श्रीरामचरितमानस बालकाण्ड भाग 53 — जयमाला और स्वयंवर का मंगलोत्सव
श्रीरामचरितमानस
बालकाण्ड — भाग 53
जयमाला और स्वयंवर का मंगलोत्सव
इस भाग का प्रसंग: जयमाला और स्वयंवर का मंगलोत्सव।
पाठ-सीमा: दोहा 263 के बाद से 268 तक का क्रमिक मूल पाठ; चौपाइयाँ, दोहे और जहाँ उपस्थित हैं वहाँ छंद तथा सोरठा सहित।
कर सरोज जयमाल सुहाई । बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई ॥
तन सकोचु मन परम उछाहू । गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू ॥
जाइ समीप राम छबि देखी । रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी ॥
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई । पहिरावहु जयमाल सुहाई ॥
सुनत जुगल कर माल उठाई । प्रेम बिबस पहिराइ न जाई ॥
सोहत जनु जुग जलज सनाला । ससिहि सभीत देत जयमाला ॥
गावहिं छबि अवलोकि सहेली । सियँ जयमाल राम उर मेली ॥
सरल भावार्थ: सखियों के बीच सीताजी महाछवि जैसी शोभित हैं। हाथ में जयमाला है; शरीर में संकोच और मन में उत्साह है। श्रीराम के निकट पहुँचकर वे चित्र जैसी स्थिर हो जाती हैं। सखियाँ माला पहनाने को कहती हैं। वे दोनों हाथ उठाती हैं, पर प्रेमविह्वलता से तुरंत पहना नहीं पातीं। सखियों के गीतों के बीच अंततः वे श्रीराम के वक्ष पर जयमाला डाल देती हैं।
सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन ॥२६४॥
सरल अर्थ: श्रीराम के वक्ष पर जयमाला देखकर देवता फूल बरसाते हैं। सभी अभिमानी राजा सूर्य देखकर संकुचित कुमुद जैसे लज्जित होते हैं।
सुर किंनर नर नाग मुनीसा । जय जय जय कहि देहिं असीसा ॥
नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं । बार बार कुसुमांजलि छूटीं ॥
जहँ तहँ बिप्र बेदधुनि करहीं । बंदी बिरदावलि उच्चरहीं ॥
महि पाताल नाक जसु ब्यापा । राम बरी सिय भंजेउ चापा ॥
करहिं आरती पुर नर नारी । देहिं निछावरि बित्त बिसारी ॥
सोहति सीय राम कै जौरी । छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी ॥
सखीं कहहिं प्रभुपद गहु सीता । करति न चरन परस अति भीता ॥
सरल भावार्थ: नगर और आकाश में बाजे बजते हैं। सज्जन आनंदित और दुष्ट मलिन होते हैं। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनि जय कहते तथा आशीर्वाद देते हैं। वेदध्वनि और यशगान फैलता है। लोग आरती करके धन निछावर करते हैं। श्रीसीताराम की जोड़ी सौंदर्य और श्रृंगार का संगम लगती है। सखियाँ सीताजी से प्रभु के चरण छूने को कहती हैं, पर वे संकोच करती हैं।
मन बिहसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि ॥२६५॥
सरल अर्थ: अहल्याजी के उद्धार का स्मरण करके सीताजी हाथ से चरण नहीं छूतीं। उनकी अलौकिक प्रीति जानकर श्रीराम मन में मुस्कुराते हैं।
उठि उठि पहिरि सनाह अभागे । जहँ तहँ गाल बजावन लागे ॥
लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ । धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ ॥
तोरें धनुषु चाड़ नहिं सरई । जीवत हमहि कुअँरि को बरई ॥
जौं बिदेहु कछु करै सहाई । जीतहु समर सहित दोउ भाई ॥
साधु भूप बोले सुनि बानी । राजसमाजहि लाज लजानी ॥
बलु प्रतापु बीरता बड़ाई । नाक पिनाकहि संग सिधाई ॥
सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई । असि बुधि तौ बिधि मुहँ मसि लाई ॥
सरल भावार्थ: कुछ दुष्ट राजा कवच पहनकर डींग हाँकते हैं कि सीता को छुड़ा लो, राजकुमारों को बाँध लो और जनक सहायता करें तो उन्हें भी युद्ध में जीत लो। सज्जन राजा उन्हें समझाते हैं कि उनकी वीरता तो धनुष के साथ ही टूट चुकी; अब ऐसा घमंड राजसभा को लज्जित करता है।
लखन रोषु पावकु प्रबल जानि सलभ जनि होहु ॥२६६॥
सरल अर्थ: ईर्ष्या, मद और क्रोध छोड़कर श्रीराम का भरपूर दर्शन करो। लक्ष्मणजी के प्रबल क्रोध को अग्नि जानकर उसमें पतंगे की तरह मत पड़ो।
जिमि चह कुसल अकारन कोही । सब संपदा चहै सिवद्रोही ॥
लोभी लोलुप कल कीरति चहई । अकलंकता कि कामी लहई ॥
हरि पद बिमुख परम गति चाहा । तस तुम्हार लालचु नरनाहा ॥
कोलाहलु सुनि सीय सकानी । सखीं लवाइ गईं जहँ रानी ॥
रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं । सिय सनेहु बरनत मन माहीं ॥
रानिन्ह सहित सोचबस सीया । अब धौं बिधिहि काह करनीया ॥
भूप बचन सुनि इत उत तकहीं । लखनु राम डर बोलि न सकहीं ॥
सरल भावार्थ: विवेकी राजा कहते हैं कि यह लालसा उतनी ही असंभव है जितनी कौए का गरुड़ की बलि चाहना या शिवद्रोही का समृद्धि चाहना। कोलाहल से डरी सीताजी को सखियाँ रानी के पास ले जाती हैं। श्रीराम सहज भाव से गुरु के पास लौटते हैं। सीता और रानियाँ चिंतित हैं। लक्ष्मणजी राजाओं की ओर देखते हैं, पर श्रीराम की मर्यादा से बोलते नहीं।
मनहुँ मत्त गजगन निरखि सिंघकिसोरहि चोप ॥२६७॥
सरल अर्थ: लाल नेत्रों और टेढ़ी भौंहों वाले लक्ष्मणजी राजाओं को क्रोध से देखते हैं, जैसे सिंह का बच्चा मदमत्त हाथियों को देखकर उत्साहित होता हो।
तेहिं अवसर सुनि सिव धनु भंगा । आयसु भृगुकुल कमल पतंगा ॥
देखि महीप सकल सकुचाने । बाज झपट जनु लवा लुकाने ॥
गौरि सरीर भूति भल भ्राजा । भाल बिसाल त्रिपुंड बिराजा ॥
सीस जटा ससिबदनु सुहावा । रिसबस कछुक अरुन होइ आवा ॥
भृकुटी कुटिल नयन रिस राते । सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते ॥
बृषभ कंध उर बाहु बिसाला । चारु जनेउ माल मृगछाला ॥
कटि मुनि बसन तून दुइ बाँधें । धनु सर कर कुठारु कल काँधें ॥
सरल भावार्थ: धनुषभंग सुनकर भृगुवंश के तेजस्वी परशुरामजी आते हैं। राजा बाज के झपटने पर छिपते पक्षियों जैसे संकुचित होते हैं। उनके गौर शरीर पर भस्म, माथे पर त्रिपुंड, सिर पर जटा और क्रोध से लाल नेत्र हैं। विशाल कंधे-भुजाएँ, यज्ञोपवीत, माला और मृगछाला शोभित हैं। हाथ में धनुष-बाण, कमर में तरकस और कंधे पर फरसा है।
धरि मुनितनु जनु बीर रसु आयउ जहँ सब भूप ॥२६८॥
सरल अर्थ: वेश शांत मुनि का है और कर्म कठोर वीर के हैं। लगता है जैसे वीररस स्वयं मुनि का शरीर धारण करके राजसभा में आया हो।

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