श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 32 — मनु-शतरूपा का वैराग्य, नैमिषारण्य गमन और कठोर तप

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 32

मनु–शतरूपा • वैराग्य • नैमिषारण्य • द्वादशाक्षर मंत्र • कठोर तप

भाग 31 दोहा 141 पर पूर्ण हुआ था। अब श्रीरामावतार के दूसरे कारण की कथा स्वायम्भुव मनु और शतरूपा से आरंभ होती है। धर्मपूर्वक राज्य करने के बाद वैराग्य, वनगमन, भक्ति और अत्यंत कठोर तप के द्वारा दंपति प्रभु के प्रत्यक्ष दर्शन की अभिलाषा करते हैं।
चौपाई
स्वायंभू मनु अरु सतरूपा। जिन्ह तें भै नरसृष्टि अनूपा॥
दंपति धरम आचरन नीका। अजहुँ गाव श्रुति जिन्ह कै लीका॥
सरल अर्थ: स्वायम्भुव मनु और शतरूपा से मानव-सृष्टि का विस्तार हुआ। उनका धर्ममय आचरण इतना श्रेष्ठ था कि वेद भी उनकी मर्यादा का गान करते हैं।
चौपाई
नृप उत्तानपाद सुत तासू। ध्रुव हरि भगत भयउ सुत जासू॥
लघु सुत नाम प्रियब्रत ताही। बेद पुरान प्रसंसहिं जाही॥
सरल अर्थ: मनुजी के पुत्र उत्तानपाद के पुत्र महान हरिभक्त ध्रुव हुए। उनके दूसरे पुत्र प्रियव्रत की भी वेद-पुराण प्रशंसा करते हैं।
चौपाई
देवहूति पुनि तासु कुमारी। जो मुनि कर्दम कै प्रिय नारी॥
आदिदेव प्रभु दीनदयाला। जठर धरेउ जेहिं कपिल कृपाला॥
सरल अर्थ: उनकी पुत्री देवहूति कर्दम मुनि की पत्नी हुईं और उनके गर्भ से भगवान कपिल प्रकट हुए।
चौपाई
सांख्य सास्त्र जिन्ह प्रगट बखाना। तत्व बिचार निपुन भगवाना॥
तेहिं मनु राज कीन्ह बहु काला। प्रभु आयसु सब बिधि प्रतिपाला॥
सरल अर्थ: भगवान कपिल ने सांख्य तत्त्व का उपदेश किया। मनुजी ने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य करते हुए प्रभु की आज्ञा का पालन किया।
सोरठा 142
होइ न बिषय बिराग भवन बसत भा चौथपन।
हृदयँ बहुत दुख लाग जनम गयउ हरिभगति बिनु॥१४२॥
सरल अर्थ: वृद्धावस्था आने पर मनुजी को दुःख हुआ कि गृहस्थ जीवन में रहते हुए विषयों से पूर्ण वैराग्य नहीं हुआ और जीवन हरिभक्ति के बिना बीतता जा रहा है।
चौपाई
बरबस राज सुतहि तब दीन्हा। नारि समेत गवन बन कीन्हा॥
तीरथ बर नैमिष बिख्याता। अति पुनीत साधक सिधि दाता॥
सरल अर्थ: मनुजी ने पुत्र को राज्य सौंप दिया और शतरूपा सहित वन की ओर चले। वे पवित्र नैमिषारण्य तीर्थ पहुँचना चाहते थे।
चौपाई
बसहिं तहाँ मुनि सिद्ध समाजा। तहँ हियँ हरषि चलेउ मनु राजा॥
पंथ जात सोहहिं मतिधीरा। ग्यान भगति जनु धरें सरीरा॥
सरल अर्थ: नैमिषारण्य में मुनि और सिद्ध निवास करते थे। वहाँ जाते हुए मनु-शतरूपा ज्ञान और भक्ति के साकार रूप जैसे शोभित होते थे।
चौपाई
पहुँचे जाइ धेनुमति तीरा। हरषि नहाने निरमल नीरा॥
आए मिलन सिद्ध मुनि ग्यानी। धरम धुरंधर नृपरिषि जानी॥
सरल अर्थ: वे धेनुमती के तट पर पहुँचे, पवित्र जल में स्नान किया और सिद्ध-मुनियों ने धर्मनिष्ठ राजर्षि जानकर उनका स्वागत किया।
चौपाई
जहँ जहँ तीरथ रहे सुहाए। मुनिन्ह सकल सादर करवाए॥
कृस सरीर मुनिपट परिधाना। सत समाज नित सुनहिं पुराना॥
सरल अर्थ: मुनियों ने उन्हें पवित्र तीर्थों का दर्शन कराया। दंपति तपस्वी वेश धारण कर संत-समाज में नित्य पुराण सुनने लगे।
दोहा 143
द्वादस अच्छर मंत्र पुनि जपहिं सहित अनुराग।
बासुदेव पद पंकरुह दंपति मन अति लाग॥१४३॥
सरल अर्थ: दोनों प्रेमपूर्वक द्वादशाक्षर मंत्र का जप करते और उनका मन भगवान वासुदेव के चरणकमलों में गहराई से लगा रहता।
चौपाई
करहिं अहार साक फल कंदा। सुमिरहिं ब्रह्म सच्चिदानंदा॥
पुनि हरि हेतु करन तप लागे। बारि अधार मूल फल त्यागे॥
सरल अर्थ: पहले वे साग, फल और कंद का आहार करते हुए सच्चिदानंद ब्रह्म का स्मरण करते रहे; फिर फल-मूल छोड़कर जल के आधार पर तप करने लगे।
चौपाई
उर अभिलाष निरंतर होई। देखअ नयन परम प्रभु सोई॥
अगुन अखंड अनंत अनादी। जेहि चिंतहिं परमारथबादी॥
सरल अर्थ: उनके हृदय में एक ही अभिलाषा थी—उस परम प्रभु का प्रत्यक्ष दर्शन हो, जिसे ज्ञानी निर्गुण, अखंड, अनंत और अनादि कहते हैं।
चौपाई
नेति नेति जेहि बेद निरूपा। निजानंद निरुपाधि अनूपा॥
संभु बिरंचि बिष्नु भगवाना। उपजहिं जासु अंस तें नाना॥
सरल अर्थ: वेद जिस परम तत्त्व को ‘नेति-नेति’ कहकर निरूपित करते हैं, उसी अनुपम ब्रह्म के दर्शन की दंपति को उत्कट इच्छा थी।
चौपाई
ऐसेउ प्रभु सेवक बस अहई। भगत हेतु लीलातनु गहई॥
जौं यह बचन सत्य श्रुति भाषा। तौ हमार पूजहि अभिलाषा॥
सरल अर्थ: उनका विश्वास था कि वही अगम प्रभु भक्तों के प्रेमवश लीला-विग्रह धारण करते हैं; इसलिए उनकी दर्शन-अभिलाषा भी अवश्य पूर्ण होगी।
दोहा 144
एहि बिधि बीते बरष षट सहस बारि आहार।
संबत सप्त सहस्र पुनि रहे समीर अधार॥१४४॥
सरल अर्थ: इस प्रकार छह हजार वर्ष जल के आधार पर तप किया और फिर सात हजार वर्ष केवल वायु के आधार पर रहे।
चौपाई
बरष सहस दस त्यागेउ सोऊ। ठाढ़े रहे एक पद दोऊ॥
बिधि हरि तप देखि अपारा। मनु समीप आए बहु बारा॥
सरल अर्थ: इसके बाद उन्होंने वायु का आधार भी छोड़ दिया और दस हजार वर्ष एक पैर पर खड़े होकर तप किया। उनके महान तप को देखकर देवता बार-बार आए।
चौपाई
मागहु बर बहु भाँति लोभाए। परम धीर नहिं चलहिं चलाए॥
अस्थिमात्र होइ रहे सरीरा। तदपि मनाग मनहिं नहिं पीरा॥
सरल अर्थ: उन्हें अनेक वर माँगने को कहा गया, पर उनका धैर्य नहीं डिगा। शरीर केवल अस्थियों जैसा रह गया, फिर भी मन में तप का कष्ट नहीं माना।
चौपाई
प्रभु सर्बग्य दास निज जानी। गति अनन्य तापस नृप रानी॥
मागु मागु बरु भै नभ बानी। परम गभीर कृपामृत सानी॥
सरल अर्थ: सर्वज्ञ प्रभु ने अपने अनन्य भक्त राजा-रानी की स्थिति जानकर आकाशवाणी की—‘वर माँगो’; वह वाणी करुणामृत से भरी थी।
चौपाई
मृतक जिआवनि गिरा सुहाई। श्रवन रंध्र होइ उर जब आई॥
हृष्ट पुष्ट तन भए सुहाए। मानहुँ अबहिं भवन ते आए॥
सरल अर्थ: प्रभु की जीवनदायिनी वाणी सुनते ही उनके शरीर फिर सुंदर और पुष्ट हो गए, मानो वे अभी-अभी राजमहल से आए हों।
दोहा 145
श्रवन सुधा सम बचन सुनि पुलक प्रफुल्लित गात।
बोले मनु करि दंडवत प्रेम न हृदयँ समात॥१४५॥
सरल अर्थ: अमृत समान वाणी सुनकर दोनों प्रेम से पुलकित हो उठे। मनुजी ने दण्डवत प्रणाम किया और हृदय में उमड़ते प्रेम के साथ प्रभु से निवेदन आरंभ किया।

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