श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 33 — मनु-शतरूपा को प्रभु दर्शन, पुत्ररूप वरदान और अवध अवतार का वचन
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 33
मनु–शतरूपा की प्रार्थना • प्रभु दर्शन • पुत्ररूप वरदान • अवध अवतार का वचन
भाग 32 दोहा 145 पर समाप्त हुआ था। अब मनु और शतरूपा प्रभु से उनके दिव्य स्वरूप के दर्शन की प्रार्थना करते हैं। भगवान प्रकट होकर उन्हें दर्शन देते हैं और अंततः स्वयं उनके पुत्र के रूप में अवध में अवतार लेने का वचन देते हैं।
चौपाई
सुनु सेवक सुरतरु सुरधेनु। बिधि हरि हर बंदित पद रेनू॥
सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥
सेवत सुलभ सकल सुख दायक। प्रनतपाल सचराचर नायक॥
सरल अर्थ: मनुजी प्रभु की स्तुति करते हैं—आप सेवकों के लिए कल्पवृक्ष और कामधेनु के समान हैं; आपके चरणों की रज ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी वंदित करते हैं।
चौपाई
जौं अनाथ हित हम पर नेहू। तौ प्रसन्न होइ यह बर देहू॥
जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं॥
जो सरूप बस सिव मन माहीं। जेहि कारन मुनि जतन कराहीं॥
सरल अर्थ: मनुजी कहते हैं—यदि हम पर आपकी कृपा है तो वही दिव्य स्वरूप दिखाइए जिसका शिवजी ध्यान करते और मुनि साधना करते हैं।
चौपाई
जो भुसुंडि मन मानस हंसा। सगुन अगुन जेहि निगम प्रसंसा॥
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥
देखहिं हम सो रूप भरि लोचन। कृपा करहु प्रनतारति मोचन॥
सरल अर्थ: वे उस सगुण-निर्गुण परम स्वरूप के प्रत्यक्ष दर्शन की प्रार्थना करते हैं जिसकी वेद प्रशंसा करते हैं।
चौपाई
दंपति बचन परम प्रिय लागे। मुदुल बिनीत प्रेम रस पागे॥
भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना॥
भगत बछल प्रभु कृपानिधाना। बिस्वबास प्रगटे भगवाना॥
सरल अर्थ: दंपति के विनम्र और प्रेमपूर्ण वचन सुनकर भक्तवत्सल प्रभु उनके सामने प्रकट हो गए।
दोहा 146
नील सरोरुह नील मनि नील नीरधर स्याम।
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम॥१४६॥
लाजहिं तन सोभा निरखि कोटि कोटि सत काम॥१४६॥
सरल अर्थ: प्रभु का श्याम शरीर नीले कमल, नीलमणि और वर्षा-मेघ के समान सुंदर था; उनकी शोभा के सामने असंख्य कामदेव भी लज्जित हों।
चौपाई
सरद मयंक बदन छबि सींवा। चारु कपोल चिबुक दर ग्रीवा॥
अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥
अधर अरुन रद सुंदर नासा। बिधु कर निकर बिनिंदक हासा॥
सरल अर्थ: उनका मुख शरद पूर्णिमा के चंद्रमा जैसा, कपोल-ठोड़ी और ग्रीवा मनोहर, होंठ लाल और मुस्कान चंद्रकिरणों को भी मात देने वाली थी।
चौपाई
नव अंबुज अंबक छबि नीकी। चितवनि ललित भावँती जी की॥
भृकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥
भृकुटि मनोज चाप छबि हारी। तिलक ललाट पटल दुतिकारी॥
सरल अर्थ: नवकमल जैसे नेत्र, मनमोहक दृष्टि, सुंदर भौंहें और तेजस्वी तिलक उनके मुखमंडल को अलौकिक बना रहे थे।
चौपाई
कुंडल मकर मुकुट सिर भ्राजा। कुटिल केस जनु मधुप समाजा॥
उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥
उर श्रीबत्स रुचिर बनमाला। पदिक हार भूषन मनिजाला॥
सरल अर्थ: मकराकृति कुंडल, मुकुट, घुँघराले केश, श्रीवत्स, वनमाला और मणिमय आभूषण प्रभु के दिव्य रूप को सुशोभित कर रहे थे।
चौपाई
केहरि कंधर चारु जनेऊ। बाहु बिभूषन सुंदर तेऊ॥
करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥
करि कर सरि सुभग भुजदंडा। कटि निषंग कर सर कोदंडा॥
सरल अर्थ: सिंह जैसी ग्रीवा, सुंदर यज्ञोपवीत और बलशाली भुजाएँ शोभित थीं; कमर में तरकस तथा हाथों में बाण और कोदंड धनुष था।
दोहा 147
तडित बिनिंदक पीत पट उदर रेख बर तीनि।
नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि॥१४७॥
नाभि मनोहर लेति जनु जमुन भवँर छबि छीनि॥१४७॥
सरल अर्थ: प्रभु का पीताम्बर बिजली की चमक को भी लजाता था; उदर की त्रिवली और नाभि अत्यंत मनोहर थी।
चौपाई
पद राजीव बरनि नहि जाहीं। मुनि मन मधुप बसहिं जेन्ह माहीं॥
बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥
बाम भाग सोभति अनुकूला। आदिसक्ति छबिनिधि जगमूला॥
सरल अर्थ: प्रभु के कमलवत चरण वर्णनातीत हैं। उनके बाईं ओर जगत की मूल आदिशक्ति, सौंदर्य की निधि श्रीसीताजी शोभित हैं।
चौपाई
जासु अंस उपजहिं गुनखानी। अगनित लच्छि उमा ब्रह्मानी॥
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥
भृकुटि बिलास जासु जग होई। राम बाम दिसि सीता सोई॥
सरल अर्थ: जिनकी शक्ति से लक्ष्मी, उमा और ब्रह्माणी जैसी शक्तियाँ प्रकट होती हैं, वही सीताजी श्रीराम के वामभाग में विराजमान हैं।
चौपाई
छबिसमुद्र हरि रूप बिलोकी। एकटक रहे नयन पट रोकी॥
चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा॥
चितवहिं सादर रूप अनूपा। तृप्ति न मानहिं मनु सतरूपा॥
सरल अर्थ: मनु और शतरूपा उस अनुपम दिव्य रूप को एकटक देखते रहे; दर्शन करते हुए भी उनका मन तृप्त नहीं होता था।
चौपाई
हरष बिबस तन दसा भुलानी। परे दंड इव गहि पद पानी॥
सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥
सिर परसे प्रभु निज कर कंजा। तुरत उठाए करुनापुंजा॥
सरल अर्थ: आनंद से देह की सुधि भूलकर दोनों प्रभु के चरण पकड़ भूमि पर गिर पड़े। प्रभु ने करकमल से उनके सिर छूकर उन्हें उठा लिया।
दोहा 148
बोले कृपानिधान पुनि अति प्रसन्न मोहि जानि।
मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि॥१४८॥
मागहु बर जोइ भाव मन महादानि अनुमानि॥१४८॥
सरल अर्थ: कृपानिधान प्रभु ने कहा—मुझे अत्यंत प्रसन्न और महान दानी जानकर अपने मन के अनुसार वर माँगो।
चौपाई
सुनि प्रभु बचन जोरि जुग पानी। धरि धीरजु बोली मृदु बानी॥
नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे॥
नाथ देखि पद कमल तुम्हारे। अब पूरे सब काम हमारे॥
सरल अर्थ: मनुजी ने हाथ जोड़कर कहा—हे नाथ! आपके चरणकमलों के दर्शन से हमारी सभी कामनाएँ पूर्ण हो गईं।
चौपाई
एक लालसा बड़ि उर माहीं। सुगम अगम कहि जात सो नाहीं॥
तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥
तुम्हहि देत अति सुगम गोसाईं। अगम लाग मोहि निज कृपनाईं॥
सरल अर्थ: फिर भी उनके हृदय में एक बड़ी इच्छा थी, जिसे माँगना उन्हें अपने संकोच के कारण कठिन लग रहा था।
चौपाई
जथा दरिद्र बिबुधतरु पाई। बहु संपति मागत सकुचाई॥
तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥
तासु प्रभाउ जान नहिं सोई। तथा हृदयँ मम संसय होई॥
सरल अर्थ: मनुजी अपनी दशा उस दरिद्र जैसी बताते हैं जो कल्पवृक्ष पाकर भी उसकी महिमा न जानने से बड़ी संपत्ति माँगने में संकोच करे।
चौपाई
सो तुम्ह जानहु अंतरजामी। पुरवहु मोर मनोरथ स्वामी॥
सकुच बिहाइ मागु नृप मोही। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥
सकुच बिहाइ मागु नृप मोही। मोरें नहिं अदेय कछु तोही॥
सरल अर्थ: मनुजी कहते हैं—आप अंतर्यामी हैं, मेरी इच्छा जानते हैं। प्रभु उन्हें संकोच छोड़कर माँगने को कहते हैं।
दोहा 149
दानि सिरोमनि कृपानिधि नाथ कहउँ सतिभाउ।
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ॥१४९॥
चाहउँ तुम्हहि समान सुत प्रभु सन कवन दुराउ॥१४९॥
सरल अर्थ: मनुजी अपने हृदय का सत्य भाव बताते हैं—हे प्रभु! मैं आपके समान पुत्र चाहता हूँ; आपसे भला क्या छिपाया जा सकता है।
चौपाई
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले। एवमस्तु करुनानिधि बोले॥
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई। नृप तव तनय होब मैं आई॥
सरल अर्थ: मनुजी का प्रेम देखकर प्रभु ने कहा—ऐसा ही हो। अपने समान दूसरा कहाँ खोजूँ? इसलिए मैं स्वयं तुम्हारा पुत्र बनूँगा।
चौपाई
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें। देबि मागु बरु जो रुचि तोरें॥
जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥
जो बरु नाथ चतुर नृप मागा। सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा॥
सरल अर्थ: प्रभु ने शतरूपा से भी वर माँगने को कहा। उन्होंने कहा कि राजा ने जो वर माँगा है वही उन्हें अत्यंत प्रिय है।
चौपाई
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई। जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई॥
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी। ब्रह्म सकल उर अंतरजामी॥
सरल अर्थ: शतरूपा विनम्र होकर कहती हैं कि प्रभु समस्त जगत के स्वामी और सबके हृदय के अंतर्यामी ब्रह्म हैं; इसलिए ऐसा वर माँगना बहुत बड़ा साहस है।
चौपाई
अस समुझत मन संसय होई। कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई॥
जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥
जे निज भगत नाथ तव अहहीं। जो सुख पावहिं जो गति लहहीं॥
सरल अर्थ: वे कहती हैं कि प्रभु का वचन सत्य है, पर वे साथ ही प्रभु के निज भक्तों को मिलने वाला सुख, गति और भक्ति भी चाहती हैं।
दोहा 150
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु।
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥१५०॥
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु॥१५०॥
सरल अर्थ: शतरूपा प्रार्थना करती हैं—हे प्रभु! हमें वही सुख, वही परम गति, वही भक्ति, आपके चरणों में वही प्रेम, वही विवेक और भक्तों जैसा आचरण दीजिए।
चौपाई
सुनि मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना। कृपासिंधु बोले मृदु बचना॥
जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥
जो कछु रुचि तुम्हरे मन माहीं। मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं॥
सरल अर्थ: शतरूपा की कोमल और गूढ़ प्रार्थना सुनकर प्रभु ने कहा—तुम्हारे मन की सभी इच्छाएँ मैंने पूर्ण कर दी हैं।
चौपाई
मातु बिबेक अलौकिक तोरें। कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें॥
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनति प्रभु मोरी॥
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी। अवर एक बिनति प्रभु मोरी॥
सरल अर्थ: प्रभु शतरूपा को अविनाशी विवेक का वर देते हैं। तब मनुजी पुनः चरण वंदना कर एक और प्रार्थना करते हैं।
चौपाई
सुत बिषइक तव पद रति होऊ। मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ॥
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना। मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना॥
सरल अर्थ: मनुजी चाहते हैं कि प्रभु-पुत्र के प्रति उनका प्रेम ऐसा हो कि वे प्रभु के बिना वैसे ही न रह सकें जैसे जल के बिना मछली।
चौपाई
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ। एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ॥
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी। बसहु जाइ सुरपति रजधानी॥
सरल अर्थ: प्रभु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और उन्हें इंद्र की राजधानी में जाकर निवास करने की आज्ञा दी।
सोरठा 151
तहँ करि भोग बिसाल तात गएँ कछु काल पुनि।
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥१५१॥
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत॥१५१॥
सरल अर्थ: प्रभु ने कहा—कुछ समय स्वर्ग के सुख भोगने के बाद तुम अवध के राजा बनोगे और तब मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में जन्म लूँगा।
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