श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 6 — रामनाम का प्रभाव, तुलसी विनय और रामकथा की गुरु परंपरा

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श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड • भाग 6
रामनाम का प्रभाव • कलियुग में नाम • तुलसी-विनय • रामकथा की गुरु-परंपरा
भाग 5 के दोहा 25 के ठीक बाद से यह भाग आरंभ होता है। रामनाम के प्रभाव के उदाहरणों से आगे बढ़ते हुए कथा तुलसीदासजी की विनय और रामकथा की गुरु-परंपरा तक पहुँचती है।
नाम-प्रसाद की महिमा
नाम प्रसाद सम्भु अबिनासी। साज अमंगल मंगल रासी॥
सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी। नाम प्रसाद ब्रह्म सुख भोगी॥
सरल अर्थ — रामनाम की कृपा से शिवजी मंगल के धाम हैं और शुकदेव, सनकादि, सिद्ध, मुनि तथा योगी ब्रह्मानंद का अनुभव करते हैं।
नारद और प्रह्लाद
नारद जानेउ नाम प्रतापू। जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू॥
नाम जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू। भगत सिरोमनि भे प्रहलादू॥
सरल अर्थ — नारदजी ने नाम का प्रताप जाना और प्रह्लाद नाम-स्मरण के कारण भक्त-शिरोमणि बने।
ध्रुव और हनुमान
ध्रुव सगलानि जपेउ हरि नाऊँ। पायउ अचल अनूपम ठाऊँ॥
सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपने बस करि राखे रामू॥
सरल अर्थ — ध्रुव ने नाम-स्मरण से अचल पद पाया और हनुमानजी की अनन्य नाम-भक्ति ने उन्हें श्रीराम का परम प्रिय बनाया।
नाम का अपार प्रभाव
अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ। भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ॥
कहउँ कहाँ लगि नाम बड़ाई। रामु न सकहिं नाम गुन गाई॥
सरल अर्थ — नाम की महिमा के उदाहरण देकर तुलसीदासजी कहते हैं कि इसकी बड़ाई का पूर्ण वर्णन करना संभव नहीं।
दोहा 26
नामु राम को कल्पतरु कलि कल्यान निवासु।
जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु॥२६॥
सरल अर्थ — कलियुग में रामनाम को कल्पवृक्ष और कल्याण का निवास कहा गया है; तुलसीदासजी अपने जीवन-परिवर्तन का श्रेय भी नाम-स्मरण को देते हैं।
चारों युगों में नाम
चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका। भए नाम जपि जीव बिसोका॥
बेद पुरान संत मत एहू। सकल सुकृत फल राम सनेहू॥
सरल अर्थ — वेद, पुराण और संतमत में रामप्रेम को पुण्यों का श्रेष्ठ फल और नाम को शोक मिटाने वाला आधार कहा गया है।
युगधर्म और कलियुग
ध्यानु प्रथम जुग मख बिधि दूजें। द्वापर परितोषत प्रभु पूजें॥
कलि केवल मल मूल मलीना। पाप पयोनिधि जन मन मीना॥
सरल अर्थ — सत्ययुग, त्रेता और द्वापर के अलग साधन बताए गए हैं, जबकि कलियुग में मन अनेक विकारों से घिरा हुआ बताया गया है।
कलियुग में नाम का आश्रय
नाम कामतरु काल कराला। सुमिरत समन सकल जग जाला॥
राम नाम कलि अभिमत दाता। हित परलोक लोक पितु माता॥
सरल अर्थ — कठिन कलियुग में रामनाम को कामना पूर्ण करने वाला और लोक-परलोक में हितकारी आश्रय कहा गया है।
एकमात्र अवलंब
नहिं कलि करम न भगति बिबेकू। राम नाम अवलंबन एकू॥
कालनेमि कलि कपट निधानू। नाम सुमति समरथ हनुमानू॥
सरल अर्थ — कलियुग के छल-कपट के सामने नाम को समर्थ हनुमान के समान रक्षक रूपक में प्रस्तुत किया गया है।
दोहा 27
राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल।
जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल॥२७॥
सरल अर्थ — रामनाम को नृसिंह, कलियुग को हिरण्यकशिपु और जापक को प्रह्लाद की उपमा देकर नाम की रक्षक शक्ति समझाई गई है।
हर भाव में नाम
भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ। नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ॥
सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा। करउँ नाइ रघुनाथहि माथा॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी कहते हैं कि नाम-स्मरण मंगलकारी है; उसी नाम को स्मरण करके वे श्रीराम के गुणों की कथा आरंभ करते हैं।
प्रभु की कृपा पर भरोसा
मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपा अघाती॥
राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो। निज दिसि देखि दयानिधि पोसो॥
सरल अर्थ — कवि अपनी योग्यता पर नहीं, श्रीराम की असीम कृपा और दयालु स्वभाव पर भरोसा रखते हैं।
स्वामी प्रेम पहचानते हैं
लोकहुँ बेद सुसाहिब रीती। बिनय सुनत पहिचानत प्रीती॥
गनी गरीब ग्राम नर नागर। पंडित मूढ़ मलीन उजागर॥
सरल अर्थ — श्रेष्ठ स्वामी बाहरी स्थिति नहीं, विनय और भीतर के प्रेम को पहचानता है—यही भाव यहाँ रखा गया है।
कवि और राजा की उपमा
सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी। नृपहि सराहत सब नर नारी॥
साधु सुजान सुसील नृपाला। ईस अंस भव परम कृपाला॥
सरल अर्थ — जैसे लोग अपनी क्षमता के अनुसार राजा की प्रशंसा करते हैं, वैसे ही भक्त अपनी बुद्धि के अनुसार प्रभु का गुणगान करता है।
श्रीराम प्रेम से प्रसन्न
सुनि सनमानहि सबहि सुबानी। भनिति भगति नति गति पहिचानी॥
यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ। जान सिरोमनि कोसलराऊ॥
सरल अर्थ — जब सांसारिक राजा भी भाव पहचानता है, तब हृदय के ज्ञाता श्रीराम भक्त की भावना को और भी भली प्रकार जानते हैं।
कवि की दीनता
रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिन मनु मोतें॥
सरल अर्थ — श्रीराम निष्कपट प्रेम से प्रसन्न होते हैं; तुलसीदासजी अपने को अत्यंत दीन मानकर विनय करते हैं।
कृपालु स्वामी
सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु।
उपल किए जलजान जेहि सचिव सुमति कपि भालु॥
सरल अर्थ — जिन श्रीराम ने पत्थरों को सेतु का साधन और वानर-भालुओं को समर्थ सहयोगी बनाया, वे अपने दीन सेवक की प्रीति भी स्वीकार करेंगे।
दोहा 28
हौंहुँ कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास॥२८॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी अत्यंत विनम्रता से कहते हैं—स्वामी तो सीतानाथ जैसे हैं और सेवक मैं तुलसीदास जैसा।
अपनी कमी का स्वीकार
अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥
समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्ह नहिं सपनें॥
सरल अर्थ — कवि अपनी कमियों को स्वीकार करते हैं, पर उन्हें भरोसा है कि प्रभु दोष से अधिक भक्त के भाव को देखते हैं।
हृदय की भक्ति
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥
कहत नसाइ होइ हिय नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥
सरल अर्थ — वाणी में कमी हो सकती है, पर हृदय का भाव निर्मल हो तो अंतर्यामी श्रीराम उसे जानते और स्वीकारते हैं।
प्रभु सेवक की चूक नहीं धरते
रहति न प्रभु चित चूक किए की। करत सुरति सय बार हिए की॥
जेहि अघ बधेउ ब्याध इव बाली। फिरि सुकंठ सोइ कीन्हि कुचाली॥
सरल अर्थ — यहाँ श्रीराम के उस स्वभाव का वर्णन है जिसमें वे सेवक की चूक से अधिक उसके हृदय और प्रेम को स्मरण रखते हैं।
विभीषण पर कृपा
सोइ करतूति बिभीषन केरी। सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी॥
ते भरतहि भेंटत सनमाने। राजसभा रघुबीर बखाने॥
सरल अर्थ — विभीषण के प्रति श्रीराम की उदारता का उदाहरण देकर प्रभु के शील और कृपा की महिमा कही गई है।
प्रभु का शील
प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान।
तुलसी कहूँ न राम से साहिब सील निधान॥
सरल अर्थ — श्रीराम ने अपने सेवकों को अत्यंत सम्मान दिया; तुलसीदासजी उन्हें शील का अनुपम भंडार कहते हैं।
श्रीराम की अच्छाई
राम निकाई रावरी है सबही को नीक।
जौं यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक॥
सरल अर्थ — कवि विश्वास व्यक्त करते हैं कि श्रीराम की भलाई सबके लिए है, इसलिए उनके आश्रित तुलसी का भी कल्याण होगा।
रघुवर के निर्मल यश की ओर
एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिर नाइ।
बरनउँ रघुबर बिसद जस सुनि कलि कलुष नसाइ॥
सरल अर्थ — अपनी सीमाएँ कहकर और सबको प्रणाम करके तुलसीदासजी अब रघुनाथजी के निर्मल यश का विस्तार आरंभ करते हैं।
रामकथा की परंपरा
जागबलिक जो कथा सुहाई। भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई॥
कहिहउँ सोइ संबाद बखानी। सुनहु सकल सज्जन सुख मानी॥
सरल अर्थ — अब उस पवित्र संवाद की भूमिका आती है जिसे याज्ञवल्क्यजी ने भरद्वाज मुनि को सुनाया था।
शिव से कागभुशुण्डि तक
संभु कीन्ह यह चरित सुहावा। बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा॥
सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा। राम भगति अधिकारी चीन्हा॥
सरल अर्थ — रामकथा की गुरु-परंपरा में शिवजी से पार्वतीजी और फिर कागभुशुण्डिजी तक कथा पहुँचने का वर्णन है।
याज्ञवल्क्य और भरद्वाज
तेहि सन जागबलिक पुनि पावा। तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा॥
ते श्रोता बकता समसीला। समदरसी जानहिं हरिलीला॥
सरल अर्थ — कागभुशुण्डिजी से याज्ञवल्क्यजी और उनसे भरद्वाजजी तक कथा पहुँची; श्रोता और वक्ता दोनों हरिलीला के ज्ञाता बताए गए हैं।
ज्ञानी हरिभक्त
जानहिं तीनि काल निज ग्याना। करतल गत आमलक समाना॥
औरउ जे हरिभगत सुजाना। कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना॥
सरल अर्थ — महान ज्ञानी भक्त रामकथा को अलग-अलग रीति से कहते, सुनते और समझते हैं।
गुरु से सुनी कथा
मैं पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत।
समुझी नहिं तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी बताते हैं कि उन्होंने अपने गुरु से सूकरक्षेत्र में यह कथा सुनी, पर बाल्यावस्था में उसका गूढ़ अर्थ पूरी तरह नहीं समझ पाए।
दोहा 30
श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़।
किमि समुझउँ मैं जीव जड़ कलिमल ग्रसित बिमूढ़॥३०॥
सरल अर्थ — रामकथा गहन है और उसके आदर्श वक्ता-श्रोता ज्ञाननिधि होते हैं; तुलसीदासजी फिर अपनी विनम्रता प्रकट करते हैं।
🌺 भाग 6 का भाव-संदेश
रामनाम की महिमा केवल सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि नारद, प्रह्लाद, ध्रुव और हनुमान जैसे भक्तों के उदाहरणों से समझाई गई है। आगे तुलसीदासजी अपनी विनय के साथ उस रामकथा-परंपरा का परिचय देते हैं जो शिव-पार्वती, कागभुशुण्डि, याज्ञवल्क्य और भरद्वाज से होकर आगे बढ़ती है।
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बालकाण्ड भाग 7 — रामकथा की महिमा और मानस सरोवर का रूपक
॥ श्री सीताराम ॥ 🚩
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