श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 2 | खल वंदना, संत-असंत स्वभाव और जीवमात्र वंदना अर्थ सहित
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
🚩 भक्ति भावना प्रस्तुत
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड • भाग 2
खल वंदना • संत-असंत • गुण-दोष विवेक • संगति का प्रभाव
भाग 2 में मूल पाठ को लगातार क्रम में विस्तृत रखा गया है। चौपाई/दोहा बड़े ग्रंथ-अक्षरों में और प्रत्येक खंड के नीचे सरल, मौलिक अर्थ दिया गया है।
खल वंदना
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ। जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें। उजरें हरष बिषाद बसेरें॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी यहाँ दुष्ट स्वभाव का चित्र खींचते हुए उनसे भी विनय करते हैं। दूसरों की हानि में सुख मानना ऐसे स्वभाव की प्रमुख पहचान बताई गई है।
खल स्वभाव
हरि हर जस राकेस राहु से। पर अकाज भट सहसबाहु से॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
जे पर दोष लखहिं सहसाखी। पर हित घृत जिन्ह के मन माखी॥
सरल अर्थ — दुष्ट व्यक्ति दूसरों के दोष खोजने और अच्छे कार्य में बाधा डालने को तत्पर रहता है।
खल स्वभाव
तेज कृसानु रोष महिषेसा। अघ अवगुन धन धनी धनेसा॥
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥
उदय केत सम हित सबही के। कुंभकरन सम सोवत नीके॥
सरल अर्थ — यहाँ उपमाओं के माध्यम से क्रोध, अवगुण और दूसरों के हित में बाधा पहुँचाने वाली प्रवृत्ति का वर्णन है।
खल स्वभाव
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं। जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥
बंदउँ खल जस सेष सरोषा। सहस बदन बरनइ पर दोषा॥
सरल अर्थ — जैसे ओले खेती को हानि पहुँचाकर स्वयं भी गल जाते हैं, वैसे ही दुष्ट दूसरों की हानि में अपनी हानि की भी चिंता नहीं करते।
खल स्वभाव
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना। पर अघ सुनइ सहस दस काना॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही। संतत सुरानीक हित जेही॥
सरल अर्थ — व्यंग्यपूर्ण उपमाओं से परदोष सुनने और उसी में रुचि रखने की प्रवृत्ति बताई गई है।
खल स्वभाव
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा। सहस नयन पर दोष निहारा॥
सरल अर्थ — कठोर वचन और दूसरों के दोष देखने की आदत से सावधान रहने का संकेत मिलता है।
दोहा 4
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति।
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥४॥
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति॥४॥
सरल अर्थ — दुष्ट स्वभाव वाला व्यक्ति मित्र, शत्रु या उदासीन—किसी का भी हित देखकर जल सकता है; कवि उनसे हाथ जोड़कर विनय करते हैं।
संत-असंत वंदना
मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा। तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥
बायस पलिअहिं अति अनुरागा। होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा॥
सरल अर्थ — कवि कहते हैं कि उन्होंने अपनी ओर से विनय कर दी, पर स्वभाव आसानी से नहीं बदलता।
संत-असंत का अंतर
बंदउँ संत असज्जन चरना। दुखप्रद उभय बीच कछु बरना॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं। मिलत एक दुख दारुन देहीं॥
सरल अर्थ — संत से बिछुड़ना दुःख देता है, जबकि असंत का मिलना दुःखदायी होता है—यही दोनों के बीच का अंतर बताया गया है।
संत-असंत का अंतर
उपजहिं एक संग जग माहीं। जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं॥
सुधा सुरा सम साधू असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥
सुधा सुरा सम साधू असाधू। जनक एक जग जलधि अगाधू॥
सरल अर्थ — एक ही संसार में जन्म लेकर भी संत और असंत के गुण कमल और जोंक, अमृत और मदिरा की तरह भिन्न हो सकते हैं।
गुण और कर्म
भल अनभल निज निज करतूती। लहत सुजस अपलोक बिभूती॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥
सुधा सुधाकर सुरसरि साधू। गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू॥
सरल अर्थ — मनुष्य अपने कर्मों के अनुसार यश या अपयश प्राप्त करता है; श्रेष्ठ और अशुभ स्वभाव का फल अलग-अलग होता है।
गुण और रुचि
गुन अवगुन जानत सब कोई। जो जेहि भाव नीक तेहि सोई॥
सरल अर्थ — गुण-अवगुण ज्ञात होने पर भी व्यक्ति अपनी रुचि और स्वभाव के अनुसार चुनाव करता है।
दोहा 5
भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु।
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥५॥
सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु॥५॥
सरल अर्थ — भला व्यक्ति भलाई ग्रहण करता है और नीच प्रवृत्ति नीचता को; वस्तु का प्रभाव उसके गुण से पहचाना जाता है।
गुण-दोष विवेचन
खल अघ अगुन साधू गुन गाहा। उभय अपार उदधि अवगाहा॥
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥
तेहि तें कछु गुन दोष बखाने। संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने॥
सरल अर्थ — गुण और दोष दोनों विशाल हैं; सही ग्रहण और त्याग के लिए पहले उनकी पहचान आवश्यक है।
सृष्टि में द्वंद्व
भलेउ पोच सब बिधि उपजाए। गनि गुन दोष बेद बिलगाए॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥
कहहिं बेद इतिहास पुराना। बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना॥
सरल अर्थ — संसार में शुभ-अशुभ दोनों हैं; विवेक उनके गुण-दोष को अलग पहचानना सिखाता है।
सृष्टि में द्वंद्व
दुख सुख पाप पुन्य दिन राती। साधु असाधु सुजाति कुजाती॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥
दानव देव ऊँच अरु नीचू। अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू॥
सरल अर्थ — दुःख-सुख, पाप-पुण्य और अनेक विरोधी स्थितियों से संसार बना है।
सृष्टि में द्वंद्व
माया ब्रह्म जीव जगदीसा। लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा॥
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥
कासी मग सुरसरि क्रमनासा। मरु मारव महिदेव गवासा॥
सरल अर्थ — तुलसीदासजी अनेक विपरीत उदाहरणों द्वारा संसार की विविधता और द्वंद्व को सामने रखते हैं।
सृष्टि में द्वंद्व
सरग नरक अनुराग बिरागा। निगमागम गुन दोष बिभागा॥
सरल अर्थ — स्वर्ग-नरक और अनुराग-वैराग्य जैसे भेद भी विवेकपूर्वक समझने योग्य बताए गए हैं।
दोहा 6
जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥६॥
संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार॥६॥
सरल अर्थ — संसार गुण और दोष दोनों से युक्त है; संत हंस की तरह सार ग्रहण कर विकार छोड़ देते हैं।
विवेक और संगति
अस बिबेक जब देइ बिधाता। तब तजि दोष गुनहिं मनु राता॥
काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई॥
काल सुभाउ करम बरिआई। भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई॥
सरल अर्थ — विवेक मिलने पर मन दोष छोड़कर गुणों में अनुरक्त होता है; परिस्थितियाँ कभी-कभी अच्छे व्यक्ति से भी चूक करा सकती हैं।
सज्जनता का प्रभाव
सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं। दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥
खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू। मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू॥
सरल अर्थ — सज्जन सुधार और कल्याण की ओर ले जाते हैं; अच्छी संगति का प्रभाव दुष्ट पर भी पड़ सकता है, यद्यपि गहरा स्वभाव बदलना कठिन है।
वेष और वास्तविकता
लखि सुबेष जग बंचक जेऊ। बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ॥
उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
उधरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू॥
सरल अर्थ — केवल बाहरी वेष से वास्तविक चरित्र सिद्ध नहीं होता; अंततः आचरण ही सच्चाई प्रकट करता है।
वेष और सम्मान
किएहुँ कुबेष साधु सनमानू। जिमि जग जामवंत हनुमानू॥
सरल अर्थ — सच्चे गुण बाहरी रूप से बड़े होते हैं; सज्जनता अपने गुणों के कारण सम्मान पाती है।
संगति का प्रभाव
हानि कुसंग सुसंगति लाहू। लोकहुँ बेद बिदित सब काहू॥
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा। कीचहिं मिलइ नीच जल संगा॥
सरल अर्थ — सत्संग लाभकारी और कुसंग हानिकारक है। धूल हवा के साथ ऊपर उठती है, जबकि दूषित जल से मिलकर कीचड़ बन जाती है।
संगति का प्रभाव
साधु असाधु सदन सुक सारीं। सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी॥
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥
धूम कुसंगति कारिख होई। लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई॥
सरल अर्थ — एक ही साधन संगति के अनुसार अलग परिणाम देता है—संगति मनुष्य की दिशा बदल सकती है।
संगति का प्रभाव
सोइ जल अनल अनिल संघाता। होइ जलद जग जीवन दाता॥
सरल अर्थ — उचित संयोग वही तत्व जीवनदायी रूप धारण कर सकता है; यहाँ संगति की शक्ति को रूपक से समझाया गया है।
दोहा 7(क)
ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥७(क)॥
होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग॥७(क)॥
सरल अर्थ — सही या गलत संयोग से वस्तुओं का प्रभाव बदलता है; विवेकी व्यक्ति इस अंतर को पहचानता है।
दोहा 7(ख)
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥७(ख)॥
ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह॥७(ख)॥
सरल अर्थ — प्रकाश की दृष्टि से पक्ष समान लग सकते हैं, पर प्रभाव के आधार पर संसार उन्हें अलग नाम और मान देता है।
🌺 भाग 2 का भाव-संदेश
इस खंड का केंद्र विवेक और संगति है—संसार में गुण-दोष दोनों हैं, पर सज्जनता सार ग्रहण करना, दोष छोड़ना और सत्संग से जीवन को श्रेष्ठ दिशा देना सिखाती है।
🙏 और भक्ति सामग्री
॥ श्री सीताराम ॥ 🚩
Bhakti Bhavna • श्रीरामचरितमानस • बालकाण्ड
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
🙏 जय श्री राम 🙏
अपनी श्रद्धा, सुझाव या प्रतिक्रिया कमेंट में अवश्य लिखें।
कृपया भाषा शालीन और सम्मानजनक रखें।
🚩 भक्ति भावना परिवार से जुड़े रहने के लिए धन्यवाद।