श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 17 — तारकासुर का आतंक, देवताओं की चिंता और कामदेव का प्रस्थान

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 17

तारकासुर का आतंक • देवताओं की चिंता • शिव समाधि • कामदेव का प्रस्थान

भाग 16 दोहा 81 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ता है—सप्तऋषि शिवजी को पार्वतीजी की निष्ठा बताते हैं, तारकासुर से पीड़ित देवता ब्रह्माजी की शरण जाते हैं और देवकार्य के लिए कामदेव शिवजी की ओर प्रस्थान करते हैं।
चौपाई
जाइ मुनिन्ह हिमवंतु पठाए। करि बिनती गिरजहिं गृह ल्याए॥
बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई॥
सरल अर्थ: सप्तऋषियों ने हिमवान को भेजकर पार्वतीजी को घर बुलवाया और फिर शिवजी के पास जाकर उनकी अटल निष्ठा का पूरा वृत्तांत सुनाया।
चौपाई
भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा॥
मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना॥
सरल अर्थ: पार्वतीजी का प्रेम सुनकर शिवजी आनंदित हुए। सप्तऋषि लौट गए और शिवजी मन स्थिर करके श्रीराम के ध्यान में स्थित हो गए।
चौपाई
तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला॥
तेंहि सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते॥
सरल अर्थ: उसी समय तारकासुर अपने अपार बल और प्रताप से देवताओं तथा लोकपालों को पराजित करके उन्हें अत्यंत दुःखी कर रहा था।
चौपाई
अजर अमर सो जीति न जाई। हारे सुर करि बिबिध लराई॥
तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे॥
सरल अर्थ: देवता अनेक युद्धों के बाद भी तारकासुर को जीत न सके। अंततः वे ब्रह्माजी के पास अपनी विपत्ति लेकर पहुँचे।
दोहा 82
सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ।
संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ॥८२॥
सरल अर्थ: ब्रह्माजी ने समझाया कि तारकासुर का अंत शिवजी से उत्पन्न पुत्र के हाथों ही संभव होगा।
चौपाई
मोर कहा सुनि करहु उपाई। होइहि ईस्वर करिहि सहाई॥
सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा॥
सरल अर्थ: ब्रह्माजी देवताओं को उपाय करने के लिए कहते हैं और स्मरण कराते हैं कि सती अब हिमाचल के घर पार्वती रूप में जन्म ले चुकी हैं।
चौपाई
तेहिं तपु कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी॥
जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी॥
सरल अर्थ: पार्वतीजी शिवजी को पति रूप में पाने के लिए तप कर चुकी हैं, लेकिन शिवजी गहन समाधि में हैं। इसी कारण देवताओं के सामने कठिन परिस्थिति है।
चौपाई
पठवहु कामु जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं॥
तब हम जाइ सिवहि सिर नाई। करवाउब बिबाहु बरिआई॥
सरल अर्थ: ब्रह्माजी योजना बताते हैं कि कामदेव शिवजी की समाधि में क्षोभ उत्पन्न करे; उसके बाद देवता शिव-पार्वती विवाह के लिए निवेदन करेंगे।
चौपाई
एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ सबु कोई॥
अस्तुति सुरन्ह कीन्हि अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबान झषकेतू॥
सरल अर्थ: देवताओं को यह उपाय उचित लगा। उन्होंने कामदेव का स्मरण और स्तुति की, तब कामदेव उनके सामने प्रकट हुए।
दोहा 83
सुरन्ह कही निज बिपति सब सुनि मन कीन्ह बिचार।
संभु बिरोध न कुसल मोहि बिहसि कहेउ अस मार॥८३॥
सरल अर्थ: देवताओं की विपत्ति सुनकर कामदेव समझ गए कि शिवजी की समाधि भंग करना उनके लिए संकटपूर्ण होगा।
चौपाई
तदपि करब मैं काजु तुम्हारा। श्रुति कह परम धरम उपकारा॥
पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं तेही॥
सरल अर्थ: कामदेव जानते हुए भी देवताओं का कार्य करने को तैयार होते हैं, क्योंकि परोपकार को महान धर्म माना गया है।
चौपाई
अस कहि चलेउ सबहि सिरु नाई। सुमन धनुष कर सहित सहाई॥
चलत मार अस हृदयँ बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा॥
सरल अर्थ: सबको प्रणाम करके कामदेव अपने पुष्पधनुष और सहायकों के साथ निकलते हैं। वे जानते हैं कि शिवजी का विरोध उनके लिए घातक हो सकता है।
चौपाई
तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा॥
कोपेउ जबहिं बारिचरकेतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू॥
सरल अर्थ: कामदेव अपने प्रभाव का विस्तार करते हैं और संसार में कामभाव की तीव्र लहर फैल जाती है।
चौपाई
ब्रह्मचरज ब्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना॥
सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा॥
सरल अर्थ: कामदेव के प्रभाव से ब्रह्मचर्य, संयम, धैर्य, धर्म, ज्ञान, सदाचार, जप, योग और वैराग्य तक डगमगाने लगते हैं।
छंद
भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सुभट संजुग महि मुरे।
सदग्रंथ पर्वत कंदरन्हि महुँ जाइ तेहि अवसर दुरे॥
सरल अर्थ: काव्यात्मक वर्णन में कहा गया है कि विवेक और उसके सहायक मानो रणभूमि छोड़कर छिप गए; कामदेव का प्रभाव अत्यंत व्यापक हो गया।
दोहा 84
जे सजीव जग अचर चर नारि पुरुष अस नाम।
ते निज निज मरजाद तजि भए सकल बस काम॥८४॥
सरल अर्थ: चर-अचर जगत में जहाँ स्त्री-पुरुष का भाव था, वहाँ कामदेव का प्रभाव फैल गया और मर्यादाएँ विचलित होने लगीं।

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