श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 62 | जनकपुर की मंगलकामना और विवाह का शुभ मुहूर्त | दोहा 309–313 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥   •   भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग ६२

चारों भाइयों की अनुपम शोभा, जनकपुर की मंगलकामना और श्रीसीताराम विवाह की शुभ बेला

मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • दोहा ३०९–३१३

गोस्वामी तुलसीदासजी कृत श्रीरामचरितमानस का बालकाण्ड भाग ६२, पिछली कड़ी के दोहा ३०८ के तुरंत बाद से शुरू होता है। यहाँ जनकपुरवासियों का उत्साह, चारों भाइयों की मनोहर शोभा, विवाह के लिए मंगलकामना और गोधूलि बेला का पवित्र प्रसंग आता है।

📜 पाठ-सीमा: दोहा ३०८ के बाद की चौपाइयाँ, दोहा ३०९ और ३१०, विशेष छंद व सोरठा ३११, दोहा ३१२ और ३१३ तक। मूल पाठ और भावार्थ अलग-अलग, बड़े स्पष्ट अक्षरों में हैं।
बालकाण्ड • दोहा 309 तक का प्रसंग

चारों भाइयों के दर्शन से जनकपुर का आनंद

श्रीराम की छवि • दशरथजी के चार पुत्र • नगरवासियों का हर्ष

चौपाई • 1 / 4
रामहि देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी॥ नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी॥
सरल हिंदी अर्थ — श्रीराम के दर्शन से पूरी बारात का विरह-दुःख शांत हो गया। महाराज दशरथ के पास चारों पुत्र ऐसे शोभित हो रहे हैं, मानो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष साकार खड़े हों।
चौपाई • 2 / 4
सुतन्ह समेत दसरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी॥ सुमन बरिसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना॥
सरल हिंदी अर्थ — पुत्रों के साथ दशरथजी को देखकर जनकपुर के स्त्री-पुरुष अत्यंत प्रसन्न हुए। देवताओं ने पुष्पवर्षा की, मंगल वाद्य बजे और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं।
चौपाई • 3 / 4
सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन॥ सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना॥
सरल हिंदी अर्थ — शतानंदजी, ब्राह्मण, मंत्री, विद्वान और स्तुतिगायक आदि ने बारात सहित दशरथजी का सत्कार किया और अनुमति लेकर लौटे।
चौपाई • 4 / 4
प्रथम बरात लगन तें आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई॥ ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं॥
सरल हिंदी अर्थ — विवाह के शुभ लग्न से पहले बारात पहुँचने के कारण नगर को उत्सव मनाने का अधिक समय मिला। जनकपुरवासी आनंद में डूबे थे और चाहते थे कि यह मंगल समय लंबा हो जाए।
✦ दोहा 309 ✦
रामु सीय सोभा अवधि सुकृत अवधि दोउ राज। जहँ तहँ पुरजन कहहिं अस मिलि नर नारि समाज॥३०९॥
दोहा का अर्थ — जनकपुर के स्त्री-पुरुष आपस में कहते हैं कि श्रीराम और सीता सुंदरता की सीमा हैं तथा दशरथ और जनक पुण्य की पराकाष्ठा हैं।
बालकाण्ड • दोहा 310 तक का प्रसंग

जानकी और श्रीराम के सौभाग्य पर जनकपुर का उल्लास

जानकीजी का पुण्य • नगरवासियों का सौभाग्य • विवाह-दर्शन की अभिलाषा

चौपाई • 1 / 4
जनक सुकृत मूरति बैदेही। दसरथ सुकृत रामु धरें देही॥ इन्ह सम काहुँ न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे॥
सरल हिंदी अर्थ — जनकजी के पुण्य मूर्तिमान होकर जानकीजी के रूप में और दशरथजी के पुण्य श्रीराम के रूप में प्रकट हुए हैं। नगरवासी इन दोनों राजाओं के अद्भुत सौभाग्य की प्रशंसा करते हैं।
चौपाई • 2 / 4
इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहिं कतहूँ होनेउ नाहीं॥ हम सब सकल सुकृत कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी॥
सरल हिंदी अर्थ — नगरवासी कहते हैं कि ऐसे पुण्यात्मा राजाओं की समानता दुर्लभ है। वे स्वयं को भी भाग्यशाली मानते हैं कि उन्हें जनकपुर में जन्म मिला।
चौपाई • 3 / 4
जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृती हम सरिस बिसेषी॥ पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू॥
सरल हिंदी अर्थ — जिन्होंने सीताराम की दिव्य छवि देखी, वे अपने सौभाग्य को धन्य समझते हैं। वे विवाह-दर्शन की प्रतीक्षा में हैं, जिससे उनकी आँखें सफल होंगी।
चौपाई • 4 / 4
कहहिं परसपर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं॥ बड़ें भाग बिधि बात बनाई। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई॥
सरल हिंदी अर्थ — मधुर स्वर वाली सखियाँ एक-दूसरे से कहती हैं कि यह विवाह उनके लिए परम मंगल अवसर है और आगे भी राम-लक्ष्मण के दर्शन का सौभाग्य मिल सकता है।
✦ दोहा 310 ✦
बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय। लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय॥३१०॥
दोहा का अर्थ — प्रेमवश जनकजी समय-समय पर सीताजी को बुलाएँगे। तब अत्यंत मनोहर श्रीराम और लक्ष्मण उन्हें लेने आएँगे — यह सोचकर जनकपुरवासियों के मन पुलकित हैं।
बालकाण्ड • सोरठा 311 तक का प्रसंग

चारों भाइयों के विवाह की मंगलकामना

भरत–शत्रुघ्न का रूप • नगर-स्त्रियों की प्रार्थना • विशेष छंद

चौपाई • 1 / 4
बिबिध भाँति होइहि पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई॥ तब तब राम लखनहि निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी॥
सरल हिंदी अर्थ — सखियाँ कहती हैं कि ऐसी ससुराल सभी को प्रिय होगी। प्रत्येक आगमन पर जनकपुरवासियों को राम-लक्ष्मण के दर्शन का आनंद मिलेगा।
चौपाई • 2 / 4
सखि जस राम लखनकर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा॥ स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए॥
सरल हिंदी अर्थ — नगर की स्त्रियाँ सुनती हैं कि दशरथजी के साथ आए भरत और शत्रुघ्न भी राम-लक्ष्मण की तरह सुंदर श्याम और गौर वर्ण के राजकुमार हैं।
चौपाई • 3 / 4
कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे॥ भरतु रामही की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी॥
सरल हिंदी अर्थ — एक सखी कहती है कि उसने दोनों भाइयों को देखा; वे ऐसे सुंदर हैं मानो स्वयं ब्रह्माजी ने सँवारे हों। भरतजी का स्वरूप श्रीराम से अत्यंत मिलता है।
चौपाई • 4 / 4
लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा॥ मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं॥
सरल हिंदी अर्थ — लक्ष्मण और शत्रुघ्न भी अत्यंत समान, सुंदर और गुणवान हैं। उनके रूप और आकर्षण का वर्णन करना कठिन है।
✦ मूल छंद ✦
उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं। बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं॥ पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहि बचन सुनावहीं॥ ब्याहिअहुँ चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावहीं॥
छंद का भावार्थ — तुलसीदासजी कहते हैं कि चारों राजकुमार बल, विनय, विद्या, शील और सुंदरता के अनुपम समुद्र हैं। जनकपुर की स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाता से प्रार्थना करती हैं कि चारों भाइयों का विवाह इसी नगरी में हो।
✦ सोरठा 311 ✦
कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन। सखि सबु करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ॥३११॥
सोरठा का अर्थ — प्रेमाश्रुओं से भरे नेत्रों और पुलकित शरीर के साथ सखियाँ कहती हैं — दोनों राजा पुण्य के सागर हैं; शिवजी हमारी मंगलकामनाएँ पूरी करेंगे।
बालकाण्ड • दोहा 312 तक का प्रसंग

विवाह का शुभ मुहूर्त और गोधूलि बेला

विवाह की प्रतीक्षा • अगहन मास • मंगल लग्न का समाचार

चौपाई • 1 / 4
एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनँद उमगि उमगि उर भरहीं॥ जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए॥
सरल हिंदी अर्थ — जनकपुर की स्त्रियाँ आनंदपूर्वक मंगलकामनाएँ कर रही हैं। सीताजी के स्वयंवर में आए राजा भी चारों भाइयों को देखकर प्रसन्न हुए।
चौपाई • 2 / 4
कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला॥ गए बीति कछु दिन एहि भाँती। प्रमुदित पुरजन सकल बराती॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा श्रीराम के पवित्र यश की प्रशंसा करते हुए अपने घर लौट गए। जनकपुर के लोग और बाराती कुछ दिन तक उत्सव के आनंद में रहे।
चौपाई • 3 / 4
मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिम रितु अगहनु मासु सुहावा॥ ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू॥
सरल हिंदी अर्थ — हेमंत ऋतु में अगहन मास का विवाह-लग्न आ पहुँचा। तिथि, नक्षत्र, योग, वार और अन्य शुभ स्थितियों का विचार करके मंगल समय निश्चित हुआ।
चौपाई • 4 / 4
पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई॥ सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता॥
सरल हिंदी अर्थ — ब्रह्माजी ने लग्न-पत्रिका नारदजी के हाथ भेजी; जनकजी के ज्योतिषियों की गणना भी उसी से मिली। यह सुन सभी नगरवासी हर्षित हुए।
✦ दोहा 312 ✦
धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल। बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल॥३१२॥
दोहा का अर्थ — ब्राह्मणों ने सभी शुभ शकुनों को अनुकूल देखकर महाराज जनक से कहा कि विवाह के लिए पवित्र गोधूलि की शुभ बेला आ पहुँची है।
बालकाण्ड • दोहा 313 तक का प्रसंग

शंखनाद के साथ बारात का विवाह-मंडप की ओर प्रस्थान

पुरोहित शतानंद • मंगलगीत • कुलरीति • दशरथजी की बारात

चौपाई • 1 / 4
उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंब कर कारनु काहा॥ सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए॥
सरल हिंदी अर्थ — महाराज जनक ने पुरोहित शतानंदजी से कहा कि अब विलंब क्यों हो? तब पुरोहित ने मंत्रियों को बुलाया और विवाह की सभी मंगल सामग्री सजाई गई।
चौपाई • 2 / 4
संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे॥ सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं बेद धुनि बिप्र पुनीता॥
सरल हिंदी अर्थ — शंख, नगाड़े और ढोल बजने लगे। मंगल कलश और शुभ सामग्री सजाई गई; सुहागिनें गीत गाने लगीं और विद्वान ब्राह्मण वेदमंत्र उच्चारने लगे।
चौपाई • 3 / 4
लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती॥ कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू॥
सरल हिंदी अर्थ — मिथिला का आमंत्रण-दल आदरपूर्वक उस जनवासे पहुँचा जहाँ बारात रुकी थी। दशरथजी का राजसी वैभव देखकर वे चकित हुए।
चौपाई • 4 / 4
भयउ समउ अब धारिअ पाऊ। यह सुनि परा निसानहिं घाऊ॥ गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा॥
सरल हिंदी अर्थ — जब विवाह का समय होने का संदेश मिला, तब मंगल वाद्य बजने लगे। राजा दशरथ ने गुरु वसिष्ठजी की अनुमति और कुल-परंपरा के अनुसार मुनि एवं साधु-संतों के साथ प्रस्थान किया।
✦ दोहा 313 ✦
भाग्य बिभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि। लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि॥३१३॥
दोहा का अर्थ — अयोध्यानरेश दशरथजी के अनुपम भाग्य और वैभव को देखकर ब्रह्मा आदि देवता भी उनके सौभाग्य की प्रशंसा करने लगे।
॥ जय श्री सीताराम ॥
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