श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 12 — सती का दक्ष यज्ञ में जाना, शिव अपमान और योगाग्नि
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 12
सती का दक्ष यज्ञ में जाना • शिव अपमान • सती का क्रोध • योगाग्नि
भाग 11 में दक्ष के विशाल यज्ञ के आरंभ तक कथा पहुँची थी। यह भाग वहीं से आगे बढ़ते हुए सती के यज्ञ में जाने, शिवजी के अपमान को देखकर उनके आक्रोश और योगबल से देहत्याग तक की कथा प्रस्तुत करता है।
चौपाई
किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा॥
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥
बिष्नु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई॥
सरल अर्थ: दक्ष के निमंत्रण पर किन्नर, नाग, सिद्ध, गंधर्व और देवता अपनी पत्नियों सहित यज्ञ की ओर चले। विष्णु, ब्रह्मा और शिवजी इस यात्रा में सम्मिलित नहीं हुए।
चौपाई
सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुंदर बिधि नाना॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥
सुर सुंदरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवन छूटहिं मुनि ध्याना॥
सरल अर्थ: सती ने आकाश में अनेक सुंदर विमानों को जाते देखा। देवांगनाओं का मधुर गान वातावरण को उत्सवमय बना रहा था।
चौपाई
पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी॥
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥
जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एहीं॥
सरल अर्थ: सती ने शिवजी से इसका कारण पूछा। पिता दक्ष के यज्ञ का समाचार सुनकर उन्होंने वहाँ जाने की इच्छा प्रकट की।
चौपाई
पति परित्याग हृदयँ दुख भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी॥
बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥
बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी॥
सरल अर्थ: सती के हृदय में पहले से गहरा दुःख था। अपने अपराध को स्मरण करके वे संकोच और प्रेम से शिवजी से अनुमति माँगती हैं।
दोहा 61
पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ।
तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥६१॥
तौ मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ॥६१॥
सरल अर्थ: सती कहती हैं—यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं पिता के घर हो रहे इस बड़े उत्सव को देखने जाऊँ।
चौपाई
कहेहु नीक मोरेहूँ मन भावा। यह अनुचित नहिं नेवत पठावा॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं॥
दच्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरें बयर तुम्हउ बिसराईं॥
सरल अर्थ: शिवजी कहते हैं कि इच्छा स्वाभाविक है, लेकिन दक्ष ने निमंत्रण नहीं भेजा। उन्होंने अपनी अन्य पुत्रियों को बुलाया, पर शिवजी से विरोध के कारण सती को नहीं बुलाया।
चौपाई
ब्रह्मसभाँ हम सन दुखु माना। तेहि तें अजहुँ करहिं अपमाना॥
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥
जौं बिनु बोलें जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी॥
सरल अर्थ: शिवजी बताते हैं कि दक्ष के मन में पुराना विरोध है। ऐसे स्थान पर बिना बुलाए जाने से सम्मान और स्नेह दोनों आहत हो सकते हैं।
चौपाई
जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोलेहुँ न सँदेहा॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥
तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गएँ कल्यानु न होई॥
सरल अर्थ: शिवजी समझाते हैं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर सामान्यतः बिना बुलाए भी जाया जा सकता है, पर जहाँ विरोध हो वहाँ जाना हितकर नहीं होता।
चौपाई
भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी बस न ग्यानु उर आवा॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥
कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ॥
सरल अर्थ: शिवजी अनेक प्रकार से समझाते हैं, फिर भी सती जाने के निश्चय से नहीं हटतीं। अंततः वे स्पष्ट कहते हैं कि बिना निमंत्रण जाना उन्हें उचित नहीं लगता।
दोहा 62
कहि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि।
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥६२॥
दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि॥६२॥
सरल अर्थ: जब सती किसी प्रकार नहीं रुकतीं, तब शिवजी अपने प्रमुख गणों को उनके साथ भेजकर उन्हें विदा करते हैं।
चौपाई
पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी॥
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥
सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता॥
सरल अर्थ: सती पिता के घर पहुँचती हैं, लेकिन दक्ष के भय से कोई उनका सम्मान नहीं करता। केवल माता स्नेह से मिलती हैं और बहनें मुस्कराकर मिलती हैं।
चौपाई
दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहि बिलोकि जरे सब गाता॥
सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥
सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा॥
सरल अर्थ: दक्ष सती की कुशल तक नहीं पूछते। यज्ञ में जाकर सती देखती हैं कि वहाँ शिवजी के लिए कोई यज्ञभाग नहीं रखा गया है।
चौपाई
तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥
पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥
सरल अर्थ: अब सती को शिवजी की चेतावनी स्मरण आती है। अपने स्वामी का अपमान देखकर उनका हृदय अत्यंत पीड़ा और क्रोध से भर जाता है।
चौपाई
जद्यपि जग दारुन दुख नाना। सब तें कठिन जाति अवमाना॥
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥
समुझि सो सतिहि भयउ अति क्रोधा। बहु बिधि जननीं कीन्ह प्रबोधा॥
सरल अर्थ: अपमान की पीड़ा से सती अत्यंत क्रोधित होती हैं। उनकी माता अनेक प्रकार से उन्हें शांत करने का प्रयास करती हैं।
दोहा 63
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध।
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥६३॥
सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥६३॥
सरल अर्थ: शिवजी का अपमान सती से सहन नहीं होता। वे यज्ञसभा को संबोधित करते हुए कठोर और धर्मसम्मत वचन कहती हैं।
चौपाई
सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह संकर निंदा॥
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥
सो फलु तुरत लहब सब काहूँ। भली भाँति पछिताब पिताहूँ॥
सरल अर्थ: सती सभा को चेताती हैं कि शिवजी की निंदा करने और उसे स्वीकार करने का परिणाम उचित नहीं होगा; दक्ष को भी अपने आचरण पर पछताना पड़ेगा।
चौपाई
संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥
काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥
काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥
सरल अर्थ: इस पद में निंदा से दूर रहने की कठोर पारंपरिक मर्यादा कही गई है—अर्थ का केंद्र यह है कि संत, शिव और भगवान की निंदा में सहभागी न बनें और वहाँ से हट जाएँ।
चौपाई
जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी॥
पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥
पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही॥
सरल अर्थ: सती शिवजी की महिमा बताते हुए दक्ष के व्यवहार की निंदा करती हैं और अपने वर्तमान शरीर को दक्ष से उत्पन्न मानकर उससे विरक्ति व्यक्त करती हैं।
चौपाई
तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चंद्रमौलि बृषकेतू॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा॥
सरल अर्थ: सती शिवजी को हृदय में धारण करके योगबल से अपना शरीर त्याग देती हैं। इससे पूरी यज्ञसभा में हाहाकार मच जाता है।
दोहा 64
सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस।
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥६४॥
जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्हि मुनीस॥६४॥
सरल अर्थ: सती के देहत्याग का समाचार पाकर शिवगण यज्ञ में विघ्न करने लगते हैं। यज्ञ की स्थिति बिगड़ती देखकर भृगु मुनि उसकी रक्षा का प्रयास करते हैं।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
🙏 जय श्री राम 🙏
अपनी श्रद्धा, सुझाव या प्रतिक्रिया कमेंट में अवश्य लिखें।
कृपया भाषा शालीन और सम्मानजनक रखें।
🚩 भक्ति भावना परिवार से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद।