श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 61 | जनकपुर में बारात का स्वागत और श्रीराम-दशरथ मिलन | दोहा 304–308 अर्थ सहित

॥ श्री सीताराम ॥   •   भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग ६१

जनकपुर में बारात का स्वागत, माता सीता की दिव्य महिमा और श्रीराम–दशरथ का प्रेममय मिलन

मूल पाठ • सरल हिंदी अर्थ • दोहा ३०४–३०८

गोस्वामी तुलसीदासजी कृत श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड की यह कड़ी पिछली कड़ी के दोहा ३०३ के ठीक बाद शुरू होती है। बारात के शुभ प्रस्थान, जनकपुर के अतिथि-सत्कार, माता सीता की महिमा तथा श्रीराम-लक्ष्मण के पिता से मिलन का यह प्रसंग श्रद्धा और प्रेम से भरा है।

📜 पाठ-सीमा: दोहा ३०३ के बाद की सभी २० चौपाई-अंश और दोहा ३०४ से ३०८ तक। मूल छंद को अर्थ से अलग, बड़े और स्पष्ट अक्षरों में रखा गया है।
बालकाण्ड • दोहा 304 तक का प्रसंग

शुभ संकेतों के साथ बारात का प्रस्थान

मंगल शकुन • यात्रा की तैयारी • मिथिला की अगवानी

चौपाई • 1 / 4
मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुंदर सुत जाकें॥ राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दसरथु जनकु पुनीता॥
सरल हिंदी अर्थ — जिनके पुत्र स्वयं सगुण ब्रह्मस्वरूप श्रीराम हैं, वहाँ शुभ संकेत सहज ही उपस्थित हैं। श्रीराम वर, सीता वधू और दशरथ-जनक जैसे पुण्यात्मा समधी हैं।
चौपाई • 2 / 4
सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे॥ एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना॥
सरल हिंदी अर्थ — ऐसे पावन विवाह का समाचार पाकर मानो शुभ शकुन भी प्रसन्न हो उठे। घोड़ों, हाथियों और मंगल वाद्यों के साथ बारात ने प्रस्थान किया।
चौपाई • 3 / 4
आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्हि जनक बँधाए सेतू॥ बीच-बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए॥
सरल हिंदी अर्थ — महाराज जनक ने दशरथजी की बारात के मार्ग में नदियों पर पुल और विश्राम के सुंदर पड़ाव बनवाए, जिन्हें देवपुरी-जैसी सुविधाओं से सजाया गया।
चौपाई • 4 / 4
असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए॥ नित नूतन सुख लखि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले॥
सरल हिंदी अर्थ — हर बाराती को मनपसंद भोजन, विश्राम और वस्त्र उपलब्ध थे। इस आत्मीय सत्कार में सबको अपने घर की याद भी नहीं रही।
✦ दोहा 304 ✦
आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान। सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान॥३०४॥
दोहा का अर्थ — बारात के आने और मंगल वाद्यों की ध्वनि सुनकर मिथिला से स्वागत-दल सजे हुए हाथियों, रथों, पैदल सेवकों और घोड़ों के साथ आगे बढ़ा।
🪔 इस दोहे के बाद परंपरागत मासपारायण में दसवाँ विश्राम आता है।
बालकाण्ड • दोहा 305 तक का प्रसंग

जनकपुर में राजसी अगवानी

मंगल उपहार • भव्य स्वागत • प्रेम का मिलन

चौपाई • 1 / 4
कनक कलस भरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा॥ भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने॥
सरल हिंदी अर्थ — स्वागत के लिए स्वर्ण कलश, सुंदर थाल और अनेक प्रकार के पकवान भेजे गए। उनके वैभव और विविधता का वर्णन कठिन है।
चौपाई • 2 / 4
फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं॥ भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना॥
सरल हिंदी अर्थ — राजा जनक ने अनेक फल, सुंदर वस्तुएँ, आभूषण, वस्त्र, रत्न और विविध पशु-पक्षी तथा सवारियाँ आदरपूर्वक भेंट में भिजवाईं।
चौपाई • 3 / 4
मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए॥ दधि चिउरा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा॥
सरल हिंदी अर्थ — मंगल-भेंट, सुगंधित पदार्थ, दही और चिउड़ा सहित अनेक उपहार कहार भर-भरकर ले चले।
चौपाई • 4 / 4
अगवानन्ह जब दीखि बराता। उर आनंदु पुलक भर गाता॥ देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना॥
सरल हिंदी अर्थ — मिथिला के स्वागत-दल ने बारात देखी तो आनंद से पुलकित हो गया। सजधजकर आए स्वागत-दल को देखकर बारातियों ने भी खुशी में वाद्य बजाए।
✦ दोहा 305 ✦
हरषि परसपर मिलन हित कछुक चले बगमेल। जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल॥३०५॥
दोहा का अर्थ — स्वागत करने वाले और बाराती इतने प्रसन्न थे कि एक-दूसरे से मिलने को दौड़ पड़े; यह दृश्य मानो आनंद के दो महासागरों का मिलन था।
बालकाण्ड • दोहा 306 तक का प्रसंग

दशरथजी का सत्कार और सीताजी की महिमा

जनवासे की शोभा • अतिथि-सत्कार • दिव्य सिद्धियाँ

चौपाई • 1 / 4
बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभीं बजावहिं॥ बस्तु सकल राखीं नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें॥
सरल हिंदी अर्थ — देवगण उल्लास से वाद्य बजा रहे थे और पुष्प बरस रहे थे। जनकजी के प्रतिनिधियों ने प्रेम और विनयपूर्वक उपहार दशरथजी के सामने रखे।
चौपाई • 2 / 4
प्रेम समेत रायँ सबु लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा॥ करि पूजा मान्यता बड़ाई। जनवासे कहुँ चले लवाई॥
सरल हिंदी अर्थ — दशरथजी ने प्रेम से उपहार स्वीकारकर याचकों को दान दिए। आदर-सत्कार के बाद स्वागत-दल उन्हें जनवासे की ओर ले चला।
चौपाई • 3 / 4
बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनदु धन मदु परिहरहीं॥ अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहुँ सब भाँति सुपासा॥
सरल हिंदी अर्थ — रास्ते पर बिछे सुंदर वस्त्र और सजावट अपूर्व थे। जनवासे में हर अतिथि की सुविधा का पूरा ध्यान रखा गया।
चौपाई • 4 / 4
जानी सियँ बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई॥ हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाईं। भूप पहुनई करन पठाईं॥
सरल हिंदी अर्थ — माता सीता ने बारात आने की सूचना पाकर अपनी दिव्य महिमा प्रकट की और सिद्धियों को राजा दशरथ व अतिथियों की सेवा के लिए भेजा।
✦ दोहा 306 ✦
सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास। लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास॥३०६॥
दोहा का अर्थ — माता सीता की आज्ञा पाकर सभी सिद्धियाँ जनवासे पहुँचीं और वहाँ दिव्य वैभव तथा सुख-सुविधाएँ उपस्थित कर दीं।
बालकाण्ड • दोहा 307 तक का प्रसंग

श्रीराम–लक्ष्मण को पिता के आगमन का समाचार

सीताजी की करुणा • गुरु की अनुमति • पितृदर्शन की लालसा

चौपाई • 1 / 4
निज निज बास बिलोकि बराती। सुर सुख सकल सुलभ सब भाँती॥ बिभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना॥
सरल हिंदी अर्थ — बारातियों को विश्राम-स्थलों में दिव्य सुख-सुविधाएँ मिलीं। वे इस अद्भुत प्रबंध का रहस्य न जानकर जनकजी की प्रशंसा करते रहे।
चौपाई • 2 / 4
सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदयँ हेतु पहिचानी॥ पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई॥
सरल हिंदी अर्थ — श्रीराम ने सीताजी के प्रेम और महिमा को समझकर आनंद अनुभव किया। पिता के आने की खबर सुनकर राम और लक्ष्मण के हृदय हर्ष से भर गए।
चौपाई • 3 / 4
सकुचन्ह कहि न सकत गुरु पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं॥ बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी॥
सरल हिंदी अर्थ — दोनों भाइयों की पिता-दर्शन की तीव्र इच्छा थी, पर वे संकोचवश गुरु से कह नहीं पा रहे थे। विश्वामित्रजी उनकी विनम्रता देखकर अत्यंत संतुष्ट हुए।
चौपाई • 4 / 4
हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए॥ चले जहाँ दसरथु जनवासे। मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे॥
सरल हिंदी अर्थ — विश्वामित्रजी ने दोनों भाइयों को प्रेम से गले लगाया। वे उन्हें साथ लेकर जनवासे की ओर चले, जहाँ दशरथजी ठहरे थे।
✦ दोहा 307 ✦
भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत। उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत॥३०७॥
दोहा का अर्थ — दशरथजी ने विश्वामित्रजी को अपने दोनों पुत्रों के साथ आते देखा तो वे आनंदविभोर होकर उठे और उनकी अगवानी के लिए आगे बढ़े।
बालकाण्ड • दोहा 308 तक का प्रसंग

पिता-पुत्र और चारों भाइयों का प्रेममय मिलन

विश्वामित्र सम्मान • दशरथ मिलन • भरत-शत्रुघ्न से भेंट

चौपाई • 1 / 4
मुनिहि दंडवत कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा॥ कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई॥
सरल हिंदी अर्थ — दशरथजी ने गुरु विश्वामित्र को श्रद्धापूर्वक दंडवत प्रणाम किया। मुनि ने राजा को उठाकर आलिंगन दिया और कुशल पूछी।
चौपाई • 2 / 4
पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई॥ सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे॥
सरल हिंदी अर्थ — राम और लक्ष्मण को प्रणाम करते देख राजा का हृदय भर आया। पुत्रों को गले लगाकर उन्होंने बिछोह का दुःख भुला दिया।
चौपाई • 3 / 4
पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए॥ बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाईं। मनभावती असीसें पाईं॥
सरल हिंदी अर्थ — दोनों भाइयों ने गुरु वसिष्ठ और ब्राह्मणों के चरणों में प्रणाम किया। सभी ने प्रेमपूर्वक आशीर्वाद दिया।
चौपाई • 4 / 4
भरत सहानुज कीन्ह प्रनामा। लिए उठाइ लाइ उर रामा॥ हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता॥
सरल हिंदी अर्थ — भरत और शत्रुघ्न ने श्रीराम को प्रणाम किया। श्रीराम ने दोनों को प्रेम से गले लगाया, और लक्ष्मणजी ने भी दोनों भाइयों से आनंदपूर्वक भेंट की।
✦ दोहा 308 ✦
पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत। मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत॥३०८॥
दोहा का अर्थ — परम विनयी और करुणामय श्रीराम ने नगरवासियों, परिजनों, याचकों, मंत्रियों तथा मित्रों से सबके अनुरूप स्नेहपूर्वक भेंट की।
॥ जय श्री सीताराम ॥
© 2026 Bhakti Bhavna | Powered by @Bablu_dwivedi418

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय भक्ति सामग्री

ओ मेरे रघुवर तू ही सहारा है | राम भजन लिरिक्स | Bhakti Bhavna

श्रीरामचरितमानस की 24 प्रसिद्ध चौपाइयाँ | सरल अर्थ सहित

नहीं चाहिए दिल दुखाना किसी का | प्रेरक भजन एवं जीवन संदेश