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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 25 — रामकथा महिमा, सगुण-निर्गुण रहस्य और श्रीराम का ब्रह्मस्वरूप

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 25 रामकथा महिमा • संशय-निवारण • सगुण-निर्गुण रहस्य • श्रीराम का ब्रह्मस्वरूप भाग 24 के सही दोहा 112 के बाद यह भाग आरंभ होता है। शिवजी रामकथा की महिमा बताते हुए पार्वतीजी के संशय का निराकरण करते हैं और सगुण-निर्गुण की अभिन्नता समझाकर श्रीराम को व्यापक परम ब्रह्म के रूप में प्रतिपादित करते हैं। चौपाई तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई॥ जिन्ह हरिकथा सुनी नहिं काना। श्रवन रंध्र अहिभवन समाना॥ सरल अर्थ: शिवजी कहते हैं कि पार्वतीजी ने पुरानी शंका इसलिए उठाई कि इस प्रसंग को कहने-सुनने से सबका कल्याण हो। हरिकथा न सुनने वाले कानों को वे निष्फल बताते हैं। चौपाई नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा॥ ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुर पद मूला॥ सरल अर्थ: संत-दर्शन, हरि और गुरु के प्रति विनय के बिना इंद्रियों की सार्थकता नहीं है—शिवजी भक्ति का महत्व समझाते हैं। चौपाई जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहिं आनी। जीवत सव समान तेइ प्रानी॥ जो नहिं करइ राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना॥ सरल अर्थ: जिस हृदय में हरिभक्ति नहीं और जो जिह्वा रामगुण नहीं गात...