श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 44 — श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर दर्शन और नगरवासियों का प्रेम
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 44
श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर दर्शन • दिव्य स्वरूप • नगरवासियों का प्रेम
कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 43 में महर्षि विश्वामित्र के साथ श्रीराम और लक्ष्मणजी मिथिला पहुँचे। राजा जनक ने दोनों भाइयों का दिव्य स्वरूप देखकर उनका परिचय पूछा और आदरपूर्वक उनके निवास की व्यवस्था की। अब लक्ष्मणजी जनकपुर देखने की इच्छा करते हैं और गुरु की आज्ञा से दोनों भाई नगर-दर्शन के लिए निकलते हैं।
इस भाग की सीमा: दोहा 218 से दोहा 223 तक।
प्रभु भय बहुरि मुनिहि सकुचाहीं। प्रगट न कहहिं मनहिं मुसुकाहीं॥
राम अनुज मन की गति जानी। भगत बछलता हिंयँ हुलसानी॥
परम बिनीत सकुचि मुसुकाई। बोले गुर अनुसासन पाई॥
सरल अर्थ: लक्ष्मणजी के मन में जनकपुर देखकर लौटने की बड़ी इच्छा थी, किंतु वे श्रीराम और गुरु विश्वामित्रजी के संकोच से उसे प्रकट नहीं कर रहे थे। भक्तवत्सल श्रीराम ने छोटे भाई के मन की इच्छा जान ली और विनम्रतापूर्वक गुरु से आज्ञा माँगने लगे।
जौं राउर आयसु मैं पावौं। नगर देखाइ तुरत लै आवौ॥
सुनि मुनीसु कह बचन सप्रीती। कस न राम तुम्ह राखहु नीती॥
धरम सेतु पालक तुम्ह ताता। प्रेम बिबस सेवक सुखदाता॥
सरल अर्थ: श्रीराम ने कहा—हे नाथ! लक्ष्मण नगर देखना चाहते हैं, पर संकोच के कारण कह नहीं पा रहे। आपकी आज्ञा हो तो मैं उन्हें नगर दिखाकर शीघ्र लौटा लाऊँ। विश्वामित्रजी प्रेमपूर्वक बोले—हे राम! तुम धर्म की मर्यादा रखने वाले और प्रेमवश सेवकों को सुख देने वाले हो, फिर यह उचित इच्छा क्यों पूरी न हो?
करहु सुफल सब के नयन सुंदर बदन देखाइ॥२१८॥
सरल अर्थ: मुनि ने कहा—हे सुख के धाम दोनों भाइयो! जाकर नगर देख आओ और अपने सुंदर मुख के दर्शन देकर सभी नगरवासियों के नेत्र सफल करो।
बालक बृंदि देखि अति सोभा। लगे संग लोचन मनु लोभा॥
पीत बसन परिकर कटि भाथा। चारु चाप सर सोहत हाथा॥
तन अनुहरत सुचंदन खोरी। स्यामल गौर मनोहर जोरी॥
सरल अर्थ: गुरु के चरण-कमलों की वंदना करके दोनों भाई नगर की ओर चले। उनका रूप संसार के नेत्रों को सुख देने वाला था। नगर के बालक उनकी सुंदरता देखकर मोहित हो गए और साथ चलने लगे। पीले वस्त्र, कमर में तरकस, हाथों में धनुष-बाण और शरीर पर सुंदर चंदन से श्याम-गौर भाइयों की जोड़ी अत्यंत मनोहर लग रही थी।
सुभग सोन सरसीरुह लोचन। बदन मयंक तापत्रय मोचन॥
कानन्हि कनक फूल छबि देहीं। चितवत चितहि चोरि जनु लेहीं॥
चितवनि चारु भृकुटि बर बाँकी। तिलक रेखा सोभा जनु चाँकी॥
सरल अर्थ: उनके सिंह के समान कंधे, विशाल भुजाएँ और वक्षस्थल पर सुंदर मणियों की माला शोभित थी। कमल-समान नेत्र और चंद्रमा-समान मुख तीनों तापों को हरने वाले थे। कानों के स्वर्णाभूषण, मन हर लेने वाली दृष्टि, बाँकी भौंहें और ललाट का तिलक उनकी दिव्य शोभा बढ़ा रहे थे।
नख सिख सुंदर बंधु दोउ सोभा सकल सुदेस॥२१९॥
सरल अर्थ: सुंदर चौकोनी टोपियाँ और घुँघराले काले केश उनके सिर पर शोभित थे। दोनों भाई नख से शिख तक इतने सुंदर थे कि मानो समस्त सुंदरता उन्हीं में समा गई हो।
धाए धाम काम सब त्यागी। मनहु रंक निधि लूटन लागी॥
निरखि सहज सुंदर दोउ भाई। होहिं सुखी लोचन फल पाई॥
जुबतीं भवन झरोखन्हि लागीं। निरखहिं राम रूप अनुरागीं॥
सरल अर्थ: जब नगरवासियों ने सुना कि दोनों राजकुमार नगर देखने आए हैं, तो वे घर और काम छोड़कर ऐसे दौड़े मानो किसी निर्धन को खजाना मिल गया हो। दोनों भाइयों का दर्शन करके सबके नेत्र सफल हो गए। युवतियाँ भवनों के झरोखों से प्रेमपूर्वक श्रीराम का रूप निहारने लगीं।
सुर नर असुर नाग मुनि माहीं। सोभा असि कहुँ सुनिअति नाहीं॥
बिष्नु चारि भुज बिघि मुख चारी। बिकट बेष मुख पंच पुरारी॥
अपर देउ अस कोउ न आही। यह छबि सखि पटतरिअ जाही॥
सरल अर्थ: स्त्रियाँ आपस में कहती हैं—सखी! इनकी सुंदरता करोड़ों कामदेवों को भी मात देती है। देवता, मनुष्य, असुर, नाग और मुनियों में ऐसी छवि कहीं सुनने में नहीं आती। ब्रह्मा, विष्णु और शिवजी के स्वरूप भी इन राजकुमारों की सहज मानवीय सुंदरता की उपमा नहीं बन सकते।
अंग अंग पर वारिअहिं कोटि कोटि सत काम॥२२०॥
सरल अर्थ: किशोर अवस्था वाले श्याम और गौर वर्ण के दोनों भाई सौंदर्य तथा सुख के धाम हैं। उनके प्रत्येक अंग पर करोड़ों-करोड़ों कामदेवों की सुंदरता न्योछावर की जा सकती है।
कोउ सप्रेम बोली मृदु बानी। जो मैं सुना सो सुनहु सयानी॥
ए दोऊ दसरथ के ढोटा। बाल मरालन्हि के कल जोटा॥
मुनि कौसिक मख के रखवारे। जिन्ह रन अजिर निसाचर मारे॥
सरल अर्थ: एक सखी कहती है—ऐसा कौन प्राणी होगा जो यह रूप देखकर मोहित न हो? दूसरी प्रेमपूर्वक उनका परिचय देती है कि ये राजा दशरथ के पुत्र हैं। इन्होंने विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा की और युद्धभूमि में राक्षसों का वध किया है।
कौसल्या सुत सो सुख खानी। नामु रामु धनु सायक पानी॥
गौर किसोर बेषु बर काछें। कर सर चाप राम के पाछें॥
लछिमनु नामु राम लघु भ्राता। सुनु सखि तासु सुमित्रा माता॥
सरल अर्थ: श्याम शरीर और कमल जैसे नेत्रों वाले, मारीच और सुबाहु का अभिमान मिटाने वाले कौशल्यापुत्र का नाम राम है। उनके पीछे धनुष-बाण धारण किए गौरवर्ण किशोर छोटे भाई लक्ष्मण हैं, जिनकी माता सुमित्राजी हैं।
आए देखन चापमख सुनि हरषीं सब नारि॥२२१॥
सरल अर्थ: दोनों भाइयों ने मुनि का यज्ञ पूर्ण कराया, मार्ग में अहल्याजी का उद्धार किया और अब धनुष-यज्ञ देखने आए हैं। यह परिचय सुनकर नगर की सभी स्त्रियाँ अत्यंत प्रसन्न हुईं।
जौ सखि इन्हहि देख नरनाहू। पन परिहरि हठि करइ बिबाहू॥
कोउ कह ए भूपति पहिचाने। मुनि समेत सादर सनमाने॥
सखि परंतु पनु राउ न तजई। बिधि बस हठि अबिबेकहि भजई॥
सरल अर्थ: श्रीराम की छवि देखकर एक स्त्री कहती है कि यही वर जानकीजी के योग्य हैं। यदि राजा जनक इन्हें देख लें तो धनुष तोड़ने की प्रतिज्ञा छोड़कर भी विवाह कर दें। दूसरी कहती है कि राजा इन्हें पहचानकर आदर दे चुके हैं, पर वे अपनी प्रतिज्ञा नहीं छोड़ेंगे।
तौ जानकिहि मिलिहि बरु एहू। नाहिन आलि इहाँ संदेहू॥
जौ बिधि बस अस बनै सँजोगू। तौ कृतकृत्य होइ सब लोगू॥
सखि हमरें आरति अति तातें। कबहुँक ए आवहिं एहि नातें॥
सरल अर्थ: कोई कहती है—यदि विधाता सचमुच सबको उचित फल देते हैं तो जानकीजी को यही वर अवश्य मिलेंगे। यदि यह शुभ संयोग बन गया तो सभी नगरवासी धन्य हो जाएँगे और विवाह के संबंध से हमें बार-बार इनके दर्शन प्राप्त होंगे।
यह संघटु तब होइ जब पुन्य पुराकृत भूरि॥२२२॥
सरल अर्थ: वे कहती हैं—यदि यह विवाह न हुआ तो हमें इनके दर्शन दुर्लभ हो जाएँगे। ऐसा सुंदर संयोग तभी बनता है जब पूर्वजन्मों के बहुत बड़े पुण्य उदय होते हैं।
कोउ कह संकर चाप कठोरा। ए स्यामल मृदुगात किसोरा॥
सबु असमंजस अहइ सयानी। यह सुनि अपर कहइ मृदु बानी॥
सखि इन्ह कहँ कोउ कोउ अस कहहीं। बड़ प्रभाउ देखत लघु अहहीं॥
सरल अर्थ: सभी इस विवाह को जनकपुर के लिए कल्याणकारी मानती हैं, लेकिन किसी को कठोर शिवधनुष और श्रीराम के कोमल किशोर शरीर को देखकर चिंता होती है। तब दूसरी सखी समझाती है कि ये देखने में भले ही किशोर हैं, पर इनका प्रभाव अत्यंत महान है।
सो कि रहिहि बिनु सिवधनु तोरें। यह प्रतीति परिहरिअ न भोरें॥
जेहिं बिरंचि रचि सीय सँवारी। तेहिं स्यामल बरु रचेउ बिचारी॥
तासु बचन सुनि सब हरषानीं। ऐसेइ होउ कहहिं मुदु बानी॥
सरल अर्थ: जिनके चरण-कमलों की धूलि छूकर अहल्याजी पापमुक्त हो गईं, क्या वे शिवधनुष तोड़े बिना रहेंगे? जिस विधाता ने सीताजी को रचा है, उसी ने विचारपूर्वक यह श्यामवर्ण वर भी बनाया है। यह सुनकर सभी स्त्रियाँ प्रसन्न होकर कहती हैं—ऐसा ही हो।
जाहिं जहाँ जहँ बंधु दोउ तहँ तहँ परमानंद॥२२३॥
सरल अर्थ: सुंदर मुख और नेत्रों वाली स्त्रियाँ हृदय में हर्षित होकर दोनों भाइयों पर पुष्प बरसाती हैं। श्रीराम और लक्ष्मण जहाँ-जहाँ जाते हैं, वहाँ-वहाँ परम आनंद छा जाता है।
अगले भाग में
बालकाण्ड भाग 45: श्रीराम-लक्ष्मण द्वारा धनुष-यज्ञशाला का दर्शन, गुरु-सेवा और पुष्पवाटिका की ओर प्रस्थान—दोहा 224 से आगे।


टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
🙏 जय श्री राम 🙏
अपनी श्रद्धा, सुझाव या प्रतिक्रिया कमेंट में अवश्य लिखें।
कृपया भाषा शालीन और सम्मानजनक रखें।
🚩 भक्ति भावना परिवार से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद।