श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 30 — विश्वमोहिनी स्वयंवर, नारद का श्राप और मोहभंग

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 30

विश्वमोहिनी स्वयंवर • नारद का क्रोध • श्राप • मोहभंग

भाग 29 दोहा 133 पर समाप्त हुआ था। अब स्वयंवर-सभा में शिवगणों का उपहास, विश्वमोहिनी द्वारा भगवान का वरण, नारदजी को अपने रूप का बोध, शिवगणों और भगवान को दिया गया श्राप तथा अंत में भगवान द्वारा माया हटाकर नारदजी का मोह दूर करने का प्रसंग आता है।
चौपाई
जेहिं समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई॥
तहँ बैठे महेस गन दोऊ। बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ॥
सरल अर्थ: नारदजी रूप के अभिमान में जिस सभा में बैठे थे, वहीं शिवजी के दोनों गण भी ब्राह्मण-वेश में बैठ गए।
चौपाई
करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई॥
रीझिहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी॥
सरल अर्थ: शिवगण व्यंग्य करते हुए नारदजी की सुंदरता की प्रशंसा करने लगे। मोह के कारण नारदजी उस व्यंग्य को समझ नहीं पाए।
चौपाई
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ॥
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी॥
सरल अर्थ: नारदजी का मन माया के वश में था। शिवगण उनकी दशा देखकर मुस्करा रहे थे, पर भ्रमित बुद्धि के कारण नारदजी उनकी बातों का अर्थ न समझ सके।
चौपाई
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा॥
मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही॥
सरल अर्थ: भगवान की लीला का रहस्य किसी ने नहीं जाना, पर राजकुमारी ने नारदजी का वह विचित्र रूप देख लिया और उनसे विमुख हो गई।
दोहा 134
सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल।
देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल॥१३४॥
सरल अर्थ: राजकुमारी सखियों सहित राजहंसिनी की भाँति चली और हाथ में जयमाला लेकर स्वयंवर में उपस्थित राजाओं को देखने लगी।
चौपाई
जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसि तेहिं न बिलोकी भूली॥
पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दसा हर गन मुसकाहीं॥
सरल अर्थ: नारदजी जिस ओर गर्व से बैठे थे, राजकुमारी ने उधर देखा तक नहीं। नारदजी व्याकुल हुए और शिवगण उनकी दशा देखकर मुस्कराते रहे।
चौपाई
धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला॥
दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा॥
सरल अर्थ: भगवान राजारूप में वहाँ पहुँचे और राजकुमारी ने प्रसन्न होकर उन्हें जयमाला पहना दी। वे दुल्हन को लेकर चले गए और बाकी राजा निराश रह गए।
चौपाई
मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी। मनि गिरि गई छूटि जनु गाँठी॥
तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई॥
सरल अर्थ: नारदजी मोह और निराशा से अत्यंत व्याकुल हो गए। तब शिवगणों ने मुस्कराकर उन्हें दर्पण में अपना मुख देखने को कहा।
चौपाई
अस कहि दौउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी॥
बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहि सराप दीन्ह अति गाढ़ा॥
सरल अर्थ: दोनों गण भाग गए। जल में अपना प्रतिबिंब देखकर नारदजी को वास्तविक रूप का पता चला और क्रोध में उन्होंने शिवगणों को शाप दे दिया।
दोहा 135
होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ।
हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ॥१३५॥
सरल अर्थ: क्रोध में नारदजी ने दोनों शिवगणों को राक्षस होने का शाप दिया और कहा कि उनके उपहास का फल उन्हें मिलेगा।
चौपाई
पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा॥
फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदी चले कमलापति पाहीं॥
सरल अर्थ: फिर नारदजी ने अपना सामान्य रूप देखा, पर क्रोध शांत नहीं हुआ। वे तुरंत भगवान विष्णु के पास चले।
चौपाई
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोर उपहास कराई॥
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी। संग रमा सोइ राजकुमारी॥
सरल अर्थ: नारदजी भगवान को शाप देने के विचार से जा रहे थे। मार्ग में उन्हें भगवान उसी राजकुमारी के साथ मिले।
चौपाई
बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं॥
नारद कहेउ सहित अभिमाना। तुम्हार बिषय मोहि कछु न जाना॥
सरल अर्थ: भगवान ने मधुर वचन में नारदजी की व्याकुलता पूछी, लेकिन मोह और क्रोध से भरे नारदजी ने कठोर भाव से उत्तर दिया।
चौपाई
कपट कीन्ह मोहि बानर देहा। तुम्हहि कहाँ हित अनहित नेहा॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥
सरल अर्थ: नारदजी भगवान पर छल का आरोप करते हुए शाप देते हैं कि जैसे वे स्त्री के कारण दुःखी हुए, वैसे ही भगवान को भी नारी-वियोग का दुःख सहना पड़ेगा।
दोहा 136
बानर आकृति तुम्ह कीन्हि हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी॥
मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरहँ तुम्ह होब दुखारी॥१३६॥
सरल अर्थ: नारदजी के शाप में आगे रामावतार की लीला का संकेत है—वानर भगवान के सहायक होंगे और उन्हें पत्नी-वियोग सहना होगा।
चौपाई
श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि॥
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि॥
सरल अर्थ: भगवान ने नारदजी के शाप को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार किया और फिर अपनी प्रबल माया का प्रभाव समेट लिया।
दोहा 137
श्राप सीस धरि हरषि हियँ प्रभु बहु बिनती कीन्हि।
निज माया कै प्रबलता करषि कृपानिधि लीन्हि॥१३७॥
सरल अर्थ: कृपानिधान भगवान ने शाप स्वीकार कर नारदजी पर छाई माया को दूर कर दिया।
चौपाई
जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी॥
तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना॥
सरल अर्थ: माया हटते ही वहाँ न लक्ष्मीजी थीं, न राजकुमारी। नारदजी को अपनी भूल का बोध हुआ और वे भयभीत होकर भगवान के चरणों में गिर पड़े।
चौपाई
मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला॥
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे॥
सरल अर्थ: नारदजी ने अपने कठोर वचनों पर पश्चात्ताप किया और भगवान से पूछा कि उनके अपराध का प्रायश्चित्त कैसे होगा।
चौपाई
जपहु जाइ संकर सत नामा। होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा॥
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें। असि परतीति तजहु जनि भोरें॥
सरल अर्थ: भगवान ने नारदजी को शिवजी के सौ नामों का जप करने को कहा और बताया कि शिवजी उन्हें अत्यंत प्रिय हैं।
चौपाई
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी॥
अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहि माया निअराई॥
सरल अर्थ: भगवान कहते हैं कि शिवकृपा के बिना उनकी भक्ति प्राप्त नहीं होती। वे नारदजी को निश्चिंत होकर संसार में विचरण करने को कहते हैं।
दोहा 138
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान।
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान॥१३८॥
सरल अर्थ: भगवान ने नारदजी को अनेक प्रकार से समझाया और अंतर्धान हो गए। मोह से मुक्त नारदजी रामगुण गाते हुए सत्यलोक की ओर चले।

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