श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 20 — शिवजी का अद्भुत श्रृंगार, विचित्र बारात और हिमाचल में स्वागत
श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 20 शिवजी का श्रृंगार • विचित्र बारात • हिमाचल की तैयारी • बारात का आगमन भाग 19 दोहा 91 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ता है—शिवजी के अद्भुत दूल्हा-श्रृंगार, देवताओं और शिवगणों की विलक्षण बारात, हिमाचल की भव्य विवाह-तैयारी और बारात के नगर पहुँचने तक। चौपाई सिवहि संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा॥ कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला॥ सरल अर्थ: शिवगण अपने प्रभु का विवाह-श्रृंगार करते हैं। जटाओं का मुकुट, सर्पों के आभूषण, शरीर पर भस्म और बाघम्बर उनके अलौकिक वैरागी स्वरूप को प्रकट करते हैं। चौपाई ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा॥ गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला॥ सरल अर्थ: मस्तक पर चंद्रमा और गंगा, तीन नेत्र, सर्प का यज्ञोपवीत, नीलकंठ और मुंडमाला—यह विचित्र वेश भी कल्याणस्वरूप शिव की महिमा को दर्शाता है। चौपाई कर त्रिसूल अरु डमरु बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा॥ देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनि जग नाहीं॥ सरल अर्थ: त्रिशूल और डमरू धारण कर शिवजी नंदी पर सवार होते हैं। उनका अनोखा ...