श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 13 — वीरभद्र का यज्ञ-विध्वंस, पार्वती जन्म और नारद आगमन
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 13
वीरभद्र का यज्ञ-विध्वंस • पार्वती जन्म • नारद आगमन • पार्वती के भावी वर का संकेत
भाग 12 में सती के योगाग्नि से देहत्याग और दोहा 64 तक कथा पहुँची थी। यह भाग वहीं से आगे बढ़ते हुए वीरभद्र द्वारा यज्ञ-विध्वंस, सती के पार्वती रूप में पुनर्जन्म, देवर्षि नारद के आगमन और पार्वतीजी के भावी वर के संकेत तक की कथा प्रस्तुत करता है।
चौपाई
समाचार सब संकर पाए। बीरभद्रु करि कोप पठाए॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥
जग्य बिधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा॥
सरल अर्थ: सती के देहत्याग का समाचार पाकर शिवजी ने क्रोध में वीरभद्र को भेजा। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस किया और वहाँ उपस्थित देवताओं को उनके कर्म के अनुसार दंड मिला।
चौपाई
भे जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई॥
यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥
यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संछेप बखानी॥
सरल अर्थ: दक्ष के प्रसंग का परिणाम संसार में प्रसिद्ध हुआ। गोस्वामी तुलसीदासजी इस परिचित प्रसंग को संक्षेप में कहकर कथा को आगे बढ़ाते हैं।
चौपाई
सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम सिव पद अनुरागा॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥
तेहि कारन हिमगिरि गृह जाई। जनमीं पारबती तनु पाई॥
सरल अर्थ: देहत्याग के समय सती ने भगवान से जन्म-जन्मांतर तक शिवचरणों में प्रेम बने रहने का वर माँगा था। उसी वर के कारण वे हिमवान के घर पार्वती रूप में जन्मीं।
चौपाई
जब तें उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं॥
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे॥
जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे॥
सरल अर्थ: पार्वतीजी के जन्म से हिमालय प्रदेश में सिद्धि और संपदा की वृद्धि हुई। अनेक मुनियों ने वहाँ अपने सुंदर आश्रम बनाए।
दोहा 65
सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति।
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति॥६५॥
प्रगटीं सुंदर सैल पर मनि आकर बहु भाँति॥६५॥
सरल अर्थ: हिमालय पर अनेक प्रकार के वृक्ष सदा फूलों और फलों से युक्त रहने लगे तथा विविध प्रकार की मणियों की खानें प्रकट हुईं।
चौपाई
सरिता सब पुनीत जलु बहहीं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहीं॥
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥
सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा॥
सरल अर्थ: नदियों में पवित्र जल बहने लगा और पक्षी, पशु तथा भ्रमर सुखपूर्वक रहने लगे। जीवों ने स्वाभाविक वैर छोड़कर परस्पर प्रेम करना आरंभ किया।
चौपाई
सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ॥
नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥
नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू॥
सरल अर्थ: गिरिजा के आगमन से हिमालय उसी प्रकार शोभित हुआ जैसे रामभक्ति प्राप्त करके भक्त का जीवन शोभित होता है। वहाँ नित्य नए मंगल होने लगे।
चौपाई
नारद समाचार सब पाए। कौतुकहीं गिरि गेह सिधाए॥
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥
सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा॥
सरल अर्थ: देवर्षि नारद को पार्वतीजी के जन्म का समाचार मिला तो वे हिमवान के घर पहुँचे। पर्वतराज ने उनका अत्यंत आदरपूर्वक स्वागत किया।
चौपाई
नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सबु भवनु सिंचावा॥
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥
निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेली मुनि चरना॥
सरल अर्थ: हिमवान और मैना ने नारदजी को प्रणाम किया और अपनी पुत्री पार्वती को भी उनके चरणों में प्रणाम कराया।
दोहा 66
त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि।
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥६६॥
कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि॥६६॥
सरल अर्थ: हिमवान नारदजी से कहते हैं कि आप त्रिकालज्ञ और सर्वज्ञ हैं; कृपा करके हमारी पुत्री के गुण-दोष और भविष्य पर विचार कर बताइए।
चौपाई
कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारि सकल गुन खानी॥
सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥
सुंदर सहज सुसील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी॥
सरल अर्थ: नारदजी मुस्कराकर गूढ़ और मधुर वाणी में कहते हैं कि आपकी पुत्री गुणों की खान है—सुंदर, सहज, सुशील और बुद्धिमती है; उसके उमा, अंबिका और भवानी जैसे नाम होंगे।
चौपाई
सब लच्छन संपन्न कुमारी। होइहि संतत पियहि पिआरी॥
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥
सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि तें जसु पैहहिं पितु माता॥
सरल अर्थ: नारदजी बताते हैं कि पार्वती सभी शुभ लक्षणों से संपन्न होंगी, पति को अत्यंत प्रिय रहेंगी और उनका सौभाग्य अचल होगा।
चौपाई
होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिँ पतिब्रत असिधारा॥
एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़हहिँ पतिब्रत असिधारा॥
सरल अर्थ: पार्वतीजी संसार में पूजनीय होंगी। उनकी उपासना और स्मरण से भक्तों को प्रेरणा मिलेगी और उनका पतिव्रत आदर्श माना जाएगा।
चौपाई
सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुन दुइ चारी॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥
अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना॥
सरल अर्थ: गुणों का वर्णन करने के बाद नारदजी भावी वर के ऐसे लक्षण बताते हैं जो सामान्य दृष्टि में विचित्र या अवगुण जैसे प्रतीत होते हैं।
दोहा 67
जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष।
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥६७॥
अस स्वामी एहि कहँ मिलिहि परी हस्त असि रेख॥६७॥
सरल अर्थ: नारदजी कहते हैं कि हस्तरेखा के अनुसार पार्वतीजी को ऐसा पति मिलेगा जो योगी, जटाधारी, निष्काम और सांसारिक मानकों से अलग वेश वाला होगा।
चौपाई
सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहि उमा हरषानी॥
नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥
नारदहुँ यह भेदु न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना॥
सरल अर्थ: नारदजी के वचन सुनकर हिमवान और मैना चिंतित हो जाते हैं, पर पार्वतीजी के मन में प्रसन्नता उत्पन्न होती है क्योंकि उनका अंतःकरण शिवजी की ओर आकर्षित है।
चौपाई
सकल सखीं गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना॥
होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥
होइ न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो बचनु हृदयँ धरि राखा॥
सरल अर्थ: देवर्षि नारद के वचन असत्य नहीं होते—इस विश्वास से पार्वतीजी उन वचनों को हृदय में धारण कर लेती हैं।
चौपाई
उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू॥
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥
जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछँग बैठी पुनि जाई॥
सरल अर्थ: पार्वतीजी के हृदय में शिवचरणों के प्रति प्रेम जागता है, किंतु उन्हें यह भी लगता है कि शिवजी को प्राप्त करना अत्यंत कठिन होगा।
चौपाई
झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहि दंपति सखीं सयानी॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥
उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ॥
सरल अर्थ: हिमवान और मैना नारदजी के वचनों को सत्य मानते हुए उपाय पूछते हैं कि पुत्री के लिए शुभ मार्ग क्या हो सकता है।
दोहा 68
कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार।
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥६८॥
देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार॥६८॥
सरल अर्थ: नारदजी कहते हैं कि विधाता ने जो भाग्य में लिखा है उसे देव, दानव, मनुष्य, नाग या मुनि कोई मिटा नहीं सकता।
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