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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 18 — शिव समाधि भंग, कामदेव दहन और रति को वरदान

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 18 कामदेव का प्रभाव • शिव समाधि भंग • कामदेव दहन • रति को वरदान भाग 17 दोहा 84 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ता है—कामदेव के व्यापक प्रभाव, शिवजी की अचल समाधि, तीसरे नेत्र से कामदेव-दहन और रति को मिले करुणामय वरदान तक। चौपाई सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा॥ नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई॥ सरल अर्थ: कामदेव के प्रभाव से समस्त जगत में आकर्षण की लहर फैल गई। तुलसीदासजी प्रकृति के रूपकों से इस व्यापक प्रभाव का वर्णन करते हैं। चौपाई जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥ पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय बिसारी॥ सरल अर्थ: जब जड़ प्रकृति तक ऐसी प्रभावित दिखाई देती है, तब चेतन प्राणियों की दशा का वर्णन कठिन है; पशु-पक्षी भी काम के प्रभाव में आ गए। छंद भए कामबस जोगीस तापस पामरन्हि की को कहै। देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे॥ सरल अर्थ: कामदेव का प्रभाव इतना व्यापक बताया गया है कि तपस्वी और योगी भी विचलित होने लगे; संसार की दृष्टि बदलती हुई प्रतीत हुई। दोहा 85 धरी न काहूँ धीर सबके मन मनसिज हरे। ज...