श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 38 — श्रीराम जन्मोत्सव, नामकरण और बाललीला

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 38

श्रीराम जन्मोत्सव • नामकरण • दिव्य बालस्वरूप • कौसल्या को विराट दर्शन • बाललीला

भाग 37 दोहा 192 पर समाप्त हुआ था। यह भाग उसी के ठीक बाद “सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी…” से आरंभ होकर श्रीराम की मनोहर बाललीलाओं के दोहा 205 तक जाता है। प्रत्येक चौपाई और दोहे का अलग कार्ड तथा उसी का अलग सरल अर्थ रखा गया है।
चौपाई
सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चलि आईं सब रानी॥
हरषित जहँ तहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी॥
सरल अर्थ: शिशु की मधुर रुदन-ध्वनि सुनकर रानियाँ और दासियाँ दौड़ीं। पूरे अयोध्या नगर में आनंद छा गया।
चौपाई
दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना॥
परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठत करत मति धीरा॥
सरल अर्थ: पुत्र-जन्म का समाचार सुनकर दशरथजी ब्रह्मानंद में डूब गए; प्रेम से उनका शरीर पुलकित हो उठा।
चौपाई
जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई॥
परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाइ बजावहु बाजा॥
सरल अर्थ: राजा को लगा कि जिनका नाम सुनना ही मंगलकारी है, वही प्रभु उनके घर आए हैं; उन्होंने उत्सव के बाजे बजवाए।
चौपाई
गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन सहित नृपद्वारा॥
अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन कहि न सिराई॥
सरल अर्थ: गुरु वशिष्ठ ब्राह्मणों सहित राजमहल आए और चारों अनुपम बालकों का दर्शन किया।
दोहा 193
नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह।
हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह॥१९३॥
सरल अर्थ: राजा ने विधिपूर्वक जातकर्म आदि संस्कार कराए और ब्राह्मणों को स्वर्ण, गाय, वस्त्र तथा रत्न दान दिए।
चौपाई
ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा॥
सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई॥
सरल अर्थ: अयोध्या ध्वज, पताकाओं और तोरणों से सज गई; आकाश से पुष्पवर्षा हुई और सब लोग आनंदमग्न हुए।
चौपाई
बृंद बृंद मिलि चलीं लोगाई। सहज सिंगार किएँ उठि धाई॥
कनक कलस मंगल धरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा॥
सरल अर्थ: नगर की स्त्रियाँ समूहों में मंगल-थाल और स्वर्ण-कलश लेकर गीत गाती हुई राजद्वार पहुँचीं।
चौपाई
करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं॥
मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक॥
सरल अर्थ: स्त्रियाँ आरती और न्योछावर करतीं, जबकि गायक और बंदीजन रघुनाथजी के पवित्र गुण गाते थे।
चौपाई
सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहिं पावा राखा नहिं ताहू॥
मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा॥
सरल अर्थ: उत्सव में भरपूर दान हुआ और नगर की गलियाँ चंदन, कस्तूरी और कुमकुम से सुगंधित हो उठीं।
दोहा 194
गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद।
हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद॥१९४॥
सरल अर्थ: सौंदर्य और मंगल के धाम प्रभु के प्रकट होने पर घर-घर बधावे बजे और नगर के स्त्री-पुरुष हर्षित हुए।
चौपाई
कैकेयसुता सुमित्रा दोऊ। सुंदर सुत जनमत भैं ओऊ॥
वह सुख संपति समय समाजा। कहि न सकइ सारद अहिराजा॥
सरल अर्थ: कैकेयी और सुमित्रा के यहाँ भी सुंदर पुत्र हुए; उस समय के आनंद और वैभव का पूर्ण वर्णन संभव नहीं है।
चौपाई
अवधपुरी सोहइ एहि भाँती। प्रभुहि मिलन आई जनु राती॥
देखि भानु जनु मन सकुचानी। तदपि बनी संध्या अनुमानी॥
सरल अर्थ: अयोध्या की शोभा ऐसी थी मानो स्वयं मंगलमयी रात्रि प्रभु से मिलने आई हो।
चौपाई
अगर धूप बहु जनु अँधिआरी। उड़इ अबीर मनहुँ अरुनारी॥
मंदिर मनि समूह जनु तारा। नृप गृह कलस सो इंदु उदारा॥
सरल अर्थ: धूप, अबीर, रत्नों और कलशों से सजी नगरी का काव्यमय वर्णन आकाश और तारों जैसी छटा के रूप में किया गया है।
चौपाई
भवन बेदधुनि अति मृदु बानी। खग कूजत कल पावन जानी॥
कौतुक देखि पतंग भुलाना। मास दिवस कर दिवस समाना॥
सरल अर्थ: राजमहल की वेदध्वनि और उत्सव देखकर मानो सूर्य भी अपनी गति भूल गए और एक दिन महीना-सा हो गया।
दोहा 195
मास दिवस कर दिवस भा मरम न जानइ कोइ।
रथ समेत रबि थाकेउ निसा कवन बिधि होइ॥१९५॥
सरल अर्थ: काव्य में जन्मोत्सव के आनंद को इतना विशाल बताया गया है कि मानो सूर्य का रथ ठहर गया और एक दिन पूरे महीने जितना हो गया।
चौपाई
यह रहस्य काहूँ नहिं जाना। दिनमनि चले करत गुनगाना॥
देखि महोत्सव सुर मुनि नागा। चले भवन बरनत निज भागा॥
सरल अर्थ: उत्सव देखकर देवता, मुनि और नाग अपने भाग्य की सराहना करते हुए लौटे; सूर्य भी प्रभु के गुण गाते हुए आगे बढ़े।
चौपाई
औरउ एक कहउँ निज चोरी। सुनु गिरिजा अति दृढ़ मति तोरी॥
काकभुसुंडि संग हम दोऊ। मनुजरूप जानइ नहिं कोऊ॥
सरल अर्थ: शिवजी पार्वती से बताते हैं कि वे और काकभुशुण्डि भी मनुष्य रूप में उस उत्सव में उपस्थित थे।
चौपाई
परमानंद प्रेमसुख फूले। बीथिन्ह फिरहिं मगन मन भूले॥
यह सुभ चरित जान पै सोई। कृपा राम कै जापर होई॥
सरल अर्थ: वे प्रेम और परमानंद में अयोध्या की गलियों में घूमते रहे; ऐसी लीला का वास्तविक रस प्रभु की कृपा से ही मिलता है।
चौपाई
तेहि अवसर जो जेहि बिधि आवा। दीन्ह भूप जो जेहि मन भावा॥
गज रथ तुरग हेम गो हीरा। दीन्हे नृप नानाबिधि चीरा॥
सरल अर्थ: जो भी उत्सव में आया, राजा दशरथ ने उसे मनचाहा दान—हाथी, रथ, घोड़े, स्वर्ण, गाय, रत्न और वस्त्र—दिए।
दोहा 196
मन संतोषे सबन्हि के जहँ तहँ देहिं असीस।
सकल तनय चिर जीवहुँ तुलसिदास के ईस॥१९६॥
सरल अर्थ: सब लोग संतुष्ट होकर चारों राजकुमारों के दीर्घ और मंगलमय जीवन का आशीर्वाद देने लगे।
चौपाई
कछुक दिवस बीते एहि भाँती। जात न जानिअ दिन अरु राती॥
नामकरन कर अवसरु जानी। भूप बोलि पठए मुनि ग्यानी॥
सरल अर्थ: कुछ दिन बाद नामकरण का समय आया और राजा ने गुरु वशिष्ठ को आदरपूर्वक बुलाया।
चौपाई
करि पूजा भूपति अस भाषा। धरिअ नाम जो मुनि गुनि राखा॥
इन्ह के नाम अनेक अनूपा। मैं नृप कहब स्वमति अनुरूपा॥
सरल अर्थ: दशरथजी ने गुरु से चारों पुत्रों के गुणों के अनुरूप नाम रखने की विनती की।
चौपाई
जो आनंद सिंधु सुखरासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी॥
सो सुखधाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक बिश्रामा॥
सरल अर्थ: जो आनंद के समुद्र और समस्त लोकों को सुख देने वाले हैं, गुरु ने उनका नाम ‘राम’ रखा।
चौपाई
बिस्व भरन पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत अस होई॥
जाके सुमिरन तें रिपु नासा। नाम सत्रुहन बेद प्रकासा॥
सरल अर्थ: विश्व का भरण-पोषण करने वाले का नाम भरत और शत्रुओं का नाश करने वाले का नाम शत्रुघ्न रखा गया।
चौपाई
लच्छन धाम राम प्रिय सकल जगत आधार।
गुरु बसिष्ठ तेहि राखा लछिमन नाम उदार॥
सरल अर्थ: शुभ लक्षणों के धाम और श्रीराम के अत्यंत प्रिय भाई का नाम गुरु वशिष्ठ ने लक्ष्मण रखा।
दोहा 197
धरे नाम गुर हृदयँ बिचारी। बेद तत्त्व नृप तव सुत चारी॥
मुनि धन जन सरबस सिव प्राना। बाल केलि तेहिं सुख माना॥१९७॥
सरल अर्थ: गुरु ने विचारपूर्वक चारों के नाम रखे। राजपरिवार और नगर उनके बालरूप को देखकर अपार आनंद पाते रहे।
चौपाई
बालचरित अति सरल सुहाए। सारद सेष संभु श्रुति गाए॥
जिन कर मन इन्ह सन नहिं राता। ते जन बंचित किए बिधाता॥
सरल अर्थ: चारों भाइयों की सरल और सुंदर बाललीलाएँ देवताओं और संतों को भी प्रिय हैं; उनसे प्रेम न होना बड़े दुर्भाग्य के समान बताया गया है।
चौपाई
भए कुमार जबहिं सब भ्राता। दीन्ह जनेऊ गुरु पितु माता॥
गुरगृह गए पढ़न रघुराई। अलप काल बिद्या सब आई॥
सरल अर्थ: उचित आयु पर संस्कार हुए और श्रीराम सहित चारों भाई गुरु के आश्रम में शिक्षा प्राप्त करने गए।
चौपाई
जाकी सहज स्वास श्रुति चारी। सो हरि पढ़ यह कौतुक भारी॥
बिद्या बिनय निपुन गुन सीला। खेलहिं खेल सकल नृपलीला॥
सरल अर्थ: जिनसे वेदों का ज्ञान प्रकट होता है, वही प्रभु विद्यार्थी बनकर पढ़ते हैं—यह उनकी मनोहर लीला है।
चौपाई
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥
सरल अर्थ: बालक श्रीराम के हाथ में धनुष-बाण शोभते हैं और चारों भाइयों को देखकर नगरवासी प्रेम से ठिठक जाते हैं।
दोहा 198
ब्यापक ब्रह्म निरंजन निर्गुन बिगत बिनोद।
सो अज प्रेम भगति बस कौसल्या कें गोद॥१९८॥
सरल अर्थ: सर्वव्यापक, अजन्मा और निर्गुण ब्रह्म भक्तिपूर्ण मातृप्रेम के वश होकर कौसल्या की गोद में बालक रूप से खेल रहे हैं।
चौपाई
काम कोटि छबि स्याम सरीरा। नील कंज बारिद गंभीरा॥
अरुन चरन पंकज नख जोती। कमल दलन्हि बैठे जनु मोती॥
सरल अर्थ: श्रीराम का श्याम शरीर करोड़ों कामदेवों से सुंदर और चरण-कमल की नख-ज्योति मोतियों जैसी मनोहर है।
चौपाई
रेख कुलिस ध्वज अंकुर सोहे। नूपुर धुनि सुनि मुनि मन मोहे॥
कटि किंकिनी उदर त्रय रेखा। नाभि गभीर जान जेहि देखा॥
सरल अर्थ: चरणों के शुभ चिह्न, नूपुरों की ध्वनि, करधनी और बालरूप की सुंदरता मुनियों के मन को भी मोहित करती है।
चौपाई
भुज बिसाल भूषन जुत भूरी। हियँ हरि नख अति सोभा रूरी॥
उर मनिहार पदिक की सोभा। बिप्र चरन देखत मन लोभा॥
सरल अर्थ: विशाल भुजाओं और आभूषणों से सुसज्जित प्रभु का बालस्वरूप अत्यंत मनोहर दिखाई देता है।
चौपाई
कंबु कंठ अति चिबुक सुहाई। आनन अमित मदन छबि छाई॥
दुइ दुइ दसन अधर अरुनारे। नासा तिलक को बरनै पारे॥
सरल अर्थ: शंख समान कंठ, सुंदर ठोड़ी, लाल होंठ और छोटे दाँत बालरूप की अद्भुत शोभा बढ़ाते हैं।
चौपाई
सुंदर श्रवन सुचारु कपोला। अति प्रिय मधुर तोतरे बोला॥
चिक्कन कच कुंचित गभुआरे। बहु प्रकार रचि मातु सँवारे॥
सरल अर्थ: सुंदर कान-कपोल, मधुर तोतली वाणी और घुँघराले बाल देखकर माता प्रेमपूर्वक उनका श्रृंगार करती हैं।
चौपाई
पीत झगुलिआ तनु पहिराई। जानु पानि बिचरनि मोहि भाई॥
रूप सकहिं नहिं कहि श्रुति सेषा। सो जानइ सपनेहुँ जेहि देखा॥
सरल अर्थ: पीले वस्त्र पहने घुटनों और हाथों के बल चलते बालराम की शोभा का पूरा वर्णन वेद और शेषजी भी नहीं कर सकते।
दोहा 199
सुख संदोह मोह पर ग्यान गिरा गोतीत।
दंपति परम प्रेम बस कर सिसुचरित पुनीत॥१९९॥
सरल अर्थ: ज्ञान और वाणी से परे प्रभु माता-पिता के प्रेम के वश होकर पवित्र बाललीलाएँ करते हैं।
चौपाई
एहि बिधि राम जगत पितु माता। कोसलपुर बासिन्ह सुखदाता॥
जिन्ह रघुनाथ चरन रति मानी। तिन्ह की यह गति प्रगट भवानी॥
सरल अर्थ: जगत के आधार श्रीराम अयोध्यावासियों को अपने बालरूप और लीला से आनंद देते हैं।
चौपाई
रघुपति बिमुख जतन कर कोरी। कवन सकइ भव बंधन छोरी॥
जीव चराचर बस कै राखे। सो माया प्रभु सों भय भाखे॥
सरल अर्थ: शिवजी बताते हैं कि श्रीराम से विमुख होकर केवल उपायों से संसार-बंधन नहीं कटता; माया भी प्रभु के अधीन है।
चौपाई
भृकुटि बिलास नचावइ ताही। अस प्रभु छाड़ि भजिअ कहु काही॥
मन क्रम बचन छाड़ि चतुराई। भजत कृपा करिहहिं रघुराई॥
सरल अर्थ: ऐसे समर्थ प्रभु को सरल मन, कर्म और वचन से भजने पर उनकी कृपा प्राप्त होती है।
चौपाई
एहि बिधि सिसुबिनोद प्रभु कीन्हा। सकल नगरबासिन्ह सुख दीन्हा॥
लै उछंग कबहुँक हलरावै। कबहुँ पालने घालि झुलावै॥
सरल अर्थ: प्रभु की बाललीलाओं से नगर आनंदित था; कौसल्या कभी उन्हें गोद में दुलारतीं और कभी पालने में झुलातीं।
दोहा 200
प्रेम मगन कौसल्या निसि दिन जात न जान।
सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान॥२००॥
सरल अर्थ: कौसल्या पुत्र-प्रेम में इतनी मग्न थीं कि दिन-रात का भान नहीं रहता और वे प्रभु की बाललीलाओं का गान करती रहतीं।
चौपाई
एक बार जननीं अन्हवाए। करि सिंगार पलनाँ पौढ़ाए॥
निज कुल इष्टदेव भगवाना। पूजा हेतु कीन्ह अस्नाना॥
सरल अर्थ: एक बार कौसल्या ने श्रीराम को स्नान और श्रृंगार कर पालने में सुलाया और कुलदेवता की पूजा की तैयारी की।
चौपाई
करि पूजा नैबेद्य चढ़ावा। आपु गई जहँ पाक बनावा॥
बहुरि मातु तहवाँ चलि आई। भोजन करत देखि सुत जाई॥
सरल अर्थ: पूजा में नैवेद्य चढ़ाकर माता रसोई की ओर गईं; लौटने पर उन्होंने बालक राम को नैवेद्य खाते देखा।
चौपाई
गै जननी सिसु पहिं भयभीता। देखा बाल तहाँ पुनि सूता॥
बहुरि आइ देखा सुत सोई। हृदयँ कंप मन धीर न होई॥
सरल अर्थ: घबराकर पालने के पास गईं तो राम वहाँ सोते मिले; फिर पूजा-स्थान पर भी वही रूप देखकर वे आश्चर्य में पड़ गईं।
चौपाई
इहाँ उहाँ दुइ बालक देखा। मतिभ्रम मोर कि आन बिसेषा॥
देखि राम जननी अकुलानी। प्रभु हँसि दीन्ह मधुर मुसुकानी॥
सरल अर्थ: एक ही समय दो स्थानों पर बालक को देखकर माता भ्रमित हुईं; प्रभु ने मुस्कराकर उनकी शंका दूर करने की लीला की।
दोहा 201
देखरावा मातहि निज अद्भुत रूप अखंड।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मंड॥२०१॥
सरल अर्थ: प्रभु ने माता को अपना अखंड विराट स्वरूप दिखाया, जिसमें प्रत्येक रोम में असंख्य ब्रह्मांड दिखाई दिए।
चौपाई
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन। बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन॥
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ। सोउ देखा जो सुना न काऊ॥
सरल अर्थ: माता ने उस विराट रूप में असंख्य सूर्य, चंद्र, ब्रह्मा, शिव, पर्वत, नदियाँ, समुद्र और समस्त सृष्टि-तत्त्व देखे।
चौपाई
देखी माया सब बिधि गाढ़ी। अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी॥
देखा जीव नचावइ जाही। देखी भगति जो छोरइ ताही॥
सरल अर्थ: उन्होंने माया की शक्ति, जीवों की स्थिति और उस बंधन से छुड़ाने वाली भक्ति का रहस्य देखा।
चौपाई
तन पुलकित मुख बचन न आवा। नयन मूदि चरननि सिरु नावा॥
बिसमयवंत देखि महतारी। भए बहुरि सिसुरूप खरारी॥
सरल अर्थ: विराट दर्शन से कौसल्या पुलकित और स्तब्ध हो गईं; तब प्रभु पुनः सहज बालरूप में आ गए।
चौपाई
अस्तुति करि न जाइ भय माना। जगत पिता मैं सुत करि जाना॥
हरि जननी बहुबिधि समुझाई। यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई॥
सरल अर्थ: माता को अपनी सीमित मातृ-दृष्टि का बोध हुआ; प्रभु ने उन्हें प्रेमपूर्वक समझाकर इस रहस्य को गुप्त रखने को कहा।
दोहा 202
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि।
अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि॥२०२॥
सरल अर्थ: कौसल्या हाथ जोड़कर प्रार्थना करती हैं कि प्रभु की माया उन्हें फिर कभी उनके वास्तविक स्वरूप को भूलने न दे।
चौपाई
बालचरित हरि बहुबिधि कीन्हा। अति अनंद दासन्ह कहँ दीन्हा॥
कछुक काल बीतें सब भाई। बड़े भए परिजन सुखदाई॥
सरल अर्थ: प्रभु ने अनेक बाललीलाएँ कर भक्तों को आनंद दिया और समय बीतने पर चारों भाई कुछ बड़े हुए।
चौपाई
चूड़ाकरन कीन्ह गुरु जाई। बिप्रन्ह पुनि दच्छिना बहु पाई॥
परम मनोहर चरित अपारा। करत फिरत चारिउ सुकुमारा॥
सरल अर्थ: संस्कार विधिपूर्वक संपन्न हुए और चारों सुकुमार भाई मनोहर बाललीलाएँ करते रहे।
चौपाई
मन क्रम बचन अगोचर जोई। दसरथ अजिर बिचर प्रभु सोई॥
भोजन करत बोल जब राजा। नहिं आवत तजि बाल समाजा॥
सरल अर्थ: जो प्रभु मन-वचन से परे हैं, वही दशरथ के आँगन में बालकों के साथ खेलते और बुलाने पर भी खेल छोड़कर तुरंत नहीं आते।
चौपाई
कौसल्या जब बोलन जाई। ठुमुकु ठुमुकु प्रभु चलहिं पराई॥
निगम नेति सिव अंत न पावा। ताहि धरै जननी हठि धावा॥
सरल अर्थ: कौसल्या बुलाने जातीं तो प्रभु ठुमकते हुए भागते; जिनका अंत वेद और शिव नहीं पा सके, उन्हें माता पकड़ने दौड़ती हैं।
चौपाई
धूसर धूरि भरें तनु आए। भूपति बिहसि गोद बैठाए॥
सरल अर्थ: धूल से भरे बालक राम लौटते तो दशरथजी हँसते हुए उन्हें प्रेम से गोद में बैठा लेते।
दोहा 203
भोजन करत चपल चित इत उत अवसरु पाइ।
भाजि चले किलकत मुख दधि ओदन लपटाइ॥२०३॥
सरल अर्थ: भोजन के समय भी बालक राम का चित्त खेल में लगा रहता; अवसर पाकर दही-भात लगे मुख से किलकारी मारते हुए भाग जाते।
चौपाई
बंधु सखा सँग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥
पावन मृग मारहिं जियँ जानी। दिन प्रति नृपहि देखावहिं आनी॥
सरल अर्थ: बड़े होने पर श्रीराम भाइयों और सखाओं के साथ वन-विहार और राजकुमारों के अनुरूप खेल करते।
चौपाई
जे मृग राम बान के मारे। ते तनु तजि सुरलोक सिधारे॥
अनुज सखा सँग भोजन करहीं। मातु पिता अग्या अनुसरहीं॥
सरल अर्थ: कथा प्रभु के बाण से मुक्ति पाने वाले जीवों का भाव बताती है; श्रीराम भाइयों-सखाओं के साथ रहते और माता-पिता की आज्ञा मानते।
चौपाई
जेहि बिधि सुखी होहिं पुर लोगा। करहिं कृपानिधि सोइ संजोगा॥
बेद पुरान सुनहिं मन लाई। आपु कहहिं अनुजन्ह समुझाई॥
सरल अर्थ: प्रभु नगरवासियों के सुख का ध्यान रखते और वेद-पुराण सुनकर छोटे भाइयों को भी समझाते।
चौपाई
प्रातकाल उठि कै रघुनाथा। मातु पिता गुरु नावहिं माथा॥
आयसु मागि करहिं पुर काजा। देखि चरित हरषइ मन राजा॥
सरल अर्थ: श्रीराम प्रातः माता-पिता और गुरु को प्रणाम करते, आज्ञा लेकर कर्तव्य करते और दशरथजी उनके आचरण से प्रसन्न होते।
दोहा 204
कोसलपुर बासी नर नारि बृद्ध अरु बाल।
प्रानहु ते प्रिय लागत सब कहुँ राम कृपाल॥२०४॥
सरल अर्थ: अयोध्या के स्त्री-पुरुष, वृद्ध और बालक—सभी को कृपालु श्रीराम अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय थे।
चौपाई
बंधु सखा सँग लेहिं बोलाई। बन मृगया नित खेलहिं जाई॥
करतल बान धनुष अति सोहा। देखत रूप चराचर मोहा॥
सरल अर्थ: श्रीराम भाइयों और सखाओं के साथ विहार करते; हाथों में धनुष-बाण लिए उनका रूप सबको मोहित करता था।
चौपाई
जिन्ह बीथिन्ह बिहरहिं सब भाई। थकित होहिं सब लोग लुगाई॥
मन बच क्रम सब भाँति सुहाए। राम चरित सबके मन भाए॥
सरल अर्थ: जिन गलियों से चारों भाई निकलते, वहाँ लोग प्रेम से उन्हें निहारते रह जाते; उनका आचरण सबको प्रिय था।
दोहा 205
ब्यापक अकल अनीह अज निर्गुन नाम न रूप।
भगत हेतु नाना बिधि करत चरित्र अनूप॥२०५॥
सरल अर्थ: जो परमात्मा सर्वव्यापक, अजन्मा, इच्छारहित और निर्गुण हैं, वही भक्तों के प्रेम के लिए अनेक अनुपम मानवीय लीलाएँ करते हैं।

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