संदेश

अपर्णा लेबल वाली पोस्ट दिखाई जा रही हैं

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 15 — पार्वती की कठोर तपस्या, अपर्णा नाम और ब्रह्मवाणी

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 15 पार्वती की कठोर तपस्या • अपर्णा नाम • ब्रह्मवाणी • शिव की श्रीराम भक्ति भाग 14 दोहा 73 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ते हुए पार्वतीजी की कठोर तपस्या, अपर्णा नाम की प्राप्ति, ब्रह्मवाणी द्वारा तप की सिद्धि और शिवजी की अचल श्रीराम भक्ति से सप्तऋषियों को भेजे जाने तक की कथा प्रस्तुत करता है। चौपाई उर धरि उमा प्रानपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तपु करना॥ अति सुकुमार न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू॥१॥ सरल अर्थ: पार्वतीजी शिवजी के चरणों को हृदय में धारण करके वन में तप करने लगीं। अत्यंत कोमल शरीर होने पर भी उन्होंने शिवप्राप्ति के लिए सभी सुखों का त्याग कर दिया। चौपाई नित नव चरन उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा॥ संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरष गवाँए॥२॥ सरल अर्थ: तप के साथ शिवचरणों में उनका प्रेम निरंतर बढ़ता गया। वे देह की सुध भूलकर दीर्घकाल तक अत्यंत संयमित आहार पर रहीं। चौपाई कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा॥ बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सहस संबत सोइ खाई॥३॥ सरल अर्थ: पार्वतीजी ने तप को क्रमशः और कठोर किया—कभी ज...