श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 51 — लक्ष्मणजी का उत्साह और सीताजी की प्रार्थना
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 51
लक्ष्मणजी का उत्साह और सीताजी की प्रार्थना
इस भाग का प्रसंग: लक्ष्मणजी का उत्साह और सीताजी की प्रार्थना।
पाठ-सीमा: दोहा 253 के बाद से 258 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।
सकल लोक सब भूप डेराने । सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने ॥
गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं । मुदित भए पुनि पुनि पुलकाहीं ॥
सयनहिं रघुपति लखनु नेवारे । प्रेम समेत निकट बैठारे ॥
बिस्वामित्र समय सुभ जानी । बोले अति सनेहमय बानी ॥
उठहु राम भंजहु भवचापा । मेटहु तात जनक परितापा ॥
सुनि गुरु बचन चरन सिरु नावा । हरषु बिषादु न कछु उर आवा ॥
ठाढ़े भए उठि सहज सुभाएँ । ठवनि जुबा मृगराजु लजाएँ ॥
सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी के क्रोधभरे वचनों से पृथ्वी और दिग्गज डोलते हैं, राजा डरते हैं, जनकजी संकोच करते हैं और सीताजी आनंदित होती हैं। गुरु, मुनि और श्रीराम प्रसन्न होते हैं। श्रीराम संकेत से लक्ष्मणजी को शांत करके पास बैठाते हैं। शुभ समय जानकर विश्वामित्रजी कहते हैं—राम, उठो, शिवधनुष तोड़कर जनक का संताप मिटाओ। गुरु को प्रणाम कर श्रीराम हर्ष-विषाद से रहित, सहज भाव से उठते हैं।
बिकसे संत सरोज सब हरषे लोचन भृंग ॥२५४॥
सरल अर्थ: मंच रूपी उदयगिरि पर श्रीराम बालसूर्य की तरह उदित हुए। संतों के हृदय-कमल खिल गए और उनके नेत्र रूपी भौंरे आनंदित हुए।
मानी महिप कुमुद सकुचाने । कपटी भूप उलूक लुकाने ॥
भए बिसोक कोक मुनि देवा । बरिसहिं सुमन जनावहिं सेवा ॥
गुर पद बंदि सहित अनुरागा । राम मुनिन्ह सन आयसु मागा ॥
सहजहिं चले सकल जग स्वामी । मत्त मंजु बर कुंजर गामी ॥
चलत राम सब पुर नर नारी । पुलक पूरि तन भए सुखारी ॥
बंदि पितर सुर सुकृत सँभारे । जौं कछु पुन्य प्रभाउ हमारे ॥
तौ सिवधनु मृनाल की नाईं । तोरहुँ राम गनेस गोसाईं ॥
सरल भावार्थ: श्रीराम के उठते ही राजाओं की आशा रूपी रात मिटती है, अभिमानी कुमुद संकुचित होते हैं और कपटी उल्लू जैसे छिपते हैं। मुनि और देवता चक्रवाक की तरह शोकमुक्त होकर फूल बरसाते हैं। श्रीराम गुरु को प्रणाम कर मुनियों की अनुमति लेते हैं और सुंदर गजराज जैसी चाल से आगे बढ़ते हैं। नगरवासी पुलकित होकर अपने पुण्य का स्मरण करते हैं और गणेशजी से प्रार्थना करते हैं कि धनुष कमलनाल की तरह टूट जाए।
सीता मातु सनेह बस बचन कहइ बिलखाइ ॥२५५॥
सरल अर्थ: सीताजी की माता प्रेम से श्रीराम को देखती हैं और सखियों को पास बुलाकर स्नेह-विह्वल होकर अपनी चिंता कहती हैं।
कोउ न बुझाइ कहइ गुर पाहीं । ए बालक असि हठ भलि नाहीं ॥
रावन बान छुआ नहिं चापा । हारे सकल भूप करि दापा ॥
सो धनु राजकुअँर कर देहीं । बाल मराल कि मंदर लेहीं ॥
भूप सयानप सकल सिरानी । सखि बिधि गति कछु जाति न जानी ॥
बोली चतुर सखी मृदु बानी । तेजवंत लघु गनिअ न रानी ॥
कहँ कुंभज कहँ सिंधु अपारा । सोषेउ सुजसु सकल संसारा ॥
रबि मंडल देखत लघु लागा । उदयँ तासु तिभुवन तम भागा ॥
सरल भावार्थ: सीताजी की माता कहती हैं कि सब तमाशा देख रहे हैं; कोई गुरु को समझाता क्यों नहीं कि बालक से इतना कठिन धनुष उठवाना उचित नहीं? जिसे रावण-बाण तक न उठा सके, वह इस कोमल राजकुमार को दिया जा रहा है। चतुर सखी समझाती है कि तेजस्वी को छोटा नहीं मानना चाहिए—अगस्त्यजी ने विशाल समुद्र सुखाया और छोटा दिखने वाला सूर्य सारे जगत का अंधकार हरता है।
महामत्त गजराज कहुँ बस कर अंकुस खर्ब ॥२५६॥
सरल अर्थ: सखी कहती है कि छोटा मंत्र भी ब्रह्मा, विष्णु, शिव और देवताओं को अनुकूल कर सकता है; छोटा अंकुश बड़े मदमत्त हाथी को वश में करता है।
देबि तजिअ संसउ अस जानी । भंजब धनुष रामु सुनु रानी ॥
सखी बचन सुनि भै परतीती । मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती ॥
तब रामहि बिलोकि बैदेही । सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही ॥
मनहीं मन मनाव अकुलानी । होहु प्रसन्न महेस भवानी ॥
करहु सफल आपनि सेवकाई । करि हितु हरहु चाप गरुआई ॥
गननायक बरदायक देवा । आजु लगें कीन्हिउँ तुअ सेवा ॥
बार बार बिनती सुनि मोरी । करहु चाप गुरुता अति थोरी ॥
सरल भावार्थ: सखी कहती है कि फूलों के धनुष-बाण वाला कामदेव भी संसार को वश में करता है, इसलिए संदेह छोड़ें—श्रीराम धनुष अवश्य तोड़ेंगे। रानी का दुख मिटता और विश्वास बढ़ता है। सीताजी श्रीराम को देखकर मन में शिव-पार्वती से प्रार्थना करती हैं कि उनकी सेवा सफल करके धनुष का भार कम करें। वे गणेशजी से भी विनती करती हैं कि उनकी अब तक की सेवा स्वीकारकर धनुष बहुत हल्का कर दें।
भरे बिलोचन प्रेम जल पुलकावली सरीर ॥२५७॥
सरल अर्थ: सीताजी धीरज धारण करके श्रीराम को बार-बार निहारती और देवताओं को मनाती हैं। आँखों में प्रेमाश्रु भर जाते हैं और शरीर पुलकित होता है।
अहह तात दारुनि हठ ठानी । समुझत नहिं कछु लाभु न हानी ॥
सचिव सभय सिख देइ न कोई । बुध समाज बड़ अनुचित होई ॥
कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा । कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा ॥
बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा । सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा ॥
सकल सभा कै मति भै भोरी । अब मोहि संभुचाप गति तोरी ॥
निज जड़ता लोगन्ह पर डारी । होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी ॥
अति परिताप सीय मन माही । लव निमेष जुग सब सय जाहीं ॥
सरल भावार्थ: सीताजी श्रीराम की छवि देखकर प्रसन्न होती हैं, फिर पिता की कठिन प्रतिज्ञा से चिंता बढ़ती है। वे सोचती हैं कि सभा के समझदार लोग भी सलाह क्यों नहीं देते। वज्र से कठोर धनुष और कोमल श्याम किशोर की तुलना उन्हें भयभीत करती है, जैसे शिरीष के फूल से हीरा भेदना हो। वे धनुष से ही विनती करती हैं कि अपनी जड़ता लोगों में डालकर श्रीराम के लिए हल्का हो जाए। संताप में क्षण भी सौ युग जैसा लगता है।
खेलत मनसिज मीन जुग जनु बिधु मंडल डोल ॥२५८॥
सरल अर्थ: सीताजी कभी प्रभु और कभी भूमि की ओर देखती हैं। उनके चंचल नेत्र ऐसे सुशोभित हैं जैसे चंद्रमंडल में कामदेव की दो मछलियाँ खेल रही हों।

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