श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 52 — श्रीराम द्वारा शिवधनुष भंग

भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 52

श्रीराम द्वारा शिवधनुष भंग

इस भाग का प्रसंग: श्रीराम द्वारा शिवधनुष भंग।

पाठ-सीमा: दोहा 258 के बाद से 263 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 259 से पहले
गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी । प्रगट न लाज निसा अवलोकी ॥
लोचन जलु रह लोचन कोना । जैसे परम कृपन कर सोना ॥
सकुची ब्याकुलता बड़ि जानी । धरि धीरजु प्रतीति उर आनी ॥
तन मन बचन मोर पनु साचा । रघुपति पद सरोज चितु राचा ॥
तौ भगवानु सकल उर बासी । करिहिं मोहि रघुबर कै दासी ॥
जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू । सो तेहि मिलइ न कछु संहेहू ॥
प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना । कृपानिधान राम सबु जाना ॥
सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसे । चितव गरुरु लघु ब्यालहि जैसे ॥

सरल भावार्थ: संकोच से सीताजी बोल नहीं पातीं; आँसू भी आँखों के कोनों में रुकते हैं। वे विश्वास करती हैं कि यदि तन, मन और वचन से उनका प्रेम सच्चा है तो हृदयवासी भगवान उन्हें श्रीराम की सेविका बनाएँगे। सच्चे प्रेम वाले अवश्य मिलते हैं। श्रीराम उनका भाव जानकर धनुष को वैसे देखते हैं जैसे गरुड़ छोटे सर्प को देखता है।

दोहा 259
लखन लखेउ रघुबंसमनि ताकेउ हर कोदंडु।
पुलकि गात बोले बचन चरन चापि ब्रह्मांडु ॥२५९॥

सरल अर्थ: श्रीराम की धनुष पर दृष्टि पड़ते देखकर लक्ष्मणजी पुलकित हो जाते हैं। वे पृथ्वी को स्थिर रखने के भाव से ब्रह्माण्ड को पाँव से दबाकर बोलते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 260 से पहले
दिसकुंजरहु कमठ अहि कोला । धरहु धरनि धरि धीर न डोला ॥
रामु चहहिं संकर धनु तोरा । होहु सजग सुनि आयसु मोरा ॥
चाप सपीप रामु जब आए । नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए ॥
सब कर संसउ अरु अग्यानू । मंद महीपन्ह कर अभिमानू ॥
भृगुपति केरि गरब गरुआई । सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई ॥
सिय कर सोचु जनक पछितावा । रानिन्ह कर दारुन दुख दावा ॥
संभुचाप बड बोहितु पाई । चढे जाइ सब संगु बनाई ॥
राम बाहुबल सिंधु अपारू । चहत पारु नहि कोउ कड़हारू ॥

सरल भावार्थ: लक्ष्मणजी दिशाओं के हाथियों, कच्छप, शेष और वराह को पृथ्वी स्थिर रखने के लिए सावधान करते हैं, क्योंकि श्रीराम शिवधनुष तोड़ना चाहते हैं। सबके संशय, राजाओं का अभिमान, परशुरामजी का गर्व और जनक-सीता तथा रानियों की चिंता मानो शिवधनुष की नाव पर चढ़ते हैं; सामने श्रीराम के बाहुबल का अपार समुद्र है।

दोहा 260
राम बिलोके लोग सब चित्र लिखे से देखि।
चितई सीय कृपायतन जानी बिकल बिसेषि ॥२६०॥

सरल अर्थ: श्रीराम देखते हैं कि सब लोग चित्र की तरह स्थिर हैं। वे अत्यंत व्याकुल जानकीजी की ओर करुणापूर्ण दृष्टि करते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — सोरठा 261 से पहले
देखी बिपुल बिकल बैदेही । निमिष बिहात कलप सम तेही ॥
तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा । मुएँ करइ का सुधा तड़ागा ॥
का बरषा सब कृषी सुखानें । समय चुकें पुनि का पछितानें ॥
अस जियँ जानि जानकी देखी । प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी ॥
गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा । अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा ॥
दमकेउ दामिनि जिमि जब लयऊ । पुनि नभ धनु मंडल सम भयऊ ॥
लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें । काहुँ न लखा देख सबु ठाढ़ें ॥
तेहि छन राम मध्य धनु तोरा । भरे भुवन धुनि घोर कठोरा ॥
छंद
भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले।
चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले ॥
सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहीं।
कोदंड खंडेउ राम तुलसी जयति बचन उचारही ॥

सरल भावार्थ: सीताजी के लिए क्षण कल्प जैसा बीतता देखकर श्रीराम समझते हैं कि सहायता समय पर ही फल देती है। वे मन में गुरु को प्रणाम कर धनुष आसानी से उठा लेते हैं। उठता धनुष बिजली की तरह चमकता और खिंचकर आकाश के मंडल जैसा होता है। कोई उठाने, चढ़ाने और खींचने की गति नहीं देख पाता। प्रभु उसे बीच से तोड़ देते हैं। भयंकर ध्वनि से दिशाएँ, पृथ्वी और लोक कंपित होते हैं; सब श्रीराम की जय कहते हैं।

सोरठा 261
संकर चापु जहाजु सागरु रघुबर बाहुबलु।
बूड़ सो सकल समाजु चढ़ा जो प्रथमहिं मोह बस ॥२६१॥

सरल अर्थ: शिवधनुष रूपी जहाज श्रीराम के बाहुबल रूपी समुद्र में डूब गया। मोहवश पहले उस पर चढ़े अभिमान और संशय के सारे समूह भी उसके साथ डूब गए।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 262 से पहले
प्रभु दोउ चापखंड महि डारे । देखि लोग सब भए सुखारे ॥
कोसिकरुप पयोनिधि पावन । प्रेम बारि अवगाहु सुहावन ॥
रामरूप राकेसु निहारी । बढ़त बीचि पुलकावलि भारी ॥
बाजे नभ गहगहे निसाना । देवबधू नाचहिं करि गाना ॥
ब्रह्मादिक सुर सिद्ध मुनीसा । प्रभुहि प्रसंसहि देहिं असीसा ॥
बरिसहिं सुमन रंग बहु माला । गावहिं किंनर गीत रसाला ॥
रही भुवन भरि जय जय बानी । धनुषभंग धुनि जात न जानी ॥
मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी । भंजेउ राम संभुधनु भारी ॥

सरल भावार्थ: श्रीराम धनुष के दोनों टुकड़े भूमि पर रखते हैं। सब आनंदित होते हैं। विश्वामित्रजी का प्रेम-समुद्र श्रीराम रूपी चंद्रमा देखकर उमड़ता है। देवस्त्रियाँ नाचती-गाती हैं; ब्रह्मा, देवता, सिद्ध और मुनि प्रभु की प्रशंसा तथा आशीर्वाद देते हैं। रंग-बिरंगे पुष्प बरसते हैं और जयध्वनि इतनी फैलती है कि धनुष टूटने की ध्वनि भी उसमें विलीन हो जाती है।

दोहा 262
बंदी मागध सूतगन बिरुद बदहिं मतिधीर।
करहिं निछावरि लोग सब हय गय धन मनि चीर ॥२६२॥

सरल अर्थ: बंदी, मागध और सूत प्रभु का यश गाते हैं। लोग घोड़े, हाथी, धन, मणियाँ और वस्त्र निछावर करते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 263 से पहले
झाँझि मृदंग संख सहनाई । भेरि ढोल दुंदुभी सुहाई ॥
बाजहिं बहु बाजने सुहाए । जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाए ॥
सखिन्ह सहित हरषी अति रानी । सूखत धान परा जनु पानी ॥
जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई । पैरत थकें थाह जनु पाई ॥
श्रीहत भए भूप धनु टूटे । जैसें दिवस दीप छबि छूटे ॥
सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती । जनु चातकी पाइ जलु स्वाती ॥
रामहि लखनु बिलोकत कैसें । ससिहि चकोर किसोरकु जैसें ॥
सतानंद तब आयसु दीन्हा । सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा ॥

सरल भावार्थ: झाँझ, मृदंग, शंख, शहनाई और ढोल आदि बजते हैं; युवतियाँ मंगलगीत गाती हैं। रानी को सूखे धान पर पानी पड़ने जैसा सुख और जनकजी को तैरते-तैरते धरती मिलने जैसा चैन मिलता है। अभिमानी राजाओं का तेज घटता है। सीताजी चातकी को स्वाति जल मिलने जैसा आनंद पाती हैं। लक्ष्मणजी चकोर की तरह प्रभु को निहारते हैं। शतानंदजी के कहने पर सीताजी श्रीराम की ओर चलती हैं।

दोहा 263
संग सखीं सुदंर चतुर गावहिं मंगलचार।
गवनी बाल मराल गति सुषमा अंग अपार ॥२६३॥

सरल अर्थ: चतुर, सुंदर सखियाँ मंगलगीत गाती हुई साथ चलती हैं। सीताजी बालहंस जैसी चाल से जाती हैं; अंग-अंग पर अपार शोभा है।

॥ श्री सीताराम ॥
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