श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 45 — धनुष-यज्ञशाला दर्शन, गुरु-सेवा और पुष्पवाटिका
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 45
धनुष-यज्ञशाला दर्शन • गुरु-सेवा • पुष्पवाटिका • सीताजी का गौरी-पूजन
कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 44 में श्रीराम और लक्ष्मणजी के जनकपुर-दर्शन से नगरवासी आनंदित हुए। अब दोनों भाई धनुष-यज्ञशाला देखते हैं, गुरु विश्वामित्रजी के पास लौटते हैं और उनकी सेवा करते हैं। अगली सुबह पूजा के फूल लेने पुष्पवाटिका जाते हैं, जहाँ सीताजी भी गौरी-पूजन के लिए आती हैं।
इस भाग की सीमा: दोहा 223 के बाद की चौपाइयों से दोहा 228 तक; दोहे 224–228 सहित।
अति बिस्तार चारु गच ढारी। बिमल बेदिका रुचिर सँवारी॥
चहुँ दिसि कंचन मंच बिसाला। रचे जहाँ बेठहिं महिपाला॥
तेहि पाछें समीप चहुँ पासा। अपर मंच मंडली बिलासा॥
सरल अर्थ: दोनों भाई जनकपुर के पूर्व की ओर पहुँचे, जहाँ धनुष-यज्ञ के लिए रंगभूमि तैयार की गई थी। वहाँ विशाल पक्का आँगन और सुंदर वेदी थी। राजाओं के बैठने के लिए चारों ओर बड़े स्वर्णमय मंच बने थे और उनके पीछे अन्य मंचों का सुंदर घेरा था।
तिन्ह के निकट बिसाल सुहाए। धवल धाम बहुबरन बनाए॥
जहँ बैंठैं देखहिं सब नारी। जथा जोगु निज कुल अनुहारी॥
पुर बालक कहि कहि मृदु बचना। सादर प्रभुहि देखावहिं रचना॥
सरल अर्थ: नगरवासियों के बैठने का स्थान कुछ ऊँचा और सुंदर बनाया गया था। पास ही अनेक रंगों से सजाए गए विशाल उजले भवन थे, जहाँ स्त्रियाँ अपने कुल की मर्यादा के अनुसार बैठकर उत्सव देख सकती थीं। नगर के बालक मधुर वाणी में दोनों राजकुमारों को आदरपूर्वक सारी व्यवस्था दिखा रहे थे।
तन पुलकहिं अति हरषु हियँ देखि देखि दोउ भ्रात॥२२४॥
सरल अर्थ: रंगभूमि दिखाने के बहाने बालक प्रेमपूर्वक प्रभु के सुंदर अंगों का स्पर्श कर रहे थे। दोनों भाइयों को बार-बार देखकर उनके शरीर पुलकित हो रहे थे और हृदय आनंद से भर रहा था।
निज निज रुचि सब लेंहिं बोलाई। सहित सनेह जाहिं दोउ भाई॥
राम देखावहिं अनुजहि रचना। कहि मृदु मधुर मनोहर बचना॥
लव निमेष महँ भुवन निकाया। रचइ जासु अनुसासन माया॥
सरल अर्थ: श्रीराम ने बालकों का प्रेम समझकर उन स्थानों की प्रेमपूर्वक प्रशंसा की। बालक अपनी पसंद की जगह दिखाने के लिए उन्हें बुलाते और दोनों भाई स्नेहपूर्वक वहाँ जाते। श्रीराम मधुर वचनों से लक्ष्मणजी को रंगभूमि की रचना दिखा रहे थे। यह उन्हीं प्रभु की लीला है जिनकी आज्ञा से माया क्षणभर में अनेक ब्रह्माण्ड रच देती है।
कौतुक देखि चले गुरु पाहीं। जानि बिलंबु त्रास मन माहीं॥
जासु त्रास डर कहुँ डर होई। भजन प्रभाउ देखावत सोई॥
कहि बातें मृदु मधुर सुहाईं। किए बिदा बालक बरिआई॥
सरल अर्थ: भक्तों के लिए मानवीय लीला करते हुए दीनदयाल श्रीराम धनुष-यज्ञशाला को आश्चर्य से देखते हैं। सब देखकर वे गुरु के पास लौटने लगे और देर होने का संकोच अनुभव किया। जिनके भय से भय भी डरता है, वही प्रभु गुरु-मर्यादा निभाकर भक्ति का प्रभाव दिखा रहे हैं। उन्होंने बालकों को प्रेमभरे मधुर वचन कहकर आग्रहपूर्वक विदा किया।
गुर पद पंकज नाइ सिर बैठे आयसु पाइ॥२२५॥
सरल अर्थ: दोनों भाई आदर, प्रेम, विनम्रता और संकोच के साथ गुरु के चरण-कमलों में सिर नवाकर उनकी आज्ञा पाकर बैठ गए।
कहत कथा इतिहास पुरानी। रुचिर रजनि जुग जाम सिरानी॥
मुनिबर सयन कीन्हि तब जाई। लगे चरन चापन दोउ भाई॥
जिन्ह के चरन सरोरुह लागी। करत बिबिध जप जोग बिरागी॥
सरल अर्थ: संध्या होने पर मुनि की आज्ञा से सबने संध्यावंदन किया। पुरानी कथाएँ और इतिहास सुनते-सुनते रात के दो पहर बीत गए। फिर विश्वामित्रजी ने शयन किया और दोनों भाई उनके चरण दबाने लगे। जिन प्रभु के चरणों का आश्रय पाने के लिए विरक्त साधक जप और योग करते हैं, वे स्वयं गुरु की सेवा कर रहे थे।
बारबार मुनि अग्या दीन्ही। रघुबर जाइ सयन तब कीन्ही॥
चापत चरन लखनु उर लाएँ। सभय सप्रेम परम सचु पाएँ॥
पुनि पुनि प्रभु कह सोवहु ताता। पौढ़े धरि उर पद जलजाता॥
सरल अर्थ: दोनों भाई प्रेम के वश होकर गुरु के चरण दबाते रहे। मुनि के बार-बार कहने पर श्रीराम विश्राम करने गए। लक्ष्मणजी आदर और प्रेम से श्रीराम के चरण दबाते हुए परम सुख अनुभव कर रहे थे। श्रीराम ने बार-बार कहा—तात, अब सो जाओ। तब लक्ष्मणजी प्रभु के चरण-कमलों को हृदय में धारण करके लेट गए।
गुर तें पहिलेहिं जगतपति जागे रामु सुजान॥२२६॥
सरल अर्थ: रात बीतने पर मुर्गे की आवाज सुनकर लक्ष्मणजी उठ गए। जगत के स्वामी श्रीराम भी गुरु से पहले ही जाग गए।
समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई॥
भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत रितु रही लोभाई॥
लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना॥
सरल अर्थ: स्नान और नित्यकर्म पूरे करके दोनों भाइयों ने गुरु को प्रणाम किया। पूजा का समय जानकर उनकी आज्ञा से फूल लेने चले। राजा जनक की सुंदर वाटिका में मानो वसंत ऋतु रम गई थी। अनेक मनोहर वृक्ष और रंग-बिरंगी लताओं के मंडप उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।
चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा॥
मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा॥
बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जलखग कूजत गुंजत भृंगा॥
सरल अर्थ: नए पत्तों, फलों और फूलों से सजे वृक्ष इतने सुंदर थे कि उनकी समृद्धि के सामने कल्पवृक्ष भी लजा जाएँ। चातक, कोयल, तोते और चकोर मधुर स्वर में बोल रहे थे तथा मोर नाच रहे थे। वाटिका के मध्य मणियों की सीढ़ियों वाला सुंदर सरोवर था। निर्मल जल में अनेक रंगों के कमल खिले थे, जलपक्षी कलरव कर रहे थे और भौंरे गूँज रहे थे।
परम रम्य आरामु यहु जो रामहि सुख देत॥२२७॥
सरल अर्थ: वाटिका और सरोवर देखकर श्रीराम तथा लक्ष्मणजी प्रसन्न हुए। वह उद्यान वास्तव में अत्यंत रमणीय था, क्योंकि वह सबको सुख देने वाले श्रीराम को भी सुख दे रहा था।
तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई॥
संग सखीं सब सुभग सयानी। गावहिं गीत मनोहर बानी॥
सर समीप गिरिजा गृह सोहा। बरनि न जाइ देखि मनु मोहा॥
सरल अर्थ: चारों ओर देखकर और मालियों से अनुमति लेकर दोनों भाई प्रसन्न मन से पत्र-पुष्प लेने लगे। उसी समय सीताजी वहाँ आईं; उनकी माता ने उन्हें गिरिजाजी की पूजा के लिए भेजा था। साथ की सुंदर और समझदार सखियाँ मधुर गीत गा रही थीं। सरोवर के निकट गिरिजाजी का मंदिर मन मोह लेने वाला था।
पूजा कीन्हि अधिक अनुरागा। निज अनुरूप सुभग बरु मागा॥
एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई॥
तेहि दोउ बंधु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई॥
सरल अर्थ: सीताजी सखियों के साथ सरोवर में स्नान करके प्रसन्न मन से गौरीजी के मंदिर गईं। उन्होंने बहुत प्रेम से पूजा की और अपने अनुरूप सुंदर वर माँगा। एक सखी फूलों की वाटिका देखने गई थी। वहाँ दोनों भाइयों के दर्शन करके वह प्रेम से विह्वल होकर सीताजी के पास लौटी।
कहु कारनु निज हरष कर पूछहिं सब मृदु बैन॥२२८॥
सरल अर्थ: सखियों ने देखा कि उस सखी का शरीर पुलकित है और आँखों में प्रेमाश्रु हैं। सबने कोमल वाणी में पूछा—अपने इस आनंद का कारण बताओ।
अगले भाग में
बालकाण्ड भाग 46: सखी द्वारा श्रीराम-लक्ष्मण की छवि का वर्णन और पुष्पवाटिका में श्रीसीतारामजी का प्रथम परस्पर दर्शन—दोहा 229 से आगे।

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