श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 47 — गौरीजी का आशीर्वाद और प्रभात में राम-लक्ष्मण संवाद
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 47
गौरीजी का आशीर्वाद और प्रभात में राम-लक्ष्मण संवाद
इस भाग का प्रसंग: गौरीजी का आशीर्वाद और प्रभात में राम-लक्ष्मण संवाद।
पाठ-सीमा: दोहा 233 के बाद से 238 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।
बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू । भूपकिसोर देखि किन लेहू ॥
सकुचि सीयँ तब नयन उघारे । सनमुख दोउ रघुसिंघ निहारे ॥
नख सिख देखि राम कै सोभा । सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा ॥
परबस सखिन्ह लखी जब सीता । भयउ गहरु सब कहहि सभीता ॥
पुनि आउब एहि बेरिआँ काली । अस कहि मन बिहसी एक आली ॥
गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी । भयउ बिलंबु मातु भय मानी ॥
धरि बड़ि धीर रामु उर आने । फिरि अपनपउ पितुबस जाने ॥
सरल भावार्थ: एक समझदार सखी सीताजी का हाथ पकड़कर कहती है—गौरीजी का ध्यान फिर कर लेना, पहले राजकुमारों को देख लो। सीताजी आँखें खोलकर श्रीराम को नख से शिख तक देखती हैं, पर पिता की प्रतिज्ञा याद कर व्याकुल हो जाती हैं। देर होने से सखियाँ लौटने को कहती हैं और एक सखी अगले दिन फिर आने का संकेत करती है। सीताजी माँ का संकोच मानकर श्रीराम को हृदय में धारण किए लौटती हैं।
निरखि निरखि रघुबीर छबि बाढ़इ प्रीति न थोरि ॥२३४॥
सरल अर्थ: मृग, पक्षियों और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बार-बार मुड़ती हैं। श्रीराम की छवि निहारने से उनका प्रेम निरंतर बढ़ता है।
प्रभु जब जात जानकी जानी । सुख सनेह सोभा गुन खानी ॥
परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही । चारु चित भीतीं लिख लीन्ही ॥
गई भवानी भवन बहोरी । बंदि चरन बोली कर जोरी ॥
जय जय गिरिबरराज किसोरी । जय महेस मुख चंद चकोरी ॥
जय गज बदन षड़ानन माता । जगत जननि दामिनि दुति गाता ॥
नहिं तव आदि मध्य अवसाना । अमित प्रभाउ बेदु नहिं जाना ॥
भव भव बिभव पराभव कारिनि । बिस्व बिमोहनि स्वबस बिहारिनि ॥
सरल भावार्थ: शिवधनुष की कठोरता सोचकर सीताजी दुखी होती हैं और श्यामल प्रभु की छवि हृदय में रखती हैं। श्रीराम भी उनके सौंदर्य और गुणों को प्रेम की स्याही से अपने चित्त पर अंकित कर लेते हैं। सीताजी फिर गौरीजी के मंदिर जाकर प्रार्थना करती हैं—हे पर्वतराज की पुत्री, महादेव की प्रिय, गणेश और कार्तिकेय की माता तथा जगज्जननी! आपके अनंत प्रभाव का वेद भी अंत नहीं जानते। आप सृष्टि, पालन और संहार की शक्ति हैं।
महिमा अमित न सकहिं कहि सहस सारदा सेष ॥२३५॥
सरल अर्थ: सीताजी कहती हैं—हे माता, पति को परम आराध्य मानने वाली स्त्रियों में आप सर्वोपरि हैं। आपकी अपार महिमा हजारों सरस्वतियाँ और शेषनाग भी नहीं कह सकते।
देबि पूजि पद कमल तुम्हारे । सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे ॥
मोर मनोरथु जानहु नीकें । बसहु सदा उर पुर सबही कें ॥
कीन्हेउँ प्रगट न कारन तेहीं । अस कहि चरन गहे बैदेहीं ॥
बिनय प्रेम बस भई भवानी । खसी माल मूरति मुसुकानी ॥
सादर सियँ प्रसादु सिर धरेऊ । बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ ॥
सुनु सिय सत्य असीस हमारी । पूजिहि मन कामना तुम्हारी ॥
नारद बचन सदा सुचि साचा । सो बरु मिलिहि जाहिं मनु राचा ॥
छंद
मनु जाहिं राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुंदर साँवरो।
करुना निधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो ॥
एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषीं अली।
तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मंदिर चली ॥
सरल भावार्थ: सीताजी प्रार्थना करती हैं कि गौरीजी की सेवा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सुलभ होते हैं। सबके हृदय में रहने वाली देवी उनका मनोरथ जानती हैं, इसलिए उसे मुख से कहने की आवश्यकता नहीं। प्रेमपूर्ण विनय से प्रसन्न होकर मूर्ति मुस्कुराती है और माला गिरती है। सीताजी प्रसाद सिर पर रखती हैं। गौरीजी आशीर्वाद देती हैं कि नारद का सत्य वचन पूरा होगा और जिस सहज सुंदर साँवले, करुणामय, सुशील प्रभु में उनका मन रमा है, वही वर उन्हें मिलेगा। सीताजी और सखियाँ आनंदित लौटती हैं।
मंजुल मंगल मूल बाम अंग फरकन लगे ॥२३६॥
सरल अर्थ: गौरीजी को अपने अनुकूल जानकर सीताजी के हृदय का आनंद वर्णन से परे है। मंगलसूचक बाएँ अंग फड़कने लगते हैं।
राम कहा सबु कौसिक पाहीं । सरल सुभाउ छुअत छल नाहीं ॥
सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही । पुनि असीस दुहु भाइन्ह दीन्ही ॥
सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे । रामु लखनु सुनि भए सुखारे ॥
करि भोजनु मुनिबर बिग्यानी । लगे कहन कछु कथा पुरानी ॥
बिगत दिवसु गुरु आयसु पाई । संध्या करन चले दोउ भाई ॥
प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा । सिय मुख सरिस देखि सुखु पावा ॥
बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं । सीय बदन सम हिमकर नाहीं ॥
सरल भावार्थ: सीताजी की सुंदरता मन में सराहते हुए दोनों भाई गुरु के पास लौटते हैं। सरल स्वभाव वाले श्रीराम विश्वामित्रजी को सब बता देते हैं। फूलों से पूजा करके मुनि दोनों को मनोरथ सफल होने का आशीर्वाद देते हैं। भोजन के बाद पुरानी कथाएँ सुनाई जाती हैं। संध्या समय पूर्व दिशा में चंद्रमा उदित होता है। पहले श्रीराम को वह सीताजी के मुख जैसा लगता है, पर विचार करने पर वे उसे उस अनुपम छवि के बराबर नहीं मानते।
सिय मुख समता पाव किमि चंदु बापुरो रंक ॥२३७॥
सरल अर्थ: चंद्रमा समुद्र से जन्मा, विष का भाई है, दिन में मलिन हो जाता है और कलंकयुक्त है। ऐसा दीन चंद्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे कर सकता है?
कोक सिकप्रद पंकज द्रोही । अवगुन बहुत चंद्रमा तोही ॥
बैदेही मुख पटतर दीन्हे । होइ दोष बड़ अनुचित कीन्हे ॥
सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी । गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी ॥
करि मुनि चरन सरोज प्रनामा । आयसु पाइ कीन्ह बिश्रामा ॥
बिगत निसा रघुनायक जागे । बंधु बिलोकि कहन अस लागे ॥
उदउ अरुन अवलोकहु ताता । पंकज कोक लोक सुखदाता ॥
बोले लखनु जोरि जुग पानी । प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी ॥
सरल भावार्थ: श्रीराम विचार करते हैं कि चंद्रमा घटता-बढ़ता है, विरहियों को दुख देता है, राहु से ग्रस्त होता है और कमल तथा चक्रवाक के लिए प्रतिकूल है। उसे सीताजी के मुख की उपमा देना अनुचित है। फिर वे गुरु को प्रणाम करके विश्राम करते हैं। प्रातः श्रीराम अरुणोदय की शोभा लक्ष्मणजी को दिखाते हैं। लक्ष्मणजी हाथ जोड़कर ऐसी मधुर वाणी कहते हैं जो प्रभु के प्रताप को प्रकट करती है।
जिमि तुम्हार आगमन सुनि भए नृपति बलहीन ॥२३८॥
सरल अर्थ: जैसे अरुणोदय से कुमुद संकुचित हो जाते हैं और तारों की ज्योति फीकी पड़ती है, वैसे ही आपके आगमन की खबर से राजा बलहीन हो गए हैं।

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