श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 14 — नारद का उपाय, शिव-वर का रहस्य और पार्वती तप का संकल्प

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 14

नारद का उपाय • शिव-वर का रहस्य • मैना की चिंता • पार्वती तप का संकल्प

भाग 13 दोहा 68 पर समाप्त हुआ था। यह भाग उसी के ठीक बाद से आगे बढ़ता है—नारदजी शिवजी को पार्वती के योग्य वर बताते हैं, हिमवान और मैना का संशय दूर होता है और पार्वतीजी तपस्या के लिए प्रस्थान करती हैं।
चौपाई
तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करै जौं दैउ सहाई॥
जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहि उमहि तस संसय नाहीं॥१॥
सरल अर्थ: नारदजी कहते हैं कि भाग्य अटल है, फिर भी एक उपाय है। पार्वतीजी को वही वर मिलेगा जिसका उन्होंने संकेत किया है।
चौपाई
जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने॥
जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषउ गुन सम कह सबु कोई॥२॥
सरल अर्थ: नारदजी बताते हैं कि वर के जिन लक्षणों को सामान्य दृष्टि से दोष समझा जा रहा है, वे शिवजी में हैं; शिव से संबंध होने पर वही लक्षण महिमा बन जाते हैं।
चौपाई
जौं अहि सेज सयन हरि करहीं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहीं॥
भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मंद कहत कोउ नाहीं॥३॥
सरल अर्थ: समर्थ और दिव्य सत्ता को केवल बाहरी आचरण से नहीं आँका जाता। नारदजी उदाहरणों से यही बात समझाते हैं।
चौपाई
सुभ अरु असुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई॥
समरथ कहुँ नहिं दोषु गोसाईं। रबि पावक सुरसरि की नाईं॥४॥
सरल अर्थ: गंगा में अनेक प्रकार का जल मिलने पर भी उसकी पवित्रता नष्ट नहीं मानी जाती। इसी प्रकार समर्थ परम तत्त्व को साधारण कसौटी से नहीं समझना चाहिए।
दोहा 69
जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान।
परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव कि ईस समान॥६९॥
सरल अर्थ: यहाँ सावधानी दी गई है कि ईश्वर के विशिष्ट आचरण की अहंकारपूर्वक नकल नहीं करनी चाहिए; जीव और ईश्वर की सामर्थ्य समान नहीं है।
चौपाई
सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना॥
सुरसरि मिलें सो पावन जैसें। ईस अनीसहि अंतरु तैसें॥१॥
सरल अर्थ: उदाहरण द्वारा ईश्वर और सामान्य जीव की सामर्थ्य के अंतर को समझाया गया है।
चौपाई
संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना॥
दुराराध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू॥२॥
सरल अर्थ: नारदजी स्पष्ट करते हैं कि शिवजी सर्वसमर्थ हैं और उनसे विवाह सर्वथा कल्याणकारी होगा। वे तप से प्रसन्न होकर शीघ्र कृपा करते हैं।
चौपाई
जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी॥
जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ सिव तजि दूसर नाहीं॥३॥
सरल अर्थ: यदि पार्वती तप करें तो शिवजी की कृपा से उनका मनोरथ सिद्ध हो सकता है। पार्वती के लिए शिव से श्रेष्ठ दूसरा वर नहीं है।
चौपाई
बर दायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन॥
इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें॥४॥
सरल अर्थ: शिवजी शरणागतों के दुःख हरने वाले और कृपासागर हैं। नारदजी शिव-आराधना को पार्वती के इच्छित फल का मार्ग बताते हैं।
दोहा 70
अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहि दीन्हि असीस।
होइहि यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस॥७०॥
सरल अर्थ: नारदजी हरि का स्मरण करके पार्वती को आशीर्वाद देते हैं और हिमवान को संशय छोड़ने को कहते हैं।
चौपाई
कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयऊ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ॥
पतिहि एकांत पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना॥१॥
सरल अर्थ: नारदजी विदा हो जाते हैं। बाद में मैना हिमवान से कहती हैं कि वे मुनि के गूढ़ वचनों का आशय पूरी तरह नहीं समझ पाईं।
चौपाई
जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा॥
न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्रानपिआरी॥२॥
सरल अर्थ: मैना चाहती हैं कि पार्वती का विवाह योग्य घर, वर और कुल में हो; वे बेटी के हित को सर्वोपरि रखती हैं।
चौपाई
जौं न मिलिहि बरु गिरिजहि जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहि सबु लोगू॥
सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेहिं न बहोरि होइ उर दाहू॥३॥
सरल अर्थ: मैना हिमवान से आग्रह करती हैं कि विवाह का निर्णय सोच-विचारकर किया जाए ताकि बाद में दुःख न हो।
चौपाई
अस कहि परी चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा॥
बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं॥४॥
सरल अर्थ: हिमवान प्रेमपूर्वक समझाते हैं कि असंभव घटना संभव हो सकती है, पर नारदजी का वचन मिथ्या नहीं होगा।
दोहा 71
प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान।
पारबतिहि निरमयउ जेहिं सोइ करिहि कल्यान॥७१॥
सरल अर्थ: हिमवान मैना को चिंता छोड़कर भगवान का स्मरण करने को कहते हैं—जिसने पार्वती को बनाया है, वही उनका कल्याण करेगा।
चौपाई
अब जौं तुम्हहि सुता पर नेहू। तौ अस जाइ सिखावन देहू॥
करै सो तपु जेहिं मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटिहि कलेसू॥१॥
सरल अर्थ: हिमवान कहते हैं कि पार्वती को ऐसा तप करने की प्रेरणा दें जिससे शिवजी की प्राप्ति हो।
चौपाई
नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुंदर सब गुन निधि बृषकेतू॥
अस बिचारि तुम्ह तजहु असंका। सबहि भाँति संकरु अकलंका॥२॥
सरल अर्थ: वे बताते हैं कि नारदजी के वचन गहरे अर्थ वाले हैं और शिवजी गुणों के भंडार तथा निष्कलंक हैं।
चौपाई
सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं॥
उमहि बिलोकि नयन भरे बारी। सहित सनेह गोद बैठारी॥३॥
सरल अर्थ: मैना को धैर्य मिलता है। वे पार्वती के पास जाकर उन्हें स्नेहपूर्वक गोद में बैठाती हैं।
चौपाई
बारहिं बार लेति उर लाई। गदगद कंठ न कछु कहि जाई॥
जगत मातु सर्बग्य भवानी। मातु सुखद बोलीं मृदु बानी॥४॥
सरल अर्थ: मैना भावुक होकर पार्वती को बार-बार हृदय से लगाती हैं। पार्वती माता की स्थिति समझकर कोमल वाणी में बोलती हैं।
दोहा 72
सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि।
सुंदर गौर सुबिप्रबर अस उपदेसेउ मोहि॥७२॥
सरल अर्थ: पार्वती अपनी माता को स्वप्न बताती हैं जिसमें एक तेजस्वी ब्राह्मण ने उन्हें तप करने का उपदेश दिया।
चौपाई
करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी॥
मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा॥१॥
सरल अर्थ: पार्वती नारदजी का कथन सत्य मानकर तप करने का निश्चय करती हैं; माता-पिता को भी यह मार्ग उचित लगता है।
चौपाई
तपबल रचइ प्रपंचु बिधाता। तपबल बिष्नु सकल जग त्राता॥
तपबल संभु करहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा॥२॥
सरल अर्थ: तप की महिमा बताते हुए कहा गया है कि सृष्टि के महान कार्य भी तपबल से जुड़े हैं।
चौपाई
तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तपु अस जियँ जानी॥
सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहि हँकारी॥३॥
सरल अर्थ: पार्वती तप को साधना का आधार बताती हैं। मैना यह सुनकर हिमवान को बुलाकर स्वप्न की बात बताती हैं।
चौपाई
मातु पितहि बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाई॥
प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता॥४॥
सरल अर्थ: पार्वती माता-पिता को समझाकर तपस्या के लिए प्रस्थान करती हैं, जबकि परिवार उनके वियोग से भावुक हो उठता है।
दोहा 73
बेदसिरा मुनि आइ तब सबहि कहा समुझाइ।
पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहि पाइ॥७३॥
सरल अर्थ: मुनि आकर परिवार को समझाते हैं और पार्वतीजी की महिमा बताते हैं, जिससे सबको धैर्य मिलता है।

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