श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 11 — शिव-सती का कैलास गमन, सती का संताप और दक्ष यज्ञ
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 11
शिव-सती का कैलास गमन • सती का संताप • शिव समाधि • दक्ष यज्ञ का आरंभ
भाग 10 में शिवजी के गंभीर संकल्प तक कथा पहुँची थी। यह भाग वहीं से आगे बढ़ते हुए शिव-सती के कैलास गमन, सती के संताप, शिवजी की समाधि और दक्ष के यज्ञ के आरंभ तक की कथा प्रस्तुत करता है।
चौपाई
अस बिचारि संकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा॥
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥
चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई॥
सरल अर्थ: शिवजी अपना संकल्प दृढ़ करके श्रीराम का स्मरण करते हुए कैलास की ओर चले। आकाशवाणी ने उनकी अटल भक्ति की प्रशंसा की।
चौपाई
अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना॥
सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥
सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा॥
सरल अर्थ: आकाशवाणी सुनकर सती समझ गईं कि शिवजी ने कोई गंभीर प्रतिज्ञा की है। वे संकोच के साथ उसका कारण पूछती हैं।
चौपाई
कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला॥
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥
जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती॥
सरल अर्थ: सती बार-बार शिवजी से प्रतिज्ञा बताने का आग्रह करती हैं, किंतु शिवजी उसे प्रकट नहीं करते।
दोहा 57 (क)
सतीं हृदय अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य।
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य॥५७ (क)॥
कीन्ह कपटु मैं संभु सन नारि सहज जड़ अग्य॥५७ (क)॥
सरल अर्थ: सती मन ही मन समझ जाती हैं कि सर्वज्ञ शिवजी उनके किए हुए कपट को जान चुके हैं।
सोरठा 57 (ख)
जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति कि रीति भलि।
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥५७ (ख)॥
बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि॥५७ (ख)॥
सरल अर्थ: तुलसीदासजी प्रेम की रीति समझाते हैं—कपट रूपी खटाई पड़ते ही दूध-पानी की तरह मिला हुआ प्रेम भी अलग हो जाता है।
चौपाई
हृदयँ सोचु समुझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहि बरनी॥
कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥
कृपासिंधु सिव परम अगाधा। प्रगट न कहेउ मोर अपराधा॥
सरल अर्थ: सती अपने कर्म को याद कर गहरे पश्चात्ताप में डूब जाती हैं। उन्हें अनुभव होता है कि शिवजी ने कृपावश उनका अपराध खुलकर नहीं कहा।
चौपाई
संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी॥
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥
निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपइ अवाँ इव उर अधिकाई॥
सरल अर्थ: शिवजी का भाव देखकर सती समझ जाती हैं कि उनके अपराध के कारण संबंध में दूरी आ गई है। उनका हृदय अत्यंत व्याकुल हो उठता है।
चौपाई
सतिहि ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुंदर सुख हेतू॥
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥
बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा॥
सरल अर्थ: सती को दुखी देखकर शिवजी मार्ग में सुंदर कथाएँ सुनाते हैं और इसी प्रकार दोनों कैलास पहुँचते हैं।
चौपाई
तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर करि कमलासन॥
संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥
संकर सहज सरुप सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा॥
सरल अर्थ: कैलास पहुँचकर शिवजी अपने संकल्प को स्मरण करते हैं और वटवृक्ष के नीचे पद्मासन लगाकर अखंड समाधि में स्थित हो जाते हैं।
दोहा 58
सती बसहि कैलास तब अधिक सोचु मन माहिं।
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥५८॥
मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं॥५८॥
सरल अर्थ: सती कैलास पर गहरे दुःख में रहने लगती हैं। उनके लिए एक-एक दिन युग के समान बीतता है।
चौपाई
नित नव सोचु सतीं उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पति बचनु मृषा करि जाना॥
मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पति बचनु मृषा करि जाना॥
सरल अर्थ: सती को श्रीराम पर संदेह करने और शिवजी के सत्य वचन पर विश्वास न करने का तीव्र पश्चात्ताप होता है।
चौपाई
सो फलु मोहि बिधाताँ दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा॥
अब बिधि अस बूझिअ नहि तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥
अब बिधि अस बूझिअ नहि तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही॥
सरल अर्थ: सती अपने दुःख को अपने कर्म का परिणाम मानती हैं और विधाता से अपनी कठिन स्थिति पर प्रश्न करती हैं।
चौपाई
कहि न जाई कछु हृदय गलानी। मन महुँ रामहि सुमिर सयानी॥
जौ प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा॥
जौ प्रभु दीनदयालु कहावा। आरती हरन बेद जसु गावा॥
सरल अर्थ: ग्लानि से भरी सती श्रीराम का स्मरण करती हैं और उनकी दीनदयालुता की शरण लेती हैं।
चौपाई
तौ मैं बिनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी॥
जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥
जौं मोरे सिव चरन सनेहू। मन क्रम बचन सत्य ब्रतु एहू॥
सरल अर्थ: सती हाथ जोड़कर प्रभु से अपनी असह्य परिस्थिति से मुक्ति की प्रार्थना करती हैं और शिवचरणों के प्रति अपने सच्चे प्रेम को स्मरण करती हैं।
दोहा 59
तौ सबदरसी सुनिअ प्रभु करउ सो बेगि उपाइ।
होइ मरनु जेही बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥५९॥
होइ मरनु जेही बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ॥५९॥
सरल अर्थ: सती सर्वदर्शी प्रभु से प्रार्थना करती हैं कि यह असह्य दुःख समाप्त हो।
चौपाई
एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी॥
बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥
बीतें संबत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी॥
सरल अर्थ: सती लंबे समय तक इसी गहरे दुःख में रहती हैं। बहुत काल बीतने पर शिवजी अपनी समाधि से उठते हैं।
चौपाई
राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सतीं जगतपति जागे॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥
जाइ संभु पद बंदनु कीन्ही। सनमुख संकर आसनु दीन्हा॥
सरल अर्थ: शिवजी रामनाम का स्मरण करने लगते हैं। सती समझ जाती हैं कि वे समाधि से जागे हैं और जाकर उन्हें प्रणाम करती हैं।
चौपाई
लगे कहन हरिकथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक॥
देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहि कीन्ह प्रजापति नायक॥
सरल अर्थ: शिवजी हरिकथा कहने लगते हैं। इसी समय कथा दक्ष प्रजापति की ओर बढ़ती है, जिन्हें बड़ा अधिकार प्राप्त होता है।
चौपाई
बड़ अधिकार दच्छ जब पावा। अति अभिमानु हृदयँ तब आवा॥
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥
नहिं कोउ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं॥
सरल अर्थ: बड़ा अधिकार पाकर दक्ष के मन में अभिमान बढ़ जाता है। तुलसीदास सत्ता के साथ आने वाले अहंकार की मानवीय कमजोरी की ओर संकेत करते हैं।
दोहा 60
दच्छ लिए मुनि बोलि सब करन लगे बड़ जाग।
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥६०॥
नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग॥६०॥
सरल अर्थ: दक्ष एक विशाल यज्ञ का आयोजन करते हैं और यज्ञभाग पाने वाले देवताओं तथा मुनियों को आदरपूर्वक निमंत्रित करते हैं।
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