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श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 24 — उमा के रामतत्त्व प्रश्न, रामकथा की जिज्ञासा और शिव का प्रेम

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 24 उमा के रामतत्त्व प्रश्न • रामकथा की जिज्ञासा • शिव का रामप्रेम भाग 23 दोहा 108 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ता है—उमा अपने शेष संशय को स्पष्ट करती हैं, रामावतार से लेकर रामराज्य और निजधाम गमन तक की पूरी कथा तथा भक्ति-ज्ञान-वैराग्य का तत्त्व पूछती हैं। उनके निष्कपट प्रश्न सुनकर शिवजी रामप्रेम में मग्न होकर कथा आरंभ करते हैं। चौपाई जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ। कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ॥ अग्य जानि रिस उर जनि धरहू। जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू॥ सरल अर्थ: उमा विनम्रतापूर्वक शिवजी से कहती हैं कि यदि राम का निर्गुण, व्यापक स्वरूप अलग प्रकार से समझने योग्य है तो उसे स्पष्ट करें और उनका भ्रम दूर करें। चौपाई मै बन दीखि राम प्रभुताई। अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई॥ तदपि मलिन मन बोधु न आवा। सो फलु भली भाँति हम पावा॥ सरल अर्थ: उमा अपने पूर्वजन्म की भूल याद करती हैं—उन्होंने वन में श्रीराम की प्रभुता देखी, फिर भी मोह के कारण सत्य को पूर्णतः नहीं समझ सकीं। चौपाई अजहूँ कछु संसउ मन मोरे। करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें॥ प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा। नाथ सो समुझि करह...

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 18 — शिव समाधि भंग, कामदेव दहन और रति को वरदान

श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड — भाग 18 कामदेव का प्रभाव • शिव समाधि भंग • कामदेव दहन • रति को वरदान भाग 17 दोहा 84 पर समाप्त हुआ था। यह भाग वहीं से आगे बढ़ता है—कामदेव के व्यापक प्रभाव, शिवजी की अचल समाधि, तीसरे नेत्र से कामदेव-दहन और रति को मिले करुणामय वरदान तक। चौपाई सब के हृदयँ मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा॥ नदीं उमगि अंबुधि कहुँ धाई। संगम करहिं तलाव तलाई॥ सरल अर्थ: कामदेव के प्रभाव से समस्त जगत में आकर्षण की लहर फैल गई। तुलसीदासजी प्रकृति के रूपकों से इस व्यापक प्रभाव का वर्णन करते हैं। चौपाई जहँ असि दसा जड़न्ह कै बरनी। को कहि सकइ सचेतन करनी॥ पसु पच्छी नभ जल थलचारी। भए कामबस समय बिसारी॥ सरल अर्थ: जब जड़ प्रकृति तक ऐसी प्रभावित दिखाई देती है, तब चेतन प्राणियों की दशा का वर्णन कठिन है; पशु-पक्षी भी काम के प्रभाव में आ गए। छंद भए कामबस जोगीस तापस पामरन्हि की को कहै। देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देखत रहे॥ सरल अर्थ: कामदेव का प्रभाव इतना व्यापक बताया गया है कि तपस्वी और योगी भी विचलित होने लगे; संसार की दृष्टि बदलती हुई प्रतीत हुई। दोहा 85 धरी न काहूँ धीर सबके मन मनसिज हरे। ज...