श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 21 — मैना का विलाप, पार्वती का धैर्य और नारद द्वारा भवानी रहस्य

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 21

मैना का विलाप • पार्वती का धैर्य • नारद का भवानी-रहस्य • विवाह-मंगल

भाग 20 दोहा 95 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ता है—मैना द्वारा शिवजी का परछन, उनके विलाप, पार्वतीजी के धैर्यपूर्ण वचन, नारदजी द्वारा भवानी के पूर्वजन्म का रहस्य और विवाह के शुभ लग्न तक।
चौपाई
लै अगवान बरातहि आए। दिए सबहि जनवास सुहाए॥
मैनाँ सुभ आरती सँवारी। संग सुमंगल गावहिं नारी॥
सरल अर्थ: बारात को आदरपूर्वक जनवासे में ठहराया गया। मैना ने शुभ आरती सजाई और स्त्रियाँ मंगलगीत गाती हुई शिवजी के स्वागत के लिए चलीं।
चौपाई
कंचन थार सोह बर पानी। परिछन चली हरहि हरषानी॥
बिकट बेष रुद्रहि जब देखा। अबलन्ह उर भय भयउ बिसेषा॥
सरल अर्थ: सोने के थाल से आरती करने चली मैना और स्त्रियाँ शिवजी का विलक्षण वैरागी रूप देखकर भयभीत हो गईं।
चौपाई
भागि भवन पैठीं अति त्रासा। गए महेसु जहाँ जनवासा॥
मैना हृदयँ भयउ दुखु भारी। लीन्ही बोलि गिरीसकुमारी॥
सरल अर्थ: स्त्रियाँ भय से भीतर लौट गईं। मैना अत्यंत दुःखी हुईं और उन्होंने पार्वतीजी को अपने पास बुलाया।
चौपाई
अधिक सनेहँ गोद बैठारी। स्याम सरोज नयन भरे बारी॥
जेहिं बिधि तुम्हहि रूपु अस दीन्हा। तेहिं जड़ बरु बाउर कस कीन्हा॥
सरल अर्थ: मैना पार्वतीजी को गोद में बैठाकर रोने लगीं और उनके सुंदर रूप की तुलना शिवजी के विचित्र वेश से करके व्याकुल हुईं।
छंद
कस कीन्ह बरु बौराह बिधि जेहिं तुम्हहि सुंदरता दई।
जो फलु चहिअ सुरतरुहिं सो बरबस बबूरहिं लागई॥
तुम्ह सहित गिरि तें गिरौं पावक जरौं जलनिधि महुँ परौं॥
घरु जाउ अपजसु होउ जग जीवत बिबाहु न हौं करौं॥
सरल अर्थ: माता का स्नेह भय और शोक में बदल जाता है। वे कहती हैं कि चाहे कितनी भी विपत्ति आए, वे बेटी का ऐसा विवाह स्वीकार नहीं करेंगी।
दोहा 96
भईं बिकल अबला सकल दुखित देखि गिरिनारि।
करि बिलापु रोदति बदति सुता सनेहु सँभारि॥९६॥
सरल अर्थ: मैना को दुःखी देखकर अन्य स्त्रियाँ भी व्याकुल हो गईं। माता अपनी पुत्री के स्नेह में रोते हुए विलाप करती हैं।
चौपाई
नारद कर मैं काह बिगारा। भवनु मोर जिन्ह बसत उजारा॥
अस उपदेसु उमहि जिन्ह दीन्हा। बौरे बरहि लगि तपु कीन्हा॥
सरल अर्थ: मैना दुःख में नारदजी को दोष देती हैं कि उनके उपदेश के कारण पार्वतीजी ने शिवजी को पाने के लिए तप किया।
चौपाई
साचेहुँ उन्ह कें मोह न माया। उदासीन धनु धामु न जाया॥
पर घर घालक लाज न भीरा। बाँझ कि जान प्रसव कै पीरा॥
सरल अर्थ: विलाप की अवस्था में मैना नारदजी के वैराग्य पर कटु वचन कहती हैं; यह उनकी मातृचिंता और तत्कालीन भावावेश का चित्रण है।
चौपाई
जननिहि बिकल बिलोकि भवानी। बोली जुत बिबेक मृदु बानी॥
अस बिचारि सोचहि मति माता। सो न टरइ जो रचइ बिधाता॥
सरल अर्थ: माता को व्याकुल देखकर पार्वतीजी विवेक और कोमलता से समझाती हैं कि विधाता ने जो निश्चित किया है, उसे चिंता से बदला नहीं जा सकता।
चौपाई
करम लिखा जौं बाउर नाहू। तौ कत दोसु लगाइअ काहू॥
तुम्ह सन मिटहिं कि बिधि के अंका। मातु ब्यर्थ जनि लेहु कलंका॥
सरल अर्थ: पार्वतीजी कहती हैं कि यदि भाग्य में ऐसा ही लिखा है तो किसी अन्य को दोष देना उचित नहीं; माता को व्यर्थ कलंक नहीं लेना चाहिए।
छंद
जनि लेहु मातु कलंकु करुना परिहरहु अवसर नहीं।
दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमरें जाब जहँ पाउब तहीं॥
सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं॥
बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषन नयन बारि बिमोचहीं॥
सरल अर्थ: उमा के विनम्र वचन सुनकर स्त्रियाँ और भावुक हो जाती हैं। पार्वतीजी अपने सुख-दुःख को भाग्य के अनुसार स्वीकार करने की दृढ़ता दिखाती हैं।
दोहा 97
तेहि अवसर नारद सहित अरु रिषि सप्त समेत।
समाचार सुनि तुहिनगिरि गवने तुरत निकेत॥९७॥
सरल अर्थ: समाचार पाकर हिमवान नारदजी और सप्तऋषियों सहित तुरंत घर पहुँचते हैं।
चौपाई
तब नारद सबहि समुझावा। पूरुब कथा प्रसंगु सुनावा॥
मयना सत्य सुनहु मम बानी। जगदंबा तव सुता भवानी॥
सरल अर्थ: नारदजी सबको पार्वतीजी के पूर्वजन्म का प्रसंग सुनाकर समझाते हैं कि वे साधारण कन्या नहीं, स्वयं जगदंबा भवानी हैं।
चौपाई
अजा अनादि सक्ति अबिनासिनि। सदा संभु अरधंग निवासिनि॥
जग संभव पालन लय कारिनि। निज इच्छा लीला बपु धारिनि॥
सरल अर्थ: नारदजी बताते हैं कि भवानी अनादि, अविनाशी शक्ति और शिवजी की अर्धांगिनी हैं; वे अपनी इच्छा से लीला-शरीर धारण करती हैं।
चौपाई
जनमीं प्रथम दच्छ गृह जाई। नामु सती सुंदर तनु पाई॥
तहँहुँ सती संकरहि बिबाहीं। कथा प्रसिद्ध सकल जग माहीं॥
सरल अर्थ: वे सती के पूर्वजन्म की कथा बताते हैं—दक्ष के घर जन्म और शिवजी से विवाह।
चौपाई
एक बार आवत सिव संगा। देखेउ रघुकुल कमल पतंगा॥
भयउ मोहु सिव कहा न कीन्हा। भ्रम बस बेषु सीय कर लीन्हा॥
सरल अर्थ: नारदजी सती द्वारा श्रीराम की परीक्षा के लिए सीताजी का रूप धारण करने वाले पूर्व प्रसंग को याद कराते हैं।
छंद
सिय बेषु सती जो कीन्ह तेहि अपराध संकर परिहरीं।
हर बिरहँ जाइ बहोरि पितु कें जग्य जोगानल जरीं॥
अब जनमि तुम्हरे भवन निज पति लागि दारुन तपु किया॥
अस जानि संसय तजहु गिरिजा सर्बदा संकर प्रिया॥
सरल अर्थ: नारदजी समझाते हैं कि वही सती अब पार्वती रूप में जन्म लेकर शिवजी के लिए कठोर तप कर चुकी हैं; इसलिए इस संबंध में संदेह छोड़ देना चाहिए।
दोहा 98
सुनि नारद के बचन तब सब कर मिटा बिषाद।
छन महुँ ब्यापेउ सकल पुर घर घर यह संबाद॥९८॥
सरल अर्थ: नारदजी की बात सुनते ही सबका शोक मिट गया और यह शुभ रहस्य पूरे नगर में फैल गया।
चौपाई
तब मयना हिमवंतु अनंदे। पुनि पुनि पारबती पद बंदे॥
नारि पुरुष सिसु जुबा सयाने। नगर लोग सब अति हरषाने॥
सरल अर्थ: मैना और हिमवान आनंदित होकर पार्वतीजी के चरणों की वंदना करते हैं। नगर के सभी लोग अत्यंत प्रसन्न होते हैं।
चौपाई
लगे होन पुर मंगल गाना। सजे सबहिं हाटक घट नाना॥
भाँति अनेक भई जेवनारा। सूपसास्त्र जस कछु ब्यवहारा॥
सरल अर्थ: नगर में मंगलगान होने लगता है, स्वर्णकलश सजते हैं और विवाह-भोज की विविध तैयारियाँ आरंभ होती हैं।
चौपाई
सो जेवनार कि जाइ बखानी। बसहिं भवन जेहिं मातु भवानी॥
सादर बोले सकल बराती। बिष्नु बिरंचि देव सब जाती॥
सरल अर्थ: जिस घर में स्वयं भवानी हों, वहाँ के विवाह-भोज की शोभा का वर्णन कठिन है। सभी बारातियों और देवताओं को आदर से बुलाया जाता है।
चौपाई
बिबिधि पाँति बैठी जेवनारा। लागे परुसन निपुन सुआरा॥
नारिबृंद सुर जेवँत जानी। लगीं देन गारीं मृदु बानी॥
सरल अर्थ: विवाह की पारंपरिक रीति से पंगत बैठती है, भोजन परोसा जाता है और स्त्रियाँ देवताओं को प्रेमपूर्ण विवाह-गारी सुनाती हैं।
छंद
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं।
भोजनु करहिं सुर अति बिलंबु बिनोदु सुनि सचु पावहीं॥
जेवँत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परै कह्यो॥
अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहँ जाको रह्यो॥
सरल अर्थ: मंगलमय हास-परिहास के बीच देवता भोजन करते हैं। प्रेम और आनंद का वातावरण इतना सुंदर है कि उसका पूरा वर्णन संभव नहीं।
दोहा 99
बहुरि मुनिन्ह हिमवंत कहुँ लगन सुनाई आइ।
समय बिलोकि बिबाह कर पठए देव बोलाइ॥९९॥
सरल अर्थ: इसके बाद मुनि हिमवान को शुभ लग्न बताते हैं और उचित समय देखकर विवाह के लिए देवताओं को बुलाया जाता है।

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