श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 69 | अयोध्या में श्रीसीताराम का स्वागत एवं बालकाण्ड सम्पूर्ण | दोहा 344–361 अर्थ सहित
॥ श्री सीताराम ॥ • भक्ति भावना प्रस्तुत
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग ६९
🌸 बालकाण्ड के समापन प्रसंग में आपका स्वागत है
गोस्वामी तुलसीदासजी कृत श्रीरामचरितमानस के इस अंतिम बालकाण्ड भाग में मिथिला से लौटती विवाह-बारात का अयोध्या में स्वागत, चारों नववधुओं का मंगलमय गृहप्रवेश, माताओं का अपार स्नेह, गुरुजनों के आशीर्वाद, श्रीराम की पावन स्मृतियों और महर्षि विश्वामित्रजी की विदाई तक का संपूर्ण क्रम दिया गया है।
📜 अंतिम पाठ-सीमा: पिछले भाग के दोहा ३४३ के बाद की चौपाइयों से सोरठा ३६१ तक। इसमें ७३ चौपाई-इकाइयाँ, १८ दोहा-पाठ, १ समापन छंद तथा अंतिम सोरठा ३६१ हैं। दोहा ३५० के दोनों खंड (क और ख) अलग शामिल हैं।
अयोध्या का भव्य मंगल-सज्जा उत्सव
हने निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे॥
झाँझि बिरव डिंडिमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई॥
सरल हिंदी अर्थ — बारात के आने की सूचना मिलते ही नगाड़े, शंख, झाँझ और शहनाइयाँ बज उठीं; हाथियों और घोड़ों का उत्साह भी वातावरण में सुनाई देने लगा।
पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता॥
निज निज सुंदर सदन सँवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे॥
सरल हिंदी अर्थ — नगरवासियों ने हर्ष से भरकर अपने घरों, बाजारों, मार्गों और द्वारों को सुंदर ढंग से सजाया; सबका रोम-रोम पुलकित था।
गलीं सकल अरगजाँ सिंचाईं। जहँ तहँ चौकें चारु पुराईं॥
बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना॥
सरल हिंदी अर्थ — गलियों में सुगंधित जल छिड़का गया और सुंदर रंगोलियाँ रची गईं; बाजार तोरण, ध्वजा और पताकाओं से शोभित हो उठे।
सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला॥
लगे सुभग तरु परसत धरनी। मनिमय आलबाल कल करनी॥
सरल हिंदी अर्थ — सुपारी, केला, आम, कदंब आदि सजे पेड़ों और रत्नमय थाले से अयोध्या की शोभा मानो स्वर्ग जैसी हो गई।
बिबिध भाँति मंगल कलस गृह गृह रचे सँवारि।
सुर ब्रह्मादि सिहाहिं सब रघुबर पुरी निहारि॥३४४॥
सरल हिंदी अर्थ — नगर के घर-घर में मंगल कलश सजाए गए। अयोध्या की अनुपम शोभा देखकर ब्रह्मा सहित देवता भी उसकी प्रशंसा करते हैं।
राजमहल में माताओं का अलौकिक उत्साह
भूप भवनु तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा॥
मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा दशरथ का महल इतना सुंदर सजा कि कामदेव भी मोहित हों; चारों ओर शुभ संकेत और समृद्धि का वास दिखाई देता है।
जनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ गृहँ छाए॥
देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही॥
सरल हिंदी अर्थ — ऐसा लगता था जैसे आनंद स्वयं साकार होकर महल में बस गया हो। सीताराम के दर्शन की अभिलाषा हर हृदय में उमड़ रही थी।
जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासिनि॥
सकल सुमंगल सजें आरती। गावहिं जनु बहु बेष भारती॥
सरल हिंदी अर्थ — सौभाग्यवती स्त्रियाँ समूह में आरती के थाल लेकर मधुर मंगलगीत गाती हुई चल रही थीं; उनका रूप और गान अनुपम था।
भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई॥
कौसल्यादि राम महतारीं। प्रेमबिबस तन दसा बिसारीं॥
सरल हिंदी अर्थ — राजमहल में अपार आनंद था। कौसल्या आदि माताएँ श्रीराम के आने की प्रतीक्षा और प्रेम में इतनी मग्न थीं कि उन्हें स्वयं की सुध नहीं थी।
दिए दान बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारि।
प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाइ पदारथ चारि॥३४५॥
सरल हिंदी अर्थ — गणेश और शिवजी की पूजा करके ब्राह्मणों को दान दिया गया। माताओं का हर्ष ऐसा था मानो किसी निर्धन को जीवन के चारों पुरुषार्थ मिल गए हों।
मंगल थाल और स्वागत की तैयारियाँ
मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता॥
राम दरस हित अति अनुरागीं। परिछनि साजु सजन सब लागीं॥
सरल हिंदी अर्थ — आनंद में माताओं के अंग पुलकित और चरण शिथिल हो गए थे। वे प्रभु के दर्शन तथा स्वागत की परछन-विधि की तैयारी में लग गईं।
बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्राँ साजे॥
हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला॥
सरल हिंदी अर्थ — वाद्य बज रहे थे। सुमित्राजी ने हल्दी, दूब, दही, पल्लव, पुष्प, पान और सुपारी जैसे शुभ पदार्थ सजाए।
अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा॥
छुहे पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन जनु नीड़ बनाए॥
सरल हिंदी अर्थ — अक्षत, अंकुर, गोरोचन, लावा, तुलसी की मंजरी और सुंदर चित्रित कलशों से मांगलिक सामग्री पूर्ण हो रही थी।
सगुन सुगंध न जाहिं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी॥
रचीं आरतीं बहु बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना॥
सरल हिंदी अर्थ — सभी रानियाँ सुगंधित शुभ वस्तुओं से आरती के सुंदर थाल सजाकर आनंदपूर्वक मंगलगीत गा रही थीं।
कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएँ मात।
चलीं मुदित परिछनि करन पुलक पल्लवित गात॥३४६॥
सरल हिंदी अर्थ — माताएँ अपने कोमल हाथों में मांगलिक वस्तुओं से भरे स्वर्ण-थाल लेकर आनंदपूर्वक परछन करने चलीं; उनके शरीर प्रेम से पुलकित थे।
गुरु-आज्ञा से बारात का अयोध्या प्रवेश
धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु जनु ठयऊ॥
सुरतरु सुमन माल सुर बरषहिं। मनहुँ बलाक अवलि मनु करषहिं॥
सरल हिंदी अर्थ — धूप के धुएँ को कवि ने सावन के बादलों से और देवताओं की पुष्पमालाओं की वर्षा को श्वेत पक्षियों की पंक्तियों से तुलना की है।
मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुँ पाकरिपु चाप सँवारे॥
प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि॥
सरल हिंदी अर्थ — मणियों के सुंदर बंदनवार इंद्रधनुष जैसे लग रहे थे और अटारियों पर आती-जाती स्त्रियाँ बिजली की चमक-सी जान पड़ती थीं।
दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा॥
सुर सुगंध सुचि बरषहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी॥
सरल हिंदी अर्थ — नगाड़ों का नाद मेघगर्जना सा था; देवताओं की पुष्प और सुगंध-वर्षा से नगर के स्त्री-पुरुष आनंदित थे।
समउ जानि गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रबेसु रघुकुलमनि कीन्हा॥
सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित महीपति सहित समाजा॥
सरल हिंदी अर्थ — शुभ समय देखकर गुरु वशिष्ठजी ने आज्ञा दी। दशरथजी ने शिव, पार्वती और गणेश का स्मरण कर बारात सहित अयोध्या में प्रवेश किया।
होहिं सगुन बरषहिं सुमन सुर दुंदुभीं बजाइ।
बिबुध बधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ॥३४७॥
सरल हिंदी अर्थ — चारों ओर शुभ शकुन हो रहे थे। देवता दुंदुभियाँ बजाकर फूल बरसा रहे थे और देवांगनाएँ मंगलगीत गाते हुए आनंद से नृत्य कर रही थीं।
अयोध्यावासियों द्वारा चारों नवविवाहित जोड़ों का स्वागत
मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर॥
जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी॥
सरल हिंदी अर्थ — सूत, मागध, भाट और कलाकार प्रभु का यश गा रहे थे। जयध्वनियाँ और वेदमंत्रों की ध्वनि दसों दिशाओं में फैल गई।
बिपुल बाजने बाजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे॥
बने बराती बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं॥
सरल हिंदी अर्थ — आकाश में देवता और नगर में जनता उत्सव मना रहे थे। बारातियों की सज्जा और हर्ष का वर्णन संभव नहीं था।
पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहि भए सुखारे॥
करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा॥
सरल हिंदी अर्थ — अयोध्यावासियों ने दशरथजी को प्रणाम किया और श्रीराम को देखकर प्रसन्न हुए; वे प्रेमाश्रुओं के साथ रत्न और वस्त्र निछावर करते रहे।
आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखि कुँअर बर चारी॥
सिबिका सुभग ओहार उघारी। देखि दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी॥
सरल हिंदी अर्थ — नगर की स्त्रियाँ चारों राजकुमारों की आरती उतार रही थीं और सुंदर पालकियों के परदे हटाकर नववधुओं के दर्शन कर आनंदित हो रही थीं।
एहि बिधि सबही देत सुखु आए राजदुआर।
मुदित मातु परिछनि करहिं बधुन्ह समेत कुमार॥३४८॥
सरल हिंदी अर्थ — इस प्रकार सबको सुख देते हुए वर-वधू राजद्वार पर पहुँचे और माताओं ने आनंदपूर्वक चारों पुत्रों तथा बहुओं का परछन किया।
राजद्वार की आरती और नवदंपतियों का गृहप्रवेश
करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा॥
भूषन मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भाँती॥
सरल हिंदी अर्थ — माताएँ बार-बार आरती उतारतीं और आभूषण, रत्न तथा वस्त्र निछावर करतीं; उनके आनंद की सीमा नहीं थी।
बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानंद मगन महतारी॥
पुनि पुनि सीय राम छबि देखी। मुदित सफल जग जीवन लेखी॥
सरल हिंदी अर्थ — चारों पुत्रों को नववधुओं सहित देखकर माताएँ परमानंद में डूब गईं। सीताराम की छवि देखकर वे अपना जन्म सफल मानने लगीं।
सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं निज सुकृत सराही॥
बरषहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा॥
सरल हिंदी अर्थ — सखियाँ बार-बार सीताजी के दर्शन कर अपने सौभाग्य की प्रशंसा में गीत गा रही थीं; देवता नाचते-गाते फूल बरसा रहे थे।
देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढँढोरीं॥
देत न बनहिं निपट लघु लागीं। एकटक रहीं रूप अनुरागीं॥
सरल हिंदी अर्थ — चारों जोड़ों की सुंदरता देखकर सरस्वती भी पर्याप्त उपमा न खोज सकीं और प्रेम से एकटक उन्हें निहारती रह गईं।
निगम नीति कुल रीति करि अरघ पाँवड़े देत।
बधुन्ह सहित सुत परिछि सब चलीं लवाइ निकेत॥३४९॥
सरल हिंदी अर्थ — वेद-विधि और कुल-रीति के अनुसार अर्घ्य, पाँवड़े और परछन की परंपराएँ निभाकर माताएँ पुत्रों और बहुओं को राजमहल के भीतर ले गईं।
चारों जोड़ों का पूजन और माताओं का अपार आनंद
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए॥
तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनित पखारे॥
सरल हिंदी अर्थ — चार सुंदर सिंहासन सजाए गए; उन पर चारों राजकुमार और राजकुमारियों को बैठाकर आदर से उनके चरण धोए गए।
धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगल निधि॥
बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं॥
सरल हिंदी अर्थ — वैदिक रीति से धूप, दीप, नैवेद्य और आरती द्वारा वर-वधुओं का पूजन हुआ; पंखे और चँवर डुलाए गए।
बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं॥
पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृतु लहेउ जनु संतत रोगीं॥
सरल हिंदी अर्थ — माताओं का आनंद ऐसा था जैसे योगी को परम तत्त्व या रोगी को अमृत मिल गया हो; अनेक पदार्थ निछावर किए जा रहे थे।
जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा॥
मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई॥
सरल हिंदी अर्थ — कवि उस आनंद को दरिद्र के पारस पाने, नेत्रहीन को दृष्टि मिलने, मूक को वाणी और वीर को विजय मिलने जैसी दुर्लभ प्राप्तियों से तुलना करते हैं।
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।
भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु॥३५० (क)॥
सरल हिंदी अर्थ — माताओं का आनंद इन सब उपमानों से भी असंख्य गुना अधिक था, क्योंकि रघुकुलचंद्र श्रीराम भाइयों के साथ विवाह करके घर लौटे थे।
लोक रीति जननीं करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं।
मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसुकाहिं॥३५० (ख)॥
सरल हिंदी अर्थ — माताएँ पारिवारिक रीति निभाती हैं, नवदंपति संकोच करते हैं और उस आनंदपूर्ण विनोद को देखकर श्रीराम मंद-मंद मुस्कुराते हैं।
अयोध्या में उदार दान और मंगल वंदना
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की॥
सबहि बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना॥
सरल हिंदी अर्थ — माताओं ने देवताओं और पितरों का पूजन कर यही प्रार्थना की कि श्रीराम और उनके भाइयों का सदा कल्याण हो।
अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं॥
भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे॥
सरल हिंदी अर्थ — देवता अदृश्य होकर आशीष देते हैं। दशरथजी बारातियों को बुलाकर वाहन, वस्त्र, रत्न और अलंकार प्रदान करते हैं।
आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि॥
पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए॥
सरल हिंदी अर्थ — बाराती मन में श्रीराम को बसाकर अपने घर चले गए। नगर के स्त्री-पुरुषों को सम्मान और उपहार मिले; घर-घर मंगलवाद्य बजे।
जाचक जन जाचहिं जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई॥
सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना॥
सरल हिंदी अर्थ — जो याचक जो माँगता था, उदार राजा उसे दान देते। सेवकों और वादकों का भी सम्मान कर उन्हें प्रसन्न किया।
देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ।
तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ॥३५१॥
सरल हिंदी अर्थ — सब लोग प्रणाम कर आशीर्वाद देते और राजपरिवार का यश गाते रहे। इसके बाद दशरथजी गुरु और ब्राह्मणों के साथ राजभवन में गए।
गुरुजनों और ऋषियों का सम्मान
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही॥
भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी॥
सरल हिंदी अर्थ — वशिष्ठजी की आज्ञा के अनुसार सारे लोक और वेद के कार्य हुए। ब्राह्मणों को देखकर रानियों ने उन्हें आदरपूर्वक स्वागत योग्य सौभाग्य माना।
पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए॥
आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे॥
सरल हिंदी अर्थ — दशरथजी ने ब्राह्मणों का सम्मान, चरण-प्रक्षालन, भोजन और दान की व्यवस्था की; वे संतुष्ट होकर आशीर्वाद देते हुए विदा हुए।
बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा॥
कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा ने विश्वामित्रजी का विशेष पूजन कर स्वयं को धन्य कहा। रानियों सहित उनकी चरणधूलि आदर से ग्रहण की।
भीतर भवन दीन्ह बर बासू। मन जोगवत रह नृप रनिवासू॥
पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी॥
सरल हिंदी अर्थ — महर्षि के लिए राजमहल के भीतर उत्तम निवास बनाया गया। राजा ने अत्यंत प्रेम से गुरु वशिष्ठजी की भी चरणवंदना और विनती की।
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु।
पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु॥३५२॥
सरल हिंदी अर्थ — रानी-राजा और चारों नवदंपति बार-बार गुरु के चरणों में प्रणाम करते हैं और महर्षि उन्हें मंगल आशीर्वाद देते हैं।
आशीर्वाद, नेग और देवताओं की प्रसन्न विदाई
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें॥
नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा ने गहन प्रेम से गुरु के सामने पुत्र और सारी संपदा अर्पित-सी कर दी; गुरु ने अपनी परंपरा का नेग लेकर भरपूर आशीर्वाद दिया।
उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता॥
बिप्रबधू सब भूप बोलाईं। चैल चारु भूषन पहिराईं॥
सरल हिंदी अर्थ — गुरुदेव सीताराम को हृदय में धारण किए लौटे। दशरथजी ने ब्राह्मण-पत्नियों को सुंदर वस्त्र और आभूषण भेंट किए।
बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं॥
नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं॥
सरल हिंदी अर्थ — सौभाग्यवती स्त्रियों और विवाह में पारंपरिक सेवाएँ करने वालों को उनकी रुचि एवं रीति के अनुसार सम्मान और नेग दिया गया।
प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने॥
देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू॥
सरल हिंदी अर्थ — सभी प्रिय अतिथियों का सत्कार हुआ। देवता श्रीराम के विवाह को देखकर पुष्पवर्षा करते हुए उत्सव की प्रशंसा करने लगे।
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ।
कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ॥३५३॥
सरल हिंदी अर्थ — देवता आनंद से नगाड़े बजाते अपने-अपने लोकों को लौटे और आपस में श्रीराम के गुण गाते रहे; उनके हृदय प्रेम से भरे थे।
दशरथजी का पुत्रों और बहुओं पर स्नेह
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू॥
जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे॥
सरल हिंदी अर्थ — सभी का स्वागत पूरा कर दशरथजी हर्षित मन से रनिवास पहुँचे, जहाँ उन्होंने चारों पुत्रों को नववधुओं सहित देखा।
लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता॥
बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा ने पुत्रों को स्नेहपूर्वक गले लगाया और बहुओं को पुत्रियों के समान गोद में बैठाकर बार-बार दुलारा।
देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू॥
कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि हरषु होत सब काहू॥
सरल हिंदी अर्थ — इस मिलन से सभी रानियाँ प्रसन्न हुईं। दशरथजी ने विवाह की रीति-प्रसंग सुनाए और सभी ने आनंद से सुना।
जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई॥
बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी॥
सरल हिंदी अर्थ — उन्होंने राजा जनक के शील, गुण, प्रेम, आदर और वैभव की मुक्तकंठ से प्रशंसा की; रानियाँ सुनकर सुखी हुईं।
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति।
भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति॥३५४॥
सरल हिंदी अर्थ — दशरथजी ने पुत्रों सहित स्नान कर गुरुजनों, ब्राह्मणों तथा संबंधियों के साथ कई प्रकार का भोजन किया; इस बीच रात्रि का कुछ समय बीत गया।
राजा की सीख — बहुओं को पलकों की तरह सहेजना
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि॥
अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए॥
सरल हिंदी अर्थ — रात्रि भर मधुर मंगलगान होते रहे। लोग भोजनोपरांत पान, पुष्पमाला और सुगंध से सुसज्जित होकर प्रसन्न थे।
रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई॥
प्रेम प्रमोद बिनोदु बड़ाई। समउ समाजु मनोहरताई॥
सरल हिंदी अर्थ — श्रीराम के दर्शन और राजा की आज्ञा पाकर सब अपने घर चले गए। उस प्रेम और आनंद का वर्णन कठिन है।
कहि न सकहिं सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू॥
सो मैं कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी॥
सरल हिंदी अर्थ — कवि कहते हैं कि अनेक सरस्वतियाँ, शेष, वेद तथा देवता भी उस शोभा को पूरा नहीं कह सकते, तो मेरे लिए उसे वर्णित करना कैसे संभव है।
नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाईं रानी॥
बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई॥
सरल हिंदी अर्थ — दशरथजी ने रानियों से स्नेहपूर्वक कहा—नई बहुएँ अभी अपरिचित घर आई हैं; इनकी रक्षा और देखभाल आँखों की पलकों की तरह करना।
लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ।
अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ॥३५५॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा ने कहा कि बच्चे थके हैं, उन्हें विश्राम कराओ। यह कहकर वे मन में श्रीराम का स्मरण करते हुए अपने विश्राम-कक्ष में चले गए।
विवाह के बाद राम और भाइयों का विश्राम
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए॥
सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा के निर्देश पर रत्नजड़ित स्वर्ण पलंग और कोमल, उज्ज्वल बिछौने सजाए गए।
उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं॥
रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा॥
सरल हिंदी अर्थ — मंदिरों में सुगंधित पुष्पमालाएँ, सुंदर तकिये, दीप और चँदोवे शोभित थे।
सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए॥
अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही॥
सरल हिंदी अर्थ — माताओं ने बड़े प्रेम से श्रीराम को विश्राम के लिए लिटाया। श्रीराम ने भाइयों को भी अपनी शय्याओं पर सोने की आज्ञा दी।
देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता॥
मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी॥
सरल हिंदी अर्थ — श्रीराम के कोमल श्यामल अंग देखकर माताएँ स्नेह से पूछती हैं—वत्स, वनयात्रा में ताड़का जैसी भयावनी राक्षसी का सामना कैसे किया?
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।
मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु॥३५६॥
सरल हिंदी अर्थ — माताएँ आश्चर्य से पूछती हैं कि युद्ध में किसी को न गिनने वाले मारीच, सुबाहु और उनके सहायक दुष्ट राक्षसों को प्रभु ने कैसे पराजित किया।
माताओं द्वारा श्रीराम की दिव्य लीलाओं का स्मरण
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी॥
मख रखवारी करि दुहुँ भाईं। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाईं॥
सरल हिंदी अर्थ — माताएँ कहती हैं—गुरु विश्वामित्र की कृपा से विपत्तियाँ दूर हुईं; दोनों भाइयों ने यज्ञ की रक्षा की और ज्ञान प्राप्त किया।
मुनितिय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी॥
कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा॥
सरल हिंदी अर्थ — अहल्या का उद्धार हुआ और आपने राजसभा में अत्यंत कठोर शिवधनुष तोड़ा; इसकी कीर्ति सारे संसार में फैल गई।
बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई॥
सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे॥
सरल हिंदी अर्थ — आपके महान कार्यों के साथ जानकीजी का विवाह और चारों भाइयों का सुखद घर लौटना संभव हुआ; माताएँ सबका श्रेय गुरु-कृपा को देती हैं।
आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा॥
जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें॥
सरल हिंदी अर्थ — वे प्रेम से कहती हैं—हे वत्स! आज तुम्हें देखकर हमारा जीवन सफल हुआ। जो दिन तुम्हारे बिना बीते, वे हमारी आयु में गिने ही न जाएँ।
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन।
सुमिरि संभु गुरु बिप्र पद किए नीदबस नैन॥३५७॥
सरल हिंदी अर्थ — श्रीराम ने सुंदर विनम्र वचनों से माताओं को संतुष्ट किया और शिवजी, गुरु तथा ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण करके विश्राम किया।
अयोध्या की मंगलरात्रि और अगली पावन सुबह
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना॥
घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं॥
सरल हिंदी अर्थ — विश्राम करते श्रीराम का मुख संध्या के कमल जैसा सुंदर लग रहा था। नगर की स्त्रियाँ घर-घर जागरण और पारंपरिक मंगलगान कर रही थीं।
पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी॥
सुंदर बधुन्ह सासु लै सोईं। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोईं॥
सरल हिंदी अर्थ — उस अनुपम रात्रि में माताएँ अपनी बहुओं को प्रेम से पास रखकर विश्राम करती हैं, जैसे नाग अपनी अनमोल मणि को सुरक्षित रखे।
प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे॥
बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए॥
सरल हिंदी अर्थ — भोर में श्रीराम जागे, वादक यशगान करने लगे और नगरवासी राजा तथा राजकुमारों के दर्शन को द्वार पर आने लगे।
बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता॥
जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे॥
सरल हिंदी अर्थ — चारों भाइयों ने देव, गुरु, माता-पिता और ब्राह्मणों को प्रणाम करके आशीर्वाद लिया; माताओं ने उन्हें देखकर आनंद पाया।
कीन्हि सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ।
प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ॥३५८॥
सरल हिंदी अर्थ — चारों भाइयों ने प्रातःकाल पवित्र सरयू में स्नान और नित्यकर्म पूरे कर पिता दशरथजी के पास जाकर दर्शन किए।
॥ नवाह्नपारायण — तीसरा विश्राम ॥
ऋषियों का सत्संग और अयोध्या का उत्सव
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई॥
देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी॥
सरल हिंदी अर्थ — दशरथजी ने पुत्रों को हृदय से लगाया और सभा श्रीराम के दर्शन से शीतल और प्रसन्न हो उठी।
पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए॥
सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे॥
सरल हिंदी अर्थ — वशिष्ठजी और विश्वामित्रजी के आगमन पर उनका स्वागत हुआ। राजा तथा पुत्रों ने उनकी चरणवंदना की; दोनों गुरु प्रेम से श्रीराम को निहारते रहे।
कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा॥
मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी॥
सरल हिंदी अर्थ — वशिष्ठजी ने धर्म की कथा कही और विश्वामित्रजी के अद्भुत कर्मों का आदरपूर्वक वर्णन किया; राजा और रानियाँ ध्यान से सुनते रहे।
बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची॥
सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू॥
सरल हिंदी अर्थ — वामदेवजी ने विश्वामित्र की महिमा की पुष्टि की। सभी हर्षित हुए और राम-लक्ष्मण के मन में गुरु के प्रति प्रेम बढ़ा।
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति।
उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति॥३५९॥
सरल हिंदी अर्थ — अयोध्या में हर दिन शुभ उत्सव, प्रेम और प्रसन्नता से बीत रहा था; नगर का आनंद दिनोंदिन बढ़ता ही जाता था।
विश्वामित्रजी की विदाई और दशरथजी का गुरु-प्रेम
सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे॥
नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं॥
सरल हिंदी अर्थ — शुभ मुहूर्त में नववधुओं की विवाह-रस्म के कंकण खोले गए। अयोध्या के नित्य नए आनंद को देखकर देवता भी वहाँ जन्म पाने को लालायित थे।
बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं॥
दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ॥
सरल हिंदी अर्थ — विश्वामित्रजी बार-बार अपने आश्रम लौटना चाहते थे, पर राम के प्रेम और विनय से रुकते रहे। दशरथजी का गुरु-प्रेम दिन-दिन बढ़ता गया।
मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे॥
नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी॥
सरल हिंदी अर्थ — अंत में विदा माँगने पर राजा ने पुत्रों सहित हाथ जोड़कर कहा—गुरुदेव, हमारा सब कुछ आपका है; हम सभी आपके सेवक हैं।
करब सदा लरिकन्ह पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू॥
अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा ने बच्चों पर स्नेह और अपने घर आते रहने की प्रार्थना की। प्रेम से उनकी वाणी रुक गई और सारा परिवार चरणों में झुक गया।
दीन्हि असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती॥
रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई॥
सरल हिंदी अर्थ — विश्वामित्रजी ने सबको आशीर्वाद दिया। श्रीराम और भाइयों ने प्रेम से उन्हें पहुँचाया और अनुमति लेकर लौट आए।
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु।
जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु॥३६०॥
सरल हिंदी अर्थ — प्रस्थान करते हुए विश्वामित्रजी मन ही मन श्रीराम की सुंदरता, दशरथजी की भक्ति, विवाहोत्सव और अयोध्या के आनंद की प्रशंसा करते गए।
गोस्वामी तुलसीदासजी का मंगलमय बालकाण्ड समापन
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी॥
सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ॥
सरल हिंदी अर्थ — वामदेवजी और वशिष्ठजी ने फिर विश्वामित्रजी की महिमा कही। राजा दशरथजी ने यह सब अपने महान सौभाग्य का फल माना।
बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ॥
जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा॥
सरल हिंदी अर्थ — सभा विसर्जित हुई और राजा पुत्रों सहित महल आए। सर्वत्र श्रीराम-विवाह का गायन होने लगा, जिससे उनका पावन यश तीनों लोकों में फैल गया।
आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें॥
प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू॥
सरल हिंदी अर्थ — श्रीराम विवाह के बाद अयोध्या में आनंद स्थायी रूप से बस गया। इस मंगल-उत्सव का वर्णन देवी सरस्वती और शेषनाग भी पूरा नहीं कर सकते।
कबिकुल जीवनु पावन जानी। राम सीय जसु मंगल खानी॥
तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी॥
सरल हिंदी अर्थ — तुलसीदासजी कहते हैं—सीताराम का यश कवियों की वाणी को पवित्र करने वाला और मंगलों का भंडार है; इसी भाव से मैंने उसका थोड़ा वर्णन किया।
निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो।
रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो॥
उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं।
बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं॥
सरल हिंदी अर्थ — तुलसीदासजी कहते हैं—मैंने अपनी वाणी को पावन करने के लिए रामयश कहा है; प्रभु के अनंत चरित्र का पार कोई कवि नहीं पा सकता। जो आदर से इनके उपनयन और विवाह-मंगल प्रसंग को सुनते-गाते हैं, वे सीताराम-कृपा से सुख पाते हैं।
सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु॥३६१॥
सरल हिंदी अर्थ — जो भक्त श्रीसीताराम-विवाह की कथा प्रेमपूर्वक गाते और सुनते हैं, उनके हृदय में सदा शुभ उत्साह बना रहता है; श्रीराम का यश मंगल का धाम है।
॥ मासपारायण — बारहवाँ विश्राम ॥
॥ बालकाण्ड सम्पूर्ण ॥
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने प्रथमः सोपानः समाप्तः।
श्रीरामचरितमानस का प्रथम सोपान बालकाण्ड यहाँ पूर्ण हुआ। अब कथा अयोध्याकाण्ड के प्रसंगों में आगे बढ़ती है।
जय श्री सीताराम! 🚩
🙏 बालकाण्ड से मिलने वाली प्रमुख सीख
इस पावन खंड में हमें संतों और गुरुजनों का आदर, मर्यादा, परिवार में स्नेह, माता-पिता की ममता, विनय और ईश्वर-भक्ति का सुंदर संदेश मिलता है। श्रीराम का आचरण दिखाता है कि शक्ति और सामर्थ्य के साथ विनम्रता तथा गुरु-भक्ति भी आवश्यक है।
सीताराम विवाह का समापन प्रसंग आनंद और मंगल का प्रतीक है। यही शुभभावना जीवन और परिवार में प्रेम, सेवा तथा परस्पर सम्मान का आधार बन सकती है।

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