श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 26 — माया का भ्रम, श्रीराम का परमात्म स्वरूप और अवतार की भूमिका
श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 26 माया का भ्रम • श्रीराम का परमात्म स्वरूप • उमा का संशय-निवारण • अवतार की भूमिका भाग 25 दोहा 116 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ता है—शिवजी जीव के भ्रम और माया का रहस्य समझाते हैं, श्रीराम को दशरथनंदन और वही परमात्मा सिद्ध करते हैं, उमा का संशय पूर्णतः मिटता है और कथा रामावतार के कारण की भूमिका तक पहुँचती है। चौपाई निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्रानी॥ जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेउ भानु कहहिं कुबिचारी॥ सरल अर्थ: अज्ञानी अपने भ्रम को न पहचानकर उसे प्रभु पर आरोपित करते हैं; जैसे बादलों को देखकर कोई कहे कि सूर्य ही ढक गया। चौपाई चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ॥ उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा॥ सरल अर्थ: दृष्टि-दोष से जैसे एक चंद्रमा दो दिखाई देता है, वैसे ही श्रीराम के विषय में मोह जीव की अपनी दृष्टि का भ्रम है। चौपाई बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता॥ सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई॥ सरल अर्थ: इंद्रियाँ, उनके देवता और जीव चेतना की विभिन्न अवस्थाएँ हैं; इन सबक...