श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 10 — सती का भ्रम, श्रीराम की परीक्षा और शिव का संकल्प

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 10

सती का भ्रम • श्रीराम की परीक्षा • दिव्य स्वरूप का दर्शन • शिव का संकल्प

यह भाग प्रकाशित भाग 9 के अंतिम प्रसंग के ठीक बाद से आगे बढ़ता है। शिवजी के श्रीराम-दर्शन, सती के संशय और परीक्षा, श्रीराम के दिव्य प्रभाव के दर्शन तथा शिवजी के गंभीर संकल्प तक की कथा यहाँ सरल अर्थ सहित दी गई है।
दोहा 48 (क)
हृदयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ।
गुप्त रूप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ॥४८ (क)॥
सरल अर्थ: शिवजी विचार करते हैं कि गुप्त रूप से अवतरित प्रभु के दर्शन किस प्रकार हों, क्योंकि यदि उनका रहस्य प्रकट हो जाए तो अवतार की लीला का भाव ही बदल जाएगा।
सोरठा 48 (ख)
संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ।
तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची॥४८ (ख)॥
सरल अर्थ: शिवजी के हृदय में प्रभु-दर्शन की तीव्र इच्छा है, पर वे लीला का रहस्य जानते हुए संकोच भी करते हैं। सती उस आंतरिक भाव को नहीं समझ पातीं।
चौपाई
रावन मरन मनुज कर जाचा। प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा॥
जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा। करत बिचारु न बनत बनावा॥१॥
सरल अर्थ: शिवजी जानते हैं कि प्रभु ने ब्रह्मा के वचन को सत्य करने के लिए मनुष्य रूप लिया है। दर्शन की इच्छा और लीला की मर्यादा—दोनों के बीच वे विचार करते हैं।
चौपाई
एहि बिधि भए सोचबस ईसा। तेही समय जाइ दससीसा॥
लीन्ह नीच मारीचहि संगा। भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा॥२॥
सरल अर्थ: इसी बीच कथा सीता-हरण की दिशा में बढ़ती है। रावण मारीच की सहायता से कपट-मृग की योजना करता है।
चौपाई
करि छलु मूढ़ हरी बैदेही। प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही॥
मृग बधि बंधु सहित हरि आए। आश्रमु देखि नयन जल छाए॥३॥
सरल अर्थ: रावण छल से सीताजी का हरण करता है। श्रीराम लौटकर आश्रम को रिक्त देखते हैं और मानव-लीला के अनुरूप विरह व्यक्त करते हैं।
चौपाई
बिरह बिकल नर इव रघुराई। खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई॥
कबहूँ जोग बियोग न जाकें। देखा प्रगट बिरह दुखु ताकें॥४॥
सरल अर्थ: जो परमात्मा वास्तव में संयोग-वियोग से परे हैं, वही श्रीराम लीला में विरही मनुष्य की भाँति लक्ष्मणजी के साथ सीताजी को खोजते दिखाई देते हैं।
दोहा 49
अति बिचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान।
जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन॥४९॥
सरल अर्थ: श्रीराम की लीला अत्यंत गूढ़ है। ज्ञानी उसके रहस्य को समझते हैं, जबकि केवल बाहरी रूप देखकर निर्णय करने वाला भ्रम में पड़ सकता है।
चौपाई
संभु समय तेहि रामहि देखा। उपजा हियँ अति हरषु बिसेषा॥
भरि लोचन छबिसिंधु निहारी। कुसमय जानि न कीन्हि चिन्हारी॥१॥
सरल अर्थ: शिवजी श्रीराम को देखकर अत्यंत आनंदित होते हैं। वे नेत्र भरकर दर्शन करते हैं, पर उस समय लीला की मर्यादा जानकर सामने जाकर परिचय नहीं देते।
चौपाई
जय सच्चिदानंद जग पावन। अस कहि चलेउ मनोज नसावन॥
चले जात सिव सती समेता। पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता॥२॥
सरल अर्थ: शिवजी श्रीराम को सच्चिदानंद और जगत-पावन कहकर प्रणाम करते हुए आगे बढ़ते हैं। प्रभु-दर्शन से उनका हृदय बार-बार पुलकित होता है।
चौपाई
सतीं सो दसा संभु कै देखी। उर उपजा संदेहु बिसेषी॥
संकरु जगतबंद्य जगदीसा। सुर नर मुनि सब नावत सीसा॥३॥
सरल अर्थ: शिवजी का ऐसा भाव देखकर सती के मन में प्रश्न उठता है कि जिन शिव को देवता और मुनि प्रणाम करते हैं, वे एक मानव-रूप राजकुमार को इतना आदर क्यों दे रहे हैं।
चौपाई
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा॥
भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥४॥
सरल अर्थ: सती देखती हैं कि शिवजी ने श्रीराम को सच्चिदानंद कहा और उनके स्वरूप में प्रेममग्न हो गए। यही दृश्य सती के संशय का कारण बनता है।
दोहा 50
ब्रह्म जो ब्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद।
सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत बेद॥५०॥
सरल अर्थ: सती के मन में प्रश्न है कि जो ब्रह्म सर्वव्यापक, अजन्मा और अभेद है, क्या वही देह धारण कर मनुष्य रूप में सामने हो सकता है?
चौपाई
बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी। सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी॥
खोजइ सो कि अग्य इव नारी। ग्यानधाम श्रीपति असुरारी॥१॥
सरल अर्थ: सती तर्क करती हैं कि यदि ये विष्णु हैं तो वे सर्वज्ञ हैं; फिर वे किसी अज्ञानी मनुष्य की तरह अपनी पत्नी को क्यों खोज रहे हैं?
चौपाई
संभुगिरा पुनि मृषा न होई। सिव सर्बग्य जान सबु कोई॥
अस संसय मन भयउ अपारा। होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा॥२॥
सरल अर्थ: दूसरी ओर सती जानती हैं कि शिवजी का वचन असत्य नहीं हो सकता। इन दो विचारों के बीच उनका संशय और गहरा हो जाता है।
चौपाई
जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी। हर अंतरजामी सब जानी॥
सुनहि सती तव नारि सुभाऊ। संसय अस न धरिअ उर काऊ॥३॥
सरल अर्थ: सती अपने मन की बात खुलकर नहीं कहतीं, फिर भी अंतर्यामी शिवजी उनके संशय को समझ लेते हैं और उन्हें समझाते हैं।
चौपाई
जासु कथा कुंभज रिषि गाई। भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई॥
सोइ मम इष्टदेव रघुबीरा। सेवत जाहि सदा मुनि धीरा॥४॥
सरल अर्थ: शिवजी स्पष्ट करते हैं कि अगस्त्य मुनि ने जिनकी कथा कही और जिनकी भक्ति का उन्होंने उपदेश दिया, वही रघुवीर उनके इष्टदेव हैं।
छंद
मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं।
कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥
सोइ रामु व्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी।
अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी॥
सरल अर्थ: शिवजी कहते हैं कि योगी और सिद्ध जिन परम तत्त्व का ध्यान करते हैं और वेद जिनकी महिमा का गान करते हैं, वही व्यापक ब्रह्म भक्तों के हित के लिए श्रीराम रूप में अवतरित हुए हैं।
सोरठा 51
लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु।
बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ॥५१॥
सरल अर्थ: शिवजी के बार-बार समझाने पर भी सती का संशय नहीं मिटता। तब महादेव हरिमाया की शक्ति को समझकर मुस्कराते हैं।
चौपाई
जौं तुम्हरें मन अति संदेहू। तौ किन जाइ परीछा लेहू॥
तब लगि बैठ अहउँ बटछाहीं। जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाहीं॥१॥
सरल अर्थ: शिवजी कहते हैं कि यदि संशय बहुत गहरा है तो सती स्वयं परीक्षा करके देख लें; वे तब तक वटवृक्ष की छाया में प्रतीक्षा करेंगे।
चौपाई
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥
चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बेचारु करौं का भाई॥२॥
सरल अर्थ: सती शिवजी की अनुमति लेकर जाती हैं, लेकिन मन में अभी भी यही विचार चल रहा है कि श्रीराम की परीक्षा किस प्रकार ली जाए।
चौपाई
इहाँ संभु अस मन अनुमाना। दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना॥
मोरेहुँ कहें न संसय जाहीं। बिधि बिपरीत भलाई नाहीं॥३॥
सरल अर्थ: शिवजी मन में अनुभव करते हैं कि सती का संशय उनके समझाने से भी नहीं गया; यह स्थिति आगे किसी कठिन परिणाम की ओर संकेत कर रही है।
चौपाई
होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥
अस कहि लगे जपन हरिनामा। गईं सती जहँ प्रभु सुखधामा॥४॥
सरल अर्थ: शिवजी सब कुछ श्रीराम की इच्छा पर छोड़कर हरिनाम जपने लगते हैं और सती परीक्षा लेने के लिए श्रीराम की ओर जाती हैं।
दोहा 52
पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप।
आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप॥५२॥
सरल अर्थ: सती अंततः सीताजी का रूप धारण करके उस मार्ग पर आगे आती हैं जहाँ से श्रीराम और लक्ष्मण आ रहे हैं।
चौपाई
लछिमन दीख उमाकृत बेषा। चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा॥
कहि न सकत कछु अति गंभीरा। प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा॥१॥
सरल अर्थ: लक्ष्मणजी सती को सीताजी के रूप में देखकर चकित होते हैं, पर श्रीराम के प्रभाव को जानते हुए मौन रहते हैं।
चौपाई
सती कपटु जानेउ सुरस्वामी। सबदरसी सब अंतरजामी॥
सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना। सोइ सरबग्य रामु भगवाना॥२॥
सरल अर्थ: अंतर्यामी श्रीराम सती के कपट और परीक्षा का उद्देश्य तुरंत जान लेते हैं।
चौपाई
सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ। देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ॥
निज माया बलु हृदयँ बखानी। बोले बिहसि रामु मृदु बानी॥३॥
सरल अर्थ: सती अपना वास्तविक रूप छिपाना चाहती हैं, लेकिन श्रीराम सब जानते हुए भी अत्यंत विनम्र और मधुर वाणी में बात करते हैं।
चौपाई
जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥
कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥४॥
सरल अर्थ: श्रीराम प्रणाम करके अपना परिचय देते हैं और सती से शिवजी के विषय में पूछते हैं। इस संबोधन से सती समझ जाती हैं कि प्रभु ने उन्हें पहचान लिया है।
दोहा 53
राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु।
सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु॥५३॥
सरल अर्थ: श्रीराम के विनम्र लेकिन गूढ़ वचन सुनकर सती अत्यंत संकोच और भय में पड़ जाती हैं और शिवजी की ओर लौटती हैं।
चौपाई
मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥
जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥१॥
सरल अर्थ: सती को पछतावा होता है कि उन्होंने शिवजी की बात नहीं मानी और अपने अज्ञान के कारण श्रीराम पर संदेह किया।
चौपाई
जाना राम सतीं दुखु पावा। निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा॥
सतीं दीख कौतुकु मग जाता। आगें रामु सहित श्री भ्राता॥२॥
सरल अर्थ: श्रीराम सती की व्याकुलता जानकर अपनी दिव्य महिमा की झलक दिखाते हैं, जिससे उनका संशय पूरी तरह टूटने लगता है।
चौपाई
फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा। सहित बंधु सिय सुंदर बेषा॥
जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना। सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना॥३॥
सरल अर्थ: सती जहाँ-जहाँ देखती हैं, वहाँ श्रीराम को सीता और लक्ष्मण सहित दिव्य रूप में देखती हैं; सिद्ध और मुनि उनकी सेवा करते दिखाई देते हैं।
चौपाई
देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका। अमित प्रभाउ एक तें एका॥
बंदत चरन करत प्रभु सेवा। बिबिध बेष देखे सब देवा॥४॥
सरल अर्थ: सती को अनेक शिव, ब्रह्मा, विष्णु और देवता श्रीराम की सेवा करते दिखाई देते हैं। यह दृश्य रामतत्त्व की व्यापकता प्रकट करता है।
दोहा 54
सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप।
जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप॥५४॥
सरल अर्थ: सती अनेक दिव्य शक्तियों और देवस्वरूपों को देखती हैं। प्रत्येक स्वरूप अपने-अपने अनुरूप दिव्य तेज से युक्त है।
चौपाई
देखे जहँ तहँ रघुपति जेते। सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते॥
जीव चराचर जो संसारा। देखे सकल अनेक प्रकारा॥१॥
सरल अर्थ: सती को समस्त चराचर जगत और देवशक्तियाँ श्रीराम की व्यापक सत्ता में स्थित दिखाई देती हैं।
चौपाई
पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा। राम रूप दूसर नहिं देखा॥
अवलोके रघुपति बहुतेरे। सीता सहित न बेष घनेरे॥२॥
सरल अर्थ: अनेक देवस्वरूप प्रभु की पूजा करते हैं, पर सती को राम का मूल स्वरूप एकरस दिखाई देता है—यह दर्शन उनके संशय को मिटा देता है।
चौपाई
सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता। देखि सती अति भईं सभीता॥
हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं। नयन मूदि बैठीं मग माहीं॥३॥
सरल अर्थ: एक ही श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को सर्वत्र देखकर सती भय और विस्मय से भर जाती हैं और मार्ग में आँखें बंद करके बैठ जाती हैं।
चौपाई
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥
पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥४॥
सरल अर्थ: आँखें खोलने पर वह विराट दृश्य लुप्त हो जाता है। सती श्रीराम के चरणों को मन ही मन प्रणाम करके शिवजी के पास लौटती हैं।
दोहा 55
गईं समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात।
लीन्हि परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात॥५५॥
सरल अर्थ: सती के लौटने पर शिवजी सहज भाव से पूछते हैं कि उन्होंने श्रीराम की परीक्षा किस प्रकार ली और पूरी बात सत्य-सत्य बताने को कहते हैं।
चौपाई
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ॥
कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रनामु तुम्हारिहि नाईं॥१॥
सरल अर्थ: श्रीराम की महिमा समझ लेने के बाद भी सती भयवश शिवजी से पूरी बात छिपा देती हैं और कहती हैं कि उन्होंने कोई परीक्षा नहीं ली।
चौपाई
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥
तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना॥२॥
सरल अर्थ: सती कहती हैं कि उन्हें शिवजी के कथन पर पूर्ण विश्वास है। शिवजी ध्यान लगाकर सती द्वारा किए गए पूरे प्रसंग को जान लेते हैं।
चौपाई
बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा॥
हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥३॥
सरल अर्थ: शिवजी राममाया को प्रणाम करते हैं और समझते हैं कि ईश्वर की इच्छा और नियति अत्यंत प्रबल है।
चौपाई
सतीं कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा॥
जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथु होइ अनीती॥४॥
सरल अर्थ: शिवजी को सबसे गहरा दुःख इस बात का होता है कि सती ने उनकी आराध्या सीता का रूप धारण किया। उनके सामने भक्ति-मर्यादा का गंभीर प्रश्न खड़ा हो जाता है।
दोहा 56
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।
प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥५६॥
सरल अर्थ: शिवजी के लिए सती को त्यागना सहज नहीं और पूर्ववत दाम्पत्य-भाव रखना भी भक्ति-मर्यादा के विरुद्ध है। वे अपने गहरे संताप को प्रकट नहीं करते।
चौपाई
तब संकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा॥
एहिं तन सतिहि भेट मोहि नाहीं। सिव संकल्पु कीन्ह मन माहीं॥१॥
सरल अर्थ: शिवजी श्रीराम के चरणों को प्रणाम कर मन में दृढ़ संकल्प करते हैं कि इस शरीर में सती के साथ पूर्ववत दाम्पत्य संबंध नहीं रखेंगे।

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