शीर्षक: श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 43 — मिथिला आगमन, जनकपुर की शोभा और श्रीराम-लक्ष्मण से राजा जनक की प्रथम भेंट
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 43
मिथिला आगमन • जनकपुर की दिव्य शोभा • राजा जनक की श्रीराम-लक्ष्मण से प्रथम भेंट
कथा कहाँ से आगे बढ़ रही है: भाग 42 दोहा 211 पर अहल्या-उद्धार और उनकी श्रीराम-स्तुति के साथ पूर्ण हुआ था। अब महर्षि विश्वामित्र श्रीराम और लक्ष्मणजी को लेकर गंगाजी पार करते हुए मिथिला पहुँचते हैं। यहाँ जनकपुर की अनुपम शोभा और राजा जनक की दोनों भाइयों से प्रथम भेंट का भावपूर्ण वर्णन आता है।
इस भाग की सीमा: दोहा 212 से दोहा 217 तक।
गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई॥
तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्हि पाए॥
हरषि चले मुनि बृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर निअराया॥
सरल अर्थ: श्रीराम और लक्ष्मणजी महर्षि विश्वामित्र के साथ जगत को पवित्र करने वाली गंगाजी के तट पर पहुँचे। विश्वामित्रजी ने गंगा के पृथ्वी पर अवतरण की कथा सुनाई। स्नान और ब्राह्मणों को दान देने के बाद पूरा मुनि-समूह प्रसन्नतापूर्वक मिथिला की ओर बढ़ा।
बापीं कूप सरित सर नाना। सलिल सुधासम मनि सोपाना॥
गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा॥
बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता॥
सरल अर्थ: मिथिला की सुंदरता देखकर श्रीराम और लक्ष्मणजी अत्यंत प्रसन्न हुए। नगर के आसपास बावड़ियाँ, कुएँ, नदियाँ और सरोवर थे, जिनका जल अमृत के समान निर्मल था। पुष्पों पर भौंरे गुंजार कर रहे थे, रंग-बिरंगे पक्षी मधुर स्वर में बोल रहे थे और शीतल-सुगंधित वायु मन को आनंद दे रही थी।
फूलत फलत सुपल्लवत सोहत पुर चहुँ पास॥२१२॥
सरल अर्थ: जनकपुर के चारों ओर पुष्प-वाटिकाएँ, बगीचे और पक्षियों से भरे वन थे। फूलों, फलों और हरे-भरे पत्तों से सुसज्जित यह प्राकृतिक शोभा नगर को अत्यंत मनोहर बना रही थी।
चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी॥
धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठ सकल बस्तु लै नाना॥
चौहट सुंदर गलीं सुहाई। संतत रहहिं सुगंध सिंचाई॥
सरल अर्थ: जनकपुर की सुंदरता का पूरा वर्णन कर पाना कठिन था। जहाँ भी दृष्टि जाती, मन वहीं आकर्षित हो जाता। सुंदर बाजार, बहुमूल्य वस्तुओं से सजी दुकानें और सुगंधित जल से सींची स्वच्छ गलियाँ नगर की समृद्धि और व्यवस्था प्रकट करती थीं।
पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता॥
अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि बिलासू॥
होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन सोभा जनु रोकी॥
सरल अर्थ: नगर के घर शुभ और कलात्मक थे। वहाँ के स्त्री-पुरुष सुंदर, पवित्र आचरण वाले, धर्मशील, ज्ञानी और गुणवान थे। राजा जनक का महल इतना अद्भुत था कि देवता भी उसकी शोभा देखकर चकित हो जाएँ; ऐसा लगता था मानो संसार की सारी सुंदरता वहीं एकत्र हो गई हो।
सिय निवास सुंदर सदन सोभा किमि कहि जाति॥२१३॥
सरल अर्थ: उज्ज्वल भवनों में रत्न, स्वर्ण और सुंदर सजावट का अद्भुत संयोजन था। माता सीताजी के निवास की शोभा इतनी अनुपम थी कि उसका वर्णन शब्दों में संभव नहीं था।
बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला॥
सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृपगृह सरिस सदन सब केरे॥
पुर बाहेर सर सारित समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा॥
सरल अर्थ: राजमहल के द्वार मजबूत और सुंदर थे। वहाँ राजाओं, कलाकारों, प्रशस्ति गाने वालों तथा योद्धाओं की भीड़ थी। विशाल घुड़साल, हाथीशालाएँ और रथों की पंक्तियाँ थीं। धनुष-यज्ञ के लिए आए अनेक राजा नगर के बाहर सरोवरों और नदियों के समीप ठहरे हुए थे।
कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुबीर सुजाना॥
भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिबृंद समेता॥
बिस्वामित्र महामुनि आए। समाचार मिथिलापति पाए॥
सरल अर्थ: विश्वामित्रजी को एक सुंदर और सुविधाजनक आम्र-वाटिका दिखाई दी। उन्होंने वहीं ठहरने की इच्छा प्रकट की। श्रीराम की सहमति से मुनि-समूह वहाँ ठहर गया। महर्षि विश्वामित्र के आगमन का समाचार शीघ्र ही राजा जनक तक पहुँच गया।
चले मिलन मुनिनायकहि मुदित राउ एहि भाँति॥२१४॥
सरल अर्थ: राजा जनक अपने मंत्रियों, वीर योद्धाओं, श्रेष्ठ ब्राह्मणों, गुरुजनों और संबंधियों को साथ लेकर प्रसन्न मन से महर्षि विश्वामित्र का स्वागत करने चले।
बिप्रबृंद सब सादर बंदे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे॥
कुसल प्रस्न कहि बारहिं बारा। बिस्वामित्र नृपहि बैठारा॥
तेहि अवसर आए दोउ भाई। गए रहे देखन फुलवाई॥
सरल अर्थ: राजा जनक ने विश्वामित्रजी के चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया और मुनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। राजा ने सभी ब्राह्मणों का आदर किया और स्वयं को भाग्यशाली माना। कुशल-क्षेम पूछने के बाद बातचीत चल ही रही थी कि पुष्प-वाटिका देखने गए श्रीराम और लक्ष्मणजी लौट आए।
उठे सकल जब रघुपति आए। बिस्वामित्र निकट बैठाए॥
भए सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता॥
मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी॥
सरल अर्थ: एक श्याम और दूसरे गौर वर्ण के दोनों कोमल किशोर अपने रूप से आँखों को सुख और संसार के मन को आकर्षित करने वाले थे। उनके आते ही सब लोग सम्मान से उठ खड़े हुए। दोनों भाइयों को देखकर सबकी आँखें प्रेम से भर गईं और शरीर रोमांचित हो उठा। देहाभिमान से रहित राजा जनक भी उनके स्वरूप में ऐसे मग्न हुए कि मानो शरीर की सुध ही भूल गए।
बोलेउ मुनि पद नाइ सिरु गदगद गिरा गभीर॥२१५॥
सरल अर्थ: राजा जनक का मन प्रेम में डूब गया था। उन्होंने विवेक से स्वयं को संभाला, महर्षि के चरणों में सिर झुकाया और भाव-विह्वल गंभीर वाणी में दोनों किशोरों के विषय में पूछा।
ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि की सोइ आवा॥
सहज बिरागरुप मनु मोरा। थकित होत जिमि चंद चकोरा॥
ताते प्रभु पूछउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करहु दुराऊ॥
सरल अर्थ: जनकजी पूछते हैं—ये दोनों सुंदर बालक मुनि-कुल के हैं या किसी राजवंश के रक्षक? अथवा वे वही परम ब्रह्म हैं जिन्हें वेद ‘नेति-नेति’ कहते हैं और जो दो रूपों में प्रकट हुए हैं? मेरा स्वभावतः वैरागी मन भी इनके दर्शन से चकोर की भाँति मोहित हो गया है, इसलिए कृपया इनका परिचय बताइए।
कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका॥
ए प्रिय सबहि जहाँ लगि प्रानी। मन मुसुकाहिं रामु सुनि बानी॥
रघुकुल मनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए॥
सरल अर्थ: जनकजी कहते हैं कि इन दोनों को देखकर उनका मन ब्रह्मानंद को भी छोड़कर सहज प्रेम में खिंच गया है। विश्वामित्रजी मुस्कराकर कहते हैं कि आपका अनुभव असत्य नहीं है—ये सभी प्राणियों को प्रिय लगते हैं। फिर वे बताते हैं कि ये रघुकुल-शिरोमणि राजा दशरथ के पुत्र हैं और राजा ने इन्हें उनके साथ भेजा है।
मख राखेउ सबु साखि जगु जिते असुर संग्राम॥२१६॥
सरल अर्थ: ये श्रेष्ठ भाई श्रीराम और लक्ष्मण हैं—रूप, शील और बल के धाम। उन्होंने विश्वामित्रजी के यज्ञ की रक्षा की और युद्ध में असुरों को पराजित किया, जिसका संसार साक्षी है।
सुंदर स्याम गौर दोउ भ्राता। आनँदहू के आनँद दाता॥
इन्ह कै प्रीति परसपर पावनि। कहि न जाइ मन भाव सुहावनि॥
सुनहु नाथ कह मुदित बिदेहू। ब्रह्म जीव इव सहज सनेहू॥
सरल अर्थ: जनकजी कहते हैं कि मुनि के चरणों और इन दोनों भाइयों का दर्शन उनके किस महान पुण्य का फल है, यह वे कह नहीं सकते। श्याम और गौर दोनों भाई आनंद को भी आनंद देने वाले हैं। उनका परस्पर प्रेम इतना पवित्र है जैसे ब्रह्म और जीव का स्वाभाविक, गहरा संबंध।
म्रुनिहि प्रसंसि नाइ पद सीसू। चलेउ लवाइ नगर अवनीसू॥
सुंदर सदनु सुखद सब काला। तहाँ बासु लै दीन्ह भुआला॥
करि पूजा सब बिधि सेवकाई। गयउ राउ गृह बिदा कराई॥
सरल अर्थ: राजा जनक बार-बार श्रीराम को निहारते रहे; उनका शरीर रोमांचित और हृदय आनंद से भर गया। उन्होंने मुनि की प्रशंसा करके चरणों में प्रणाम किया और सभी को आदरपूर्वक नगर में ले गए। सुंदर तथा सुखद भवन में निवास की व्यवस्था, पूजा और सेवा करके राजा अनुमति लेकर अपने महल लौटे।
बैठे प्रभु भ्राता सहित दिवसु रहा भरि जामु॥२१७॥
सरल अर्थ: रघुवंश-मणि श्रीराम ने ऋषियों और लक्ष्मणजी के साथ भोजन करके कुछ विश्राम किया। दिन का लगभग एक पहर शेष रहने पर दोनों भाई मुनि के समीप बैठे थे।
अगले भाग में
बालकाण्ड भाग 44: श्रीराम-लक्ष्मण का जनकपुर दर्शन, नगरवासियों का प्रेम और दोनों भाइयों के दिव्य स्वरूप का वर्णन—दोहा 218 से 223 तक।


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