श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 64 | श्रीराम की मंगल आरती, जनक-दशरथ मिलन और सीता का मंडप आगमन | दोहा 319–323 अर्थ सहित
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग ६४
श्रीराम की मंगल आरती, जनक–दशरथ मिलन और माता सीता का मंडप में आगमन
गोस्वामी तुलसीदासजी कृत श्रीरामचरितमानस, बालकाण्ड — भाग ६४ में दोहा ३१८ के बाद की कथा प्रस्तुत है। माता सुनयना श्रीराम का मंगल परछन करती हैं, जनकजी और दशरथजी प्रेम से मिलते हैं तथा अंत में जनकनन्दिनी सीताजी विवाह-मंडप में पधारती हैं।
📜 पाठ-सीमा: दोहा ३१८ के बाद की २० चौपाई-इकाइयाँ, ६ छंद और दोहा ३१९ से ३२३ तक। प्रत्येक के नीचे अलग सरल हिंदी अर्थ दिया गया है।
माता सुनयना द्वारा श्रीराम की मंगल आरती और मंडप प्रवेश
सरल अर्थ — माता सुनयना शुभ अवसर का ध्यान करके प्रेमाश्रुओं को सँभालती हुई प्रसन्न मन से दूल्हे श्रीराम की परछन करती हैं। वे वैदिक विधान और कुल-परंपरा के सभी मंगलाचार विधिपूर्वक संपन्न करती हैं।
सरल अर्थ — चारों ओर मंगलवाद्य और मंगलगीत गूँज रहे हैं तथा सुंदर वस्त्रों के पाँवड़े बिछाए जा रहे हैं। स्त्रियाँ आरती और अर्घ्य अर्पित करती हैं; इसके बाद श्रीराम विवाह-मंडप की ओर बढ़ते हैं।
सरल अर्थ — राजा दशरथ अपने राजसमाज के साथ विराजमान होते हैं। वैभव देखकर लोकपाल भी विस्मित हैं। देवता पुष्पवर्षा करते हैं और ब्राह्मण शुभ समय के अनुसार शांतिपाठ कर रहे हैं।
सरल अर्थ — आकाश और नगर में उत्सव की ऐसी ध्वनि है कि दूसरी आवाज सुनाई नहीं देती। इसी मंगलमय वातावरण में श्रीराम मंडप में पधारते हैं और अर्घ्य देकर उन्हें सम्मानपूर्वक आसन पर बैठाया जाता है।
छंद का अर्थ — स्त्रियाँ दूल्हे श्रीराम को आसन पर बैठाकर आरती करती हैं, रत्न-वस्त्र-आभूषण न्योछावर करती हैं और मंगलगीत गाती हैं। ब्रह्मा आदि देवता ब्राह्मण-वेश धारण कर यह दिव्य उत्सव देखते हैं और श्रीराम के दर्शन को अपने जीवन का सौभाग्य मानते हैं।
दोहा का अर्थ — नाई, बारी, भाट तथा नट श्रीराम पर की गई निछावर पाकर अत्यंत प्रसन्न हैं। वे सिर झुकाकर आशीर्वाद देते हैं और उनका आनंद हृदय में समाता नहीं।
राजा जनक और राजा दशरथ का प्रेमपूर्ण समधी-मिलन
सरल अर्थ — वैदिक और लोक-परंपरा की विधियाँ पूरी करके राजा जनक और राजा दशरथ अत्यंत प्रेम से मिलते हैं। दोनों का यह मिलन इतना अनुपम है कि कवि उसके लिए उपमा खोजते-खोजते संकोच करने लगता है।
सरल अर्थ — कवि को कहीं उचित उपमा नहीं मिलती; वह मान लेता है कि दोनों की तुलना केवल उन्हीं से हो सकती है। दोनों समधियों का स्नेह देखकर देवता मुग्ध होकर पुष्प बरसाते और यश गाते हैं।
सरल अर्थ — देवगण कहते हैं कि ब्रह्माजी की सृष्टि के आरंभ से अनेक विवाह देखे-सुने हैं, लेकिन वैभव, सद्गुण और सम्मान में ऐसे समान समधी आज ही देखे हैं।
सरल अर्थ — देवताओं के सच्चे, सुंदर वचन सुनकर दोनों ओर प्रेम और गहरा हो जाता है। राजा जनक अर्घ्य एवं पाँवड़ों से दशरथजी का स्वागत करते हुए उन्हें आदर से विवाह-मंडप में लाते हैं।
छंद का अर्थ — विवाह-मंडप की मनोहर रचना मुनियों का मन मोह लेती है। राजा जनक स्वयं सबके लिए आसन सजाते हैं। वे वसिष्ठजी को अपने कुलदेवता के समान पूजकर आशीर्वाद लेते हैं और विश्वामित्रजी का असीम प्रेम से आदर करते हैं।
दोहा का अर्थ — राजा जनक हर्षपूर्वक वामदेव आदि ऋषियों की पूजा करते हैं, सभी को सुंदर आसन प्रदान करते हैं और उनसे आशीर्वाद ग्रहण करते हैं।
राजा जनक का बारातियों और देवताओं का सम्मान
सरल अर्थ — जनकजी दशरथजी को शिवजी के समान पूज्य मानकर फिर उनका आदर करते हैं। वे हाथ जोड़कर अपने सौभाग्य का वर्णन करते हुए विनम्रता से उनका अभिनंदन करते हैं।
सरल अर्थ — राजा जनक सभी बारातियों को दशरथजी के समान सम्मान देते हैं और प्रत्येक को उपयुक्त आसन प्रदान करते हैं। इस उत्सव की उमंग का वर्णन एक मुख से संभव नहीं।
सरल अर्थ — जनकजी दान, सम्मान, विनम्र वचन और आदर से समूची बारात का स्वागत करते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य आदि देवता श्रीराम की महिमा पहचानते हैं।
सरल अर्थ — देवतागण ब्राह्मणों का रूप बनाकर उत्सव देखने आते हैं। राजा जनक उनका वास्तविक परिचय न जानकर भी देवतुल्य सम्मान करते हैं और आसन देते हैं।
छंद का अर्थ — उत्सव के आनंद में सभी अपने-आप को भूल गए हैं। श्रीराम देवताओं को पहचानकर मन-ही-मन उनका सत्कार और आसन अर्पित करते हैं। प्रभु का शील एवं विनम्र स्वभाव देखकर देवताओं का हृदय प्रसन्न हो उठता है।
दोहा का अर्थ — श्रीराम का मुख चंद्रमा के समान मनोहर है और सबके नेत्र चकोर पक्षियों की भाँति उसका दर्शन कर रहे हैं। सबके मन में अपार प्रेम और आनंद भरा है।
माता सीता का श्रृंगार और सखियों संग मंडप की ओर आगमन
सरल अर्थ — शुभ समय देखकर गुरु वसिष्ठ शतानंदजी को बुलाते हैं और राजकुमारी सीताजी को लाने का संदेश देते हैं। मुनि की आज्ञा पाकर शतानंदजी प्रसन्नता से महल की ओर जाते हैं।
सरल अर्थ — पुरोहित की बात सुनकर बुद्धिमती रानी सखियों सहित आनंदित होती हैं। ब्राह्मण-स्त्रियों एवं कुल की वृद्ध महिलाओं को बुलाकर परिवार की परंपरा के अनुरूप मंगलगीत गाए जाते हैं।
सरल अर्थ — सुंदर स्त्रियों के वेश में आई देवांगनाओं को देखकर राजमहल की महिलाएँ प्रसन्न होती हैं। पहचान न होने पर भी वे उन्हें अपने प्राणों के समान प्रिय मानती हैं।
सरल अर्थ — रानी उन्हें उमा, लक्ष्मी और सरस्वती के समान मानकर बार-बार सम्मान देती हैं। सब मिलकर सीताजी का सुंदर श्रृंगार करती हैं और आनंद से उन्हें विवाह-मंडप की ओर ले चलती हैं।
छंद का अर्थ — सखियाँ और सुहागिन महिलाएँ सोलह श्रृंगार कर सीताजी को सम्मानपूर्वक मंडप की ओर लाती हैं। उनके मधुर गीत और पायल-कंगनों की झंकार से संपूर्ण वातावरण उत्सवमय हो उठता है।
दोहा का अर्थ — स्त्रियों के सुंदर समूह के बीच सीताजी ऐसी शोभा पा रही हैं मानो सौंदर्य की साक्षात मूर्ति अपनी ही मनोहर छवियों के बीच विराजमान हो।
विवाह-मंडप में माता सीता का प्रवेश और वैदिक मंगलाचार
सरल अर्थ — सीताजी की अलौकिक सुंदरता का वर्णन सीमित बुद्धि से संभव नहीं। बाराती परम पवित्र और सौंदर्य की निधि जानकीजी को मंडप की ओर आते देखते हैं।
सरल अर्थ — सभी मन-ही-मन सीताजी को प्रणाम करते हैं। प्रभु श्रीराम उन्हें देखकर कृतार्थ हो उठते हैं। दशरथजी अपने पुत्रों सहित अत्यंत प्रसन्न हैं; उस आनंद का वर्णन नहीं किया जा सकता।
सरल अर्थ — देवता प्रणाम कर पुष्पवर्षा करते हैं; मुनियों के आशीर्वाद और मंगलवाद्यों की ध्वनि चारों ओर गूँज रही है। सभी नर-नारी प्रेम और आनंद में मग्न हैं।
सरल अर्थ — इस प्रकार सीताजी विवाह-मंडप में पहुँचती हैं। मुनिगण प्रसन्नतापूर्वक शांतिपाठ करते हैं और दोनों कुलों के गुरु उस समय की रीति-विधि का संचालन करते हैं।
छंद का अर्थ — विवाह की विधियों में गुरु, गौरी, गणेश और ब्राह्मणों का पूजन कराया जाता है। देवता पूजा ग्रहण कर आशीर्वाद देते हैं। पुरोहितों की आवश्यकता के अनुसार सेवक मंगल-सामग्री, कलश और मधुपर्क आदि तुरंत प्रस्तुत करते हैं।
छंद का अर्थ — सूर्यदेव स्वयं सूर्यवंश की परंपराएँ प्रेम से बताते हैं और सब उनका पालन करते हैं। देवपूजा के बाद सीताजी को सुंदर सिंहासन दिया जाता है। सीताराम की परस्पर प्रेममयी दृष्टि इतनी गहन है कि मन, बुद्धि और वाणी उसका वर्णन नहीं कर सकतीं।
दोहा का अर्थ — हवन के समय अग्निदेव स्वयं रूप धारण कर अत्यंत प्रसन्नता से आहुतियाँ स्वीकार करते हैं। वेद भी ब्राह्मण-वेश में उपस्थित होकर विवाह के विधि-विधान बताते हैं।

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