-सोग हरिए॥ जब कब निज करुना सुभाव तें द्रवहु तौ निस्तरिए। तुलसिदास बिस्वास आनि नहिं, कत पचि-पचि मरिए॥
कठिन शब्दों का अर्थ

जतन = प्रयत्न; पर-हित = दूसरों का भला; सुदृढ़ = मजबूती से; ईर्षा = दूसरे के सुख से जलन; निस्तरिए = पार लगा जाए।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास अपने मन की उलटी चाल स्वीकारते हैं—जिस सदाचार को आवश्यक समझते हैं, उससे दूर जाते हैं; परोपकार के बजाय ईर्षा में फँस जाते हैं, सत्संग के बजाय अभिमान को चुनते हैं। वे पूछते हैं कि अब उनके लिए कौन-सा बल बचा है और करुणामय श्रीराम से सहारा माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह आत्मपरीक्षण दूसरों पर दोष लगाने के बजाय स्वयं में बदलाव करने की शिक्षा है। परोपकार, ईर्ष्या से दूरी और श्रेष्ठ संगति इस पद के मुख्य व्यवहारिक सूत्र हैं।

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पद १८७ — ताहि तें आयो सरन सबेरे

ताहि तें आयो सरन सबेरे। ज्ञान-बिराग-भगति साधन कछु सपनेहु नाथ न मेरे॥ लोभ, मोह, मद, काम, क्रोध, रिपु फिरत रैन दिन घेरे। तिनहि मिले मन भयो कुपथ-रत फिरै तिहारेहि फेरे॥ दोष-निलय यह बिषय सोक-प्रद कहत संत स्रुति टेरे। जानत हूँ अनुराग तहाँ अति सो हरि तुम्हरेहि प्रेरे॥ बिष पियूष सम करहु, अगिनि हिम, तारि सकहु बिनु बेरे। तुम सम ईस कृपालु परम हित पुनि न पाइहौं हेरे॥ यह जिय जानि रहौं सब तजि रघुबीर भरोसे तेरे। तुलसिदास यह बिपति-बाँगुरो तुमहिं सों बनै निबेरे॥
कठिन शब्दों का अर्थ

बिराग = वैराग्य; दोष-निलय = दोषों का घर; पियूष = अमृत; बिना बेरे = बिना नाव; बाँगुरो = फंदे में फँसा।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि वह ज्ञान, भक्ति या वैराग्य का बड़ा दावा नहीं कर सकते। काम, क्रोध, लोभ और मोह से घिरे मन को वे केवल श्रीराम के भरोसे रखते हैं। वे भगवान की सामर्थ्य का स्मरण करते हैं और अपने सांसारिक बंधनों से निकलने की प्रार्थना करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद भक्ति के भीतर ईमानदार सीमा-बोध दिखाता है। साधक को अपनी कमियों से भागना नहीं, बल्कि उन्हें स्वीकारकर बेहतर आदतें और आध्यात्मिक अनुशासन विकसित करना चाहिए।

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पद १८८ — मैं तोहिं अब जान्यो, संसार! बाँधि न सकहिं मोहिं हरि के बल प्रगट कपट-आगार

मैं तोहिं अब जान्यो, संसार! बाँधि न सकहिं मोहिं हरि के बल प्रगट कपट-आगार॥ देखत ही कमनीय, कछू नाहिंन पुनि किए बिचार। ज्यों कदलीतरु मध्य निहारत कबहुँ न निकसत सार॥ तेरे लिये जनम अनेक मैं फिरत न पायों पार। महामोह-मृगजल-सरिता महँ बोर्‍यो हौं बारहिं बार॥ सुनु खल छल बल कोटि किए बस होहिं न भगत उदार। सहित सहाय तहाँ बसि अब जेहि हृदय नंदकुमार॥ तासों करहु चातुरी जो नहिं जानै मरम तुम्हार। सो परि डरै मरै रजु-अहि तें बूझै नहिं ब्यवहार॥ निज हित सुनु सठ! हठ न करहि जो चहहि कुसल परिवार। तुलसिदास प्रभु के दासनि तजि भजहि जहाँ मद मार॥
कठिन शब्दों का अर्थ

कपट-आगार = छल का घर; कदलीतरु = केले का पेड़; मृगजल = मरीचिका; रजु-अहि = रस्सी को साँप मानने का भ्रम; मरम = रहस्य।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास संसार को संबोधित करके कहते हैं कि उसका बाहरी आकर्षण अक्सर टिकाऊ सार नहीं देता। केले के तने और मृगतृष्णा जैसी उपमाओं से वे भ्रम का वर्णन करते हैं। वे दृढ़ विश्वास व्यक्त करते हैं कि श्रीहरि की भक्ति करने वाला विवेक से इन जालों को पहचान सकता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

इसका आशय संसार से भागना नहीं, भ्रमित कर देने वाले लोभ और प्रतिष्ठा की चकाचौंध से सावधान रहना है। वस्तुओं का उपयोग करें, पर जीवन का अंतिम उद्देश्य केवल उन्हें बना न लें।

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पद १८९ — राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु, भाई रे

राम कहत चलु, राम कहत चलु, राम कहत चलु, भाई रे। नाहिं तौ भव बेगारि मह परिहौ छूटत अति कठिनाई रे॥ बाँस पुरान साज सब अटकट सरल तिकोन खटोला रे। हमहिं दिहल करि कुटिल करमचँद मंद मोल बिनु डोला रे॥ बिषम कहार मार-मदमाते चलहिं न पाउँ बटोरा रे! मंद बिलंद अभेरा दलकन पाइय दुख झकझौरा रे! काँट कुरायँ लपेटन लोटन ठावहिं ठाउँ बझाऊ रे! जस जस चलिय दूरि तस तस निज बास न भेंट लगाऊ रे! मारग अगम, संग नहिं संबल, नाउँ गाउँ कर भूला रे! तुलसिदास भव-त्रास हरहु अब, होहु राम अनुकूला रे!॥
कठिन शब्दों का अर्थ

भव-बेगारि = संसार का अनचाहा बोझ; कहार = पालकी ढोने वाला; झकझौरा = झटका; संबल = राह का सहारा; अनुकूला = कृपालु।

सरल हिंदी अर्थ

इस लोकगीत जैसी शैली वाले पद में तुलसीदास बार-बार रामनाम लेते चलने का आह्वान करते हैं। संसार को कठिन यात्रा के रूप में और कर्मों को पालकी ढोने वालों की तरह दिखाया गया है। वे प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि इस असमंजस भरी यात्रा में अनुकूल बने रहें।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

जीवन कभी अनिश्चित और श्रमसाध्य होता है। इस पद में नाम-स्मरण मन को साहस देने वाला सहारा है। इसमें लय और पुनरावृत्ति सामूहिक भजन तथा दैनिक जप, दोनों के लिए प्रभावी प्रतीक हैं।

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पद १९० — सहज सनेही राम सों तैं कियो न सहज सनेह

सहज सनेही राम सों तैं कियो न सहज सनेह। तातें भव भाजन भयो, सुनु अजहुँ सिखावन एह॥ ज्यों मुख मुकुर बिलोकिए अरु चित न रहै अनुहारि। त्यों सेवतहुँ न आपने ये मातु पिता सुत नारि॥ दै दै सुमन तिल बासि कै अरु खरि परिहरि रस लेत। स्वारथ हित भूतल भरे, मन मेचक, तन सेत॥ करि बीत्यो, अब करतु है, करिबे हित मीत अपार। कबहुँ न कोउ रघुबीर सो नेह निबाहनिहार॥ जासों सब नातों फुरै तासों न करी पहिचानि। तातें कछू समझ्यो नहीं कहा लाभ कह हानि॥ साँचो जान्यो झूठ को, झूठे कहँ साँचो जानि। को न गयो, को जात है, को न जैहै करि हितहानि॥ बेद कह्यो, बुध कहत हैं अरु हौहुँ कहत हौं टेरि। तुलसी प्रभु साँचो हितू, तू हिये की आँखिन हेरि॥
कठिन शब्दों का अर्थ

भव-भाजन = संसार-दुःख का पात्र; मुकुर = दर्पण; फुरै = पूरा होता है; अनुहारि = प्रतिबिंब; साँचो हितू = वास्तविक हितैषी।

सरल हिंदी अर्थ

कवि मन को याद दिलाते हैं कि सहज प्रेम करने वाले श्रीराम को भूलकर वह अस्थायी स्वार्थों में उलझा रहा। संसार के रिश्तों और लाभों की अनिश्चितता दिखाकर वे कहते हैं कि सभी परिवर्तनों के बीच प्रभु-प्रेम को स्थायी मूल्य बनाना चाहिए।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

परिवार से विमुख होना इसका लक्ष्य नहीं; काव्य के माध्यम से आग्रह है कि प्रेम में स्वार्थ और भ्रम का अंधापन न हो। संबंधों के साथ जिम्मेदारी निभाएँ, किंतु अपने जीवन के केंद्र में सत्य, करुणा और भक्ति रखें।

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खंड • पद १९१ से १९७

राम-प्रेम, सेवा और विश्वास की गहराई

प्रभु की प्रेम-रीति, पुराने अपराधों से मुक्ति की आशा और भक्ति की सच्चाई।

पद १९१ — एक सनेही साँचिलो केवल कोसलपालु

एक सनेही साँचिलो केवल कोसलपालु। प्रेम कनौड़ो राम सो नहि दूसरो दयालु॥ तन साथी सब स्वारथी, सुर ब्यवहार-सुजान। आरत अधम अनाथ हित को रघुबीर समान॥ नाद निठूर, समचर सिखी, सलिल सनेह न सूर। ससि सरोग, दिनकर बड़े, पयद प्रेम-पथ कूर॥ जाको मन जासों बँध्यो ताको सुखदायक सोइ। सरल सील साहिब सदा सीतापति सरिस न कोइ॥ सुनि सेवा सही को करै, परिहरै को दूषन देखि। केहि दिवान दिन दीन को आदर अनुराग बिसेखि॥ खग सबरी पितु-मातु ज्यों माने, कपि को किए मीत। केवट भेंट्यों भरत ज्यो ऐसो को कहु पतित-पुनीत॥ देह अभागहिं भागु को, को राखै सरन सभीत। बेद-बिदित बिरुदावली, कबि कोबिद गावत गीत॥ कैसेउ पाँवर पातकी जेहि लई नाम की ओट। गाँठी बाँध्यो दाम सो पर्‍यो न फेरि खर खोट॥ मन-मलीन, कलि किलबिषी होत सुनत जासु कृत काज। सो तुलसी कियो आपुनो रघुबीर गरीब-निवाज॥
कठिन शब्दों का अर्थ

कोसलपालु = अयोध्या के पालनकर्ता; कनौड़ो = प्रेम के कारण वश होने वाला; गरीब-निवाज = दीनों का मान रखने वाले; नत = शरण में झुका व्यक्ति।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास श्रीराम को अद्वितीय प्रेममय स्वामी कहते हैं। जटायु, शबरी, केवट और वानर भक्तों से उनके अपनत्व का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि प्रभु दूसरों की कमियाँ देखकर त्यागने के बजाय उनके भाव की कद्र करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद प्रेम में स्वीकार्यता और समावेशिता का सुंदर परिचय है। मनुष्य के दोषों की चर्चा से आगे उसके सुधार, गरिमा और आशा को देखना करुणामय व्यवहार का रूप बन सकता है।

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पद १९२ — जो पै जानकी नाथ सों नातो नेह न नीच

जो पै जानकी नाथ सों नातो नेह न नीच। स्वारथ परमारथ कहाँ? कलि कुटिल बिगोयो बीच॥ धरम बरन आस्रमनि के पैयत पोथिही पुरान। करतब बिनु बेष देखिए ज्यौं सरीर बिनु प्रान॥ बेद-बिहित साधन सबै सुनियत दायक फल चारि। राम-प्रेम बिनु जानिबो जैसे सर सरिता बिनु बारि॥ नाना पथ निरबान के, नाना बिधान बहु भाँति। तुलसी तू मेरे कहे जपु राम-नाम दिन राति॥
कठिन शब्दों का अर्थ

जानकीनाथ = श्रीराम; परमारथ = परम कल्याण; बरन-आस्रम = पारंपरिक सामाजिक धार्मिक अवस्थाएँ; निरबान = मुक्ति; बारि = जल।

सरल हिंदी अर्थ

कवि कहते हैं कि बिना प्रेम के धार्मिक पहचान, वेश और अनेक साधन अपूर्ण लगते हैं। वे चार पुरुषार्थों की चर्चा करते हुए रामप्रेम को उस सरोवर का जल बताते हैं जिसके बिना बाहरी संरचना अर्थहीन हो जाती है। अंत में वे अपने मन से रामनाम जपने को कहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

भक्ति के केंद्र में दिखावे के बजाय आचरण हो। यह पद व्यक्तिगत आध्यात्मिक विश्वास की गहराई समझाता है, किसी दूसरे पंथ या व्यक्ति को कमतर ठहराने का आग्रह नहीं करता।

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पद १९३ — अजहुँ आपने राम के करतब समुझत हित होइ

अजहुँ आपने राम के करतब समुझत हित होइ। कहँ तू, कहँ कोसलधनी, तोको कहा कहत सब कोइ॥ रीझि निवाज्यो कबहिं तू, कब खीझि दई तोहिं गारि। दरपन बदन निहारि कै सुबिचारि मान हिय हारि॥ बिगरी जनम अनेक की सुधरत पल लगै न आधु। ‘पाहि कृपानिधि!’ प्रेम सों कहे को न राम कियो साधु॥ बालमीकि-केवट-कथा, कपि-भील-भालु-सनमान। सुनि सनमुख जो न राम सों तिहि को उपदेसहि ज्ञान॥ का सेवा सुग्रीव की, का प्रीति-रीति-निरबाहु? जासु बंधु बध्यो ब्याध ज्यों सो सुनत सोहात न काहु॥ भजन बिभीषन को कहा, फल कहा दियो रघुराज! राम गरीब-निवाज के बड़ी बाँह-बोल की लाज॥ जपहि नाम रघुनाथ की चरचा दूसरी न चालु। सुमुख सुखद साहिब सुधी समरथ कृपालु नतपालु॥ सजल नयन, गदगद गिरा, गहबर मन पुलक सरीर। गावत गुनगन राम के केहि की न मिटी भव-भीर?॥ प्रभु कृतज्ञ सरबज्ञ हैं, परिहरु पाछिली गलानि। तुलसी तोसों राम सो कछु नई न जान-पहिचानि॥
कठिन शब्दों का अर्थ

कोसलधनी = अयोध्या के स्वामी; निवाज्यो = सम्मान दिया; पाछिली गलानि = पुरानी भूलों का पश्चात्ताप; कृतज्ञ = उपकार मानने वाले।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास मन को श्रीराम के करुणामय कार्यों का स्मरण कराते हैं। वाल्मीकि, केवट, सुग्रीव, विभीषण और अन्य पात्रों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि प्रभु पुरानी गलतियों से लौटने वालों का भी आदर करते हैं। अब मन को पछतावे में अटके रहने के बजाय प्रेम से उनके गुण गाने चाहिए।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

पश्चात्ताप जब सुधार की ओर ले जाए तभी अर्थपूर्ण होता है। इस पद का व्यावहारिक संदेश है—गलती स्वीकारें, उससे सीखें और बेहतर आचरण के नए अवसर को अपनाएँ।

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पद १९४ — जो अनुराग न राम सनेही सों

जो अनुराग न राम सनेही सों। तौ लह्यो लाहु कहा नर देही सों॥ जो तनु धरि परिहरि सब सुख भए सुमति राम अनुरागी। सो तनु पाइ अघाइ किये अघ अवगुन-उदधि अभागी॥ ज्ञान बिराग जोग जप तप मख जग मुद-मग नहिं थोरे। राम-प्रेम बिनु नेम जाय जैसे मृग-जल-जलधि हिलोरे॥ लोक बिलोकि, पुरान बेद सुनि, समुझि बूझि गुरु ज्ञानी। प्रीति प्रतीति राम-पद-पंकज सकल सुमंगल-खानी॥ अजहुँ जानि जिय मानि हारि हिय होइ पलक महँ नीको। सुमिरु सनेह सहित हित रामहिं मानु मतो तुलसी को॥
कठिन शब्दों का अर्थ

अनुराग = गहरा प्रेम; नर देही = मानव शरीर; मृगजल = मरीचिका; प्रीति-प्रतीति = प्रेम और विश्वास; सुमंगल-खानी = कल्याण का भंडार।

सरल हिंदी अर्थ

कवि मनुष्य जन्म का लाभ रामप्रेम के बिना अधूरा मानते हैं। योग, यज्ञ, तप, ज्ञान और अनेक धार्मिक विधियों को वे तभी सार्थक समझते हैं जब उनमें स्नेह और विश्वास जुड़ें। अंतिम पंक्तियों में मन को अभी से श्रीराम का प्रेमपूर्वक स्मरण करने की सलाह है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद मन के भीतर की भावना को बाहरी विधियों से ऊपर स्थान देता है। काम-धंधे और दायित्व निभाते हुए भी समय निकालकर प्रेम, सद्भाव तथा शांत आत्मचिंतन को जीवन में उतारा जा सकता है।

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पद १९५ — बलि जाउँ हौं राम गुसाईं

बलि जाउँ हौं राम गुसाईं। कीजै कृपा आपनी नाईं॥ परमारथ सुरपुर-साधन सब स्वारथ सुखद भलाई! कलि सकोप लोपी सुचाल, निज कठिन कुचाल चलाई॥ जहँ जहँ चित चितवत हित तहँ नित नव बिषाद अधिकाई। रुचि-भावती भभरि भागहि, समुहाहिं अमित अनभाई॥ आधि-मगन मन, ब्याधि-बिकल तन, बचन मलीन झुठाई। एतेहुँ पर तुम सों तुलसी की प्रभु सकल सनेह सगाई॥
कठिन शब्दों का अर्थ

गुसाईं = स्वामी; परमारथ = आध्यात्मिक कल्याण; कलि = कलियुग; आधि = मानसिक व्यथा; ब्याधि = रोग; सगाई = आत्मीय संबंध।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास बताते हैं कि कलियुग के विपरीत प्रभाव से सुख के प्रयास भी चिंता में बदल जाते प्रतीत होते हैं। उनका मन व्यथित है, शरीर अशक्त लगता है और वाणी में भी दोष आने का भय है। फिर भी वे श्रीराम के साथ अपने प्रेम-संबंध पर विश्वास रखते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह विनय मनुष्य की सीमाओं और आशा का सुंदर मेल है। अपनी कठिनाइयों में सहारा माँगना, जिम्मेदारी से प्रयास करते रहना और मन को संतुलित रखना इसकी प्रेरणा है।

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पद १९६ — काहे को फिरत मन करत बहु जतन, मिटै न दुख बिमुख रघुकुल-बीर

काहे को फिरत मन करत बहु जतन, मिटै न दुख बिमुख रघुकुल-बीर। कीजै जो कोटि उपाइ, त्रिबिध ताप न जाइ, कह्यो जो भुज उठाय मुनिबर कीर॥ सहज टेव बिसारि तुही धौं देखु बिचारि, मिलै न मथत बारि घृत बिनु छीर। समुझि तजहि भ्रम भजहि पद जुगम, सेवत सुगम गुन गहन गँभीर॥ आगम निगम ग्रंथ, ऋषि मुनि सुर संत, सबही को एक मत सुनु, मतिधीर। तुलसिदास प्रभु बिनु पियास मरै पसु, जद्यपि है निकट सुरसरि-तीर॥
कठिन शब्दों का अर्थ

त्रिबिध ताप = देहिक, दैविक, भौतिक कष्ट; छीर = दूध; पद जुगम = चरण-युगल; निगम = वेद; सुरसरि = गंगा।

सरल हिंदी अर्थ

कवि मन को समझाते हैं कि केवल असंख्य बाहरी उपाय करके, भगवान को भूलकर, स्थायी शांति नहीं मिलती। दूध के बिना पानी को मथकर घी न मिलने की उपमा से वे साधन और लक्ष्य के मेल पर बल देते हैं। निकट गंगा के होते हुए प्यासा रहने का चित्र भी यही बताता है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

अपने पास मौजूद श्रेष्ठ अवसरों को पहचानने की सीख इस पद में है। नियमित आस्था, विवेक और सदाचार जीवन की उलझनों में दिशा दे सकते हैं; मात्र व्यस्त प्रयास लक्ष्य का विकल्प नहीं बनते।

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पद १९७ — नाहिन चरन-रति ताहि तें सहौं बिपति, कहत स्रुति सकल मुनि मतिधीर

नाहिन चरन-रति ताहि तें सहौं बिपति, कहत स्रुति सकल मुनि मतिधीर। बसै जो ससि-उछंग सुधा-स्वादित कुरंग, ताहि क्यों भ्रम निरखि रबिकर-नीर?॥ सुनिय नाना पुरान, मिटत नाहिं अज्ञान, पढ़िय न समुझिय जिमि खग कीर। बझत बिनहिं पास सेमर-सुमन-आस, करत चरत तेइ फल बिनु हीर॥ कछु न साधन सिधि, जानौं न निगम, बिधि, नहिं जप तप बस मन, न समीर। तुलसिदास भरोस परम करुना-कोस, प्रभु हरिहैं बिषम भवभीर॥
कठिन शब्दों का अर्थ

चरन-रति = प्रभुचरणों में प्रेम; कुरंग = हिरन; रबिकर-नीर = सूर्यकिरणों का मृगतृष्णा-जैसा जल; कीर = तोता; भवभीर = संसार का भय।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास अपनी विपत्तियों का कारण प्रभु-प्रेम की कमी मानते हैं। वे चंद्रमा के समीप रहते हुए भी मृगतृष्णा का भ्रम करने वाले जीव तथा अर्थ समझे बिना रटने वाले तोते की उपमा देते हैं। उन्हें भरोसा है कि करुणामय श्रीराम ही उनकी उलझन दूर करेंगे।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

ज्ञान को केवल सुनना या दोहराना पर्याप्त नहीं; समझ और अनुभव के साथ उसे अपनाना आवश्यक है। यह पद दिखावे की साधना से हटकर अर्थपूर्ण भक्ति और समझदारी का आग्रह करता है।

↑ विषय-सूची पर जाएँ   •   पद १९७ / २०३
खंड • पद १९८ से २०३

दुर्लभ मानव-जन्म और मन को परम उपदेश

अनित्य जीवन, परोपकार, संयम और पद २०३ के विशेष तिथि-आधारित आध्यात्मिक उपदेश।

पद १९८ — मन पछितैहै अवसर बीते

मन पछितैहै अवसर बीते। दुर्लभ देह पाइ हरिपद भजु करम बचन अरु ही ते॥ सहसबाहु दसबदन आदि नृप बचे न काल बली ते। हम हम करि धन धाम सँवारे, अंत चले उठि रीते॥ सुत बनितादि जानि स्वारथ-रत न करु नेह सबही ते। अंतहु तोहिं तजैंगे, पामर! तू न तजै अबही ते॥ अब नाथहिं अनुरागु जागु जड़ त्यागु दुरासा जी ते। बुझै न काम-अगिनि तुलसी कहुँ, बिषय-भोग बहु घी ते॥
कठिन शब्दों का अर्थ

अवसर बीते = समय निकल जाने पर; सहसबाहु = सहस्रबाहु; दसबदन = रावण; दुरासा = व्यर्थ आशा; काम-अगिनि = तृष्णा की अग्नि।

सरल हिंदी अर्थ

कवि मन को सावधान करते हैं कि दुर्लभ मानव जीवन का अवसर बीतने पर पश्चात्ताप होगा। वे शक्तिशाली राजाओं की अनित्यता का उल्लेख करते हैं और बताते हैं कि धन तथा उपभोग से मन की तृष्णा हमेशा शांत नहीं होती। अभी जागकर प्रभु-स्मरण शुरू करने को कहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

जीवन का समय सीमित है, इसलिए उचित कार्य और प्रियजनों के प्रति करुणा को बाद के लिए न टालें। इसका संदेश भय फैलाना नहीं, बल्कि वर्तमान अवसर का अच्छा उपयोग और स्वार्थ पर नियंत्रण है।

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पद १९९ — काहे को फिरत मूढ़ मन धायो

काहे को फिरत मूढ़ मन धायो। तजि हरि-चरन-सरोज सुधारस रबिकर-जल लय लायो॥ त्रिजग, देव, नर, असुर, अपर जग जोनि सकल भ्रमि आयो। गृह, बनिता, सुत, बंधु भए बहु मातु पिता जिन्ह जायो॥ जाते निरय-निकाय निरंतर सोइ इन्ह तोहिं सिखायो। तुव हित होइ कटै भव-बंधन, सो मगु तोहिं न बतायो॥ अजहुँ बिषय कहँ जतन करत, जद्यपि बहुबिधि डहँकायो। पावक-काम भोग-घृत तें सठ, कैसे परत बुझायौ?॥ बिषयहीन दुख, मिले बिपति अति, सुख सपनेहुँ नहिं पायो। उभय प्रकार प्रेत-पावक ज्यों धन दुखप्रद स्रुति गायो॥ छिन छिन छीन होत जीवन, दुरलभ तनु बृथा गँवायो। तुलसिदास हरि भजहि आस तजि, काल-उरग जग खायो॥
कठिन शब्दों का अर्थ

सुधारस = अमृतरस; रबिकर-जल = मृगतृष्णा; डहँकायो = धोखा खाया; पावक = आग; काल-उरग = समय रूपी साँप।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास मन से पूछते हैं कि वह प्रभुचरणों के सच्चे रस को छोड़कर मृगतृष्णा-जैसे भोगों के पीछे क्यों भागता है। वे विषयासक्ति को आग में घी डालने जैसा बताते हैं, जिसमें तृप्ति के बजाय बेचैनी बढ़ती है। जीवन घटता जा रहा है, इसलिए मन को सजग रहने का आह्वान है।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

असीम चाहत और तुलना मन को थका सकती हैं। संतोष, संयम और सार्थक साधना से ध्यान को फिर जीवन के गहरे मूल्यों पर टिकाने का अभ्यास इस पद की सीख है।

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पद २०० — ताँबे सो पीठि मनहुँ तन पायो

ताँबे सो पीठि मनहुँ तन पायो। नीच! मीच जानत न सीस पर, ईस निपट बिसरायौ॥ अवनि, रवनि, धन, धाम, सुहृद, सुत को न इन्हहिं अपनायो। काके भए गए सँग काके सब सनेह छल-छायो॥ जिन्ह भूपनि जग जीति, बाँधि जम अपनी बाँह बसायो। तेऊ काल कलेऊ कीन्हे, तू गिनती कब आयो?॥ देखु बिचारि सार का साँचो, कहा निगम निजु गायो। भजहिं न अजहुँ समुझि तुलसी तेहि जेहि महेस मन लायो॥
कठिन शब्दों का अर्थ

मीच = मृत्यु; अवनि = भूमि; रवनि = स्त्री/परिवार का संदर्भ; काल-कलेऊ = काल का ग्रास; निगम = वेद।

सरल हिंदी अर्थ

कवि मन को मृत्यु की अनिवार्यता याद दिलाते हैं। धन, भूमि, परिवार या राज्य-सत्ता किसी की स्थायी निजी संपत्ति नहीं है; बड़े-बड़े विजेता भी समय के सामने टिक नहीं पाए। इसलिए वे मन को श्रीराम की ओर लगाने और जीवन के सत्य पर विचार करने को कहते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

अनित्यता की स्मृति जीवन को निराश करने के लिए नहीं, बल्कि प्राथमिकताओं को साफ करने के लिए है। जिन लोगों और अवसरों से हमारा संबंध है, उनके प्रति आज ही जिम्मेदार और दयालु होना मूल्यवान है।

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पद २०१ — लाभ कहा मानुष तनु पाए

लाभ कहा मानुष तनु पाए। काय, बचन, मन सपनेहु कबहुँक घटत न काज पराए॥ जो सुख सुरपुर नरक गेह बन आवत बिनहिं बुलाए। तेहि सुख कहँ बहु जतन करत मन, समुझत नहिं समुझाए॥ पर-दारा, परद्रोह, मोहबस किए मूढ़ मन भाए। गर्भबास दुखरासि जातना तीब्र बिपति बिसराए॥ भय निद्रा मैथुन अहार सब के समान जग जाए। सुर-दुरलभ तनु धरि न भजे हरि, मद अभिमान गँवाए॥ गई न निज-पर-बुद्धि, सुद्ध ह्वै रहे न राम-लय लाए। तुलसिदास यह अवसर बीते का पुनि के पछिताए?॥
कठिन शब्दों का अर्थ

काय = शरीर; परद्रोह = दूसरों का अहित; सुर-दुरलभ = देवताओं को भी दुर्लभ; निज-पर-बुद्धि = अपना-पराया का भेद।

सरल हिंदी अर्थ

तुलसीदास प्रश्न करते हैं कि मानव शरीर पाकर क्या लाभ, यदि मन, वचन, कर्म से दूसरों की भलाई न की जाए। वे केवल सुख की दौड़, स्वार्थ और अभिमान पर आलोचनात्मक दृष्टि डालते हैं। प्रभु-स्मरण और सबके प्रति भलाई से जीवन को सार्थक बनाने का आग्रह करते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह पद स्पष्ट करता है कि भक्ति का संबंध परोपकार और समान दृष्टि से है। अपने तथा पराए का कठोर भेद कम करना, दया और सहयोग बढ़ाना इसकी प्रमुख व्यावहारिक सीख है।

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पद २०२ — काज कहा नरतनु धरि सार्‍यो

काज कहा नरतनु धरि सार्‍यो। पर-उपकार सार श्रुति को जो सो धोखेहु न बिचार्‍यो॥ द्वैत मूल, भय सूल, सोक फल, भवतरु टरै न टार्‍यो। रामभजन तीछन कुठार लै सो नहिं काटि निवार्‍यो॥ संसय-सिंधु नाम बोहित भजि निज आतमा न तार्‍यो। जनम अनेक विवेकहीन बहु जोनि भ्रमत नहिं हार्‍यो॥ देखि आन की सहज संपदा द्वेष-अनल मन-जार्‍यो। सम दम दया दीन-पालन सीतल हिय हरि न सँभार्‍यो॥ प्रभु गुरु पिता सखा रघुपति तैं मन क्रम बचन बिसार्‍यो। तुलसिदास एहि त्रास सरन राखिहि जेहि गीध उधार्‍यो॥
कठिन शब्दों का अर्थ

पर-उपकार = दूसरों की भलाई; भवतरु = संसार रूपी वृक्ष; तीछन कुठार = तीखी कुल्हाड़ी; बोहित = नाव; सम-दम = मन और इंद्रियों का संयम।

सरल हिंदी अर्थ

कवि मन से कहते हैं कि शरीर मिलने पर भी परोपकार का सार न समझा और संशय व मोह से मुक्त होने का प्रयास नहीं किया। दूसरों की संपत्ति देखकर ईर्ष्या की आग जलती रही, जबकि समता, दम, दया और दीनों के संरक्षण जैसे मूल्य छूटते गए। अंततः जटायु को सम्मान देने वाले श्रीराम की शरण माँगते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

परोपकार, आत्मसंयम और ईर्ष्या से मुक्ति को यह पद भक्ति का मूल बताता है। धर्म केवल व्यक्तिगत उद्धार की कल्पना न बने; दूसरों के सुख और सम्मान की चिंता भी उसमें शामिल हो।

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पद २०३ — श्रीहरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान

विशेष दीर्घ पद — तिथि, होली और संत-संगति के सभी मूल २० दोहे संपूर्ण प्रस्तुत हैं।

श्रीहरि-गुरु-पद-कमल भजहु मन तजि अभिमान। जेहि सेवत पाइय हरि सुख निधान भगवान॥ परिवा प्रथम प्रेम बिनु राम मिलन अति दूरि। जद्यपि निकट हृदय निज रहे सकल भरि पूरि॥ दुइज द्वैत-मति छाँड़ि चरहि महि-मंडल धीर। बिगत मोह माया मद हृदय बसत रघुबीर॥ तीज त्रिगुन-पर परम पुरुष श्रीरमन मुकुंद। गुन सुभाव त्यागे बिनु दुरलभ परमानंद॥ चौथि चारि परिहरहु बुद्धि मन, चित अहंकार। बिमल बिचार परमपद निज सुख सहज उदार॥ पाँचइँ पाँच परस, रस, सब्द, गंध अरु रूप। इन्ह कर कहा न कीजिए बहुरि परब भव-कूप॥ छठ षड्बर्ग करिय जय जनकसुता-पति लागि। रघुपति-कृपा-बारि बिनु नहीं बुताइ लोभागि॥ सातैं सप्तधातु-निर्मित तनु करिय बिचार। तेहि तनु केर एक फल, कीजै पर-उपकार॥ आठइँ आठ-प्रकृति-पर निर्बिकार श्रीराम। केहि प्रकार पाइय हरि, हृदय बसहिं बहु काम॥ नवमी नवद्वार-पुर बसि जेहि न आपु भल कीन्ह। ते नर जोनि अनेक भ्रमत दारून दुख लीन्ह॥ दसइँ दसहु कर संयम जो न करिय जिय जानि। साधन बृथा होइँ सब मिलहिं न सारँगपानि॥ एकादसी एक मन बस कै सेवहु जाइ। सोइ ब्रत कर फल पावै आवागमन नसाइ॥ द्वादसि दान देहु अस अभय होइ त्रैलोक। परहित निरत सो पारन बहुरि न ब्यापत सोक॥ तेरसि तीन अवस्था तजहु भजहु भगवंत। मन-क्रम-बचन-अगोचर, ब्यापक, ब्याप्य, अनंत॥ चौदसि चौदह भुवन अचर-चर रूप गोपाल। भेद गए बिनु रघुपति अति न हरहिं जग-जाल॥ पूनो प्रेम-भगति-रस हरि-रस जानहिं दास। सम सीतल गत-मान ज्ञानरत बिषय उदास॥ त्रिबिध सूल होलिय जरै, खेलिय अब फागु। जो जिय चहसि परम सुख, तौ यहि मारग लागु॥ श्रुति-पुरान-बुध-संमत चाँचरि चरित मुरारि। करि बिचार भव तरिय, परिय न कबहुँ जमधारि॥ संसय-समन दमन दुख सुखनिधान हरि एक। साधु-कृपा बिनु मिलहिं न करिय उपाय अनेक॥ भव-सागर कहँ नाव सुद्ध संतन के चरन। तुलसिदास प्रयास बिनु मिलहिं राम दुखहरन॥
कठिन शब्दों का अर्थ

परिवा = पहली तिथि; दुइज = दूसरी तिथि; त्रिगुन = सत्त्व-रजस्-तमस्; षड्बर्ग = छह आंतरिक विकार; नवद्वार = शरीर के नौ द्वार; पूनो = पूर्णिमा; चाँचरि = फाग-गीत की एक शैली।

सरल हिंदी अर्थ

इस विस्तृत विशेष पद में तुलसीदास पंचांग की तिथियों का आध्यात्मिक रूपक बनाते हैं। वे प्रथम तिथि पर प्रेम, द्वितीया पर द्वैत-त्याग, फिर गुणों से ऊपर उठने, इंद्रिय-संयम, षड्विकार-विजय, परोपकार, एकाग्रता, दान, शांति और अंत में पूर्णिमा के समान प्रेममयी भक्ति की बात कहते हैं। फाग और होली की काव्यात्मक छवियों से अंत में भीतर के दुःख और संशय को मिटाने का उत्सव रचते हैं।

विस्तृत भावार्थ एवं भक्ति-संदेश

यह केवल धार्मिक कैलेंडर का वर्णन नहीं, बल्कि दैनिक साधना की रूपकात्मक यात्रा है। विशेषकर सातवीं तिथि में परोपकार, एकादशी में एकाग्र चित्त तथा द्वादशी में निर्भय कर देने वाले दान का संदेश बहुत उपयोगी है। पद के सभी बीस दोहे मूल क्रम में रखे गए हैं, उन्हें संक्षेपित नहीं किया गया।

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इस भाग की पाँच प्रमुख जीवन-शिक्षाएँ

१. आत्मस्वीकार के बिना सुधार कठिन है

मन अपनी कमी देख सके तो विनय एक स्वस्थ बदलाव की शुरुआत बनती है। पद १७१ और १८५–१८७ इस साहस पर विशेष बल देते हैं।

२. संतत्व का रूप है संतोष और सेवा

पद १७२ में परहित, नम्रता, दूसरों के गुण देखना और सुख-दुःख में संतुलन—आध्यात्मिक जीवन की स्पष्ट कसौटियाँ हैं।

३. नाम-स्मरण और आचरण साथ चलें

रामनाम की महिमा केवल उच्चारण से जुड़ी नहीं; सत्य, उदारता, संयम और दूसरों के हित की भावना उसमें प्राण डालती है।

४. मानव जीवन के अवसर का सदुपयोग करें

पद १९८–२०२ समय की अनित्यता याद दिलाकर ईर्ष्या और निरर्थक भोग से हटने तथा परोपकार की ओर बढ़ने को प्रेरित करते हैं।

५. हर तिथि में आत्मिक साधना का संकेत

पद २०३ का रूपक प्रेम, अहंकार-त्याग, इंद्रिय-संयम, निर्भय दान, संतसंग और भक्ति से जुड़ी एक पूर्ण साधना-यात्रा प्रस्तुत करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री विनय पत्रिका भाग ६ में कितने पद हैं?

इस लेख में पद १७१ से २०३ तक क्रमवार ३३ पद हैं। उनके साथ अलग शब्दार्थ, सरल हिंदी अर्थ और भावार्थ दिया है।

इस भाग की मुख्य शिक्षा क्या है?

श्रीराम में प्रेम और भरोसा, संतोष एवं परोपकार, दिखावे से दूर आचरण और दुर्लभ मानव जीवन के सदुपयोग की शिक्षा मुख्य है।

पद १७२ की विशेषता क्या है?

यह संत-स्वभाव का व्यावहारिक चित्र है: यथालाभ संतोष, कटु वचन सहना, दूसरों के गुण देखना और मन-वचन-कर्म से परोपकार।

विनय पत्रिका का पद २०३ किस विषय पर है?

यह एक विशेष दीर्घ पद है, जो विभिन्न तिथियों के नाम लेकर प्रेम, द्वैत-त्याग, साधना, दान और संतसंग के आध्यात्मिक अर्थ समझाता है।

इस श्रृंखला का पिछला भाग कहाँ पढ़ें?

ऊपर भाग ५ (पद १३५–१७०) सहित भाग १ से ५ तक सभी प्रकाशित लेखों के लिंक दिए हैं।

इसके आगे कौन-सा भाग प्रकाशित होगा?

अगला प्रस्तावित भाग ७, पद २०४ से २३८ तक रहेगा। प्रकाशित होने के बाद उसका वास्तविक URL इस श्रृंखला में जोड़ा जाएगा।

मूल पाठ का संदर्भ: गोस्वामी तुलसीदास कृत विनय पत्रिका के पद १७१–२०३ का क्रम अवध्य के विनय पत्रिका मूल पाठ एवं पद २०३ के अन्य पाठ से मिलाया गया है। पुरानी कृतियों के अलग संस्करणों में शब्द-वर्तनी और छंद-विराम के पाठांतर संभव हैं। सरल अर्थ एवं भावार्थ इस लेख के लिए स्वतंत्र रूप से रचे गए हैं।

श्री सीताराम जय राम जय जय राम

अध्ययन के लिए अपने मित्रों और परिवार के साथ यह लेख साझा करें। अगले भाग में पद २०४ से २३८ तक इसी पाठ-परंपरा को आगे बढ़ाया जाएगा।

पिछला भाग: श्री विनय पत्रिका भाग ५ — पद १३५–१७०

अगला भाग ७ — पद २०४ से २३८ (शीघ्र प्रकाशित होगा)
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