जय जय गिरिवरराज किशोरी | सीता जी की गौरी स्तुति | रामचरितमानस अर्थ सहित

🌺 श्रीरामचरितमानस • बालकाण्ड

जय जय गिरिवरराज किशोरी — सीता जी की गौरी स्तुति

पुष्पवाटिका में प्रभु श्रीराम के दर्शन के बाद माता सीता द्वारा माता गौरी से की गई पावन प्रार्थना, संपूर्ण प्रसंग और सरल हिंदी अर्थ सहित।

माता सीता ने गौरी स्तुति कब की?

श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में जनकपुर की पुष्पवाटिका का अत्यंत सुंदर प्रसंग आता है। माता सीता अपनी सखियों के साथ गौरी पूजन के लिए आई थीं। इसी वाटिका में उन्होंने पहली बार प्रभु श्रीराम को देखा।

श्रीराम के दिव्य स्वरूप को देखकर उनका मन प्रेम से भर गया। उसी समय उन्हें अपने पिता महाराज जनक का वह प्रण भी स्मरण हुआ कि जो शिवजी के महान धनुष को उठाकर तोड़ेगा, उसी से सीता का विवाह होगा।

माता सीता श्रीराम की छवि को हृदय में धारण करके पुनः माता भवानी के मंदिर में गईं और हाथ जोड़कर प्रार्थना करने लगीं।
🌸 पुष्पवाटिका में श्रीराम के दर्शन
🏹 पिता जनक के प्रण का स्मरण
🙏 गौरी माता से प्रार्थना
🌿 गौरी मंदिर लौटती हैं माता सीता
जानि कठिन सिवचाप बिसूरति।
चली राखि उर स्यामल मूरति॥

प्रभु जब जात जानकी जानी।
सुख सनेह सोभा गुन खानी॥
सरल अर्थ: शिवधनुष को अत्यंत कठिन जानकर माता सीता के मन में चिंता हुई। फिर भी वे श्रीराम की साँवली छवि को अपने हृदय में धारण करके चलीं।
🙏 भवानीजी के चरणों में प्रार्थना
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही।
चारु चित भीतीं लिख लीन्ही॥

गई भवानी भवन बहोरी।
बंदि चरन बोली कर जोरी॥
सरल अर्थ: माता सीता ने श्रीराम के स्वरूप को प्रेमरूपी कोमल स्याही से अपने सुंदर हृदय में अंकित कर लिया। फिर वे दोबारा माता भवानी के मंदिर गईं, उनके चरणों की वंदना की और हाथ जोड़कर स्तुति करने लगीं।

🌺 सीता जी कृत गौरी स्तुति

अब माता सीता माता पार्वती की महिमा का वर्णन करते हुए अपनी प्रार्थना आरंभ करती हैं।
01 • माता गौरी की जय
जय जय गिरिबरराज किसोरी।
जय महेस मुख चंद चकोरी॥

जय गज बदन षड़ानन माता।
जगत जननि दामिनि दुति गाता॥
सरल अर्थ: हे पर्वतराज हिमवान की पुत्री माता पार्वती! आपकी जय हो। हे भगवान शिव के मुखरूपी चंद्रमा को प्रेम से निहारने वाली चकोरी! आपकी जय हो। हे श्रीगणेश और कार्तिकेय की माता! हे जगतजननी, जिनकी कांति बिजली के समान तेजस्वी है, आपकी जय हो।
02 • माता की अनंत महिमा
नहिं तव आदि मध्य अवसाना।
अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना॥

भव भव बिभव पराभव कारिनि।
बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि॥
सरल अर्थ: हे माता! आपका न आदि है, न मध्य और न अंत। आपकी अनंत महिमा को वेद भी पूर्ण रूप से नहीं जान सकते। आप सृष्टि के उत्पन्न होने, पालन और परिवर्तन की शक्ति हैं तथा अपनी स्वतंत्र शक्ति से संसार में लीला करती हैं।
03 • गौरीजी की महिमा का दोहा
पतिदेवता सुतीय महुँ मातु प्रथम तव रेख।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष॥
सरल अर्थ: हे माता! आदर्श पतिव्रता नारियों में आपका स्थान सबसे श्रेष्ठ माना गया है। आपकी अनंत महिमा का पूर्ण वर्णन हजारों सरस्वती और शेषनाग भी नहीं कर सकते।
04 • माता की सेवा से चार पुरुषार्थ
सेवत तोहि सुलभ फल चारी।
बरदायनी पुरारि पिआरी॥

देबि पूजि पद कमल तुम्हारे।
सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे॥
सरल अर्थ: हे वर देने वाली और भगवान शिव की प्रिय देवी! आपकी सेवा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ सहज प्राप्त होते हैं। देवता, मनुष्य और मुनि आपके चरणकमलों की पूजा करके आनंद पाते हैं।
05 • सीता जी अपने मनोरथ की बात कहती हैं
मोर मनोरथु जानहु नीकें।
बसहु सदा उर पुर सबही कें॥

कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं।
अस कहि चरन गहे बैदेहीं॥
सरल अर्थ: माता सीता कहती हैं—हे माता! आप मेरे मन की इच्छा को अच्छी तरह जानती हैं, क्योंकि आप सभी के हृदय में निवास करती हैं। इसलिए मैंने अपनी मनोकामना को शब्दों में प्रकट नहीं किया। इतना कहकर जानकीजी ने माता गौरी के चरण पकड़ लिए।

🌸 माता गौरी प्रसन्न हुईं

माता सीता की विनम्रता और प्रेम से भवानीजी प्रसन्न हो गईं। मानस में वर्णन आता है कि प्रतिमा की माला खिसक गई और मूर्ति मुस्कुराई। माता सीता ने उस माला को प्रसाद मानकर आदरपूर्वक सिर पर धारण किया।
06 • गौरीजी की प्रसन्नता
बिनय प्रेम बस भई भवानी।
खसी माल मूरति मुसुकानी॥

सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ।
बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ॥
सरल अर्थ: सीता जी के विनय और प्रेम से माता भवानी प्रसन्न हुईं। प्रतिमा की माला खिसक पड़ी और मूर्ति मुस्कुराई। सीता जी ने उस प्रसाद को आदरपूर्वक सिर पर धारण किया। तब गौरीजी हर्षपूर्वक आशीर्वाद देने लगीं।
🌺 माता गौरी का सीता जी को आशीर्वाद
सुनु सिय सत्य असीस हमारी।
पूजिहि मन कामना तुम्हारी॥

नारद बचन सदा सुचि साचा।
सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा॥
सरल अर्थ: हे सीता! मेरा सच्चा आशीर्वाद सुनो—तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। नारदजी का वचन पवित्र और सत्य है। जिस वर में तुम्हारा मन अनुरक्त हुआ है, वही तुम्हें प्राप्त होगा।
07 • “मनु जाहिं राचेउ...” — प्रसिद्ध आशीर्वाद
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो॥

एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली॥
सरल अर्थ: माता गौरी कहती हैं—जिस सुंदर साँवले वर में तुम्हारा मन लगा है, वही तुम्हें प्राप्त होगा। वह करुणा का भंडार, सुजान और तुम्हारे शील तथा प्रेम को जानने वाला है। गौरीजी का यह आशीर्वाद सुनकर सीता जी और उनकी सखियाँ बहुत प्रसन्न हुईं। सीता जी ने भवानीजी की बार-बार पूजा की और प्रसन्न मन से राजमहल लौट गईं।
08 • प्रसंग का मंगलमय समापन
जानि गौरि अनुकूल सिय हिय हरषु न जाइ कहि।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे॥
सरल अर्थ: गौरीजी को अपने अनुकूल जानकर माता सीता को इतना आनंद हुआ कि उसका वर्णन करना कठिन है। उनके बाएँ अंगों में मंगलसूचक स्पंदन होने लगे।

🙏 इस प्रसंग का भक्ति संदेश

गौरी स्तुति का यह प्रसंग केवल मनोकामना की प्रार्थना नहीं है। माता सीता अपने मन की इच्छा को माता के सामने शब्दों में भी नहीं रखतीं, क्योंकि उन्हें विश्वास है कि जगज्जननी उनके हृदय को पहले से जानती हैं। इसमें विनम्रता, निष्कपट प्रेम, ईश्वर पर विश्वास और पूर्ण समर्पण की सुंदर शिक्षा मिलती है।

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