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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 23 — भरद्वाज की रामभक्ति, याज्ञवल्क्य का रामचरित आरंभ और कैलास प्रसंग

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 23 भरद्वाज की भक्ति • याज्ञवल्क्य का रामचरित आरंभ • कैलास • उमा का रामतत्त्व प्रश्न भाग 22 दोहा 103 पर समाप्त हुआ था। अब कथा शिव-पार्वती विवाह प्रसंग से वापस भरद्वाज–याज्ञवल्क्य संवाद में आती है। याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजी की निर्मल भक्ति देखकर श्रीरामचरित का वर्णन आरंभ करते हैं और कैलास पर उमा द्वारा पूछे गए रामतत्त्व के प्रश्न तक कथा पहुँचती है। चौपाई संभु चरित सुनि सरस सुहावा। भरद्वाज मुनि अति सुखु पावा॥ बहु लालसा कथा पर बाढ़ी। नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी॥ सरल अर्थ: शिवजी का सुंदर चरित्र सुनकर भरद्वाजजी अत्यंत आनंदित हुए। कथा के प्रति उनका प्रेम इतना बढ़ा कि आँखों में आँसू और शरीर में रोमांच हो आया। चौपाई प्रेम बिबस मुख आव न बानी। दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी॥ अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा। तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा॥ सरल अर्थ: भरद्वाजजी प्रेम से इतने भर गए कि बोल न सके। उनकी दशा देखकर याज्ञवल्क्यजी प्रसन्न हुए और उनकी शिवभक्ति की सराहना की। चौपाई सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं। रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं॥ बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू। राम भगत कर लच्छन एहू॥ सरल अ...