श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 60 — अयोध्या की सजावट और बारात की तैयारी

भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 60

अयोध्या की सजावट और बारात की तैयारी

इस भाग का प्रसंग: अयोध्या की सजावट और बारात की तैयारी।

पाठ-सीमा: दोहा 298 के बाद से 303 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 299 से पहले
बाँधे बिरद बीर रन गाढ़े । निकसि भए पुर बाहेर ठाढ़े ॥
फेरहिं चतुर तुरग गति नाना । हरषहिं सुनि सुनि पवन निसाना ॥
रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए । ध्वज पताक मनि भूषन लाए ॥
चवँर चारु किंकिन धुनि करही । भानु जान सोभा अपहरहीं ॥
सावँकरन अगनित हय होते । ते तिन्ह रथन्ह सारथिन्ह जोते ॥
सुंदर सकल अलंकृत सोहे । जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे ॥
जे जल चलहिं थलहि की नाई । टाप न बूड़ बेग अधिकाई ॥
अस्त्र सस्त्र सबु साजु बनाई । रथी सारथिन्ह लिए बोलाई ॥

सरल भावार्थ: वीर नगर के बाहर इकट्ठे होते और घोड़ों की विभिन्न चाल दिखाते हैं। सारथि ध्वज, मणि, चँवर और घंटियों से सुंदर रथ सजाते हैं। तेज घोड़े उनमें जोते जाते हैं, जो जल पर भी भूमि की तरह चलने की क्षमता वाले बताए गए हैं। रथ, अस्त्र और शस्त्र तैयार करके योद्धा बुलाए जाते हैं।

दोहा 299
चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात।
होत सगुन सुन्दर सबहि जो जेहि कारज जात ॥२९९॥

सरल अर्थ: रथों पर चढ़कर बाराती नगर के बाहर जुटने लगते हैं। जो जिस कार्य से जाता है, उसे सुंदर शुभ शकुन होते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 300 से पहले
कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं । कहि न जाहिं जेहि भाँति सँवारीं ॥
चले मत्तगज घंट बिराजी । मनहुँ सुभग सावन घन राजी ॥
बाहन अपर अनेक बिधाना । सिबिका सुभग सुखासन जाना ॥
तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर बृन्दा । जनु तनु धरें सकल श्रुति छंदा ॥
मागध सूत बंदि गुनगायक । चले जान चढ़ि जो जेहि लायक ॥
बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती । चले बस्तु भरि अगनित भाँती ॥
कोटिन्ह काँवरि चले कहारा । बिबिध बस्तु को बरनै पारा ॥
चले सकल सेवक समुदाई । निज निज साजु समाजु बनाई ॥

सरल भावार्थ: हाथियों पर सुंदर अंबारियाँ सजी हैं और घंटियाँ बजती हैं। ब्राह्मण पालकियों तथा सुखासनों में चलते हैं, मानो वेदों के छंद शरीर धारण कर आए हों। मागध, सूत और बंदी अपने योग्य वाहनों में हैं। ऊँट, खच्चर, बैल और कहार अनेक प्रकार की सामग्री लेकर चलते हैं। सेवक अपनी-अपनी तैयारी से बारात में शामिल होते हैं।

दोहा 300
सब कें उर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर।
कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनू दोउ बीर ॥३००॥

सरल अर्थ: सबके हृदय में अपार हर्ष और शरीर में रोमांच है। वे उत्सुक हैं कि श्रीराम और लक्ष्मणजी का नेत्र भरकर दर्शन कब होगा।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 301 से पहले
गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा । रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा ॥
निदरि घनहि घुर्म्मरहिं निसाना । निज पराइ कछु सुनिअ न काना ॥
महा भीर भूपति के द्वारें । रज होइ जाइ पषान पबारें ॥
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं । लिँएँ आरती मंगल थारी ॥
गावहिं गीत मनोहर नाना । अति आनंदु न जाइ बखाना ॥
तब सुमंत्र दुइ स्पंदन साजी । जोते रबि हय निंदक बाजी ॥
दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने । नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने ॥
राज समाजु एक रथ साजा । दूसर तेज पुंज अति भ्राजा ॥

सरल भावार्थ: हाथियों की गर्जना, घंटियों, रथों और घोड़ों की ध्वनि तथा नगारों का नाद फैलता है। राजद्वार पर भारी भीड़ है। स्त्रियाँ अटारियों से आरती की थाल लिए गीत गाती हैं। सुमंत्रजी दो सुंदर रथ तैयार करते हैं—एक राजसमाज के योग्य और दूसरा तेजस्वी रथ गुरु के लिए।

दोहा 301
तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु।
आपु चढ़ेउ स्पंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु ॥३०१॥

सरल अर्थ: दशरथजी प्रसन्नता से वसिष्ठजी को सुंदर रथ पर बैठाते हैं। फिर शिव, गुरु, गौरी और गणेश का स्मरण करके स्वयं दूसरे रथ पर चढ़ते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 302 से पहले
सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें । सुर गुर संग पुरंदर जैसें ॥
करि कुल रीति बेद बिधि राऊ । देखि सबहि सब भाँति बनाऊ ॥
सुमिरि रामु गुर आयसु पाई । चले महीपति संख बजाई ॥
हरषे बिबुध बिलोकि बराता । बरषहिं सुमन सुमंगल दाता ॥
भयउ कोलाहल हय गय गाजे । ब्योम बरात बाजने बाजे ॥
सुर नर नारि सुमंगल गाई । सरस राग बाजहिं सहनाई ॥
घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं । सरव करहिं पाइक फहराहीं ॥
करहिं बिदूषक कौतुक नाना । हास कुसल कल गान सुजाना ।

सरल भावार्थ: गुरु वसिष्ठजी के साथ दशरथजी इंद्र और बृहस्पति जैसे शोभित हैं। कुल तथा वेद की विधि पूरी कर वे श्रीराम का स्मरण करते और गुरु की आज्ञा से प्रस्थान करते हैं। देवता फूल बरसाते हैं। शहनाई, मंगलगीत और वाद्य गूँजते हैं; सैनिक और कलाकार अपने कौशल तथा विनोद से उत्सव बढ़ाते हैं।

दोहा 302
तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान ॥
नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान ॥३०२॥

सरल अर्थ: मृदंग और नगारों की ताल सुनकर राजकुमार घोड़ों को नचाते हैं। कुशल नट भी चकित देखते हैं, क्योंकि ताल का बंधन तनिक नहीं चूकता।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 303 से पहले
बनइ न बरनत बनी बराता । होहिं सगुन सुंदर सुभदाता ॥
चारा चाषु बाम दिसि लेई । मनहुँ सकल मंगल कहि देई ॥
दाहिन काग सुखेत सुहावा । नकुल दरसु सब काहूँ पावा ॥
सानुकूल बह त्रिबिध बयारी । सघट सवाल आव बर नारी ॥
लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा । सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा ॥
मृगमाला फिरि दाहिनि आई । मंगल गन जनु दीन्हि देखाई ॥
छेमकरी कह छेम बिसेषी । स्यामा बाम सुतरु पर देखी ॥
सनमुख आयउ दधि अरु मीना । कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना ॥

सरल भावार्थ: बारात की शोभा अवर्णनीय है। नीलकंठ, कौआ, नेवला, लोमड़ी, गाय-बछड़ा, मृग, क्षेमकरी और श्यामा पक्षी शुभ संकेत देते हैं। अनुकूल हवा चलती है। कलश लिए स्त्रियाँ, दही, मछली और पुस्तकधारी दो विद्वान ब्राह्मण सामने आते हैं। कथा में ये सभी शुभ शकुन माने गए हैं।

दोहा 303
मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार।
जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार ॥३०३॥

सरल अर्थ: ऐसा लगता है मानो मंगल और कल्याण देने वाले सभी शकुन एक साथ प्रकट हुए हों, ताकि अपनी शुभ फल देने की बात सच कर दिखाएँ।

॥ श्री सीताराम ॥
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