श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 46 — पुष्पवाटिका में श्रीसीतारामजी का प्रथम दर्शन

भक्ति भावना प्रस्तुत

श्रीरामचरितमानस

बालकाण्ड — भाग 46

पुष्पवाटिका में श्रीसीतारामजी का प्रथम दर्शन

इस भाग का प्रसंग: पुष्पवाटिका में श्रीसीतारामजी का प्रथम दर्शन।

पाठ-सीमा: दोहा 228 के बाद से 233 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 229 से पहले
देखन बागु कुअँर दुइ आए । बय किसोर सब भाँति सुहाए ॥
स्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी ॥
सुनि हरषीँ सब सखीं सयानी । सिय हियँ अति उतकंठा जानी ॥
एक कहइ नृपसुत तेइ आली । सुने जे मुनि सँग आए काली ॥
जिन्ह निज रूप मोहनी डारी । कीन्ह स्वबस नगर नर नारी ॥
बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू । अवसि देखिअहिं देखन जोगू ॥
तासु वचन अति सियहि सुहाने । दरस लागि लोचन अकुलाने ॥
चली अग्र करि प्रिय सखि सोई । प्रीति पुरातन लखइ न कोई ॥

सरल भावार्थ: सखी कहती है कि वाटिका में दो सुंदर किशोर राजकुमार आए हैं—एक श्याम और दूसरे गौर। उनकी छवि शब्दों में नहीं समाती; वाणी के पास आँखें नहीं और आँखें बोल नहीं सकतीं। दूसरी सखी उन्हें विश्वामित्रजी के साथ आए राजकुमार बताती है, जिनके सौंदर्य से पूरा नगर मुग्ध है। यह सुनकर सीताजी दर्शन के लिए व्याकुल होकर प्रिय सखी को आगे करके चलती हैं।

दोहा 229
सुमिरि सीय नारद बचन उपजी प्रीति पुनीत ॥
चकित बिलोकति सकल दिसि जनु सिसु मृगी सभीत ॥२२९॥

सरल अर्थ: नारदजी के वचनों का स्मरण करके सीताजी के हृदय में पवित्र प्रेम जागता है। वे डरी हुई मृगशाविका की तरह चकित होकर चारों दिशाओं में देखती हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 230 से पहले
कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनि । कहत लखन सन रामु हृदयँ गुनि ॥
मानहुँ मदन दुंदुभी दीन्ही । मनसा बिस्व बिजय कहँ कीन्ही ॥
अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा । सिय मुख ससि भए नयन चकोरा ॥
भए बिलोचन चारु अचंचल । मनहुँ सकुचि निमि तजे दिगंचल ॥
देखि सीय सोभा सुखु पावा । हृदयँ सराहत बचनु न आवा ॥
जनु बिरंचि सब निज निपुनाई । बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई ॥
सुंदरता कहुँ सुंदर करई । छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई ॥
सब उपमा कबि रहे जुठारी । केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी ॥

सरल भावार्थ: कंगन, करधनी और पायल की ध्वनि सुनकर श्रीराम लक्ष्मणजी से कहते हैं कि मानो कामदेव ने विश्व-विजय का डंका बजाया हो। वे उस ओर देखते हैं और उनके नेत्र सीताजी के चंद्रमुख के चकोर बन जाते हैं। उनकी दृष्टि स्थिर हो जाती है। सीताजी का अनुपम सौंदर्य देखकर वे मन में प्रशंसा करते हैं; वह सौंदर्य स्वयं सुंदरता को सुंदर बनाता है और सभी प्रचलित उपमाओं से बढ़कर है।

दोहा 230
सिय सोभा हियँ बरनि प्रभु आपनि दसा बिचारि ।
बोले सुचि मन अनुज सन बचन समय अनुहारि ॥२३०॥

सरल अर्थ: श्रीराम सीताजी की शोभा हृदय में सराहते हुए अपनी स्थिति पर विचार करते हैं और समय के अनुरूप पवित्र मन से लक्ष्मणजी से बोलते हैं।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 231 से पहले
तात जनकतनया यह सोई । धनुषजग्य जेहि कारन होई ॥
पूजन गौरि सखीं लै आई । करत प्रकासु फिरइ फुलवाई ॥
जासु बिलोकि अलोकिक सोभा । सहज पुनीत मोर मनु छोभा ॥
सो सबु कारन जान बिधाता । फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता ॥
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ । मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ ॥
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी । जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी ॥
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी । नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी ॥
मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं । ते नरबर थोरे जग माहीं ॥

सरल भावार्थ: श्रीराम कहते हैं—ये जनकजी की वही पुत्री हैं जिनके लिए धनुष-यज्ञ हो रहा है। इनके अलौकिक सौंदर्य से मेरा सहज पवित्र मन आकर्षित हुआ है और शुभ अंग फड़क रहे हैं। इसका कारण विधाता जानते हैं। रघुवंश का मन कभी कुमार्ग पर नहीं चलता; मुझे अपने मन पर विश्वास है, जिसने स्वप्न में भी परस्त्री की इच्छा नहीं की। रण में पीठ न दिखाने वाले, परस्त्री पर दृष्टि न रखने वाले और याचक को खाली न लौटाने वाले श्रेष्ठ पुरुष दुर्लभ हैं।

दोहा 231
करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान ।
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान ॥२३१॥

सरल अर्थ: लक्ष्मणजी से बात करते हुए भी श्रीराम का मन सीताजी के रूप में रमा है। वह उनके मुख-कमल की शोभा रूपी मधुर रस का भौंरे की तरह पान कर रहा है।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 232 से पहले
चितवहि चकित चहूँ दिसि सीता । कहँ गए नृपकिसोर मनु चिंता ॥
जहँ बिलोक मृग सावक नैनी । जनु तहँ बरिस कमल सित श्रेनी ॥
लता ओट तब सखिन्ह लखाए । स्यामल गौर किसोर सुहाए ॥
देखि रूप लोचन ललचाने । हरषे जनु निज निधि पहिचाने ॥
थके नयन रघुपति छबि देखें । पलकन्हिहूँ परिहरीं निमेषें ॥
अधिक सनेहँ देह भै भोरी । सरद ससिहि जनु चितव चकोरी ॥
लोचन मग रामहि उर आनी । दीन्हे पलक कपाट सयानी ॥
जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी । कहि न सकहिं कछु मन सकुचानी ॥

सरल भावार्थ: सीताजी चिंता करती हैं कि राजकुमार कहाँ गए। उनकी दृष्टि जहाँ पड़ती है, वहाँ मानो श्वेत कमलों की पंक्ति बरसती है। सखियाँ लताओं की ओट में दोनों भाइयों को दिखाती हैं। श्रीराम को देखकर सीताजी मानो अपना पुराना धन पहचान लेती हैं। उनकी आँखें अपलक छवि निहारती हैं। वे प्रभु को नेत्रों के मार्ग से हृदय में उतारकर पलकें बंद कर लेती हैं; उनका प्रेम देखकर सखियाँ भी संकोच से कुछ नहीं कह पातीं।

दोहा 232
लताभवन तें प्रगट भे तेहि अवसर दोउ भाइ ।
निकसे जनु जुग बिमल बिधु जलद पटल बिलगाइ ॥२३२॥

सरल अर्थ: उसी समय दोनों भाई लता-मंडप से बाहर आए, जैसे बादलों का पर्दा हटाकर दो निर्मल चंद्रमा प्रकट हो गए हों।

चौपाइयाँ व प्रसंग — दोहा 233 से पहले
सोभा सीवँ सुभग दोउ बीरा । नील पीत जलजाभ सरीरा ॥
मोरपंख सिर सोहत नीके । गुच्छ बीच बिच कुसुम कली के ॥
भाल तिलक श्रमबिंदु सुहाए । श्रवन सुभग भूषन छबि छाए ॥
बिकट भृकुटि कच घूघरवारे । नव सरोज लोचन रतनारे ॥
चारु चिबुक नासिका कपोला । हास बिलास लेत मनु मोला ॥
मुखछबि कहि न जाइ मोहि पाहीं । जो बिलोकि बहु काम लजाहीं ॥
उर मनि माल कंबु कल गीवा । काम कलभ कर भुज बलसींवा ॥
सुमन समेत बाम कर दोना । सावँर कुअँर सखी सुठि लोना ॥

सरल भावार्थ: दोनों भाई सौंदर्य की सीमा हैं; उनके श्याम और गौर शरीर नील तथा पीत कमलों जैसे हैं। सिर पर मोरपंख और पुष्प-कलियाँ, माथे पर तिलक तथा परिश्रम की बूँदें और कानों में आभूषण शोभित हैं। घुँघराले बाल, कमल जैसे नेत्र, सुंदर नासिका, ठोड़ी और मुस्कान मन मोहते हैं। गले में मणिमाला, सुंदर कंठ और बलवान भुजाएँ हैं। श्रीराम के बाएँ हाथ में फूलों का दोना है; उनकी छवि अत्यंत मनोहर है।

दोहा 233
केहरि कटि पट पीत धर सुषमा सील निधान।
देखि भानुकुलभूषनहि बिसरा सखिन्ह अपान ॥२३३॥

सरल अर्थ: सिंह जैसी कमर, पीले वस्त्र और सौंदर्य तथा शील के भंडार सूर्यवंशभूषण श्रीराम को देखकर सखियाँ स्वयं को भूल गईं।

॥ श्री सीताराम ॥
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