श्रीराम भक्ति, सत्संग और रामनाम की महिमा — श्रीरामचरितमानस के दिव्य छंद, दोहे और श्लोक भावार्थ सहित
☘️ जय श्री सीताराम ☘️ श्रीराम भक्ति, सत्संग और रामनाम की महिमा — श्रीरामचरितमानस के दिव्य छंद, दोहे और श्लोक भावार्थ सहित भक्त के गुण स्वयं भगवान क्यों कहते हैं? श्रीराम का यश सुनने का फल क्या है? मन को विषयों से बचाकर सत्संग की ओर कैसे ले जाएँ? और रामनाम को अमृत क्यों कहा गया है? इन पावन पदों में भक्ति-पथ का अत्यंत सुंदर संदेश छिपा है। 📜 इस लेख में 1. नारदजी और भक्त-महिमा का छंद 2. श्रीराम के यश का फल — दोहा 46 (क) 3. काम-मद त्याग और सत्संग — दोहा 46 (ख) 4. श्रीराम-लक्ष्मण की दिव्य स्तुति 5. श्रीरामनामामृत की महिमा 6. इन सभी पदों का संयुक्त संदेश 🌺 नारदजी और भक्त-महिमा कहि सक न सारद सेष नारद सुनत पद पंकज गहे। अस दीनबंधु कृपाल अपने भगत गुन निज मुख कहे॥ सिरु नाइ बारहिं बार चरनन्हि ब्रह्मपुर नारद गए। ते धन्य तुलसीदास आस बिहाइ जे हरि रँग रँए॥ भावार्थ-: 'शेष और शारदा भी नहीं कह सकते' यह सुनते ही नारदजी ने श्री रामजी के चरणकमल पकड़ लिए। दीनबंधु कृपालु प्रभु ने इस प्रकार अपने श्रीमुख से अपने भक्तों के गुण कहे। भगवान के चरणों में बार-बार सिर नवाकर नारदजी ब्र...