श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 42 में श्रीराम के चरणस्पर्श से अहल्या-उद्धार, उनकी भावपूर्ण श्रीराम-स्तुति और प्रभु की करुणा का सुंदर प्रसंग पढ़ें।

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 42

अहल्या-उद्धार और अहल्या की श्रीराम-स्तुति

कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 41 दोहा 210 पर समाप्त हुआ था। अब श्रीराम के चरणस्पर्श से अहल्या का उद्धार और उनकी स्तुति आती है।
छंद 1
परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तपपुंज सही।
देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही॥
अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवइ बचन कही।
अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही॥
सरल अर्थ: श्रीराम के पवित्र चरणों का स्पर्श होते ही शोक का नाश हुआ और तप की मूर्ति अहल्या अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुईं। रघुनाथजी को देखकर वे हाथ जोड़कर खड़ी रहीं; प्रेम से शरीर पुलकित हुआ, वाणी रुक गई और नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे।
छंद 2
धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपाँ भगति पाई।
अति निर्मल बानीं अस्तुति ठानी ग्यानगम्य जय रघुराई॥
मै नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई।
राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई॥
सरल अर्थ: अहल्या ने धीरज धरकर प्रभु को पहचाना और उनकी कृपा से भक्ति पाई। निर्मल वाणी से वे श्रीराम की स्तुति करती हुई स्वयं को उनकी शरण में समर्पित करती हैं।
छंद 3
मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना।
देखेउँ भरि लोचन हरि भवमोचन इहइ लाभ संकर जाना॥
बिनती प्रभु मोरी मैं मति भोरी नाथ न मागउँ बर आना।
पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना॥
सरल अर्थ: अहल्या शाप को भी अनुग्रह मानती हैं क्योंकि उसी कारण उन्हें भवबंधन से मुक्त करने वाले प्रभु के दर्शन मिले। वे केवल यही वर चाहती हैं कि उनका मन प्रभु के चरणकमलों के प्रेमरस में सदा अनुरक्त रहे।
छंद 4
जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भई सिव सीस धरी।
सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी॥
एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी।
जो अति मन भावा सो बरु पावा गै पतिलोक अनंद भरी॥
सरल अर्थ: अहल्या प्रभु के उन चरणों की महिमा कहती हैं जिनसे गंगा प्रकट हुईं, जिन्हें शिवजी ने धारण किया और ब्रह्माजी पूजते हैं। प्रभु के चरणों में बार-बार प्रणाम कर मनचाहा वर पाकर वे आनंदपूर्वक पतिलोक को चली गईं।
दोहा 211
अस प्रभु दीनबंधु हरि कारन रहित दयाल।
तुलसिदास सठ तेहि भजु छाड़ि कपट जंजाल॥२११॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी मन को समझाते हैं कि श्रीराम दीनों के बंधु और बिना कारण दया करने वाले प्रभु हैं; इसलिए कपट और जंजाल छोड़कर उन्हीं का भजन करना चाहिए।
भाग 42 की समाप्ति: दोहा 211 पर अहल्या-उद्धार का प्रसंग पूर्ण होता है।

अगला भाग: श्रीराम-लक्ष्मण विश्वामित्रजी के साथ गंगाजी की ओर चलते हैं और आगे विदेह/जनकपुर की यात्रा होती है।

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