श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 9 — प्रयाग माहात्म्य, भरद्वाज का रामतत्त्व प्रश्न और याज्ञवल्क्य का उत्तर
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 9
प्रयाग माहात्म्य • भरद्वाज का रामतत्त्व प्रश्न • याज्ञवल्क्य का उत्तर
यह भाग पिछले प्रकाशित भाग 8 के दोहा 43(ख) के ठीक बाद से आरंभ होता है। याज्ञवल्क्य-भरद्वाज संवाद में प्रयाग की महिमा, रामतत्त्व का प्रश्न और उसके उत्तर में सती प्रसंग की भूमिका आती है।
प्रयाग में भरद्वाज मुनि
भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा। तिन्हहि राम पद अति अनुरागा॥
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥
तापस सम दम दया निधाना। परमारथ पथ परम सुजाना॥
सरल अर्थ: भरद्वाज मुनि प्रयाग में निवास करते हैं और श्रीराम के चरणों में उनका गहरा प्रेम है। तप, संयम, दया और परमार्थ उनके जीवन के आधार हैं।
माघ में तीर्थराज का संगम
माघ मकरगत रबि जब होई। तीरथपतिहिं आव सब कोई॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥
देव दनुज किंनर नर श्रेनी। सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं॥
सरल अर्थ: माघ में सूर्य के मकर राशि में आने पर विविध लोकों के प्राणी तीर्थराज प्रयाग पहुँचते और श्रद्धापूर्वक त्रिवेणी में स्नान करते हैं।
माधव और अक्षयवट
पूजहि माधव पद जलजाता। परसि अखय बटु हरषहिं गाता॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥
भरद्वाज आश्रम अति पावन। परम रम्य मुनिबर मन भावन॥
सरल अर्थ: तीर्थयात्री माधव के चरणों की पूजा और अक्षयवट का स्पर्श करते हैं। भरद्वाज का आश्रम इस आध्यात्मिक वातावरण का पवित्र केंद्र है।
ऋषियों का सत्संग
तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा। जाहिं जे मज्जन तीरथराजा॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥
मज्जहिं प्रात समेत उछाहा। कहहिं परसपर हरि गुन गाहा॥
सरल अर्थ: प्रयाग आए ऋषि-मुनि भरद्वाज आश्रम में एकत्र होकर स्नान के बाद हरि के गुणों और आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा करते हैं।
दोहा 44
ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग।
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥४४॥
कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग॥४४॥
सरल अर्थ: संत-मुनि ब्रह्म, धर्म और तत्त्वों का विवेचन करते हुए ज्ञान और वैराग्य से संयुक्त भगवान की भक्ति का वर्णन करते हैं।
माघ के बाद मुनियों की विदाई
एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं। पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं॥
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥
प्रति संबत अति होइ अनंदा। मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा॥
सरल अर्थ: माघ भर यह पवित्र क्रम चलता है और फिर मुनिगण अपने-अपने आश्रम लौट जाते हैं। यह आनंदमय परंपरा प्रति वर्ष होती है।
याज्ञवल्क्य को रोकना
एक बार भरि मकर नहाए। सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए॥
जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥
जगबालिक मुनि परम बिबेकी। भरद्वाज राखे पद टेकी॥
सरल अर्थ: एक अवसर पर अन्य मुनियों के चले जाने के बाद भरद्वाज ने परम विवेकी याज्ञवल्क्य मुनि को विशेष आग्रह से रोक लिया।
आदरपूर्वक सत्कार
सादर चरन सरोज पखारे। अति पुनीत आसन बैठारे॥
करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥
करि पूजा मुनि सुजस बखानी। बोले अति पुनीत मृदु बानी॥
सरल अर्थ: भरद्वाज मुनि ने याज्ञवल्क्य का आदरपूर्वक सत्कार किया और फिर विनम्र वाणी में अपना प्रश्न रखने लगे।
भरद्वाज का संशय
नाथ एक संसउ बड़ मोरें। करगत बेदतत्व सबु तोरें॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥
कहत सो मोहि लागत भय लाजा। जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा॥
सरल अर्थ: भरद्वाज कहते हैं कि उनके मन में एक बड़ा संशय है। पूछने में संकोच है, पर उसे छिपाए रखना आध्यात्मिक प्रगति में बाधा होगा।
दोहा 45
संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव।
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥४५॥
होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव॥४५॥
सरल अर्थ: संतों की नीति है कि गुरु से मन का संशय छिपाने पर निर्मल विवेक नहीं जागता। इसलिए भरद्वाज अपने प्रश्न को स्पष्ट करते हैं।
रामनाम का प्रभाव
अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू। हरहु नाथ करि जन पर छोहू॥
राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥
राम नाम कर अमित प्रभावा। संत पुरान उपनिषद गावा॥
सरल अर्थ: भरद्वाज करुणा की याचना करते हुए कहते हैं कि संत, पुराण और उपनिषद रामनाम के असीम प्रभाव का गान करते हैं।
शिव और रामनाम
संतत जपत संभु अबिनासी। सिव भगवान ग्यान गुन रासी॥
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥
आकर चारि जीव जग अहहीं। कासीं मरत परम पद लहहीं॥
सरल अर्थ: वे स्मरण कराते हैं कि ज्ञान और गुणों के भंडार शिव स्वयं रामनाम का जप करते हैं और काशी में जीवों को परम गति का उपदेश मिलता है।
राम कौन हैं?
सोपि राम महिमा मुनिराया। सिव उपदेसु करत करि दाया॥
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥
रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही। कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही॥
सरल अर्थ: भरद्वाज का केंद्रीय प्रश्न सामने आता है—वे जानना चाहते हैं कि शिव जिन राम की महिमा बताते हैं, वे राम वास्तव में कौन हैं।
अयोध्या के राम
एक राम अवधेस कुमारा। तिन्ह कर चरित बिदित संसारा॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु मारा॥
नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा। भयहु रोषु रन रावनु मारा॥
सरल अर्थ: वे अयोध्या के राजकुमार राम के प्रसिद्ध चरित्र का उल्लेख करते हैं—वनवास, सीता-वियोग और रावण-वध—और इसी से अपने प्रश्न को और स्पष्ट करते हैं।
दोहा 46
प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि।
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥४६॥
सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि॥४६॥
सरल अर्थ: भरद्वाज पूछते हैं कि क्या शिव जिनका जप करते हैं वे यही राम हैं या कोई अन्य? वे याज्ञवल्क्य से विवेकपूर्वक रामतत्त्व समझाने का आग्रह करते हैं।
संशय मिटाने की प्रार्थना
जैसे मिटै मोर भ्रम भारी। कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी॥
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥
जागबलिक बोले मुसुकाई। तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई॥
सरल अर्थ: भरद्वाज विस्तार से कथा सुनकर भ्रम मिटाना चाहते हैं। याज्ञवल्क्य मुस्कराकर संकेत देते हैं कि भरद्वाज स्वयं भी रघुनाथ की प्रभुता जानते हैं।
प्रश्न के पीछे कथा-प्रेम
राममगत तुम्ह मन क्रम बानी। चतुराई तुम्हारी मैं जानी॥
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥
चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा। कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा॥
सरल अर्थ: याज्ञवल्क्य समझ जाते हैं कि भरद्वाज का प्रश्न अज्ञान से नहीं, बल्कि श्रीराम के गूढ़ गुणों को विस्तार से सुनने की प्रेमपूर्ण इच्छा से निकला है।
रामकथा की शक्ति
तात सुनहु सादर मनु लाई। कहउँ राम कै कथा सुहाई॥
महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥
महामोहु महिषेसु बिसाला। रामकथा कालिका कराला॥
सरल अर्थ: याज्ञवल्क्य मन लगाकर रामकथा सुनने को कहते हैं। तुलसीदास रामकथा को महामोह रूपी महिषासुर का नाश करने वाली शक्ति के रूप में चित्रित करते हैं।
संतों के लिए चंद्रकिरण
रामकथा ससि किरन समाना। संत चकोर करहिं जेहि पाना॥
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥
ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी। महादेव तब कहा बखानी॥
सरल अर्थ: रामकथा संतों के लिए चंद्रकिरणों जैसी प्रिय है। याज्ञवल्क्य बताते हैं कि ऐसा ही संशय कभी भवानी ने भी किया था और शिव ने उसका समाधान किया।
सती प्रसंग की भूमिका
एक बार त्रेता जुग माहीं। संभु गए कुंभज रिषि पाहीं॥
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥
संग सती जगजननि भवानी। पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी॥
सरल अर्थ: रामतत्त्व के उत्तर में याज्ञवल्क्य अब एक पुराने प्रसंग की ओर जाते हैं—त्रेतायुग में शिव सती के साथ अगस्त्य मुनि के आश्रम पहुँचे।
रामकथा का श्रवण
रामकथा मुनीबर्ज बखानी। सुनी महेस परम सुखु मानी॥
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥
रिषि पूछी हरिभगति सुहाई। कही संभु अधिकारी पाई॥
सरल अर्थ: अगस्त्य मुनि ने रामकथा कही और शिव ने अत्यंत आनंद से सुनी। बाद में मुनि के प्रश्न पर शिव ने उन्हें हरिभक्ति का रहस्य समझाया।
शिव-सती की विदाई
कहत सुनत रघुपति गुन गाथा। कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा॥
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥
मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी। चले भवन सँग दच्छकुमारी॥
सरल अर्थ: कुछ दिन रामगुणों की कथा कहते-सुनते बीते। फिर शिव मुनि से विदा लेकर सती के साथ अपने धाम की ओर चले।
श्रीराम का अवतार
तेहि अवसर भंजन महिभारा। हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा॥
पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥
पिता बचन तजि राजु उदासी। दंडक बन बिचरत अबिनासी॥
सरल अर्थ: उसी समय पृथ्वी का भार हरने के लिए भगवान रघुवंश में अवतरित होकर पिता की आज्ञा से राज्य छोड़ दंडक वन में विचरण कर रहे थे।
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